द इनसाइडर्स: रील वाले कलेक्टर साहबों के नए कारनामें, सीनियर आईएएस बेटी के जरिए कर रहे मनीलॉन्ड्रिंग, मंत्रियों से बंगले खाली करवाए पर पूर्व आईएएस अब भी डटे
The Insiders में इस बार पढ़ें प्रशासनिक और राजनीतिक अखाड़े की गुदगुदाने वाली अनकही कहानियाँ
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल| आज बात नई पीढ़ी के रील संस्कार की। उज्जैन के राजा भर्तृहरि द्वारा सम्राटों और विद्वानों के व्यवहार के बारे में लिखी गई किताब नीतिशतकम् में बड़े काम की बात कही गई है— “अनुभ्युन्नतपदा भवन्ति” अर्थात जो वास्तव में श्रेष्ठ होते हैं, वे ऊंचे पद पर बैठकर और भी विनम्र हो जाते हैं। लेकिन कुछ जिलों की कलेक्ट्रर्स को देखकर लगता है कि वे जिला संभालने नहीं, बल्कि ऑस्कर की तैयारी करने आए हैं। फाइलों के निपटारे में नहीं, बल्कि ‘कैमरा एंगल’ और ‘बैकग्राउंड म्यूजिक’ का सही तालमेल में बैठाने आए हैं। प्राथमिकता रील के ‘व्यूज’ और ‘फॉलोअर्स’ हो गई है।
प्रशासनिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस पद की गरिमा का एक अलग ही चेहरा नजर आता है। अंग्रेजों के शासनकाल में लगान वसूली के ‘कलेक्शन’ के लिए जिन अधिकारियों की नियुक्ति की गई, उनका पदनाम ‘कलेक्टर’ पड़ा। वहीं, राजस्व वसूली के लक्ष्यों को पूरा करने के एवज में जिन अफसरों को कमीशन मिलता था, उन्हें ‘कमिश्नर’ कहा गया। समय के साथ यही पद जिले की प्रशासनिक इकाई की रीढ़ बन गए और समाज में इन्हें बहुत इज्जत मिली। आजादी के बाद कलेक्टर साहब का व्यक्तित्व और उनकी सादगी लोगों के लिए प्रेरणा होती थी, लोग उनका दिल से सम्मान करते थे।
लेकिन विडंबना देखिए, आज की रील संस्कार और भ्रष्टाचार के दीमक ने इस गौरवशाली पद को वापस वहीं लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से इसकी शुरुआत हुई थी। आज के कुछ कलेक्टर भ्रष्टाचार के कारण फिर से महज एक ‘कलेक्शन’ और ‘कमीशनखोर एजेंट’ बनकर रह गए हैं। इन अधिकारियों की मौजूदा हरकतों को देखकर कालजयी उपन्यास ‘राग दरबारी’ का वह ‘रंगनाथ’ याद आता है जो व्यवस्था की विसंगतियों को देख चकरा जाता है। जो तामझाम कभी चुनाव जीतने वाले नेताओं का शौक हुआ करता था, वह अब कलेक्टर साहब की ‘डेली रील’ का अनिवार्य हिस्सा है। वैसे, जब कलेक्टर ही खुद को ‘सुपरहीरो’ की तरह पेश करने लगेगा, तो पटवारी से लेकर इंजीनियर तक का टीम-मनोबल टूटना तय है।
