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The Insiders: आईएएस मैडम ने देवी-देवताओं से मुंह फेरा, सरकार के करीबी को साउथ लॉबी ने हटवाया, मंत्री का पीए फिर निकला वसूली पर

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़िए - मसूरी की दीवारों पर चमकने वाले 'शीलं परम् भूषणम्' को हमारे नए-नवेले अफसर अपनी प्रैक्टिकल लाइफ में कैसे धुएँ में उड़ाते हैं

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल |
कुछ वक्त पहले बिहार पृष्ठभूमिके एक एसीएस स्तर के अफसर को ग्वालियर में सेवानिवृत्ति पर एक माला एक गुलदस्ता तक नसीब नहीं हुआ। और अभी पिछले महीने जबलपुर में जनजातीय विभाग के सेवानिवृत्त हो रहे एक अधिकारी को कर्मचारियों ने बेशरम के फूल का गुलदस्ता देकर विदा किया। अनोखा प्रदर्शन था। देने वाले के संस्कारों और लेने वाले के कर्मों का अदभुत प्रतीकात्मक मेल। यही परम्परा चालू रही तो जल्द ही वल्लभ भवन के गलियारों में कैक्टस के पौधे और केंवाच के फूलों की माला भी सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारियों को प्राप्त हो सकती हैं। ऐसा क्यूं हो सकता है? तो समझने वाली बात ये है कि मसूरी में LBSSNA की एक बड़ी दीवाल पर बहुत बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है -“शीलं.. परम्.. भूषणम..”…लेकिन जब आईएएस अफसर फील्ड में आते हैं तो घर लिखा होता है ..”शीला.. प्रियम.. आभूषणम..” यानी पत्नी/प्रेयसी की जरूरतों में शील का शील भंग कर आभूषण से लेकर भोगविलास में मानवीय व्यवहार तक भूल जाते हैं। और पदस्थापना में अपने हर मातहत को कोल्हू का बैल समझ कर अपने आर्थिक हित साधने में पेरते रहते हैं। वैसे, सेवानिवृत्ति बाद कभी-कभी बच्चों से तिरस्कार और सामाजिक दुत्कार मिलता है तो अक्सर भगवान से शिकायत करते हैं कि हमने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया। फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? तब इन्हें यह याद नहीं आता कि पद पर रहते हुए अपने बर्ताव को प्रशासनिक शिष्टाचार मानते थे और भूल जाते थे कि मानवीय सम्वेदनाएं कुचली जा रहीं हैं। बहरहाल बस यही कहेंगे कि इन बेशरम के फूलों को सन्मति दे भगवान। और अब शुरू करते हैं आज का द इनसाइडर्स…

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  1. बेड़ई कचौरी ने इडली-डोसा के सामने दम तोड़ा!

वल्लभ भवन की पांचवीं मंजिल पर एक बार फिर गाज गिरी है। यहां की बेड़न कचौरी को इडली-डोसा वाली पार्टी ने निपटा दिया है। नहीं समझे तो विस्तार से बताते हैं। पांचवीं मंजिल यानी सीएम सचिवालय में पता नहीं क्या वास्तु दोष हो गया है कि कोई भी टिक नहीं पा रहा है। ऐसे ही भले और बेड़ई पुरी वाले इलाके से आने वाले एक अफसर भी हालिया फेरबदल में हटा दिए गए हैं। तब से उनके हटने की वजहों को लेकर तरह-तरह की चर्चाओं का दरबार गर्म है। लेकिन हमारे इनसाइडर्स के मुताबिक, चौथी मंजिल के इटली-डोसा खेमे वाले अधिकारी ने अपने ही खेमे वाले अधिकारी के संग साजिश (बड़े साहब के कान फूंकने) का ऐसा खेल रचा कि बेड़ई पुरी चारों खाने चित्त हो गई।

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  1. किससे बात करें?

जैसा हमने बताया कि पांचवीं मंजिल में बार-बार अफसरों के हटने से सत्ता संतुलन गड़बड़ा रहा है। अब हालात यह हो गई है कि किसी को समझ नहीं आ रहा है कि काम के लिए किससे संपर्क करें? चिराग तले अंधेरे वाली स्थिति है। हाल ही में राज्यसभा चुनाव हुए तो सत्ता पक्ष के प्रदेश के बाहर से आए एक नेता ने भी नामांकन भरा। इस दौरान वे इस बात से परेशान रहे कि सरकार से संपर्क कैसे करें। कोई भी उन्हें यह बता पाने की स्थिति में नहीं था कि सरकार से कौन व्यक्ति फोन पर बात कराएगा? हालांकि, उन्होंने अपने पुराने राजनीतिक अनुभव का पिटारा खोला, किसी पुराने अफसर से बात की और जैसे-तैसे सरकार के पास मौजूद व्यक्ति तक पहुंच हासिल की।

