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The Insiders: मोदी की वर्क फ्रॉम होम अपील पर पूर्व से ही अमल कर रहे एसपी साहब, बड़े साहब के बंगले से भी कमीशन मसका, आईएएस ने चुनी पितृभक्ति की राह

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़िए सीनियर अधिकारी का मोदी जी को खुला पत्र

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865

मध्यप्रदेश के एक सीनियर अधिकारी का मोदी जी को खुला पत्र…

परम् आदरणीय मोदी जी

सादर नमस्कार।

ये जो आपने बाबा रामदेव की तरह 7 का आंकड़ा पकड़ कर सप्त मर्यादा की बात की है, उस पर आज “द इनसाइडर्स” के माध्यम से  हमारी अरज सुन लें।

आपने पेट्रोल, खाने के तेल, रासायनिक खाद, सोना, विदेशी ब्रांड खरीदने और विदेश यात्रा से की बचने व वर्क फ्रॉम होम करने की सलाह दी। नेता नगरी ने आपके वचन को बकैती समझ कर इग्नोर किया और बड़ी-बड़ी रैली निकाली। फलस्वरूप कुछ को आपके चेलों ने निपटा दिया। अच्छा हुआ। पर मैं बात करूंगा अधिकारियों की परेशानी की। जहां वर्क फ्रॉम होम और खाने के तेल वाले आग्रह से हमें फर्क नहीं पड़ना, हम बिल्कुल इसका पालन करेंगे। (क्योंकि पहले से कई अफसर घर से ही आफिस चलाते हैं और फिटनेस के लिए तेल का उपयोग भी बंद है)। लेकिन बाकी घोषणाओं से हमारी इच्छाओं का तुषारापात सा हो गया है ।

आप ही बताइए! हम सोना नहीं खरीदेंगे तो नंबर 2 की कमाई को कहाँ लगाएंगे? अपनी प्रौढ़ पत्नी को बिना गहने दिए प्रसन्न या व्यस्त कैसे रखेंगे? उसको 16 साल की नवयौवना वाला एहसास कराने के लिए और घर की सुख शांति के लिए गहनों का निरंतर घर आना जरूरी है भाई!!!!…(हालांकि आप नहीं समझेंगे पत्नी पुराण को।) खैर, हमने इसका भी उपाय निकाल लिया है। सोना की मनाही है पर  हीरों और अन्य मूल्यवान रत्नों की तो नहीं। आपके गुजराती हीरा व्यापारियों का ही भला कर देंगे। पर मोदी जी सारे सिंगल माल्ट और स्कॉच विदेशी ही होते हैं। इसलिए विदेशी ब्रांड के बिना हम जी नहीं सकेंगे। (देशी ब्रांड बड़े हार्ड होते हैं जी…) इसलिए हमारी इस अरज पर खास ध्यान दीजिए।

और, हाँ रासायनिक खाद से हमारा कोई लेना देना नहीं पर पेट्रोल की कमी कराने की कोशिश अवश्य करेंगे। आदेश निकाल देंगे कि आगे से कोई फिजिकल मीटिंग नहीं होगी। जो भी मीटिंग होगी वो ऑनलाइन बैठक होगी। इससे मातहतों की गाड़ियों का पेट्रोल बच जाएगा। पर खबरदार! आपने हमारे चार इमली या 74 बंगले के बंगले पर खड़ी तीन-तीन सरकारी गाड़ियों का हिसाब पूछा तो? आपको क्या पता कि किस तरह हम “पूल” के नाम पर या “अपने स्टेनो” के नाम पर लक्ज़री गाड़ी अलॉट कर बंगले पर मुश्किल से मात्र 3 गाड़ी ही रख पाते हैं। यदि ये नहीं होगा तो हमारा डॉगी कार में घूम नहीं पायेगा? हमारी मैडम घूम नहीं पाएगी? तो कलह हो जाएगी और steel frame of indian administration हिलने लग जाएगा।

तो मोदी जी ये हम से न हो पाएगा!