हैरानी तो तब होती है जब दिन भर सादगी और कर्तव्यनिष्ठा की रील बनाने वाले इन चेहरों का असली चेहरा सूरज ढलते ही बेनकाब होता है। साहब और साहिबाएं अपनी कार्यशैली से ज्यादा अपनी ‘लटक-झटक और मटक’ वाली अदाओं के लिए मशहूर हो रही हैं। शाम ढलते ही ‘वेल्थ, वाइन और वूमन’ (WWW) के मायाजाल में मशगूल रहने वाले ये अफसर यह भूल जाते हैं कि उनका पद ‘भोग’ के लिए नहीं, बल्कि जनसेवा के लिए है। इसलिए, बड़े साहब को कड़ा हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इनकी ऊर्जा रील के लिए म्यूजिक सेट करने या शाम की महफिलें सजाने में नहीं जाया हो। जनता को ‘इन्फ्लुएंसर’ नहीं, एक ऐसा ‘प्रशासक’ चाहिए जो बिना कैमरे के भी उनके आंसू देख सके।
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सीनियर आईएएस लिख रहे मनीलॉन्ड्रिंग की नई स्क्रिप्ट
किस्सा उन सीनियर आईएएस साहब का है, जिनका मन गृह कार्य की रूखी-सूखी फाइलों और दफ्तर की चहारदीवारी में किसी ‘कैदी’ की तरह छटपटा रहा था। आखिर मर्मज्ञ कलाकार जो ठहरे! उन्होंने ऐसी जुगत भिड़ाई कि बड़े हाकिम का दिल पिघल गया और उन्हें यहां से मुक्त कर दिया है। अब साहब वापस उसी ‘गीत-संगीत और संस्कृति’ की महफिल में रम गए हैं, जहाँ फाइलों की धूल नहीं, सुरों की खुशबू आती है। साहब अब सुकून में हैं, पर चर्चा है कि जब वे ‘गृह कार्य’ में कुछ ज्यादा ही मशगूल हो गए थे। तब अपने प्रभार वाले एक और विभाग में जिस सोशल मीडिया हैंडल करने वाली कंपनी को उन्होंने ‘बेटी के उज्ज्वल भविष्य’ के लिए सेट करवाया था, वहां हिसाब-किताब का सुर थोड़ा बेसुरा हो गया है। अब गलियारों में चटखारे लिए जा रहे हैं कि साहब कलाकारी तो विभाग में दिखा रहे हैं, पर असली ‘मनी-लॉन्ड्रिंग’ की स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जा रही है। बेटी के जरिए नए वित्तीय रास्ते खोजे जा रहे हैं—मानो साहब कह रहे हों, “संस्कृति तो सिर्फ दिखावा है, असली संगीत तो लक्ष्मी जी की झंकार में है!”
रंगीला राजा…फाइल से मांगे कुछ और…
औरंगजेब के बाद मुगल सल्तनत में एक बादशाह हुए मोहम्मद शाह रंगीला। उर्फ रोशन अख्तर। 29 साल के इनके कार्यकाल की अजब कहानियां हैं। कहा जाता है कि भारत वर्ष का सबसे बड़ा हरम इनके पास था। दिन भर शराब और शबाब में डूबे रहते थे। कभी कभी तो नश में होश खोकर दरबार में हरम से नग्न अवस्था में ही आ जाते थे। नादिरशाह इनके कार्यकाल में आया और कोहिनूर समेत तमाम सम्पदा औरतें लूट कर ले गया पर इनकी अय्याशियों में कभी कमी नहीं हुई। ठीक इसी तरह का किरदार है पानी से जुड़े विभाग के एक अलग थलग पड़ी विंग के मुख्य अभियंता का। जनाब विधुर हैं तो उनकी हसरतों को परिस्थियों का सहारा मिल गया। हुआ यूं कि जैसे ही विभाग प्रमुख बने अनुकम्पा नियुक्ति के प्रकरण आने लगे। स्वर्ग सिधारने वाले कर्मचारियों कि बेवाएँ प्रार्थना करने आने लगीं। साहब कि बंजर भूमि में अरमानों की बारिश हो गई और उन्होंने इनमें से कुछ से धन वसूला लेकिन एक से व्हाट्सप्प पर सम्बन्ध स्थापित कर लिए। इस बेवा की बिटिया जैसे ही 18 की हुई, न कोई पुलिस वेरिफिकेशन न ही कोई कास्ट सर्टिफिकेट और न ही रोस्टर। सीधे पोस्टिंग। नीचे वालों को धमकाकर न सर्फ बिना कागजों के जॉइन कराया बल्कि उस सुकुमारी पर “स्नेह” बरसा कर अपने कार्यालय में अटैच कर लिया। 