The Insiders: एक्टीविस्ट बन गए सीनियर आईपीएस, साले ने आईएएस जीजा के साथ जुगलबंदी से हासिल किए ठेके, छोटे से कारिंदे ने आईपीएस का रिटर्न टिकट कटवाया
द इनसाइडर्स में पढ़िए सरकारी गलियारों के मलाईदार खेल, रसूखदार कारिंदे और अपनों पर मेहरबानियों के सनसनीखेज खुलासे!
आईएएस जीजा की साले संग जुगलबंदी
पिछले अंक में हमने आपको एक जमीन-प्रेमी युवा आईएएस अफसर की दास्तान सुनाई थी, जिनका नाम आश्रम कांड से लेकर गुराड़ी में 50 अफसरों के सामूहिक जमीन घोटाले तक में खूब उछला। अब इस कहानी में एक नया और दिलचस्प किरदार एंट्री मार चुका है—इनके कथित साले साहब। सूत्रों की मानें तो साले साहब, जीजा जी की मलाईदार पदस्थापना से पहले भी दवाइयों के जोड़-तोड़ (खरीद-फरोख्त) के धंधे में थे। लेकिन जीजा जी के आते ही साले साहब के हौसलों को मानो पंख लग गए। अब आलम यह है कि सरकारी टेंडरों की शर्तें साले साहब की मर्जी से तय होती हैं। मजाल है कि कोई और नियम-कायदों से खेल जाए! अगर कोई गलती से ‘एल-1’ (सबसे कम बोली लगाने वाला) आ भी जाए, तो साले साहब के रसूख के आगे उस टेंडर का निरस्त होना तय समझिए। खेल यहीं खत्म नहीं होता। जीजा जी (आईएएस महोदय) ने एक ‘मीणा’ उपनाम वाले खास कारिंदे के जरिए कोकता के पास बेशकीमती बेनामी संपत्ति भी समेट ली है। लेकिन कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक दिन भरता जरूर है। इनसाइडर की खबर है कि दोनों की इस जुगलबंदी की गूंज अब ‘बड़े साहब’ के दरबार तक पहुंच चुकी है। शिकायतें टेबल पर हैं, देखना है कि इस ‘पावरफुल’ जीजा-साले की जोड़ी का यह धमाल कब तक चलता है!
मैडम की सनक और खूनी मुख्यालय का डर!
हमने तो पहले ही आगाह किया था कि आधे-अधूरे, मलबे से पटे नगर निगम मुख्यालय का आनन-फानन में उद्घाटन कराना सिर्फ और सिर्फ एक ‘सनक’ है। आईएएस मैडम की इस जिद की वजह से अफसर, कर्मचारी और जनता हर दिन हलाकान हो रहे हैं, जिसकी पोल हमने पिछले अंक में खोली थी। लेकिन मैडम की सेहत पर जूं तक नहीं रेंगी। नतीजा? लापरवाही की नई किस्त सामने आ चुकी है—हाल ही में एक महिला कर्मचारी काफी देर तक लिफ्ट में फंसी रही। याद दिला दें, इसी नए भवन में पैर फिसलने से एक शख्स पहले ही जान गंवा चुका है। मैडम, रसूख और जिद अपनी जगह है, लेकिन इंसान की जान बहुत कीमती होती है। हादसों को दावत देना बंद कीजिए, इससे पहले कि कोई और बड़ी अनहोनी हो जाए!
‘एक्टिविस्ट’ बने सीनियर आईपीएस, फील्ड में थे तो क्यों थे मौन?
हमारे एक सीनियर आईपीएस साहब इन दिनों कुछ ज्यादा ही ज्ञान गंगा बहा रहे हैं। उनकी बहकी-बहकी बातें वैसे तो समाज हित में लगती हैं, लेकिन वर्दी की गरिमा और उनके महकमे के काम से इनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है। कभी साहब यूपी के मुख्यमंत्री को अवैध खनन रोकने की मुफ्त सलाह बांटने लगते हैं, तो कभी अपने ही प्रदेश के कलेक्टर्स को फोन घुमाकर प्रशासनिक नसीहतें देने बैठ जाते हैं। अब गलियारों में लोग चटखारे लेकर पूछ रहे हैं कि साहब, जब समाज की इतनी ही फिक्र थी, तो खुद फील्ड में पोस्टेड रहते हुए तीर क्यों नहीं चलाया? तब तो चुप्पी साध रखी थी। मातहतों के बीच चर्चा गर्म है कि अगर खाकी से ज्यादा खादी या समाजसेवा का शौक चर्राया है, तो बिना देर किए वीआरएस (VRS) ले लीजिए और सीधे एक्टिविस्ट बन जाइए।
भगीरथपुरा के दोषियों पर मेहरबानी
भगीरथपुरा कांड याद है न? भाई, ऐसा इसलिए पूछना पड़ रहा है क्योंकि हमारे राजनेताओं को मुगालता है कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। इसी मुगालते के दम पर नेताओं में यह साहस कूट-कूटकर भरा है कि जनता पुराना पाप भूलेगी और वे पर्दे के पीछे से सारे दोषियों को माफ कर देंगे। तभी तो भीषण जलसंकट के बीच भगीरथपुरा कांड के मुख्य दोषी अधिकारी और इंजीनियर को बहाल कर, चमचमाती पोस्टिंग देने की तगड़ी लॉबिंग शुरू हो गई है। साहेब भी हर चौखट पर जुगाड़ बिठा रहे हैं और मुमकिन है कि सफल भी हो जाएं। लेकिन गलियारों में बड़ा सवाल तैर रहा है—जो इंजीनियर साहब पिछले 20 सालों से इसी विभाग में कुंडली मारकर बैठे थे, तब तो इंदौर का जलसंकट दूर नहीं कर पाए, अब बहाल होकर कौन सा नया तीर मार देंगे? जनता सब देख रही है नेताजी!
