The Insiders: सीनियर आईपीएस पर सरकार की कृपा बरसी, दो आईएएस में हुई जोरदार भिडंत, आईएफएस की नजर में आप हैं दिमागी नक्सल
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें शहरों की बर्बादी पर आत्मचिंतन करते अफसरों का रूदाली प्रलाप
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | राजा भोज ने अपनी कालजयी रचना ‘समरांगण सूत्रधार’ में टाउन प्लानिंग का मूल उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखा था: “वास्तुशास्त्रं प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया।” (अर्थात् नगर और वास्तु का संपूर्ण विधान केवल और केवल लोक-कल्याण और जनहित के लिए होना चाहिए।) और प्लानिंग के ऐसे ही सूत्रों के आधार पर उन्होंने भोपाल की नींव रखी। लेकिन भोपाल के आधुनिक योजनाकारों और नीति-नियंताओं ने इस प्राचीन सिद्धांत को उलटकर निजी कल्याण का जरिया बना डाला। आम आदमी को भले ही इस कागज़ी खेल की बारीकियां समझ न आएं, लेकिन ज़मीनों के माहिर खिलाड़ियों—बिल्डरों, सियासी सूरमाओं और अफ़सरशाही—का यह सबसे पसंदीदा शगल बन चुका है। आख़िर हो भी क्यों न? अफ़सरों की अकूत ‘बेनामी ज़मीनें’ इन्हीं प्रस्तावित नक्शों, एफएआर और ग्रीन बेल्ट के फेर में जो फंसी हैं!
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने रहवासी इलाकों में चल रहीं धड़ल्लेदार व्यावसायिक गतिविधियों पर अपनी त्योरियां चढ़ाईं, वल्लभ भवन से लेकर अरेरा हिल्स तक ‘मास्टर प्लान’ अचानक सबकी जुबां पर तैरने लगा। सेवारत और रिटायर्ड आईएएस अफ़सरों के व्हाट्सएप ग्रुप्स में बाकायदा ‘बौद्धिक विलाप’ का दौर शुरू हो गया। वे रूदाली प्रलाप करने लगे। मज़ेदार बात यह रही कि पूर्व मुख्य सचिवों (CS) और एसीएस स्तर के दिग्गज अफ़सरों ने सारा ठीकरा ‘पॉलिटिकल विल’ की कमी पर फोड़ दिया। सबने मिलकर ऐसा सियासी रायता फैलाया मानो वे खुद तो दूध के धुले थे! लेकिन सवाल तो लाज़िमी है हुज़ूर—जब आप मलाईदार कुर्सियों पर काबिज़ थे, तब आपने हुक्मरानों को सही नीति के लिए ‘कन्विंस’ करने का जोखिम क्यों नहीं उठाया? बिना भेदभाव, निष्पक्ष और पर्यावरण-अनुकूल मास्टर प्लान तैयार करना तो प्रशासनिक मशीनरी की ही बुनियादी ज़िम्मेदारी थी। बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया की गर्दन दबाने और हरियाली की छाती पर कंक्रीट का जंगल खड़ा करने का चोर-रास्ता आख़िर किसने बनाया?
अफसरों की इसी ‘निजी लालच’ और संवेदनहीन फैसलों ने आज पूरे झीलों के शहर को तबाही और अनियोजित कंक्रीट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। खैर अब पछताए होते क्या? इसलिए शहर की इस बर्बादी पर मुजफ्फर रज़्मी का वही शेर मौजूं बैठता है— “ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने, लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई!” और अब शुरू करते हैं इस हफ्ते का द इनसाइडर्स कॉलम अपने उसी चटपट और गुदगुदाने वाले अंदाज में…
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दो आईएएस में हुई तु-तु, मैं-मैं
लबासना में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है कि उनका आचरण बहुत ही संतुलित रहे। वे बेहद शांत रहकर और भावशून्य होकर कूटनीति के दम पर मामले सुलझाते हैं। लेकिन एसएएस (राज्य हम्माल सेवा) से प्रमोट हुए एक अफसर शायद मिड-टर्म ट्रेनिंग भूल गए हैं, इसलिए उनका व्यवहार आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने आरआर वाले अपने सीनियर आईएएस (जो कि सचिव हैं) से पंगा ले लिया है। उनके बीच तकरार इतनी बढ़ गई है कि उन्होंने सचिव महोदय से साफ कह दिया—आप मुझे बेइज्जत नहीं कर सकते। यही नहीं, अब दोनों के बीच अबोला सा हो गया है। मंत्रालय में कानाफूसी है कि भले ही साहब बड़े साहब के गृह क्षेत्र से आते हैं पर जबान लड़ाने का यह शौक उन्हें भारी पड़ेगा और जल्द ही उनकी लूप लाइन में रवानगी का परवाना कट सकता है!