हाँ, मासिक बैठक बुलाने से जो मासिक कलेक्शन की प्रक्रिया है उसका हम कोई तोड़ …हवाला …हरकारा…आदि के जरिये निकाल लेंगे। पर खबरदार जो आपने सभी शासकीय वाहनों पर जीपीएस लगाने की बात की तो। यदि ऐसा हुआ तो हमारा एसोसिएशन इस बात पर बड़े साहब के समक्ष विरोध करेगा। और वो हमारी बात मानेगे ही। भले ही वो ईमानदार टाइप के हैं पर हैं तो हमारे ही। हमसे बाहर थोड़ी जा पाएंगे!

आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने विदेश यात्रा का मना किया है  लेकिन सरकारी विदेश यात्रा का थोड़े ही मना किया है! आप भी तो 5 देशों की सरकारी यात्रा पर हो। और हम कौन कभी अपने पैसों से विदेश जाते हैं।

और आखिरी निवेदन अब कोई नई बंदिशें मत लगाना, वरना IAS/IPS में IIT/IIM की जगह किसी गुरुकुल या आश्रमों से ही सीधी भर्ती करवा लीजिए।

आपसे प्रभावित और प्रताड़ित
आपका अपना…

मध्य प्रदेश का एक भरिष्ठ (भ्रष्ट+वरिष्ठ) अधिकारी…

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साहब का ‘टच-स्क्रीन’ दफ्तर और बारूद की हकीकत

देवास में पटाखा फैक्ट्री क्या फटी, हमारे कलेक्टर बाबू के वसूली की गुल्लक चटक गई। ग्राम पंचायत तहसीलदार साहब को चिट्ठियां लिख-लिखकर थक गई, लेकिन साहब अपने वातानुकूलित दफ्तर के अभेद्य किले में इतने मशगूल थे मानो जनता किसी दूसरे ग्रह की प्राणी हो। जनता गुहार लगाती रही, और साहब फाइलों की ‘डिजिटल दुनिया’ में खोए रहे। अभी हरदा के धमाकों की राख ठंडी भी नहीं हुई थी कि अफसरों की इसी लचर कार्यप्रणाली ने देवास में फिर से लाशों का ढेर लगा दिया। जनता से कटे इन ‘कुंभकर्णी’ हुक्मरानों पर दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं:

“तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,

मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।”

जब बारूद के ढेर पर गरीब मजदूरों के चीथड़े उड़ गए, तब जाकर साहब का यह कांच का किला खुला और वे हमेशा की तरह “जांच कमेटी” का घिसा-पिटा राग अलापने बाहर निकले। हुजूर याद रखिएगा कि आपकी आलीशान कुर्सी के नीचे बारूद सुलग रहा है! वैसे, इस मामले में सरकार का भी रूख पक्षपाती रहा है। हरदा जिले में हादसा हुआ तो तत्कालीन कलेक्टर को हटाकर उनकी जांच शुरू करवा दी। पर एसपी की भी जांच लंबित रखी। और देवास में सिर्फ जिम्मेदारों पर कार्रवाई की बजाय सिर्फ एक जांच कमेटी?

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पीएम की अपील पर एसपी साहब ने मारी ताली!

प्रधानमंत्री जी ने जैसे ही ‘वर्क फ्रॉम होम’ की अपील की, हमारे देश की आधी आबादी भले ही सोच में पड़ गई हो, लेकिन मां नर्मदा के नाभि केंद्र वाले एक जिले में तैनात कप्तान साहब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। साहब तो मन ही मन बोल उठे होंगे—“लो, जिसे हम अब तक अपनी सहूलियत समझ रहे थे, उसे तो प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रीय नीति घोषित कर दिया!” दरअसल, साहब इस विधा के पुराने उस्ताद हैं। जिले की कानून-व्यवस्था हो या अपराधियों की धरपकड़, साहब ने दफ्तर की चौखट लांघे बिना, सोफे पर लेटे-लेटे ही ‘रिमोट कंट्रोल’ से पूरा जिला हांकने का कीर्तिमान पहले ही बना रखा था। मातहत फाइलें लेकर बंगले की परिक्रमा करते थे और साहब वहीं से सुरक्षा का चक्रव्यूह रचते थे। अब जब पीएम के फरमान ने उनकी इस ‘आरामदेह कार्यप्रणाली’ पर लीगल मोहर लगा दी है, तो साहब का सीना चौड़ा होना लाजिमी है। इसे कहते हैं दूरदर्शी अफसरशाही। देश जिसे अब अपना रहा है, कप्तान साहब उसे बरसों से जी रहे थे!