छोटे से कारिंदे ने दिल्ली से कप्तान साहब की रिटर्न टिकट कटवाई
एक आईपीएस साहब बड़ी दिल्लगी और अरमानों के साथ दिल्ली पहुंचे थे। मकसद साफ था—मैडम (पत्नी) के साथ देश की राजधानी में वक्त बिताना। इसके लिए बकायदा तिकड़म भिड़ाकर वे एमपी के एक प्रादेशिक ‘भवन’ में ज्वाइंट कमिश्नर की कुर्सी पर काबिज भी हो गए थे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। वहां साहब की भिड़ंत भवन के एक रसूखदार ‘कारिंदे’ से हो गई। यह कारिंदा मामूली नहीं, बल्कि एसीएस (ACS) से लेकर दिल्ली-भोपाल की तमाम बड़ी हस्तियों का चहेता है। साहब ने जैसे ही उसे दबाने की कोशिश की, कारिंदे ने अपनी ताकत दिखाई और आईपीएस साहब को वापस प्रदेश फिंकवाकर सीधे एक जिले की कप्तानी थमा दी। दुनिया को लगा कप्तान बनना तरक्की है, पर साहब का दिल तो दिल्ली में ही छूटा था। इधर, कारिंदे का गुरूर सातवें आसमान पर है। आलम यह है कि भवन के 50 फीसदी कमरे खाली पड़े रहते हैं, लेकिन वह ऑक्यूपेंसी फुल का बोर्ड टांगकर रसूखदारों को भी उल्टे पैर लौटा देता है। साहब तो चले गए, पर कारिंदे की यह मनमानी अब भी बदस्तूर जारी है! बता दें कि बड़े साहब की पत्नी भी यह पदस्थ रह चुकी हैं।
राष्ट्रनिर्माता बने कलेक्टर के स्टेनो और पीआरओ
कहते हैं शिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है, इसलिए समाज में सबसे ऊंचा सम्मान उसी का है। लेकिन हमारे प्रदेश के कुछ गुरुजी ऐसे हैं, जिन्हें क्लासरूम में चॉक घिसने से ज्यादा ‘पावर गैलरी’ के गलियारों में चक्कर काटने में मजा आता है। कोई साहब मंत्रियों के बंगले पर ‘शोभा की सुपारी’ बने बैठे हैं, तो कोई बड़े दफ्तरों में मलाईदार अटैचमेंट का सुख भोग रहे हैं। चर्चा इस बार बुंदेलखंड के एक मुख्यालय वाले जिले के ‘गुरुजी’ की है, जो सालों से पीआरओ (PRO) की कुर्सी पर कुंडली मारकर सरकारी भोंपू बजा रहे हैं। वहीं दूसरे शिक्षक महोदय का रसूख तो और भी अनूठा है; वे हाल ही में पटाखा फैक्ट्री में भीषण आगजनी के कारण सुर्खियों में आए एक चर्चित कलेक्टर साहब के यहां ‘स्टेनो’ की ड्यूटी बजा रहे हैं। सवाल यह है कि जब गुरुजी कलेक्टर साहब की डिक्टेशन लिखेंगे और पीआर संभालेंगे, तो नौनिहालों का भविष्य कौन सवारेगा? साहब, शिक्षा विभाग के इस घालमेल पर ताला कब लगेगा?
चार इमली मेंटेनेंस घोटाले के खिलाफ ठेकेदार ही लामबंद!
अमूमन कहानी यही होती है कि अफसरों और ठेकेदारों का ‘गठजोड़’ मिलकर भ्रष्टाचार की नई इबारत लिखता है। लेकिन सूबे के सबसे वीवीआईपी पते यानी आईएएस अफसरों के ठिकाने—’चार इमली’ में कुछ ऐसा हुआ है कि खुद ठेकेदार ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। मामला करीब 100 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का है, जिसकी शिकायतें अब ‘बड़े साहब’ की टेबल से लेकर हर मुमकिन फोरम तक पहुंच चुकी हैं। ठेकेदारों का सीधा आरोप है कि जनता से जुड़े एक रसूखदार विभाग के दो इंजीनियरों ने चार इमली को अपनी जागीर बना लिया है। यहां नियम-कायदों को ताक पर रखकर सिर्फ अपने चहेतों और रिश्तेदारों को ही रेवड़ियों की तरह ठेके बांटे जा रहे हैं, जबकि जमीन पर काम के नाम पर ढेला भी नहीं हिल रहा। हद तो देखिए, बीते महज एक साल के भीतर बड़े साहबों के बंगलों में ‘मेंटेनेंस’ और रखरखाव के नाम पर इन इंजीनियरों ने अपने सगे-संबंधियों की जेबों में करीब 70 करोड़ रुपये डकार लिए। जब साहबों के घरों की मरम्मत के नाम पर ही इतनी बड़ी ‘सेंधमारी’ हो रही हो, तो बाकी शहर का भगवान ही मालिक है। ठेकेदारों की इस बगावत के बाद अब देखना यह है कि इन चहेते इंजीनियरों पर गाज गिरती है या मामला रफा-दफा कर दिया जाता है!



