The Insiders: फर्जी आईएएस के तमगे से मैडम बनी सोशल मीडिया क्रश, दूध वाले ने कराई सीईओ की कमिश्नर मैडम से मुलाकात, ईडी साहब गाड़ी के कम एवरेज से परेशान
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें बड़े साहब की तैनाती की पर्दे के पीछे की कहानी
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | दिल्ली के गलियारों से उठी नीट-नीट (NEET) की आंधी ने पिछले 12 सालों में केंद्र सरकार को सबसे कड़ी और अभूतपूर्व चुनौती दे डाली है। आलम यह रहा कि पहली बार किसी शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर ही बन आई। लेकिन रुकिए, दिल्ली की इस उठापटक के बीच अपने सूबे में जो प्रशासनिक सर्कस हुआ, वह किसी ब्लॉकबस्टर मूवी के क्लाइमेक्स से कम नहीं था! तस्वीर देखिए—इधर निवर्तमान बड़े साहब ने सभी प्रमुख सचिवों और विभागाध्यक्षों को हाई-टी की चमचमाती टेबल पर बिठाया, प्रमोशनों की रेवड़ियों और यूसीसी जैसे भारी-भरकम विधेयकों को निपटाने का आभार जताया, और अभी चाय की चुस्की का स्वाद ज़ुबान से उतरा भी नहीं था कि महज आधे घंटे के भीतर दिल्ली से फरमान आ गया। फिर क्या था, अगले चार घंटे में नए बड़े साहब की ताजपोशी का ऐलान हो गया! जब तक वल्लभ भवन का अमला कुछ समझ पाता, अगली सुबह तबादलों की नई लिस्ट सामने आ खड़ी हुई। कहने को तो इस सूची पर पूर्व बड़े साहब की छाप साफ दिख रही थी, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में हवा का रुख ‘जैनवाद’ से बिहार की तरफ शिफ्ट होता साफ नज़र आया। हालाँकि, इन तमाम बहसों के बीच जो चीज़ हमेशा की तरह कांस्टेंट रही, वह थी बेचारे प्रमोटियों अफसरों की किस्मत! उनके लिए तो प्रशासनिक मलाई में हिस्सा पाना बस ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने’ जैसा ही रहा। नए बड़े साहब ने आते ही स्पष्ट संदेश दे दिया है कि चाहे कितना ही फेरबदल हो जाए, असली पावर सेंटर और हुकूमत की चाबी तो आरआर लॉबी के पास ही रहेगी। पावर के इस पावरफुल खेल, आईएएस लॉबी की गुटबाज़ी और सत्ता के अंदरखाने के इस नए समीकरण को ध्यान में रखते हुए, आइए बिना किसी लाग-लपेट के सीधे शुरू करते हैं—अपने उसी तीखे, चुटीले और गुदगुदाने वाले अंदाज़ में इस हफ़्ते का द इनसाइडर्स…
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द इनसाइडर्स की खबर पर लगी मुहर: सुलेमानी ताकत कायम!
द इनसाइडर के पाठकों को याद होगा, हमने करीब चार महीने पहले ही खुलासा कर दिया था कि बड़े साहब का अगला ठिकाना दिल्ली का नीति आयोग होने वाला है। जब फैसले में थोड़ा विलंब हुआ, तो सचिवालय के कई ज्ञानी कहने लगे थे कि साहब अब यहीं जमे रहेंगे। लेकिन लीजिए साहब, पर्दा उठ चुका है और द इनसाइडर की खबर पर शत-प्रतिशत मुहर लग चुकी है। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। हमने यह भी खबर दी थी कि अब पूर्व हो चुके बड़े साहब ने एक सीनियर आईएएस अधिकारी को अपनी कुर्सी सौंपने का पक्का वादा किया था। रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाहुं बरु बचनु न जाई.. और साहब को प्राण की नौबत भले न आई पर वादा निभा लिया गया। और उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में उसी सीनियर आईएएस को राजमुकुट पहना सिंहासन पर राजतिलक कर दिया है।