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हाइब्रिड साहिबा और ‘कंगाल’ निगम का किस्सा

नगरीय निकायों में आजकल एक नया ‘शौक-ए-दीदार’ परवान चढ़ रहा है। जहाँ विभाग के अफसरों को आलीशान गाड़ियों की लत लगी है, वहीं कमिश्नर साहिबा भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहतीं। उन्होंने भी ‘सद-संस्कृति’ और सादगी का चोला पहनकर अपनी सवारी के लिए चमचमाती इनोवा हाइब्रिड क्रिस्टा पसंद की है। विडंबना देखिए, एक तरफ नगर निगम कंगाली के आंसू रो रहा है और दूसरी तरफ साहिबा की गाड़ी हाइब्रिड रफ़्तार भर रही है। मैडम शायद यह भूल गई हैं कि उनकी गाड़ी के महंगे पेट्रोल और किश्तों के बीच, उन बेचारे वेंडरों और ठेकेदारों के घरों में सन्नाटा पसरा है जिनका पेमेंट महीनों से अटका हुआ है। साहबों के ठाठ-बाट देखकर तो यही लगता है कि जनता का पैसा चाहे गड्ढों में जाए या ठेकेदारों के चूल्हे बुझ जाएं, पर ‘साहब’ की सवारी में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। आखिर हाइब्रिड गाड़ी में बैठकर कंगाली का दर्द महसूस करना भी तो एक कला है!

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मसकने में माहिर इंजीनियर ने बड़े साहब को भी नहीं छोड़ा

सरकारी खजाने और टेंडरों को ऐसे मसकना कि बड़े-बड़े उस्ताद भी पानी मांग जाएं, यह हुनर तो जनता के निर्माण से जुड़े विभाग में पदस्थ कोई हमारे इन इंजीनियर साहब से सीखे। विकास की गंगा बहाने का दावा करने वाले साहब ने चार इमली के विपुल और आलीशान बंगलों वाले क्षेत्र में सालभर के भीतर करीब 100 करोड़ रुपए फूंक दिए। अब वह काम हुआ है या सिर्फ कागजों पर चमका है, यह तो ऊपर वाले मंत्री-अफसर ही जानें! लेकिन साहब की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने बड़े साहब के बंगले के रिनोवेशन में भी ठेकेदार से मोटी रिश्वत मसक ली। इसके लिए उन्होंने जो शातिर तिकड़म भिड़ाई, वह किसी मास्टरमाइंड क्रिमिनल की स्क्रिप्ट जैसी है। वैसे इंजीनियर साहब पैसा और देह दोनों को मसकने के आदि हैं। एक महिला मित्र के साथ इनके फोटो और फिर उससे तकरार के किस्से सावर्जनिक हैं। यही नहीं, शहर के प्रतिष्ठित प्लाजा में भी उनका रेस्टारेंट भी कम ख्यातिलब्ध नहीं है। इन्हीं सब की दम पर श्यामला हिल्स वाले मंदिर में दान देकर वे ईएनसी बनना चाहते हैं। तो अब जो इन्होंने टेंडर को खेल रचा है, वह जल्द ही हम सार्वजनिक करेंगे।

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मैडम का ‘मसूरी रिटर्न’ फरमान, भोपाल का ‘कीमा-कबाब’ भी चाहिए!