22 हजार की तनख्वाह वाली कन्या THAR से आफिस आने लगी और हाथ में आई फोन 17 PRO लेकर फ्लॉन्ट करने लगी। वहीं, शेर आदमखोर हो गया अब तो उसे हर अनुकम्पा नियुक्ति की फ़ाइल में 36-24-36 दिखने लगा। एवज में अब “कुछ और”… कि मांग होने लगी। ऐसा न होने पर फ़ाइल को ये कह कर ठंडे बस्ते में डाल देतें हैं कि जानकारी पूरी नहीं दी। मतलब साफ है “या तो हवेली(चार इमली) पे आओ या भाड़ में जाओ..” इसी तरह के रंगीले राजाओं के कारण आज ये विभाग खत्म होने को है और एक ग्रामीण विभाग नादिरशाह बन के लूटने जा रहा है। शेष अगले अंकों में…
दिल्ली की ‘चमक’ और एमपी का ‘परहेज’
शहरों वाले विभाग के एक कमिश्नर साहब आजकल मध्य प्रदेश की गलियों से ज्यादा दिल्ली के ‘आईएएस चैप्टर’ की रौनक बढ़ा रहे हैं। साहब ने ‘पीएम स्वनिधि’ का ढिंढोरा पीटने के लिए दिल्ली दरबार को चुना, ताकि खुद और बड़े साहब की चमक सीधे देश की राजधानी तक पहुंचे। हैरानी की बात यह है कि जिस योजना का फल मध्य प्रदेश मिला है, उसका गुणगान प्रदेश की जनता के बजाय दिल्ली के रसूखदारों के बीच हो रहा है। साहब को शायद लगता है कि एमपी में प्रचार करना ‘देसी’ है और दिल्ली में प्रोफाइल चमकाना ‘विदेशी’! हालांकि चर्चा यह है कि साहब का दिल्ली प्रेम छूट नहीं है। इसलिए वे दिल्ली वाले दोस्तों को बता रहे हैं कि वे कितना काम करते हैं। निशानेबाज कह रहे हैं कभी दिल्ली जाना पड़े तो दिल्ली वाली सत्ता में भी अपने काम के निशां बनाए रखना चाहते हैं।
कलेक्टर साहब अपनी जासूसी से हुए खौफजदा
नए-नवेल कलेक्टर बने एक साहब की सतर्कता को सलाम। आपने अपने ही दफ्तर में छिपे उस ‘स्पाई डिवाइस’ और जासूसी के खेल को पकड़कर बड़ा किला फतह कर लिया है। खबर है कि साहब अपनी जासूसी से इतने खौफजदा हैं कि पूरे कलेक्ट्रेट को अभेद्य किला बना दिया है। पर साहब, असली सवाल तो यह है कि आपको इस जासूसी से इतना डर क्यों लग रहा है? कहीं यह डर इसलिए तो नहीं कि आपकी ‘खास मुलाकातों’ का कच्चा चिट्ठा लीक न हो जाए? जासूसी पकड़ने का ढोल आप भले ही पीट लें, लेकिन जनता के बीच चर्चा तो आपकी ‘वसूली’ के उन पुराने किस्सों की है, जो पिछली पोस्टिंग से आपके साथ यहाँ तक आए हैं। वहां भी ‘सेवा-शुल्क’ के चर्चे आम थे और यहाँ भी फाइलों की रफ्तार ‘वजन’ तय करने के बाद ही बढ़ती है। याद रखिएगा, साहब—“पर्दा जो उठ गया तो राज खुल जाएगा, और जिस दिन राज खुलेगा, उस दिन आपकी ये सारी जासूसी रोकने की सारी कोशिश धरी की धरी रह जाएगी।” यह पब्लिक है सब जानती है।
साहब की गैरमौजूदगी में भी ‘विवादों’ ने ढूंढ लिया पता!
