द इनसाइडर्स वैचारिकी : महाभारत के अंत को आज समझने का समय आ गया है – युद्ध को नहीं, उसके परिणाम को देखिए
युद्धों की आग में झुलसती दुनिया के लिए महाभारत की चेतावनी— राष्ट्रीय हितों और तर्कों की आड़ में पूरी पृथ्वी को कुरुक्षेत्र बनने से कैसे रोकें?
दुबई से लेखक एवं सामाजिक चिंतक आर्किटेक्ट वेंकटेश गणपति की कलम से…
भारत के पास महाभारत के रूप में एक अद्भुत रचना है। इसे केवल धार्मिक ग्रंथ, प्राचीन इतिहास या युद्ध की कथा समझना शायद इसके वास्तविक महत्व को बहुत सीमित कर देना है। महाभारत मानव-स्वभाव, परिवार, सत्ता, मोह, निष्ठा, कर्तव्य, धर्म, अधर्म, राजनीति, शांति और युद्ध के परिणामों का ऐसा जीवंत अध्ययन है, जो प्रत्येक युग में प्रासंगिक रहता है। आज दुनिया में जिस प्रकार परिवार, समाज, संगठन और देश अलग-अलग पक्षों में बंटते दिखाई दे रहे हैं, दुनिया विभिन्न युद्धों में फंसी है, उस समय महाभारत को फिर से पढ़ने से अधिक, उसे प्रारम्भ से अंत तक समझने की आवश्यकता है।
हम प्रायः महाभारत को कुछ प्रसंगों में देखते हैं—द्रौपदी का अपमान, अर्जुन का विषाद, श्रीकृष्ण का गीता-उपदेश, चक्रव्यूह, भीष्म की प्रतिज्ञा, कर्ण की मित्रता और अंत में पांडवों की विजय। लेकिन महाभारत की सबसे बड़ी शिक्षा केवल युद्ध में नहीं, बल्कि युद्ध के बाद दिखाई देती है।
महाभारत केवल अच्छे और बुरे लोगों का युद्ध नहीं था
महाभारत को सामान्यतः इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि पांडव अच्छे थे और कौरव बुरे। लेकिन महाभारत की वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी और जटिल है। कौरव पक्ष में खड़े सभी लोग दुष्ट, राक्षस या अधर्मी नहीं थे। भीष्म महान थे। द्रोणाचार्य विद्वान और श्रेष्ठ गुरु थे। कर्ण वीर, दानी और मित्र के प्रति निष्ठावान था। कृपाचार्य सम्मानित आचार्य थे। धृतराष्ट्र भी पूरी तरह अनजान नहीं थे कि उनका पुत्र गलत दिशा में जा रहा है। फिर भी ये सभी लोग अंततः उस पक्ष की शक्ति बन गए, जिसका नेतृत्व दुर्योधन कर रहा था।
क्यों?…
क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के पास अपनी निष्ठा, अपना वचन, अपना मोह, अपनी कृतज्ञता और अपना व्यक्तिगत कर्तव्य था। कर्ण कह सकता था कि दुर्योधन ने उसे सम्मान दिया, इसलिए मित्र के प्रति निष्ठा निभाना उसका धर्म था। भीष्म कह सकते थे कि हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा करना उनकी प्रतिज्ञा और धर्म था। द्रोणाचार्य कह सकते थे कि वे राज्य के प्रति अपने दायित्व का पालन कर रहे थे।
धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में बंधे थे। वह दुर्योधन को समझाते भी थे, पर उसके विरुद्ध निर्णायक कदम उठाने का साहस नहीं कर सके।
प्रत्येक के पास अपना तर्क था। लेकिन महाभारत हमसे एक बड़ा प्रश्न पूछता है: क्या व्यक्तिगत निष्ठा उस समय भी धर्म रह जाती है, जब वह किसी बड़े अधर्म को शक्ति देने लगे? यही महाभारत का वास्तविक धर्मसंकट है।
अधिकांश लोग दुर्योधन नहीं होते