हालाँकि, साहब ने सार्वजनिक रूप से यह कुबूल करके सबको चौंका दिया कि उन्होंने ही तीन दावेदार अफसरों में से एक का चयन किया है। लेकिन बाकी दो अफसर भी उतने ही काबिल थे। बस, इसी एक बयान ने साफ कर दिया कि प्रदेश के डॉक्टर साहब की अपनी ही सरकार में सबसे बड़ी प्रशासनिक कुर्सी के चयन में कितनी चली! प्रशासनिक गलियारों के काकभुशुंडि तो यह भी कह रहे हैं कि सिर्फ पूर्व बड़े साहब का आशीर्वाद ही काम नहीं आया, बल्कि पिछले छह महीनों से जो संघं शरणम् गच्छामि की अनवरत यात्रा चल रही थी, उसने भी नए निज़ाम का मार्ग निष्कंटक बनाया। खैर, सच्चाई चाहे जो भी हो, मगर एक बात तय है—चेहरे बदल गए हैं, पर उस कुर्सी के पीछे की सुलेमानी ताकत आज भी बरकरार है।
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कमिश्नर मैडम से मुलाकात का दूधिया फॉर्मूला
1948 की मशहूर फिल्म दुलारी का वह क्लासिक गाना तो आपने सुना ही होगा— “सुहानी रात ढल चुकी, न जाने तुम कब आओगे…” यह गाना फिल्म में नायक तब गाता है जब वह अपनी नायिका के इंतजार में तड़प रहा होता है और मुलाकात के सारे रास्ते बंद नजर आते हैं। ठीक यही हालत इन दिनों किसी शहर की नगर निगम कमिश्नर मैडम के दफ़्तर के बाहर देखने को मिलती है! फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ ठेकेदार, नेता और अफसर मैडम के दर्शन पाने के लिए दिन-रात यही गाना गुनगुनाने को मजबूर हैं।
हाल ही का एक मजेदार किस्सा सुनिए। प्रदेश के एक बड़े दुग्ध संघ के सीईओ साहब को कमिश्नर मैडम से एक बेहद ज़रूरी काम के लिए मिलना था। साहब के पीए ने कई बार फोन घुमाया, लेकिन हर बार मैडम के पीए का रटा-रटाया टका सा जवाब मिलता— “मैडम तो भारी मीटिंग में व्यस्त हैं” या “मैडम दफ़्तर में हैं ही नहीं!” जब बार-बार के इस झूठ से सीईओ साहब तंग आ गए। ऐसे में उनके पीए ने एक दूधिया तरकीब निकाली। पीए ने नगर निगम मुख्यालय के ठीक पास स्थित एक छोटे से दूध पार्लर के संचालक को फोन ठोका। दूध वाला भी बिना झिझक सीधे कमिश्नर दफ़्तर की गैलरी में जा धमका। वहाँ पहुँचकर उसने अपनी आँखों से तसदीक की कि मैडम साहिबा अपने आलीशान चैंबर में ही विराजमान हैं, और तुरंत फोन पर हरी झंडी दे दी। फिर क्या था, सीईओ साहब ने बिना किसी अपॉइंटमेंट के सीधे मैडम के चैंबर में एंट्री मार दी! तो मैडम को मजबूरी में मुस्कुराते हुए मुलाकात करनी ही पड़ी। वैसे, द इनसाइडर के जरिए हम मैडम साहिबा को एक मुफ़्त सलाह ज़रूर देना चाहेंगे। मैडम, नगर निगम तो लोकतंत्र की वो बुनियादी नर्सरी है जहाँ से सूबे की राजनीति का ककहरा शुरू होता है। यहीं से कल के विधायक और सांसद निकलते हैं। इसलिए मैडम साहिबा थोड़ा आम जनता और जनप्रतिनिधियों से भी मिल लिया करें… वरना जब जनता अपने इंतजार का हिसाब मांगती है, तो फिर बड़े-बड़ों की कुर्सियां हिल जाती हैं!
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हाय री किस्मत! रिटायरमेंट से पहले ही तेल निकल गया
दूरस्थ ज़िले में पदस्थ एक अपर कलेक्टर साहब ने रिटायरमेंट से ठीक पहले राजधानी का रुख सिर्फ इसलिए किया ताकि वीकएंड पर अपने इंदौर वाले घर आराम से आ-जा सकें। राजधानी पहुँचते ही एक निगम में ईडी का ओहदा मिला और साथ में एक चमचमाती ऑलीशान गाड़ी भी। शुरुआत में तो साहब बेहद खुश हुए, लेकिन जल्द ही माथा पीट बैठे! किस्मत का खेल देखिए—गाड़ी जितनी ऑलीशान निकली, उसका एवरेज उतना ही फुस निकला। हालत यह है कि सरकारी कोटे का तेल हफ्ते भर में ही उड़ जाता है और वीकएंड पर इंदौर जाने के लिए जेब ढीली करनी पड़ रही है। कम एवरेज के चक्कर में अब साहब का हर हफ्ते इंदौर जाना भी मुहाल हो गया है। इसी को कहते हैं— सिर मुँड़ाते ही ओले पड़ना!