जानकारी मांगी तो आप हो सकते हैं दिमागी नक्सल
एक विवादित आईएफएस से सवाल पूछने पर आपको ‘दिमागी नक्सल’ करार दिया जा सकता है। जी हां, आपने सही पढ़ा—’दिमागी नक्सल’। यह वही शब्द है, जिसका इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त के अपने भाषण में किया था। अब इन आईएफएस ने एक पोस्ट में लिखा है: ‘वन्यजीवों की सुरक्षा में लगे सभी वनकर्मियों के लिए एक जरूरी सलाह है। हर कोई जो वन्यजीवों की मदद करने का दावा करता है, जरूरी नहीं कि वह जमीनी हकीकत को समझता हो या उसके मकसद भी नेक हों। इसलिए किसी भी तरह की जानकारी साझा न करें। हर जगह ‘दिमागी नक्सल’ मौजूद हैं, हमें इन्हीं से निपटना है। सतर्क रहें।’
सीनियर आईपीएस को इस साल दूसरा प्रमोशन
आम आदमी हो, अदना सा कर्मचारी या फिर छोटे साहब—हर कोई नियमों के बोझ तले अपनी गृहस्थी में दिन-रात उलझा रहता है। कई बार वह किसी परेशानी में फंस भी जाए, तो उसे मानवीय आधार पर भी राहत नहीं मिलती। लेकिन बड़े लोगों की बात ही जुदा है; और यदि वे ऑल इंडिया सर्विस से हों, तो फिर कायदे-कानून ताक पर रख दिए जाते हैं। ऐसे ही एक आईपीएस को इस साल दो-दो तरक्कियां मिली हैं, वह भी तब जब उनकी सीआर (CR) खराब थी। वैसे, ये साहब एक दुर्घटना के कारण लंबे समय तक ड्यूटी पर नहीं आए, फिर भी वेतन निर्बाध मिलता रहा। जब जॉइन किया तब भी काम नहीं किया, पर मजाल है कि कोई आंच आ जाए! अब आलम यह है कि इन्हें इसी साल दूसरा प्रमोशन भी थमाया जा रहा है। बता दें कि साहब की पत्नी भी सीनियर आईएएस हैं। और उन्हीं के दवाब के चलते साहब पर यह मेहरबानी हो रही है।
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प्रदेश की बजाय दूसरे राज्य की करा दी सैर
‘मध्य प्रदेश अजब है, सबसे गजब है’ का स्लोगन पर्यटन स्थलों के प्रचार-प्रसार के लिए गढ़ा गया था, पर अब यह सूबे के अजब-गजब फैसलों और कारनामों पर तंज कसने के काम आता है। एक बार फिर ऐसा ही अजीबोगरीब मामला सामने आया है। प्रदेश में निवेश को बढ़ावा देने के लिए किस स्तर की कसरत चल रही है, इससे सब वाकिफ हैं। इसी बीच एक आईएएस ने गजब ही ‘आसमानी-सुलतानी’ कारनामा कर दिखाया। उन्होंने पंजाब-हरियाणा की इंडस्ट्री एसोसिएशन के प्रतिनिधियों को मध्य प्रदेश का दौरा कराने के बजाय ‘केरलम’ की सैर करा दी! हद तो यह कि इस दौरे का भुगतान भी नई टेक कंपनियों की सुविधाओं के लिए तय बजट से करा दिया गया। अब गलियारों में चर्चा है कि केरलम की सैर से मध्य प्रदेश को कौन सा निवेश मिल जाएगा?