समाज में अधिकांश लोग स्वयं दुर्योधन नहीं होते। अधिकांश लोग कर्ण, भीष्म, द्रोण या धृतराष्ट्र की स्थिति में होते हैं। वे स्वयं अन्याय नहीं कर रहे होते, पर किसी न किसी कारण से अन्याय करने वाले पक्ष के साथ खड़े रहते हैं। कोई मित्रता के कारण चुप रहता है। कोई अपने पद के कारण। कोई संगठन के अनुशासन के कारण। कोई परिवार के कारण। कोई राजनीतिक निष्ठा के कारण। कोई अपने समुदाय या धार्मिक पहचान के कारण। और कोई यह सोचकर चुप रहता है कि वह अकेला क्या कर सकता है। धीरे-धीरे बहुत से अच्छे लोगों का मौन, कुछ गलत लोगों की शक्ति बन जाता है। यही महाभारत की सबसे बड़ी चेतावनी है। अधर्म केवल उस व्यक्ति से शक्तिशाली नहीं होता जो उसे करता है। अधर्म उस समय अधिक शक्तिशाली होता है, जब अच्छे, विद्वान, सम्मानित और प्रभावशाली लोग अपने व्यक्तिगत कारणों से उसके सामने मौन हो जाते हैं।
व्यक्तिगत धर्म और उच्चतर धर्म
धर्म को केवल “रिलिजन” समझना उचित नहीं है। धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, पंथ या धार्मिक पहचान नहीं है। धर्म का व्यापक अर्थ है—कर्तव्य, न्याय, सत्य, मर्यादा, करुणा, उत्तरदायित्व और सही आचरण। प्रत्येक व्यक्ति के अनेक व्यक्तिगत धर्म हो सकते हैं। एक व्यक्ति का परिवार के प्रति धर्म है। मित्र के प्रति धर्म है। संस्था और व्यवसाय के प्रति धर्म है। समाज और समुदाय के प्रति धर्म है। उसकी अपनी धार्मिक आस्था और अनुशासन है। लेकिन इन सबके ऊपर एक उच्चतर धर्म भी होता है।
यदि परिवार का कोई सदस्य अन्याय करे, तो परिवार के प्रति निष्ठा हमें उसके अपराध की रक्षा करने का अधिकार नहीं देती। यदि कोई मित्र गलत कार्य करे, तो मित्रता हमें उसके अधर्म का समर्थक नहीं बना सकती। यदि कोई संगठन हिंसा, घृणा, भ्रष्टाचार या अन्याय का रास्ता अपनाए, तो संगठन के प्रति निष्ठा हमें मौन रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। व्यक्तिगत धर्म तब तक धर्म है, जब तक वह किसी बड़े अधर्म का साधन न बन जाए।
भारत के नागरिक का उच्चतर धर्म
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में प्रत्येक नागरिक का अपना धर्म, विश्वास, समुदाय, भाषा, जाति, संगठन और राजनीतिक विचार हो सकता है। लेकिन इनमें से कोई भी भारत और उसके संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। किसी राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा देश से बड़ी नहीं हो सकती। किसी संगठन के प्रति समर्पण संविधान से बड़ा नहीं हो सकता। किसी नेता के प्रति श्रद्धा कानून से बड़ी नहीं हो सकती।
किसी धार्मिक पहचान के नाम पर दूसरे नागरिक की गरिमा और अधिकारों को चोट नहीं पहुंचाई जा सकती। हमारी धार्मिक आस्था हमारी व्यक्तिगत और आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा हो सकती है। लेकिन एक नागरिक के रूप में हमारा उच्चतर नागरिक धर्म है—न्याय, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, मानव गरिमा और संविधान की रक्षा। इसे सरल शब्दों में कहें तो: धर्म व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन न्याय सार्वभौमिक होना चाहिए। संगठन अपना हो सकता है, लेकिन राष्ट्र सबसे ऊपर होना चाहिए। नेता प्रिय हो सकता है, लेकिन कानून उससे ऊपर होना चाहिए। विचारधारा महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन मानवता उससे बड़ी होनी चाहिए।