द इनसाइडर्स का कहा सच हुआ: पूर्व बड़े साहब के पार्टनर पर गिरी गाज
द इनसाइडर्स के हमारे पुराने और वफादार पाठकों को अच्छी तरह याद होगा—जब हमने इस कॉलम का सफर शुरू किया था, तब पूर्व हो चुके एक बड़े साहब के इकबाल को सबसे पहले हमने ही बेनकाब किया था। उसके बाद उनके बेहद खास करीबियों पर जब इनकम टैक्स के छापे पड़े, तो हमारी लिखी एक-एक बात पत्थर की लकीर साबित हुई। उसी दौर में हमने एक और बड़ा खुलासा किया था कि प्रदेश के सबसे अमीर विधायक जी के एक पूर्व पार्टनर के साथ इन पूर्व अफसर साहब की भी अंदरखाने गहरी हिस्सेदारी थी। वही पार्टनर साहब, जिन्होंने मौका मिलते ही अपने ही अमीर विधायक जी से तगड़ी दगाबाज़ी कर डाली थी! अब खबर यह है कि बंगाल में जैसे ही सियासी हवा बदली और सरकार का निज़ाम बदला, उस दगाबाज़ पार्टनर को भी धर दबोचा गया है। अब साहब, बेनामी संपत्ति तो आखिर बेनामी ही होती है, उसका कोई धर्म या ईमान तो होता नहीं! ऐसे में अपने पूर्व बड़े साहब के माथे पर चिंता की लकीरें और शिकन आना बिल्कुल लाज़मी है। आखिर जब एक-एक करके सारे पुराने सहयोगी निपटाए जा रहे हों, तो दिल की धड़कनें बढ़ना तो स्वाभाविक है। अब स्थिति यह है कि अगर इसी रफ्तार से सारे पुराने हिस्सेदार निपटते रहे, तो पूर्व बड़े साहब की बाकी बची ज़िंदगी उस बेनामी जायदाद को दूर से देखकर सिर्फ हाथ मलते और आहें भरते ही गुज़रेगी!
कमिश्नर मैडम के संघर्ष की अतिरेक कहानी
रीति काल के मशहूर कवि वृंद का दोहा है—
“कपट रूप करि झूठ बोलि, काज करै कोउ कोय।
अंसुक सों पावक ढक्यौ, प्रगट होत सब कोय॥”
आजकल सोशल व डिजिटल मीडिया में एक मोहतरमा की संघर्ष की गाथा खूब बेची जा रही है। कहानी संक्षेप में कुछ यूँ परोसी जा रही है कि उन्होंने— “बचपन में भयावह गरीबी, कम उम्र में शादी और बच्चे, फिर घरेलू हिंसा झेली, अपमान सहा, अंडरगारमेंट में रोटी छिपाकर बाथरूम में चोरी-छुपे खाई और जब परीक्षा देने जातीं तो पति उनके ऊपर पेशाब से भरी बाल्टी उड़ेल देते थे! फिर बच्चों का हाथ थामकर घर छोड़ा और बिना कोचिंग के सीधे UPSC क्रैक कर IAS अफसर बन गईं!”
कहानी में ऐसे-ऐसे अतिरेक और अकल्पनीय दावे ठूंसे गए हैं कि सुनकर पहली नज़र में किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएँ और सहानुभूति का सैलाब उमड़ पड़े। लेकिन ज़रा ठहरिए! ‘द इनसाइडर’ जब किसी खबर की तह में जाता है, तो ड्रामे के पीछे का असली खेल बाहर आ ही जाता है। पहली बात- जब से मैडम सेवा में आई है तब से खबरों में मैडम अपने नाम के आगे बड़े-बड़े अक्षरों में IAS लिखवाकर तालियाँ बटोर रही हैं, जबकि हकीकत यह है कि वे आईएएस अधिकारी हैं ही नहीं!