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बेइज्जत होकर रुखसत हुए साहब
जनता से संवाद स्थापित करने वाले एक अहम विभाग से एक साहब भारी बेइज्जती के साथ रुखसत हुए हैं। ये साहब हमारे शब्दों में ‘राज्य हम्माल सेवा’ से आते हैं। हालांकि साहब ने हम्माली तो कभी नहीं की, लेकिन ‘कट’ लेने में खासे माहिर रहे। इसी सेवा से पहले आईएएस बने एक वरिष्ठ साहब इन्हें अपने सहयोगी के रूप में लेकर आए थे। उस वक्त विभाग में बगावत के सुर उठे, तो उन्हें दबा दिया गया। लेकिन जल्द ही इनकी काबिलियत उजागर हो गई और ये हाशिए पर फेंक दिए गए। विभाग में आए नए साहब ने भी इन्हें बिना काम के ही रखा। इतनी जिल्लत झेलने के बाद भी साहब कुर्सी से चिपके रहे। आखिरकार, अब भाजपा के एक सीनियर नेता को साधकर इन्होंने नई पोस्टिंग का जुगाड़ बैठा ही लिया।
दो की जगह चार अफसर पदस्थ
निर्माण से संबंधित विभाग में दो उपसचिव और एक सचिव का कैडर पद स्वीकृत है। लेकिन मौजूदा स्थिति यह है कि यहां एक सचिव, एक अतिरिक्त सचिव और तीन उपसचिव कुंडली मारकर बैठ गए हैं। शुक्रवार को जारी सूची में जिस तीसरे उपसचिव की तैनाती हुई है, उनके बैठने के लिए तो केबिन तक मयस्सर नहीं है। यानी किसी न किसी उपसचिव को केबिन छोड़कर या तो मातहतों के साथ बैठना पड़ेगा या फिर केबिन शेयर करना होगा। अंदरखाने चर्चा है कि प्रमुख सचिव एक उपसचिव की कार्यप्रणाली से नाखुश थे, क्योंकि पदोन्नति के मामलों में उनकी वसूली की शिकायतें आ रही थीं। संभव है कि अब उनकी रवानगी का रास्ता साफ किया जा रहा हो।
एक और आईपीएस चले दिल्ली
जब कई बड़े-बड़े आईपीएस अफसरों का दिल्ली का टिकट ‘वेटिंग’ में अटका हुआ है, तब एक अन्य आईपीएस ने अपना टिकट कन्फर्म करा लिया है। उन्होंने राज्य में कूलिंग पीरियड खत्म होते ही दोबारा आवेदन किया और केंद्र सरकार को इतना पसंद था कि तुरंत ही अनुमति दे दी। अब वे एक केंद्रीय बल में आईजी के पद पर अपनी सेवाएं देंगे।
गोपनीय विभाग की मुराद
मुख्यमंत्री तक गोपनीय सूचनाएं पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण विभाग के मुखिया इसी महीने सेवानिवृत्त हो रहे हैं। चूंकि यह पद डीजीपी और सरकार—दोनों के लिए बेहद अहम है, इसलिए इसके लिए लॉबिंग तेज हो गई है। दावेदार खुद को सीएम का सबसे निष्ठावान और भरोसेमंद साबित करने के लिए लगातार हाजिरी लगा रहे हैं। पुलिस ट्रेनिंग में गीता और महाभारत की शिक्षाओं को शामिल कराने की पैरवी करने वाले एक एडीजी भी इस दौड़ में पूरी ताकत झोंक चुके हैं।
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मेरा वचन ही है शासन!
पानी से जुड़े एक निगम में फिल्म बाहुबली की ‘राजमाता शिवगामी देवी’ का प्रादुर्भाव हो चुका है। पैसों की व्यवस्था संभालने वाली इन देवी का अलिखित फरमान है—’मेरा वचन ही है शासन!’ हाल ही में निगम के एमडी ने एक ठेकेदार से मिलने के लिए इंटरकॉम पर कहा, तो देवी को यह गुस्ताखी नागवार गुजरी। उन्होंने ठेकेदार को पूरे दो घंटे बाहर बिठाकर संदेश दे दिया कि ‘ऊपर से फोन करवाओगे तो पछताओगे!’ वैसे, जिस तरह इन्होंने निजी जिंदगी में दोहरी जिम्मेदारी ले रखी है, उसी तरह विभाग में भी दो प्रभार संभाल रही हैं। निजी जिंदगी की तरह ही पहले इन्हें अतिरिक्त प्रभार भाता था, पर अब मूल प्रभार ही ज्यादा रास आने लगा है।
शुद्ध खून में मिलावट नहीं!
एक आईएएस को उसी जिले में जिला पंचायत का सीईओ बना दिया गया था, जहां उन्हीं के बैच का एक अन्य अफसर कलेक्टर था। सरकार ने करीब आठ महीने बाद अपनी यह भूल सुधार ली है। अब इन आईएएस को दूसरे जिले में भेजा गया है, जहां कलेक्टर सीनियर बैच के हैं। प्रशासनिक गलियारों में फुसफुसाहट है कि यदि आईएएस अधिकारी डायरेक्ट रिक्रूट (आरआर) होते, तो शासन कभी यह गलती न करता; और यदि करता भी तो तुरंत सुधार लेता। लेकिन चूंकि यह साहब प्रमोटेड कैडर से आते हैं, इसलिए पुराने बड़े साहब ने यह पोस्टिंग देकर जता दिया कि ‘शुद्ध खून के साथ मिलावट बर्दाश्त नहीं होती!’


