The Insiders: महिला आईएएस का सौतन प्रेम, मंत्री जी ने सरकार से अदावत में अपने ही शहर की फाइल रोकी, धुंधकारी बना धृतराष्ट और रंगीला राजा का नया कारनामा
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें अफसरों ने लक्ष्मी प्रेम के लिए क्या-क्या जतन किए?
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल| दतिया के इस अप्रत्याशित सियासी भूचाल ने अच्छे-अच्छे सूरमाओं और राजनीतिक पंडितों को अचकचा दिया है। इन दिनों चाय की टपरी पर होने वाली चर्चाओं से लेकर महलों के बंद गलियारों तक, चहुंओर बस ‘पंडित जी’ के इस हश्र की ही गूंज सुनाई दे रही है। पंडित जी से निजी तौर पर सहानुभूति होना एक अलग बात है, पर सियासत वो बेरहम चीज है जहाँ वक्त बदलते देर नहीं लगती—यहाँ पल में माशा और पल में तोला हो जाना ही अंतिम सत्य है। ऐसा क्यों, कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ? इस पर तो राजनीतिक मठाधीशों और विश्लेषकों का दौर लंबा चलेगा। हम तो बस इतना ही कहेंगे कि अब इस सियासी शोक और गुणा-भाग से बाहर निकलिए और पढ़िए ‘द इनसाइडर्स’ के ये बिल्कुल नए और चटपटे किस्से, जो व्यवस्था पर तीखा तंज कसने के साथ-साथ आपको गुदगुदाने के लिए भी पूरी तरह तैयार हैं…
सौत के बेटे पर बरसा आईएएस महिला का सच्चा प्यार
दतिया में उपचुनाव की रणभेरी क्या बजी, एक बड़े नेताजी अपनी ‘थर्ड एंट्री’ से कांग्रेस और भाजपा दोनों का खेल बिगाड़ने की तैयारी में जुट गए। लेकिन सियासत के इस खिलाड़ी को क्या पता था कि दतिया की बिसात पर चलने वाले मोहरों के तार दूर नर्मदापुरम में उनकी आईएएस पत्नी की मां द्वारा खरीदी गई जमीन से जुड़ जाएंगे! जमीन खरीदना कोई गुनाह नहीं है, लेकिन इसके पीछे जो पारिवारिक एकता’ का दिव्य उदाहरण सामने आया है, वह बिलकुल फिल्म जुदाई की कहानी टाइप है, जिसमें अनिल कपूर की पहली पत्नी श्रीदेवी रुपयों की खातिर बिना तलाक दिए उर्मिला मातोंडकर से अपने पति की दूसरी शादी करा देती हैं। नेता जी ने भी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना ही एक आदिवासी आईएएस महिला से ब्याह रचाया है। आमतौर पर ऐसी स्थिति में महाभारत छिड़ जाती है, वहां इन आईएएस मैडम का अपनी सौत के प्रति प्रेम ऐसा है जैसे श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी गोपियां अपनी सुध-बुध खो बैठती हैं। मैडम अपने प्रियतम यानी नेताजी की खातिर सौतन के बेटे और उसके दोस्तों पर इस कदर लट्टू हुईं कि अपनी मां के नाम की कीमती जमीन उनके नाम ही ट्रांसफर कर दी! प्रेम की इस अतिरंजना पर यह फिल्मी गाना एकदम सटीक बैठता है:
“तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ… सजदे सर झुकता है, यारा मैं क्या करूँ!”
हालांकि कहने वाले इसे नेताजी की समझदारी यानी काली कमाई को ठिकाने लगाने वाला कदम बता रहे हैं। पर खुलासे के बाद शायद नामांकन पत्र के दौरान दी जाने वाली जानकारी में यह सयानपत्ति भारी न पड़ जाए।
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अतिक्रमणकारियों पर बरसा पूर्व मंत्री जी का अगाध प्रेम!