दूसरी बात: संघर्ष और मुफ़लिसी की जो मनगढ़ंत पटकथा तैयार की गई है, उसकी पोल मैडम द्वारा खुद मीडिया को दी गई तस्वीरों से ही खुल जाती है। मीडिया में छापी गई उनकी अफसर बनने से पहले की ज़िंदगी की तमाम तस्वीरें बेहद ग्लैमरस, हाई-प्रोफाइल और टीप-टॉप हैं, जिनमें दूर-दूर तक उस दीनता और प्रताड़ना का कोई नामो-निशान नज़र नहीं आता जिसका ढोल पीटा जा रहा है। सहानुभूति का यह अतिरेक ऐसा है कि खुद को बेचारी और पीड़ित साबित करने के चक्कर में मैडम ने अपने मायके और ससुराल—दोनों परिवारों को सरेआम बदनाम करके रख दिया है। और सबसे बड़ा विरोधाभास तो यह है कि मैडम का अपना दामन निकायों में सीएमओ और कमिश्नर रहते हुए भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और गंभीर विवादों से बुरी तरह भरा पड़ा है!
एक दागी अफसर पर दो IAS मेहरबान
हमारे सूबे का प्रशासनिक ढांचा इतना दयालु है कि यहाँ एक विवादित और गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे संविदा अफसर पर एक नहीं, बल्कि दो-दो सीनियर आईएएस अफसर ‘दीवाने’ हुए जा रहे हैं! पूरा किस्सा बड़ा दिलचस्प है। सैर-सपाटा से जुड़े विभाग में पदस्थ इस ‘खास’ अफसर की हरकतों से तंग आकर आईएएस साहब ने एक दिन इन्हें ज़रा कड़े शब्दों में डपट दिया। अब संविदा वाले अफसर की ठसक इतनी कि वे फौरन रूठकर एक दूसरे विभाग के एसीएस साहब के पास पहुँच गए। एसीएस साहब भी इतने मेहरबान निकले कि फौरन अपने यहाँ कंसल्टेंट के रूप में नौकरी का आवेदन ले लिया। लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तो इसके बाद आया! संविदा वाले साहब को डपटने वाले पहले आईएएस साहब को अचानक न जाने कौन सी आत्मग्लानि हुई कि वे उन्हें वापस मनाने में जुट गए और अपने ही यहाँ नौकरी कंटीन्यू करने का फरमान जारी कर दिया। अब आलम यह है कि शातिर अफसर गफलत में पड़ गया कि जाएँ तो जाएँ कहाँ! उधर एसीएस साहब हैं कि अपनी यहाँ जॉइनिंग कराने के लिए उन पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं। अब जरा इस ‘चहेते’ अफसर के कारनामे भी सुन लीजिए, जिन पर दोनों आईएएस लट्टू हैं। संविदा पर जीएम पद पर तैनात इन महाशय पर इवेंट के नाम पर बिना सरकारी अनुमति के दनादन 10 से ज्यादा विदेश यात्राएँ करने का गंभीर आरोप है। हद तो यह है कि इन सारे ‘रॉयल’ दौरों का करीब 80 लाख रुपये का खर्चा भी नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाकर सरकारी खजाने (निगम) से ही चुकता करा लिया गया!
लखन पटेल के पर कतरे तो थर्राए कद्दावर मंत्री
बाबा तुलसीदास जी सुंदरकांड में लिख गए हैं— “भय बिनु होइ न प्रीति…” (अर्थात्: बिना डर के न तो सही नीयत आती है और न ही काम में तेज़ी!) सूबे की राजनीति में भी यही सच साबित हुआ। हाल ही में राज्य मंत्री लखन पटेल का विभाग छीनकर उन्हें आनंदित किया गया। वजह थी ज़मीन से जुड़ी फाइलों को बेवजह अटकाना। दिल्ली से चले इस चाबुक का असर ऐसा हुआ कि वल्लभ भवन के एक अन्य कद्दावर मंत्री जी के हाथ-पांव फूल गए। ये वही मंत्री जी हैं जो शहरों से जुड़ी अथॉरिटी के नियमों की फाइल छह महीने से दबाकर बैठे थे। जैसे ही उन्होंने देखा कि फाइल अटकाने पर लखन पटेल के पर कतर दिए गए हैं, उन्होंने दिल्ली के खौफ से रातों-रात फाइल को हरी झंडी दे दी! हालांकि, इस मामले में द इनसाइडर्स को भी श्रेय दिया जा सकता है क्योंकि हमने ही फाइल अटकाने वाले किस्सा उजागर किया।
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IITian IAS के आगे कंप्यूटर के शाहंशाह ढेर, पहुंचे स्मार्ट सिटी!
