The Insiders: पूर्व साहब के लेटर बम पर सीएस को देनी पड़ी सफाई, एक हम्माल ने अटकाई आईएएस की डीपीसी, आखिरकार आईपीएस की चार्जशीट जारी
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़िए पूर्व हो चुके अफसरों से जुड़े रोचक किस्से
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | प्राचीन ग्रीक दार्शनिक हेराक्लाइटस ने कहा था— No man ever steps in the same river twice, for it’s not the same river and he’s not the same man यानी एक ही नदी में कोई दोबारा कदम नहीं रख सकता। क्योंकि न तो वह नदी वही रहती है, और न ही वह इंसान। मगर लुटियंस की गलियों या राज्यों की सिविल लाइन्स की भव्य कोठियों से बेदखल हुए हमारे पूर्व माननीय अफ़सर इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
इन्हें अक्सर दिल्ली या प्रदेश की राजधानियों के एलीट क्लबों, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर या जिमखाना के किसी कोने में बैठे देखा जा सकता है। झुर्रियों से भरे चेहरे पर पुराना रसूख ओढ़ने की नाकाम कोशिश, हाथ में व्हिस्की का ग्लास और जुबां पर अतीत का दंभ। उनकी बातचीत की शुरुआत ही “व्हेन आई वॉज़…” (जब मैं सचिव या कलेक्टर था…) से होती है। वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठानों में किसी तरह अपनी पैठ बनाए रखने या सलाहकार व ट्रिब्यूनल अध्यक्ष जैसी किसी वैसलीन-छाप कुर्सी को पाने के लिए वे आज भी अफ़लातूनी जोड़-तोड़, पैंतरेबाज़ी और साज़िशों के ताने-बाने बुनते हैं।
जिस सिस्टम के शीर्ष पर बैठकर इन्होंने अपनी पूरी नौकरी के दौरान सिर्फ़ फ़ाइलों को अटकाया, बुनियादी सुधारों के नाम पर सिफ़र काम किया। वही लोग हर शाम उसी सिस्टम की नाकामियों पर लंबा-चौड़ा बौद्धिक प्रवचन छाँटते हैं। सिस्टम की बेरहमी को आम नागरिक अपनी नियति मानकर तिल-तिल सहते हुए जिंदगी गुज़ार देता है, रिटायरमेंट के बाद वही दिक्कतें जब इनकी देहरी पर दस्तक देती हैं—चाहे ज़मीन का नामांतरण हो, या बिजली का बिल ठीक कराना हो—तो ये आसमान सिर पर उठा लेते हैं।
समय का चक्र देखिए— इन्हीं तकलीफों को दूर करने के लिए आज किसी वर्तमान आईएएस (जो कभी इनका जूनियर हुआ करता था) के दफ़्तर के बाहर इंतज़ार करते हैं। बंद कमरों में या फोन पर जी… जी…’ करते हुए अपने काम के लिए गिड़गिड़ाते हैं और मिन्नतें मारते हैं। छोटे-मोटे काम के लिए किसी कनिष्ठ अफ़सर या मामूली क्लर्क की टेबल पर पहुँचते हैं, तो उनकी अकड़ पूरी तरह चूर-चूर हो चुकी होती है। हालांकि चतुर्थ श्रेणी पर अब भी रौब झाड़ते हैं।