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  1. पी.ए. साहब की नई ‘वसूली यात्रा’ का फार्मूला

एक नई-नवेली मंत्राणी जी और उनके घाट-घाट का पानी पिए पी.ए. के कारनामे इन दिनों चर्चा में हैं। मैडम ने भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद सीधे पंगों से दूरी तो बना ली, पर ऊपर की मलाई का मोह नहीं छोड़ पाईं। इसी बीच उनके पी.ए. ने कान फूंका कि अपना विभाग तो सूखा है, असली कमाई तो प्रभारी जिले में है। ताजा खबर यह है कि पी.ए. साहब अभी फिर वसूली पर उसी प्रभार वाले जिले के दौरे पर निकल चुके हैं। मैडम का दौरा तो बाद में होता है, साहेब दो दिन पहले ही वहां डेरा डालकर खनिज, परिवहन और अपने महकमे से वसूली का नया अध्याय शुरू कर देते हैं। चर्चा है कि हर फेरे में 50 लाख की सेंधमारी होती है, मगर मंत्राणी जी को भनक तक नहीं लगती और आधा से ज्यादा माल पी.ए. खुद डकार जाते हैं। विधायकों की शिकायत के बाद भी जब मैडम ने कोई एक्शन नहीं लिया, तो माननीय अब अपना सा मुंह लेकर रह गए हैं और मामला सीधे सरकार के दरबार में ले जाने की फिराक में हैं।

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  1. और पावरफुल हुए अपर कलेक्टर साहब

आर्थिक राजधानी में हमने पहले ही बताया था कि यहां अपर कलेक्टरों के बीच काफी टशन है। अब जब एक पावरफुल अधिकारी का ट्रांसफर हो गया तो यह बात सबकी जुबान पर है। उनके हटने से दूसरे एक और अधिकारी और ज्यादा पावरफुल हो गए हैं। वे पहले यहां प्रभारी के तौर पर थे, पर नए आदेश में यहीं उनकी पक्की पदस्थापना कर दी गई है। अब साहेब की ठसक देखने लायक है, विरोधी कह रहे हैं—“जिसका डर था वही बात हो गई, साहब की तो रातों-रात चांदी हो गई!”

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  1. हम IAS हैं… देवी-देवता नहीं मानते

पिछले दिनों एक महिला आईएएस का बोल्ड स्टेटमेंट सामने आया। हुआ यूं कि कृषि से जुड़े इनके कार्यक्षेत्र के जिला परिसरों में पुलिस थानों की तरह लगभग हर परिसर में एक मंदिर है। कुछ कर्मचारी इन मंदिरों में सुधार कार्य के लिए संस्था का सहयोग लेने पहुंचे तो साल भर पहले प्रमोट हो चुकी आईएएस मोहतरमा बिफर गईं। उन्होंने कहा—“हम IAS हैं, देवी-देवता नहीं मानते। मंदिरों की राजनीति तो नेता करते हैं वोट बैंक के लिए।” और कर्मचारियों को भगा दिया। अब कर्मचारी पीठ पीछे आपस में बात कर रहे हैं कि हाँ मैडमजी, आप सिर्फ हरी-हरी गांधी की फ़ोटो वाले नोट-देवता को ही मानती हो! तभी तो आईएएस बनने के साल भर बाद भी डिप्टी कलेक्टर की पोस्ट से चिपकी बैठी हो। हे राम… क्या कलयुग के देवता अब सच में बदल गए हैं?

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  1. दीये तले अंधेरा…

द इनसाइडर्स के पिछले अंकों में हमने C-SAT पीढ़ी के एक फक्कड़, ईमानदार, नवाचार, शिष्टाचार और सदाचार वाले अधिकारी के कसीदे पढ़े। पर साहब, चांद में भी दाग होता है। हमारे इस पानी वाले विभाग के हीरो की भी एक कमी है और वो है इस इंसान की साधु वाली क्षमा प्रवृत्ति। कभी किसी से गलती हो तो ये उसे सुधरने का मौका देते हुए अपनी ईमानदार छबि की मिट्टी से उसे ढकने की कोशिश करते हैं। लेकिन आदतन लालची लोग कभी-कभी उनकी इस कमजोरी का मजा लेते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ पिछले दिनों। इनके मुख्यालय के एक बड़े अधिकारी ने बिना अर्हर्ता वाले कर्मचारियों को कुछ ले-देकर नियुक्त कर लिया। साहब (साधु बाबा) को शिकायत मिली तो उन्होंने तत्काल नियुक्ति निरस्त कर दी। लेकिन गलती करने वाले साहब को आलोकित नहीं किया बल्कि बख़्श दिया। वैसे, ये साहब आदतन अपराधी हैं। पहले भी एम्पनलमेंट में गड़बड़ी कर चुके हैं। आफिस मुख्यालय में फर्नीचर बनना था तो इस लालची अधिकारी ने एजेंसी से मुफ्त में पहले अपने घर का फर्नीचर बनवा लिया। बात साधु साहब तक भी पहुंची पर साधु साहब से जाने कैसे हर बार इस लालची को माफी प्राप्त हो जाती है। सर जी, हमारी सलाह तो ये है कि भलमनसाहत घर में रखें आफिस में नहीं, कहीं किसी दिन दूसरों को बचाते-बचाते खुद न झुलस जाएं।