सियासत में वोट बैंक का गणित भी बड़ा अजब-गजब होता है। पूर्व मंत्री जी ने मुख्यमंत्री जी को यूरिया वितरण को लेकर एक ऐसा अनोखा पत्र लिख मारा है, जिसे पढ़कर कानून के रखवाले भी अपना सिर पकड़ लें। मंत्री जी को आम किसानों की चिंता तो है ही, लेकिन उनका दिल वन भूमि और शासकीय भूमि पर कब्जा जमाने वाले अतिक्रमणकारियों के लिए कुछ ज्यादा ही जोर से धड़क रहा है। पत्र में बकायदा वकालत की गई है कि पोर्टल के कड़े नियमों की वजह से इन ‘अतिक्रमणधारी भाइयों’ को यूरिया का टोकन नहीं मिल पा रहा है, जिससे उन्हें ‘भारी परेशानी’ हो रही है! इसे कहते हैं—“चोरी ऊपर से सीनाजोरी!” अब देखना यह है कि क्या सरकार इन ‘विशेष’ कब्जाधारियों के लिए पोर्टल के नियम बदलती है या पूर्व मंत्री जी का यह पत्र ठंडे बस्ते के हवाले होता है! अब मंत्री जी के बारे में हिंट दे देते हैं। पूर्व मंत्री जी कांग्रेस सरकार को गिराकर भाजपा में आए थे। और पिछला चुनाव भाजपा से कांग्रेस में एक गए पूर्व मंत्री के बेटे से हार गए थे।
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लक्ष्मी प्रेम में साहब का स्वास्थ्य खराब
‘द इनसाइडर्स’ ने पहले ही ढोल पीठकर बता दिया था कि सूबे के एक आईएएस का स्वास्थ्य लक्ष्मी प्रेम के चक्कर में कुछ ज्यादा ही गड़बड़ा रहा है। अब उस बीमार’ का जो इलाज सामने आया है, उसने ब्यूरोक्रेसी के बड़े-बड़े दिग्गजों को भी चक्कर में डाल दिया है। साहब जिस कॉर्पोरेशन के कर्ताधर्ता हैं, वहां उन्होंने ऐसा कमाल का स्लो-मोशन दांव चला है कि सारे नियम-कायदे हवा हो गए। मामला यह है कि एक डॉक्टर साहब को कॉर्पोरेशन में गुपचुप तरीके से टेक्निकल चीफ की मलाईदार कुर्सी पर बैठा दिया गया है। अब इस नियुक्ति के पीछे का असली चमत्कार सुनिए! आरोप है कि इन नए-नवेले चीफ साहब की अपनी खुद की निजी कंपनी भी मजे से चल रही है। यानी एक हाथ में अपनी प्राइवेट कंपनी का मुनाफा और दूसरे हाथ में सरकारी कॉर्पोरेशन का पावर! इस अजब-गजब सेटिंग में नियम-कायदे और ‘कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट (हितों का टकराव) तो साहब के चश्मे से ऐसे गायब हुए कि ढूंढने से भी न मिलें। पूरे विभाग में अब बस एक ही गुणा-भाग चल रहा है कि डॉक्टर साहब की इस ‘टेक्निकल’ एंट्री के बदले साहब को कितनी लक्ष्मी घुटी के रूप में प्राप्त हुई है, जिसने उनके स्वास्थ्य में अचानक यह नई जान फूंक दी! अब देखना यह है कि खुद की कंपनी वाले इन ‘चीफ साहब’ का यह सरकारी इलाज कॉर्पोरेशन को कितना तंदुरुस्त करता है, या फिर यह फाइल भी किसी दिन खुद-ब-खुद ‘वायरल’ हो जाती है!
चड्डी पहनकर शाखा जाने वाले साहब पर हाथ कटे मंत्री का करारा तंज!