मप्र कैडर के युवा ‘यदुवंशी’ अफसर के गृह-नक्षत्र इन दिनों कुछ ज्यादा ही ‘उग्र’ चल रहे हैं। उनकी प्रशासनिक पारी तो फिलहाल वैसी ही हो गई है कि “सिर मुंडाते ही ओले पड़े”। बेचारे अभी नई कुर्सी की धूल भी ठीक से नहीं झाड़ पाते कि विवादों का बवंडर उनका पता पूछते हुए दफ्तर के बाहर खड़ा मिलता है। किस्मत का खेल देखिए, पहले इंदौर के भागीरथपुरा कांड में उनका नाम ऐसे उछला जैसे सारा ‘दोष’ उन्हीं के खाते में लिखा हो, जबकि पद संभाले जुम्मा-जुम्मा दिन ही हुए थे। वहां से जैसे-तैसे पल्ला छुड़ाकर एक निगम के एमडी बने, तो वहां भी बरगी के पानी ने उनकी किस्मत में ‘खलल’ डाल दिया। गजब तो यह है कि साहब सवा महीने से बंगाल के चुनावी रण में पसीना बहा रहे थे, लेकिन बदनसीबी की रडार इतनी तेज निकली कि उनकी गैरमौजूदगी में भी सारा ठीकरा उन्हीं के नाम पर फोड़ दिया। हालांकि साहब हैं बहुत मेहनती और दिल से काम करते हैं। पर अब इसे संयोग कहें या भारी भरकम कुंडली। इन दिनों विवादों के बादलों का पहरा कुछ ज्यादा ही गहरा है।
फाइल के लिए साहबों की नूराकुश्ती
प्रशासनिक गलियारों में आजकल मनोरंजन का नया ठिकाना ‘पर्यावरण विभाग’ बन गया है। किस्सा बड़ा चटखारेदार है—एक तरफ 90 के दशक वाले कड़क एसीएस साहब हैं, जिन्होंने कलम की ताकत दिखाते हुए फरमान जारी किया कि “काम शुरू करो, सरकार का साथ है और नियम हमारे हाथ हैं।” पर असली ‘ट्विस्ट’ तो यहाँ आया जब जूनियर साहब ने अपनी कुर्सी घुमाई और सीनियर साहब के आदेश को ऐसे ताका जैसे वह किसी पुरानी फिल्म का बोरियत भरा डायलॉग हो। जूनियर साहब, जो खुद एक पूर्व दिग्गज के सुपुत्र हैं, उन्होंने दो-टूक कह दिया—हमें तो अदालत का खौफ ज्यादा प्यारा है। दरअसल, पर्यावरण तो यहाँ केवल बहाना है, असली मुकाबला तो ‘साहबी’ और ‘साहबजादे’ के बीच है। मंत्रालय के कोनों में चुटकियाँ ली जा रही हैं कि जहाँ वरिष्ठता और विरासत टकराती है, वहाँ फाइलें अक्सर कोमा में चली जाती हैं!
कमिश्नर मैडम का सुविधाओं के साथ ‘फेविकोल’ जैसा जोड़
ऊर्जाधानी वाले जिले के प्रशासनिक गलियारों में आजकल कलेक्टर साहब और मैडम कमिश्नर के बीच ‘सादगी बनाम सुविधा’ का दिलचस्प मैच चल रहा है। जहाँ नए कलेक्टर ने पीएसयू कॉलोनी की लग्जरी छोड़कर पुराने सरकारी बंगले की धूल झाड़ना पसंद किया, वहीं मैडम कमिश्नर का ‘सुविधा प्रेम’ अब भी इसी कॉलोनी की ठंडी हवाओं में कैद है। मजे की बात यह है कि सोशल व डिजिटल मीडिया पर ‘संघर्ष से सफलता’ की आईएएस वाली फर्जी दास्तानों से सुर्खियां बटोरने वाली मैडम असल में नगरीय प्रशासन सेवा की अधिकारी हैं। और पिछली कार्यकालों में कई विवाद भी जुड़े हैं। डिजिटल दुनिया में आदर्शों की गंगा बहाने वाली मैडम को ज़मीन पर सरकारी आवास रास नहीं आ रहा। जनता चुटकी ले रही है कि संघर्ष की रील बनाना आसान है, पर हकीकत में सुविधाओं का मोह त्यागना बड़े-बड़ों के बस की बात नहीं!