हमेशा इर्द-गिर्द मंडराने वाले पैंसठिया (दलाल और चाटुकार) हवा की तरह गायब हो जाते हैं। जिन भरोसेमंदों या रिश्तेदारों के नाम बेनामी संपत्तियां और ज़मीनें ली थीं, वे मौका पाते ही दबा बैठते हैं और साहब अपनी ही घूस की कमाई पर हाथ मलते रह जाते हैं। नौकरी के दौरान बनी मुफ्तखोरी की लत से मजबूर जितना पैसा बचा होता है, उसका भी लुत्फ नहीं ले पाते हैं। इन्हें कार का डीजल, ड्राइवर या नौकरों की तन्ख्वाह देना भी बहुत बड़ा खर्च लगता है। इसलिए घर के भीतर का मंज़र और भी कड़वा होता है। अफ़सरी के रोब में उपेक्षित रही पत्नी अब छोटी-छोटी बातों पर ताने मारती है। बच्चे या तो विदेश में सेटल होकर अपनी व्यस्त ज़िंदगियों में मस्त हैं या फिर साहब के अतीत के दंभ से उकताकर दूरी बना चुके हैं।
दफ़्तरों में बेआबरू होकर और घर में अपनों से ठुकराए जाने के बाद जब ये साहब अपनी पॉश कॉलोनी में टहलने निकलते हैं, तो इनका बचा-खुचा अहंकार फिर उफ़ान मारने लगता है। कॉलोनी का कोई आम नागरिक, गैर-सरकारी पड़ोसी या वॉचमैन सामने आ जाए, तो ये आँखें तरेरने लगते हैं। दुनिया से खोई हुई अपनी अफ़सरी का पूरा बदला ये कॉलोनी के बेबस लोगों पर रोब झाड़कर पूरा करने की कोशिश करते हैं। यह उस रसूख़, मुफ़्त की सुविधाओं, सैल्यूट मारने वाले अर्दलियों और असीम ताक़त के अचानक गायब हो जाने की गहरी टीस है। जिसके पीछे छुपा है भारी अकेलापन, ठगे जाने का दर्द और इतिहास के कूड़ेदान में हमेशा के लिए फेंक दिए जाने का ख़ौफ़… और इनमें से कुछ की जिंदगी की शाम ऐसी होती है कि चार कंधों का इंतजाम भी वर्तमान अफसर को अपने अर्दली भेजकर करना पड़ता है।
अब आप और ऊबासी न लीजिए, इसलिए शुरू करते हैं इस हफ्ते की सत्ता के गलियारों की फुसफुसाहटों मजेदार और चुटीले अंदाज आज के द इनसाइडर्स में…
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पूर्व साहब का लेटर बम और वीआईपी मोह
कहावत है—“रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया।” सूबे के एक पूर्व आईएएस साहब, जो आजकल अपनी बहू की वजह से चर्चा में हैं, उन्होंने एक लेटर बम फोड़ दिया है। डीजीपी को लिखे पत्र में उन्होंने बहू और कॉलोनीवासियों के विवाद में अपना नाम सोशल मीडिया में घसीटे जाने पर आपत्ति जताते हुए कार्रवाई की मांग की है। पर सवाल यह है कि शीर्ष पर रह चुके साहब ने खुद उचित कानूनी तरीका क्यों नहीं अपनाया? सीधे डीजीपी को पत्र लिखने के बजाय वे खुद पुलिस के पास IT एक्ट में FIR कराने क्यों नहीं गए? क्या यह सीधे पत्र लिखना उनके पूर्व पद की धमक दिखाने और जांच को प्रभावित करने का उद्यम नहीं है? नौकरशाही का ड्रामा तब और बढ़ा जब यह लेटर आईएएस के व्हाट्सएप ग्रुप पर एक दूसरे पूर्व साहब ने डालकर वर्तमान बड़े साहब की काबिलियत पर सवाल उठा दिया कि—वे कोई दखल नहीं दे रहे। दबाव में आए वर्तमान बड़े साहब ने शाम को लिखा—‘DGP को बोल दिया है।’ राजनीतिक विचारक मैकियावेली (The Prince) ने लिखा था कि सत्ताधारी हमेशा प्रभाव बनाए रखने के लिए पद के तंत्र का इस्तेमाल करते हैं। पर हम तो बस इतना जानना चाहते हैं—क्या बड़े साहब इतनी ही तत्परता किसी आम आदमी के मामले में दिखाएंगे? या कबीर का कथन ही सच है—“सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय!”
