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The Insiders: घूसखोर ‘स्त्री’ ट्रेप, आईपीएस का फरमान- ‘हंसना मना है’, आईएएस मैडम को ‘दीदी’ से एतराज, नीति पर चर्चाओं का बाजार गर्म

द इनसाइडर्स में इस बार पेश है आईएएस-आईपीएस की हरकतों के अजब-गजब किस्से

कुलदीप सिंगोरिया| भोपाल

पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान | भीलन लूटीं गोपिका, वही अर्जुन वही बान ||
अफसरानों का दिल एक अदद सूची में बसता है। अटकता है… भटकता है और चटकता भी है। इसी कशमकश में जिंदगानी उलझती रहती है। खैर, एक अदद इंतजार के बाद आईएएस की एक तबादला सूची आ चुकी है। एक और सूची भी जल्द आ जाएगी। फिर आईपीएस और एसएएस यानी हम्माल सेवा की भी आएगी। इसलिए यह एक सतत प्रकिया है। तो हम बात करेंगे कि जिन महानुभावों का नाम मौजूदा सूची में नहीं है या फिर जिन्हें मलाईदार पोस्ट नहीं मिली है, वे ऊपर लिखे दोहे का जरूर मनन करें। फिर मन को शांत करें और लग जाएं फिर से अगली सूची में स्थान पाने की जुगत में। याद रखिए, जब यूपीएससी का एक्जाम दिया था तब भी आपने सूची में स्थान पाया था, तो अब भी मिल ही जाएगा। बस धैर्य की दरकार है।

वहीं, जिन पराक्रमियों या बाहुबलियों को इस बार मलाईदार पोस्टिंग का सौभाग्य मिला है, वे भी इन पंक्तियों को जरूर आत्मसात करें क्योंकि प्रशासन के इस खेल में कभी भी लूप लाइन की सवारी करनी पड़ सकती है। इसलिए फील्ड में पहुंचते ही धुआंधार बल्लेबाजी शुरू न करें। हालांकि, खबर लगी है कि एक साहब ने तो पदस्थ होते ही वसूली की तगड़ी जुगाड़ जमा ली है, पर उन्हें कुदरत का फल भी तुरंत मिल गया। एक दौरे में उन्हें उम्मीद से ज्यादा मिर्ची वाला खाना परोस दिया गया। इसलिए होशियार रहें, बाखबरदार रहें। हम खबरों की दुनिया में आपका स्वागत तो करेंगे ही, लेकिन जिन्हें अभी सुलेमानी ताकत मिल गई है, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि यह सदा बरकरार नहीं रह सकेगी। इसका क्षीण होना तय है। इसलिए इस भीषण गर्मी में अपने मिजाज में थोड़ी ठंडक बनाए रखिए, वरना लू उतरते देर नहीं लगेगी। पोस्टिंग चाहे जहां भी हुई हो, संतुलन ही आपकी असली जीत है। बाकी तो आप ठहरे इस देश की सबसे समझदार कौम। तो चलिए, बिना किसी लंबी भूमिका के शुरू करते हैं, उसी गुदगुदाने वाले अंदाज में रसूखदारों के हैरतअंगेज कारनामों से भरा आज का ‘द इनसाइडर्स’…

स्त्री हुई ट्रेप, विकी-जना की जय-जयकार

ओ स्त्री, कल आना…”—फिल्मी डायलॉग था, पर यहां कहानी कुछ यूँ पलटी कि स्त्री खुद ही आ गई… और सीधे ट्रेप में फंस गई! हमने भी अपने कॉलम द इनसाइडर्स में इस घूसखोर महिला अफसर की कहानी दो किस्तों में सुनाई थी। दूसरे पार्ट में खुलासा हुआ था कि रात की वसूली में एक सरकटा—यानी सिविल सर्जन—भी पार्टनर बन चुका है। अब पेश है पार्ट-थ्री… और यहीं कहानी का द एंड। जिले में लंबे समय से परेशान लोग आखिरकार एकजुट हुए। फिल्म के विकी और जना की तरह, यहां भी एक टीम बनी—और मैडम की वसूली वाली रातें सीधे लोकायुक्त के जाल में फंस गईं। रात नौ बजे के बाद की कमाई अब सलाखों के पीछे है। शुक्रवार को इस “स्त्री” पर जीत के बाद जिले में विकी-जना स्टाइल जय-जयकार गूंज रही है। वैसे भाई, सारा क्रेडिट अकेले मत ले जाइए… इनसाइडर्स के कानों-आंखों का भी थोड़ा रोल रहा है। “कहानी में ट्विस्ट हमने भी डाला था, जनाब!