प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक कृषि प्रधान आईएएस महारानी के जलवे सातवें आसमान पर हैं। मैडम हम्माल सेवा के डिप्टी कलेक्टर कैडर की मलाईदार पोस्ट से ऐसे चिपकी हैं, जैसे आजकल ‘आरआर’ वाले नए-नवेले आईएएस हम्माल सेवा के पद कब्जाते हैं। वैसे, मैडम भी हम्माल सेवा से प्रमोट होकर आईएएस बन गई हैं लेकिन पद नहीं छोड़ रही हैं। किस्मत से पिछले दिनों इन्हें ‘लबासना’ (मसूरी) ट्रेनिंग का बुलावा आ गया। इसलिए इनका चार्ज एक दूसरी महिला अफसर को सौंप दिया गया। अब मैडम ज्ञान का समंदर समेटकर जब मसूरी की ठंडी हवाओं से वापस भोपाल लौटीं, तो आते ही पहला काम क्या किया? मातहतों को तलब कर अपनी अनुपस्थिति के दौरान का कीमा-कबाव यानी भूतलक्षी प्रभाव से कमीशन मांग लिया! यानी ज्ञान अपनी जगह, और टेबल के नीचे की माया अपनी जगह। मातहतों ने हाथ जोड़कर कहा, “हुजूर, वह हिस्सा तो चार्ज संभाल रही दूसरी मैडम ले गईं।” बस फिर क्या था! मैडम ने तुगलकी फरमान सुना दिया—“मुझे नहीं पता, उनसे वापस छीनकर लाओ या अपनी जेब से भरो, पर मेरा ‘कीमा-कबाब’ मुझे मिलना चाहिए।” अब बेचारे मातहत दफ्तर-दफ्तर सिर पकड़े घूम रहे हैं। वहीं, दोनों तरफ महिला अफसर हैं, तो दफ्तर की फाइलों से ज्यादा दोनों के बीच का ‘कैटवॉक’ और कोल्ड-वॉर चर्चा का विषय बन गया है। अब देखना है कि इस ‘ब्यूरोक्रेटिक कैटफाइट’ में जीत किसकी बिल्ली की होती है!

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जोरू के गुलाम नहीं, श्रवण कुमार निकले साहब

आजकल जहां दुनिया ‘बीवी नंबर वन’ के नारे लगाती है, वहीं मप्र कैडर के एक सीनियर आईएएस साहब ने ‘जोरू का गुलाम’ बनने के ट्रेंड को सिरे से खारिज कर दिया है। साहब ने साबित कर दिया है कि भले ही वे कितने ही बड़े अफसर बन जाएं, पर दिल से वे कलयुग के ‘श्रवण कुमार’ ही हैं। साहब की होम मिनिस्ट्री खुद संस्कारधानी में पदस्थ हैं। अमूमन लोग छुट्टी मिलते ही पत्नी के पास दौड़ते हैं, पर हमारे साहब का जी तो राजपूताना में निवासरत अपने माता-पिता की सेवा में ही रमता है। हाल ही में साहब डेढ़ महीने तक बंगाल चुनाव के तपते रण में पसीना बहाकर लौटे, तो लोगों को लगा कि अब तो साहब सीधे जबलपुर की ट्रेन पकड़ेंगे। लेकिन साहब ने सबको चौंकाते हुए सीधे अपने गृह राज्य का टिकट कटा लिया! दफ्तर के इनसाइडर चुटकी लेते हुए बताते हैं कि साहब का जब भी ‘लीव एप्लीकेशन’ मंजूर होता है, उनकी गाड़ी का रुख पत्नी के आशियाने की तरफ नहीं, बल्कि माता-पिता के चरणों की तरफ मुड़ जाता है। अब गलियारों में लोग चटखारे लेकर पूछ रहे हैं कि भाई, जब मैडम खुद ‘होम मिनिस्ट्री’ संभालती हैं, तो साहब की उनके होम से इतनी दूरी क्यों है? खैर, वजह जो भी हो, पर साहब की इस कलयुगी पितृभक्ति को देखकर हम तो यही कहेंगे—”धन्य हैं माता-पिता, और धन्य हैं साहब की ये अनोखी संन्यास-पद्धति!”