नाले की बदबू से साहब का चिर्राटा गायब
अब बात एक और पूर्व आईएएस की। साहब आलीशान अपार्टमेंट में रहते हैं, पर आजकल पास बहते नाले की बदबू और मेंटेनेंस की छोटी-मोटी समस्याओं के लिए बिल्डर को कोस रहे हैं। नगर निगम से बात न बनी तो चिड़चिड़ा गए। आखिरकार एक अन्य पूर्व आईएएस की मदद से निगम के एक अदने से इंजीनियर के सामने गुहार लगाई। साहब बेहद अदब से अपनी तकलीफ बयां कर रहे थे और इंजीनियर मंद-मंद मुस्कुराते हुए आधा घंटे तक सुनता रहा। वह मन ही मन सोच रहा था कि जब साहब पद पर थे, तब इनका ‘चिर्राटा’ कितना बड़ा था! खैर, काम करना इंजीनियर के अधिकार क्षेत्र से बाहर था, सो नतीजा वही—“ढाक के वही तीन पात।” गालिब लिख गए थे—“बेखुदी में जिंदगी का मज़ा लेते रहे, होश आया तो पता चला हम अकेले थे।” जब अपने बनाए ढर्रे पर खुद चलना पड़ता है, तब असलियत समझ आती है। इसलिए लबासना (LBSNAA) में अब एक ट्रेनिंग रिटायरमेंट से पहले भी होनी चाहिए कि कुर्सी छिन जाने के बाद आम जिंदगी कैसे जी जाती है!
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सरकारी खर्चे पर पूर्व हो रहे साहबों का आभार आडंबर
सरकारी कामकाज में ‘डीओ लेटर’ (D.O. Letter) का इस्तेमाल नीतिगत और अति-आवश्यक शासकीय पत्राचार के लिए होता है। लेकिन हाल ही में रिटायर हुए एक प्रमुख सचिव साहब ने इसे अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने और व्यक्तिगत आभार जताने का जरिया बना लिया। उन्होंने सरकारी खर्चे पर कागज़ और डाक का इस्तेमाल कर सबको आभार संदेश भिजवा दिया।
साहब, जब रिटायरमेंट व्यक्तिगत है, तो फिर निजी धन्यवाद ज्ञापन के लिए सरकारी खजाने पर बोझ क्यों? ऐसे ही एक पूर्व बड़े साहब ने भी सबको आभार पत्र भेजा है। हालांकि, सचिवालय के गलियारों में चुटकी लेने वाले कह रहे हैं—“चिड़िया चुग गई खेत, अब पछताए होत क्या!” सेवा में रहते ऐसा कोई काम तो किया नहीं जिसे याद रखा जाए, अब कागज़ी चिट्ठियों से यादों में बने रहने की अफलातूनी कोशिश कर रहे हैं। प्राचीन चीनी विचारक लाओत्सु (Lao Tzu) ने कहा था— A leader is best when people barely know he exists… When his work is done, his aim fulfilled, they will say: We did it ourselves.” (एक श्रेष्ठ नेता/प्रशासक वह है जिसकी उपस्थिति का आभास लोगों को नाममात्र का हो… जब उसका काम पूरा हो जाए और लक्ष्य हासिल हो जाए, तब जनता कहे कि यह तो हमने खुद किया है।) पर हमारे साहबों को पद पर रहते न काम से मतलब था, न जनता से। अब विदाई के वक्त सरकारी पन्नों पर ‘जी… जी…’ और धन्यवाद लिखकर रस्म-अदायगी कर रहे हैं!