सूबे की ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों ‘संघी’ दिखने की एक अनोखी होड़ मची हुई है। आलम यह है कि जो देखो, वही अफसर सरकार बनते ही खुद को सबसे बड़ा स्वयंसेवक सिद्ध करने में जुट जाता है। पिछले दिनों हमारे एक वरिष्ठ मंत्री जी—जो इन दिनों सत्ता के समीकरणों में खुद को ‘हाथ कटे ठाकुर’ की तरह महसूस कर रहे हैं—ने सार्वजनिक मंच से एक बड़ा बयान देकर सियासी गलियारों में खलबली मचा दी। अब आइए, ‘द इनसाइडर्स’ के चश्मे से मंत्री जी के इस दर्द और बयान के पीछे की असली इनसाइड स्टोरी को डिकोड करते हैं! दरअसल, किस्सा यह है कि पिछले दिनों भारत सरकार में सचिव रहे एक बेहद सीनियर आईएएस साहब हमारे इन मंत्री जी से मिलने पहुंचे। साहब का इरादा मध्य प्रदेश में अपनी रिटायरमेंट के बाद किसी मलाईदार ‘पुनर्वास’ (पोस्ट-रिटायरमेंट पोस्टिंग) की जुगाड़ बिठाना था। अब मंत्री जी को प्रभावित करने के लिए साहब ने अपना ‘अटूट संघ प्रेम’ दिखाना शुरू कर दिया। उन्होंने बकायदा अपने पिता से लेकर खानदान तक के संघी होने के किस्से सुना डाले और यहाँ तक दावा कर दिया कि वे खुद बचपन में ‘चड्डी पहनकर’ शाखा में जाया करते थे! लेकिन साहब यह भूल गए कि मंत्री जी राजनीति के पुराने घाघ खिलाड़ी हैं। उन्हें साहब के मध्य प्रदेश में पोस्टिंग के दौरान के एक-एक कारनामे और उनके असली मिजाज की पूरी कुंडली मालूम थी। बस फिर क्या था, मंत्री जी ने सीधे नाम तो नहीं लिया, लेकिन सार्वजनिक रूप से अपरोक्ष रूप से ऐसा तीर चलाया कि सीधे साहब के ‘लंगोट’ पर जाकर लगा! इसे कहते हैं—“वक्त पड़े पर गधे को भी बाप बनाना!”
मंत्री की सरकार से अदावत, शहर के विकास पर 8 महीने से कुंडली!
जिन वरिष्ठ मंत्री जी हमने ऊपर जिक्र किया है, उनकी सरकार से अदावत जगजाहिर है और वे पत्र लिखकर अपनी व्यथा भी जता चुके हैं। लेकिन मंत्री जी भी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं; वे सरकार के प्रिय प्रोजेक्ट्स को रोककर अपनी ताकत दिखा रहे हैं। मंत्री जी के गृह नगर में एक अथॉरिटी का गठन होना है, जहाँ सरकार खुद प्रभारी है। विभाग ने फाइल तैयार कर दी थी, लेकिन मंत्री जी पूरे 8 महीने से उस पर कुंडली मारे बैठे हैं। इससे पहले उन्होंने नामकरण पर भी अड़ंगा लगाया था, जो सरकार के कड़े हस्तक्षेप के बाद ही पास हो सका। इस शह-मात के खेल में मंत्री जी का नगर राजधानी भोपाल से पिछड़ गया है। यानी जिस शहर को नंबर वन बनाने का दंभ मंत्री जी करते हैं, उसे राजनीति की बलि पर चढ़ाने में भी उन्हें कोई कोताही नहीं है। बदले हुए मिजाज पर राहत इंदौरी साहब का यह शेर बिल्कुल सटीक है:
“बदला न अपने-आप को जो वक़्त के साथ,
वो ख़ानदान टूट गया हाथ कटते ही।”
अब देखना यह है कि जीत किसकी होती है—क्या सरकार इस फाइल को आजाद करा पाती है या विकास ऐसे ही बंधक रहेगा!
पुत्र मोह में धृतराष्ट्र बन गया धुंधकारी
पानी से जुड़े एक विभाग में आजकल नियम-कायदे हवा में उड़ रहे हैं और सिर्फ एक ही राग गूंज रहा है—“पुत्र मोह!” दरअसल, यहां के बड़के इंजीनियर यानी हमारे धुंधकारी भैया अपने लाडले को कार्यपालन यंत्री बनाने के लिए अब पूरी तरह धृतराष्ट्र बनने को उतारू हैं। धुंधकारी भैया ने नियमों को दरकिनार करते हुए इन्होंने निगम से सीधे 31 पद अपनी झोली में डाल लिए, ताकि बेटे की पदोन्नति की राह में कोई कांटा न बचे। भले ही इस चक्कर में पूरा रोस्टर बिगड़ जाए। तुलसीदास जी ने भी समर्थ लोगों के इसी रसूख पर लिखा है: “समरथ कहूँ नहिं दोषु गोसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाईं॥” अब देखना यह है कि हक मारे जाने से नाराज जो इंजीनियर न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं, वहां धृतराष्ट्र के इस पाश से न्याय कैसे निकलता है!