महाभारत युद्ध की प्रेरणा नहीं, युद्ध की चेतावनी है
आज महाभारत के कुछ प्रसंगों को युद्ध, प्रतिशोध और संघर्ष की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन क्या महाभारत वास्तव में युद्ध की प्रेरणा देता है? यदि हम उसे पूरा पढ़ें, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि श्रीकृष्ण ने युद्ध से पहले शांति का हर संभव प्रयास किया।
समझौते की संभावना खोजी गई। परिवार को बचाने का प्रयास किया गया। युद्ध को रोकने के लिए संवाद हुआ। पांडव अत्यंत सीमित समझौते तक के लिए तैयार थे। लेकिन जब अहंकार, सत्ता, अन्याय और जिद ने हर शांतिपूर्ण समाधान को अस्वीकार कर दिया, तब युद्ध हुआ। इसलिए महाभारत का संदेश यह नहीं है: “जब तुम्हें लगे कि तुम सही हो, तो युद्ध कर दो।” उसका संदेश है: “अन्याय को इतना मत बढ़ने दो कि युद्ध ही एकमात्र विकल्प दिखाई देने लगे।” युद्ध में धर्म का पक्ष विजयी हो सकता है, लेकिन युद्ध स्वयं मानवता की पराजय बन सकता है।
केवल पांडवों की विजय तक मत देखिए
हम अक्सर महाभारत को पांडवों की विजय पर समाप्त मान लेते हैं। लेकिन वास्तविक शिक्षा उसके बाद दिखाई देती है। कौरवों का अंत हो गया। पांडवों ने अपने पुत्रों, भाइयों, गुरुओं, मित्रों और परिजनों को खो दिया। द्रौपदी ने अपने पुत्र खो दिए। गांधारी ने अपने सौ पुत्र खो दिए। कुंती ने अपने पुत्र कर्ण की वास्तविकता युद्ध के बाद बताई। युधिष्ठिर को राज्य मिला, लेकिन मन की शांति नहीं मिली। विजेता भी शोक में थे और पराजित भी। बाद में श्रीकृष्ण का अपना यादव वंश भी आपसी संघर्ष में समाप्त हो गया।
अंततः क्या बचा?
सिंहासन बचा, पर परिवार समाप्त हो गया।
राज्य बचा, पर पीढ़ियां समाप्त हो गईं।
विजय मिली, पर आनंद नहीं मिला।
यही कारण है कि महाभारत को युद्ध तक नहीं, उसके अंत तक देखना आवश्यक है।
महाभारत का अंत हमें बताता है:
युद्ध में कोई एक पक्ष जीत सकता है, पर युद्ध के बाद अक्सर पूरी मानवता हार जाती है।
महाभारत एक शाश्वत केस स्टडी है
महाभारत केवल प्राचीन काल की घटना नहीं है। यह प्रत्येक परिवार, संस्था, संगठन, समाज और देश के लिए एक शाश्वत केस स्टडी है। जब भी हमारे सामने धर्म और अधर्म का प्रश्न आए, हमें महाभारत को अपने मन में तेज गति से प्रारम्भ से अंत तक देखना चाहिए। देखना चाहिए कि विवाद कैसे शुरू हुआ। अन्याय को प्रारम्भ में क्यों नहीं रोका गया। कौन लोग जानते हुए भी मौन रहे। किसने अपनी मित्रता को न्याय से ऊपर रखा। किसने अपने वचन को मानवता से बड़ा माना। किसने पद, सत्ता और संगठन को सत्य से ऊपर रखा। किसने शांति के अवसर को अस्वीकार किया। और अंत में किसके हाथ क्या बचा। महाभारत हमें एक प्रकार से भविष्य का अंतिम दृश्य पहले ही दिखा देता है। वह हमें चेतावनी देता है कि व्यक्तिगत निष्ठाओं और छोटे-छोटे स्वार्थों में बंटकर जब हम उच्चतर धर्म को भूल जाते हैं, तब अंत में किसी की वास्तविक विजय नहीं होती।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही शिक्षा