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मैडम के रसूख पर कानून पर रस्सियां कसीं

हमारे सिस्टम में जब आईएएस की नेमप्लेट चमकती है, तो कानून की किताबें खुद-ब-खुद थोड़ा झुक जाती हैं। मैडम के आलीशान फार्म हाउस पर जुए की फड़ क्या पकड़ी गई, कानून का पालन कराने वाले टीआई साहब ने मानो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया। मैडम ने तुरंत अपने ‘प्रशासनिक वीटो’ का इस्तेमाल किया और फरमान भिजवाया—”या तो जुए का पता बदलो, या मेरा नाम फाइलों से गायब करो।” जब ईमानदार टीआई ने इस ‘रसूखदार स्क्रिप्ट’ को मानने से इनकार कर दिया, तो मैडम ने अपने पद के दुरुपयोग की ऐसी मास्टरक्लास दिखाई कि चौबीस घंटे के भीतर टीआई साहब के हाथ में सस्पेंशन का लेटर थमा दिया गया। इसे कहते हैं पद की मलाई का सही इस्तेमाल—खुद का फार्म हाउस ‘कैसीनो’ बना रहे तो कोई बात नहीं, पर कोई खाकी वाला वहां कानून का डंडा घुमाने की हिम्मत कैसे कर दे? पर कहते हैं न, ऊपरवाले के यहां देर है पर अंधेर नहीं। तो भला हो हाईकोर्ट का, जिसने मैडम के इस ‘दुर्भावनापूर्ण हंटर’ को पहचानकर सस्पेंशन आर्डर पर पानी फेर दिया। वरना मैडम तो कानून को अपनी उंगलियों पर ‘कैटवॉक’ कराने पर आमादा थीं!

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एमपी के एपस्टीन फाइल वाली शालीमार थैरपी बंद

‘द इनसाइडर्स’ के एक अंक में हमने खुलासा किया था कि भोपाल के कुछ रसूखदार साहबान काम के तनाव को मिटाने के लिए ‘शालीमार थेरेपी’ और ‘सैंडविच मसाज’ के वीआईपी सुख में डूबे हुए हैं। एक शातिर दलाल के आलीशान फ्लैट पर अफसरों के मनोरंजन का यह गुप्त ‘स्वर्ग’ सजता था, जहाँ फाइलों के बदले कायाकल्प का खेल चलता था। लेकिन किस्मत की फिरकी देखिए! वह दलाल और उसकी पत्नी खुद करोड़ों की धोखाधड़ी के चक्रव्यूह में ऐसे फंसे कि एफआईआर होते ही दोनों रफूचक्कर हो गए। अब दलाल साहब फरार हैं, तो उनके साथ ही हुक्मरानों की अय्याशी का वह मलाईदार अड्डा भी सील हो गया है। इस तालाबंदी से सबसे तगड़ा झटका पानी से जुड़े विभाग के ईएनसी, यानी हमारे चहेते ‘धुंधकारी भैया’ को लगा है। दफ्तर में बैठकर दिन-भर पानी का बजट ठिकाने लगाने वाले भैया आजकल खुद ‘पानी-पानी’ हो रहे हैं। दलाल के भागने से मसाज की टेबल क्या छूटी, साहब के बदन का दर्द और दिल की बेचैनी दोनों सातवें आसमान पर पहुंच गई है।

यूपी-बिहार पर पहला अंक पढ़ें –  आईपीएस की जोड़ी दिल्ली चली, फंड की कमी तो वसूली के रेट दोगुने, बड़े साहब खुद ही बन गए ‘चारण’

सूची और बदलाव मई में ही

दो सूचनाएं हैं। राज्य हम्माल सेवा यानी राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों के लिए खुशखबरी है। उनके तबादले की सूची बनना शुरू हो गई हैं। लिहाजा, जो भी साहिबान मलाईदार पोस्ट चाहते हैं, अभी से ही तगड़ी लॉबिंग में जुट जाए। बाकी सूची कहां बन रही है, यह बात आप भली-भांति जानते ही हैं। दूसरी सूचना मंत्रीमंडल विस्तार की। दिल्ली से हमारे एक इनसाइडर ने बताया कि मई के आखिर तक आपको इसकी सूचना मिल जाएगी।

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