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क्या बदलेगी प्रदेश की नीति

ये कुर्सी बड़ी चीज़ है मुन्‍ना…”—और जब कुर्सी दिल्ली की हो, तो बात ही अलग। केंद्र सरकार के नीति आयोग में सबसे बड़े पद की वेकेंसी निकली है, पर चर्चा दिल्ली से ज्यादा भोपाल की गलियों में है। वजह—इस कुर्सी के लिए बड़े साहब का नाम हवा में तैर रहा है। अब बड़े साहब चाहें या न चाहें… “ऊपर से आया फरमान” अक्सर इच्छाओं से भारी पड़ता है। हालांकि, सुलेमानी ताकतें अभी भी यही चाहेंगी कि साहब प्रदेश में ही डटे रहें। इधर, जो लोग उनकी कुर्सी के दावेदार हैं, उनके चेहरे पर वही चमक है— जैसे रिजल्ट आने से पहले ही “मिठाई बुक” हो गई हो। कुल मिलाकर, दिल्ली दूर है… पर नजरें वहीं टिकी हैं।

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साहब की दरियादिली

दिल तो बच्चा है जी…”—पर यहां दिल दरबार निकला। एक सीनियर आईएएस, जिन्हें उनके दरबार सजाने के शौक के कारण “दरबार” कहा जाता है—अब एक नए कारण से चर्चा में हैं। फाइलों को अटकाना-भटकाना और मौके पर बल्लेबाजी करना—इनकी पहचान रही है। लेकिन इस बार कहानी ने पलटी मारी। एक मातहत बीमार पड़ीं—और साहब ने दिल से कमान संभाल ली। परिवार से लेकर डॉक्टर और हॉस्पिटल तक, हर जगह खुद या नुमाइंदे मौजूद रहे। और परिवार से पल-पल की खबरें लेते रहे। जिस मातहत ने कभी सोचा भी नहीं था कि इतना बड़ा अफसर इस तरह ख्याल रखेगा—वो आज साहब की दरियादिली की कायल है। अब हालत ये है कि साहब के सारे “अवगुण” बैकफुट पर हैं… और “दिलदार” इमेज कवर ड्राइव मार रही है।

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हंसी तो फंसी

हंसी तो फंसी…”—फिल्म का नाम था, पर यहां तो हकीकत बन गई। एक पुलिसकर्मी… बेचारा VC में बैठे था। न कोई पंचलाइन, न कोई कॉमेडी सीन—फिर भी हंसी निकल गई। बस, यही “गलती” भारी पड़ गई। एसपी साहब ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए सीधा निलंबन थमा दिया। यानी—हंसी की कीमत नौकरी से चुकानी पड़ी! अब कोई साहब को ये समझाए कि “लाफ्टर इज़ द बेस्ट मेडिसिन”—पर यहां तो दवा ही बीमारी बन गई। वैसे, साहब अगर थोड़ी दरियादिली दिखा देते, तो बात वहीं खत्म हो जाती। अब निलंबन आदेश सोशल मीडिया पर वायरल है… और लोग पूछ रहे हैं— “जनाब, इतनी भी क्या सख्ती कि मुस्कुराहट भी जुर्म बन जाए?” वैसे, ये घटना उसी जिले की है… जिसके नाम के आखिर में “घाट” आता है। और इस बार हंसी सीधे घाट उतर गई

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चाह नहीं मैं सुरबाला…

मालवा क्षेत्र की एक ऐसी बस्ती, जिसका नाम कभी वेश्यावृत्ति के कारण बदनामी से जुड़ा रहा—आज वहीं से बदलाव की एक सशक्त और प्रेरक कहानी सामने आई है। इसी समाज के पाँच युवा हाल ही में आरक्षक बने हैं। यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे कलंक से बाहर निकलने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। इन युवाओं ने अपनी सफलता का श्रेय उस आईपीएस अधिकारी को दिया है, जो पूर्व में यहां पदस्थ रहे थे। उन्होंने इस समाज के युवाओं में संभावनाएं देखीं, उन्हें पढ़ाई और मुख्यधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। यह प्रयास उनके कार्यकाल तक सीमित नहीं रहा—दोबारा लौटने पर भी उन्होंने मार्गदर्शन जारी रखा और यहां से जाने के बाद भी लगातार संपर्क में बने रहे। यह बदलाव बताता है कि संवेदनशील पहल और सतत जुड़ाव से समाज की दिशा बदली जा सकती है। ऐसे कार्यों को देखकर माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा की यह पंक्तियाँ सहज ही याद आती हैं—
“चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं… मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक।” 
वास्तव में, यह वही भावना है—जहां व्यक्तिगत यश से ऊपर उठकर किसी ने समाज के सबसे उपेक्षित हिस्से में आशा के बीज बोए। वर्तमान में वे आईपीएस अधिकारी लोकायुक्त संगठन में पदस्थ हैं, और उनका यह कार्य इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सच्ची सेवा वही है, जो किसी के जीवन की दिशा बदल दे।