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स्मार्ट अफसरों के सामने ईमानदार बड़े साहब हुए बेबस
‘द इनसाइडर्स’ ने बहुत पहले ही मुनादी पीट दी थी कि स्मार्ट क्लास के नाम पर एलईडी टीवी और इंटरैक्टिव पैनल की खरीद में ‘अंदरूनी खेल’ शुरू हो चुका है। लेकिन साहबों के कान पर जूं रेंगती भी तो कैसे? आखिर ‘लक्ष्मी प्रेम’ के आगे बाकी सब तो फीका ही है! मामला जनजातीय कार्य विभाग का है। साहबों ने सोचा होगा कि आदिवासी बच्चों को स्मार्ट बनाकर क्या ही हो जाएगा? इससे अच्छा तो यह है कि टेंडर की शर्तों में ऐसा जादुई खेल किया जाए कि खुद की जेबें ही सबसे पहले स्मार्ट हो जाएं! 250 करोड़ के इस खेल में, जो 85 इंच की एलईडी टीवी बाजार में महज 4 लाख रुपये में मिल जाती है, उसे पूरे 10.89 लाख रुपये में खरीदने के वारे-न्यारे कर दिए गए। जब इस महाघोटाले की गूंज ईओडब्ल्यू तक पहुंची, तो उन्होंने जांच शुरू की। लेकिन अफसरों की ढिठाई तो देखिए, ईओडब्ल्यू पांच-पांच बार प्रेम पत्र (नोटिस) लिख चुका है, पर साहब लोग रिपोर्ट दबाकर ऐसे बैठे हैं मानो कह रहे हों—“चोरी ऊपर से सीनाजोरी!” अब मजे की बात देखिए, बड़े साहब सूबे में अपनी कड़क ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध हैं। गलियारों में लोग चुटकी ले रहे हैं कि जब बड़े साहब इतने ही ईमानदार हैं, तो इस टेंडर को निरस्त क्यों नहीं करवा पा रहे? या फिर खेल ‘और ऊपर’ का है, जहां बड़े साहब की ईमानदारी भी बेबस होकर फाइलों के नीचे दबी मुस्कुरा रही है!
रंगीला राजा की विधुर अभिलाषाएं
पानी से जुड़े विभाग का एक और किस्सा पढ़िए। यहां के एक मुख्य अभियंता उर्फ हमारे रंगीला राजा को लेकर पिछले दिनों अफवाहों का बाजार गर्म रहा। सामान्यत: वर्क्स डिपार्टमेंटस में मलाईदार पोस्ट के लोग या तो छुट्टी जाते नहीं और जाते भी हैं तो एक दो दिन की सीएल पर। लेकिन रंगीला राजा अचानक 15 दिन की छुट्टी पर चले गए तो विभाग के जग्गा जासूसों के कान खड़े हो गए। और शक विश्वास में तब बदल गया जब उनके जाते ही उनके आफिस के लेडीज़ क्लब की स्नेह प्राप्त सबसे युवा कन्या भी आफिस से गायब हो गई। इस बीच खबर आई कि विधुर मन ने एक विधवा मन से विवाह कर लिया। पर इस बीच युवा कन्या ने सोशल मीडिया पर मुम्बई और गोवा के 5 स्टार होटल के फोटो के साथ स्टेटस लगा दिया..अब जग्गा जासूस ये तो समझ गए कि तबियत खराब तो बहाना था। असल में रंगीला तबियत हरी करने गया था …पर फिर अचानक एक यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया कि साहब का “स्नेह” पात्र कौन है..माँ ..??पुत्री ..???या दोनों…!!! पक्की खबर मिलते ही हम भी आपको खबर करेंगे। पर एक बात तो पक्की है साहब का दिल है बहुत बड़ा…थार से लेकर फाइव स्टार तक सब अफोर्ड कर लेते हैं। और क्यों न करें “नारायण” कृपा से “लक्ष्मी” की कोई कमी नहीं..तो “लुत्फ ए माल” तो ले ही सकते है।