यदि हम पूरी पृथ्वी को एक बड़े परिवार की तरह देखें, तो प्रत्येक देश का अपना संविधान, कानून और राष्ट्रीय हित है। राष्ट्रीय स्तर पर संविधान हमारा उच्चतर नागरिक धर्म है। लेकिन जब हम विश्व स्तर पर आते हैं, तब मानवता, शांति, सह-अस्तित्व और मानव जीवन की रक्षा उससे भी व्यापक धर्म बन जाते हैं। हर देश अपने राष्ट्रीय हित की बात करता है। हर सरकार अपने निर्णय को उचित ठहराती है।
हर युद्ध में दोनों पक्ष अपने तर्क रखते हैं। लेकिन महाभारत हमें तर्कों से आगे जाकर युद्ध का अंतिम परिणाम देखने को कहता है।
शहर नष्ट होते हैं। परिवार समाप्त होते हैं। बच्चे अनाथ होते हैं। पीढ़ियां भय और घृणा में जीती हैं। और विजय के बाद भी शांति वापस नहीं आती। इसलिए किसी देश का राष्ट्रीय हित भी मानवता के अस्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता। जब प्रत्येक देश केवल अपने सीमित हित को सर्वोच्च मान ले और मानवता के उच्चतर धर्म को भूल जाए, तब पूरी पृथ्वी कुरुक्षेत्र बन सकती है।
आज महाभारत को समझना क्यों आवश्यक है?
आज हम ऐसे समय में खड़े हैं, जब लोग तेजी से परिवारों, दलों, विचारधाराओं, धर्मों और संगठनों के आधार पर विभाजित हो रहे हैं। लोग अपने पक्ष की गलती को भी सही सिद्ध करने लगते हैं। अपने संगठन के भ्रष्टाचार पर मौन रहते हैं। अपने नेता की हिंसक या घृणापूर्ण भाषा को नजरअंदाज करते हैं। अपने समुदाय द्वारा किए गए अन्याय पर प्रश्न नहीं उठाते। और दूसरे पक्ष की छोटी-सी भूल को भी बड़ा अपराध घोषित कर देते हैं। यही वह स्थिति है, जहां महाभारत को समझना आवश्यक हो जाता है। महाभारत हमें सिखाता है कि केवल यह पर्याप्त नहीं कि हम स्वयं को अच्छा व्यक्ति मानते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि हमारे मौन, हमारी निष्ठा, हमारी प्रतिभा और हमारी शक्ति से कौन-सा पक्ष मजबूत हो रहा है। हमारे व्यक्तिगत तर्क हमें समझा सकते हैं कि हम किसी पक्ष में क्यों खड़े हैं। लेकिन इतिहास अंततः यह देखेगा कि हमारी शक्ति ने धर्म को मजबूत किया या अधर्म को।
अंतिम बात…
महाभारत का सबसे बड़ा संदेश केवल यह नहीं है: “जब युद्ध हो, तब धर्म का पक्ष चुनिए।” उसका सबसे बड़ा और गहरा संदेश है: उच्चतर धर्म का पक्ष इतनी जल्दी चुनिए कि युद्ध होने की नौबत ही न आए। अपने लोगों के अधर्म पर भी आवाज उठाइए। अपनी निष्ठा से ऊपर न्याय को रखिए। अपने संगठन से ऊपर राष्ट्र को रखिए। अपने राष्ट्रहित के साथ मानवता को भी देखिए। और किसी भी संघर्ष में केवल यह मत देखिए कि कौन जीतेगा। पहले यह देखिए कि अंत में बचेगा क्या। महाभारत को दोहराना हमारी नियति नहीं है। महाभारत से सीखना हमारा धर्म है।