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दीदी ओ दीदी…

दीदी ओ दीदी…”—यह डायलॉग आजकल रीलों में खूब बजता है। पर लगता है, एक युवा आईएएस मैडम को यह सुर रास नहीं आया। हुआ यूँ कि अपनी समस्या लेकर पहुंचे किसानों ने आदतन उन्हें “दीदी” कह दिया… और बस, यहीं कहानी में ट्विस्ट आ गया। मैडम ने साफ शब्दों में फरमान सुना दिया— “दीदी मत कहो… ये दीदी-भैया वाला नहीं चलेगा।” अब जनाब, गांव के सीधे-साधे किसान तो यही समझ पाए होंगे कि “नाम में क्या रखा है”—पर यहां तो संबोधन ही मुद्दा बन गया। हम तो इतना ही कहेंगे—“दीदी” इस देश में सम्मान का शब्द है, अपनापन है। और अगर किसान आपको इस नाम से पुकारते हैं, तो यह उनके भरोसे की भाषा है, न कि किसी रील का रिएक्शन। आखिर, नारी सशक्तिकरण “दीदी” सुनकर कमजोर नहीं होता… बल्कि और मजबूत होता है। थोड़ा अपनापन भी रखिए मैडम, कुर्सी से ऊपर रिश्ते होते हैं।

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जांच की बजाय ‘जाम’ में डूबे इंजीनियर साहब

एमपी अजब है, गजब है…”— मध्यप्रदेश पर्यटन विकास की यह लाइन अब सिर्फ विज्ञापन नहीं, कई किस्सों की हेडलाइन बन चुकी है। विंध्य के एक सीधे-साधे जिले में जल जीवन मिशन की जांच के लिए भोपाल से बड़े इंजीनियर साहब पहुंचे। लोगों को उम्मीद थी कि साहब फाइलें खंगालेंगे… सच्चाई सामने लाएंगे…पर साहब तो होटल में “जाम” खंगालते मिले! और मज़े की बात सुनिए— जिनकी जांच होनी थी, वही साहब के साथ पैग पर पैग लगाते नजर आए। यानि, “चोर-चोर मौसेरे भाई” वाला सीन लाइव हो गया। बताया जाता है कि पूरी पार्टी का इंतजाम भी आरोपियों ने ही किया था। अब जांच क्या होती, जब मेजबानी इतनी दिल से हो! खबर जब नए-नवेले कलेक्टर साहब तक पहुंची, तो उन्होंने कार्यपालन यंत्री की जमकर खबर ली। बाकी, “एमपी अजब है…”—ये लाइन फिर एक बार फिट बैठ गई।

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मैं नहीं सुधरूंगा…

मैं नहीं सुधरूंगा…”—यह कोई फिल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि एक साहब का जीवन-मंत्र बन चुका है। पत्नी के साथ विवादों में रहने वाले इस आईएएस के बारे में सीनियर अक्सर हैरान होते हैं— “ये साहब आखिर आईएएस कैसे बन गए?” पर साहब को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता… और शायद यही वजह है कि सुधार भी नहीं होता। ताजा किस्सा जनजातीय विभाग का है। साहब ने एक काम के लिए दूसरे विभागों के आईएएस अफसरों की ड्यूटी लगा दी। यहां तक कि सीनियर अधिकारियों को भी नहीं छोड़ा। अब सीनियर ने फोन कर समझाया— “कम से कम नियम-प्रक्रिया तो देख लिया करो…” लेकिन साहब ठहरे अपने ही अंदाज़ के खिलाड़ी। उन्होंने सफाई देते-देते ऐसा रायता फैलाया कि बात और उलझ गई। उन्होंने सारा ठीकरा अपने बॉस पर फोड़ दिया। कुल मिलाकर, मामला वही है। नियम अपनी जगह… और साहब अपनी जगह।

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