यूपी-बिहार पर पहला अंक पढ़ें – आईपीएस की जोड़ी दिल्ली चली, फंड की कमी तो वसूली के रेट दोगुने, बड़े साहब खुद ही बन गए ‘चारण’
बंगलों का ‘मोहपाश’ और प्रशासन की ‘अकादमी’
बात बंगले की निकली है तो प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों ‘अतिथि देवो भव’ का एक नया और अनोखा वर्जन देखने को मिल रहा है, जिसे हम ‘अतिथि बंगला छोड़ो भव’ कह सकते हैं। किस्सा कुछ यूं है कि सरकार ने अपने पूर्व मंत्रियों से तो बंगले ऐसे खाली करवा लिए जैसे कोई सख्त मकान मालिक किरायेदार को बाहर करता है, पर जब बात अपने ‘खास साहबों’ की आई, तो नियम-कायदे कहीं फाइलों के नीचे सो गए। एक रिटायर्ड एसीएस साहब तो बंगले से ऐसा चिपके हैं कि पिछले 13 महीनों से उन्हें बाहर की हवा रास ही नहीं आ रही। शायद उन्हें लगता है कि रिटायरमेंट सिर्फ दफ्तर से होता है, बेडरूम से नहीं! वहीं दूसरी तरफ एक महिला आईएएस अधिकारी ने तो प्रशासन सिखाने वाली अकादमी के उस बंगले पर ही डेरा डाल रखा है, जो खास तौर पर डायरेक्टर के लिए ‘ईयर मार्क’ (आरक्षित) है। ऐसे में गलियारों में खुसर-पुसर है पूर्व मंत्रियों का रुतबा तो चला गया, पर साहबों का ‘ईगो’ और ‘आराम’ अब भी सरकारी ईंटों से मजबूती से चिपका हुआ है। इसे कहते हैं असली प्रशासनिक ‘कब्जा’, जहाँ रिटायरमेंट के बाद भी साहब नया आशियाने में शिफ्ट होना भूल जाते हैं!
संस्कारधानी वाले विधायक और बारदाने का ‘माल’
संस्कारधानी वाले जिले की सियासत में इन दिनों सिद्धांतों की नहीं, बल्कि ‘बारदाने’ की बंदरबांट की चर्चा है। किस्सा बड़ा दिलचस्प है—एक पूर्व मंत्री जी व विधायक, जो आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘मसीहा’ बनकर उभरे हैं, उन्होंने बड़े साहब के कान भरकर एक बड़ा घोटाला रुकवा दिया। जनता को लगा कि वाह! मंत्री जी तो दूध के धुले हैं, पर असली खेल तो पर्दे के पीछे चल रहा था। खबर है कि जिले के ही एक दूसरे विधायक जी इसी विभाग में ‘मोटा माल’ समेटने की कला में माहिर हो चुके हैं। जब यह राज पूर्व मंत्री जी को पता चला, तो उन्हें घोटाले से नफरत नहीं, बल्कि अपना ‘हिस्सा’ न मिलने का मलाल हुआ। बस, फिर क्या था! दोनों माननीय अब आमने-सामने हैं और एक-दूसरे का खेल बिगाड़ने में जुटे हैं। यह कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ पवित्र जंग नहीं, बल्कि ‘तुमने खाया तो मैं क्यों नहीं’ वाली आपसी रंजिश है। अब दोनों तरफ से विभाग पर दबाव की राजनीति का ‘पट्टा’ फेंका जा रहा है ताकि अपनी गोटी लाल की जा सके। कुल मिलाकर, बारदाने की आड़ में जनता के बीच संस्कार और पर्दे के पीछे ‘मलाई’ का खेल जोरों पर है। इसे कहते हैं—हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और!