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  1. किस्मत का कैलेंडर

पिछले साल सरकार के यहां शहनाई बजी तो सरकारी कलेंडर पर एक तस्वीर सबके बीच चर्चा में थी। वजह थी तस्वीर में नजर आ रही लड़की, जो सरकार की बहुरानी जैसी थी। इस बार राज्य सभा चुनाव हुए तो कलेंडर में जून वाले पेज पर भी तस्वीर चर्चा में आ गई। वजह वही पुरानी—तस्वीर में नजर आ रहे एक शख्स वही थे, जिन्हें राज्यसभा की तीसरी सीट के लिए टिकट मिला था। इसे देखकर लोग अब सचिवालय में कह रहे हैं कि भाई, सरकारी कैलेंडर में छपना ही राजयोग की पहली गारंटी है!

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  1. आईएएस की अपील: पहले अपनी ‘महफ़िल’ तो संभालो साहब!

एक कलेक्टर साहब ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक बेहद नेक और जनहित वाली पोस्ट डाल दी। साहब ने लिखा कि जिले में कहीं भी नशे का अवैध कारोबार हो रहा हो, तो कोई भी नागरिक सीधे उन्हें सूचना दे सकता है, उसकी पहचान बिल्कुल टॉप सीक्रेट रखी जाएगी। साथ ही, आम जनता से नशे से दूर रहने की भावुक अपील भी की गई। बस फिर क्या था, पोस्ट डलते ही उनके साथी आईएएस मित्रों ने बंद कमरों में उनके जमकर मजे ले लिए। हालांकि, सर्विस रूल के डर से किसी ने भी सोशल मीडिया की पोस्ट पर तो कोई कमेंट नहीं लिखा, लेकिन व्यक्तिगत मुलाकातों और फोन कॉल्स पर कलेक्टर साहब ही छाए रहे। साथी अधिकारियों का चटखारे लेकर कहना था कि जनता को ज्ञान बांटने से पहले कलेक्टर साहब अपने यहां होने वाली हाई-प्रोफाइल पार्टियों को तो रोकें। ऐसे में गलियारों में कानाफूसी चल रही है कि साहब पर “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” वाली कहावत यहां रत्ती-रत्ती सच बैठती है। खुद मियां फजीहत, औरों को नसीहत! वैसे, कलेक्टर साहब बड़े जिले में पदस्थ हैं।

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  1. तबादला सीजन खत्म, अब नोटों को ठिकाने लगाने की टेंशन!

लो साहब, आखिरकार तबादला सीजन का शटर गिर गया और इसी के साथ करोड़ों-अरबों का टर्नओवर करने वाला ‘तबादला उद्योग’ भी फिलहाल के लिए बंद हो गया। लेकिन असली सिरदर्दी तो अब शुरू हुई है। दलालों से लेकर साहबों और मंत्रियों के यहां गांधी छाप नोटों का जो गगनचुंबी पहाड़ इकट्ठा हुआ है, उसे ठिकाने लगाने (इन्वेस्ट करने) के लिए अब उन्नत किस्म के सीए और शातिर दिमागों की भारी माथापच्ची जारी है। हर कोई इसी जुगाड़ में है कि इस काली कमाई को सफेद चादर कैसे ओढ़ाई जाए। वैसे, इस बार के खेल में बही-खाते का हिसाब भी बड़ा गड़बड़ रहा है। कहीं वादे के मुताबिक मलाईदार पोस्टिंग नहीं मिली, तो कहीं एडवांस लेने के बाद भी साहब लूप लाइन में ही रह गए। नतीजा यह है कि हर कोई एक-दूसरे को संदेह की निगाह से देख रहा है। सत्ता के गलियारों में कहीं खुन्नस निकाली जा रही है, तो कहीं ‘अगली बार देख लेने’ की खुली धमकियां दी जा रही हैं। हालांकि, इनसाइडर्स के बीच आजकल सबसे गर्म चर्चा इस बात की है कि इस ‘सीजन’ का ‘मैन ऑफ द मैच’ कौन रहा? यानी किस अफसर या नेता ने सबसे ज्यादा धन की गंगा में डुबकी लगाई और अपनी तिजोरी को कुबेर का खजाना बना दिया। भाई साहब, अगर इस बंपर कमाई का सटीक आंकड़ा और नाम आपको भी कहीं से पता लगे, तो हमारे कान में आकर जरूर बताना। हम भी तो देखें कि कलयुग के इस महासंग्राम का असली सिकंदर कौन निकला!

 

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