भोपाल नगर निगम की डिजिटल सल्तनत में भी कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला है। सालों से कंप्यूटर शाखा पर एकतरफा राज कर रहे बेताज बादशाह को गलतफहमी हो गई थी कि उनकी बनी-बनाई सल्तनत के वे ही एकमात्र वारिस हैं। लेकिन साहब भूल गए थे कि इस बार पाला किसी पुराने ढर्रे वाले अफसर से नहीं, बल्कि IITian पृष्ठभूमि वाले युवा आईएएस अपर आयुक्त साहब से पड़ा है! तकनीक के इस असली महारथी आईएएस अफसर ने पहली ही नज़र में समझ लिया कि कंप्यूटरगिरी के चमकदार आवरण के पीछे क्या खेल चल रहा है। साहब ने पलक झपकते ही सारा गड़बड़झाला पकड़ लिया और कंप्यूटर के उस कथित वारिस का पत्ता काटकर सीधे स्मार्ट सिटी फेंक दिया! अब निष्कासित साहब विक्टिम कार्ड खेलते हुए सफाई दे रहे हैं कि कुछ महीने पहले हुई लोकायुक्त की कार्रवाई में उनकी ईमानदारी ही उनके गले की फांस बन गई, जिसकी वजह से उन्हें फिरकी में फंसाया गया है। हालांकि महोदय ने बचने की कोशिश खूब की और एक मंत्री से भी फोन लगवाया। पर कमिश्नर मैडम इस गुस्ताखी पर और चिढ़ गई।
गरमाहट कहीं मोटी वसूली के लिए तो नहीं
छात्रों की किताबों की छपाई से जुड़े निगम में नए-नए पधारे एमडी साहब ने आते ही ऐसा रौब झाड़ा और स्टाफ को ऐसा हड़काया कि पूरे दफ़्तर में हड़कंप मच गया है। हर कोई दुबककर अपनी-अपनी फाइलों में मुँह छिपाए बैठा है। लेकिन इस कड़कपन के पीछे असली गफलत तो दलालों और मलाईदार अफसरों के मन में पैदा हो गई है। सब असमंजस के भंवर में गोते खा रहे हैं कि— “साहब से ‘लेन-देन और सेटिंग’ की बात छेड़ी जाए या नहीं?” डर यह है कि अगर साहब सचमुच ‘ईमानदार’ निकले, तो कहीं गाज न गिर जाए! और अगर बात न की, तो जल्द ही जारी होने वाले करोड़ों रुपये के टेंडरों के कमीशन का गणित कौन संभालेगा? वैसे, द इनसाइडर की पारखी नज़र भी साहब पर बराबर बनी हुई है। हम भी देख रहे हैं कि साहब की यह कड़कबाज़ी वाकई ईमानदारी का जज़्बा है या फिर प्रशासनिक गलियारों की वही पुरानी सुपरहिट थ्योरी— “पहले गरम हो जाओ, फिर नरम पड़ो और फिर बेशर्म होकर मलाई खाओ!”
कर्मचारियों की जेब ढीली, अफसरों के घर दीपावली!
कैलेंडर के हिसाब से तो दीपावली आने में अभी चार महीने बाकी हैं, लेकिन हमारे सूबे के अफसरों की किस्मत देखिए—जुलाई के महीने में ही उनकी दो-दो दिवाली मन गई! पहली ‘दिवाली’ तो सूबे में चले ताबड़तोड़ ट्रांसफर उद्योग की रही, जिसकी मलाई का स्वाद अभी जुबान से उतरा भी नहीं था कि अफसरों की चौखट पर प्रमोशन वाली दूसरी दिवाली ने दस्तक दे दी। सूत्र बताते हैं कि प्रमोशन पूरी तरह लीगल (कानूनी) और पात्रता के दायरे में था। लेकिन साहब, जब तक छोटे कर्मचारियों की जेब हल्की न हो जाए, तब तक अफसरों की दिवाली में वो ‘चमक’ कैसे आती? बस फिर क्या था, जायज प्रमोशन का ठप्पा लगाने के एवज में निचले स्तर के छोटे कर्मचारियों से 10 हजार रुपये से लेकर 50 हजार रुपये तक की वसूली कर ली गई! बेचारे छोटे कर्मचारी भी क्या करते, प्रमोशन की खुशी में गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा दिवाली उपहार के नाम पर अफसरों की न्योछावर करने को मजबूर हो गए। अब सरकारी महफिलों में जमकर ठहाके लग रहे हैं— “जब पटाखा फोड़ने की उम्र ढल जाए, तो साहब लोग कर्मचारियों की जेब फोड़कर ही अपनी दिवाली मना लेते हैं!”