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क्लीन चिट के 4 साल बाद आईपीएस का लालच जिंदा हुआ
अब बात एक और पूर्व आईपीएस की। साहब के खिलाफ गंभीर विभागीय जांच थी, जिसके पुख्ता प्रमाण थे। इसीलिए मामला सालों अटका रहा। फिर गृह विभाग में एक सहृदय और सज्जन ACS आए। बुजुर्गावस्था और असीम मानवीय संवेदना के नाते एसीएस साहब का दिल पसीज गया। उन्होंने दरियादिली दिखाते हुए शर्तों के साथ क्लीन चिट दे दी, ताकि साहब की पेंशन न रुके। पर कहावत है—“कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी!” साहब बाकी शर्तों पर मौन रहे और चार साल बाद फिर विभाग में अभ्यावेदन ठोक दिया। अब मांग है कि जांच अवधि के इंक्रीमेंट और अन्य भत्ते भी दिए जाएँ। प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि साहब का लालच खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। जिस अफसर ने तरस खाकर बुढ़ापा सुधारा, उसी के रहमोकरम को अब साहब अपना हक मान बैठे हैं। तुलसीदास जी ने ठीक ही लिखा था—“लोभ न पगहिं अकाज” (लालच में इंसान को सही-गलत का भान नहीं रहता)।
ढाई साल बाद आईपीएस को चार्जशीट जारी
सूबे के चर्चित पटाखा फैक्ट्री हादसे में आखिरकार ढाई साल बाद पूर्व कप्तान साहब (आईपीएस) को चार्जशीट थमा ही दी गई। हादसा हुआ तो तत्कालीन कलेक्टर (आईएएस) पर तुरंत गाज गिरी और उन्हें तत्काल चार्जशीट थमा दी गई। पर कप्तान साहब के मामले में पहले पुलिस मुख्यालय ने और फिर विभाग ने पारिवारिक विपदा की दुहाई देकर असीम दरियादिली दिखाई और फाइल कुछ वक्त के लिए ठंडे बस्ते में डाल दी। इस दोहरे रवैये ने प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट बढ़ा दी थी। लोग पूछ रहे थे कि क्या सूबे में आईएएस लॉबी से ज्यादा ‘आईपीएस लॉबी’ पावरफुल हो गई है? जब आम नागरिक के खिलाफ कार्रवाई में एक मिनट की देरी नहीं होती, तब खाकी के रसूखदारों के लिए फाइलों पर दो-दो साल की ‘अनुकंपा’ बरसना अपने आप में बड़ा सवाल है। कहावत है—“देर आए, दुरुस्त आए!” पर इस देरी ने सिस्टम के उस आचरण को उजागर कर दिया है जहाँ लॉबी की ताकत के आगे कायदे-कानून की धाराएं भी अपनी रफ्तार बदल लेती हैं।
खाने भी न देंगे और रायता फैलाएंगे
राज्य प्रशासनिक सेवा (द इनसाइडर्स के तंजिया लहजे में राज्य हम्माल सेवा) से एक बड़ा अपडेट है। वर्ष 2007 और 2008 बैच के अफ़सरों की आईएएस (IAS) अवॉर्ड के लिए डीपीसी (DPC) होनी है। सितंबर तक यह प्रक्रिया न हुई, तो मामला अगले साल के लिए टल जाएगा। प्रमोशन की रेस में शामिल अफ़सर पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, पर एक अफ़सर के ‘खेल’ ने सबकी राह में रोड़ा अटका दिया है। वर्ष 2011 में चयनित एक अफ़सर ने नौकरी में आने के बाद ऐसा ताना-बाना बुना कि वर्ष 2008 की वेटिंग लिस्ट का हवाला देकर अपना नाम सीनियर अफ़सरों के आगे दर्ज करा लिया। जब बात समझ आई, तो अफ़सरों के पेट में दर्द होना स्वाभाविक था; सो सबने मिलकर उनका नाम हटवा दिया। यानी “न खाएँगे, न खाने देंगे, रायता पूरे आँगन में फैलाएँगे!” अब हटने वाला अफ़सर भी कहाँ मानने वाले हैं? वह फिर कोर्ट-कचहरी की शरण लेगा और नतीजतन डीपीसी फिर ठंडे बस्ते में चली जाएगी! प्राचीन चीनी रणनीतिकार सुन्त्ज़ू (The Art of War) ने कहा था—“जब अपनी जीत अनिश्चित हो, तो विरोधी के रास्ते में भ्रम और व्यवधान पैदा कर दो।”
कलेक्टर ने तंज कसे पर पूर्व साहब ने उलटा तारीफ की
एक ज़िले के वर्तमान कलेक्टर साहब के मॉडल को सरकार ने सराहा और पूरे सूबे में लागू करने का ऐलान कर दिया। इस उपलब्धि पर हमारी ढेरों बधाई! रंग तब जमा जब उनसे ठीक पहले वहाँ पदस्थ रहे पूर्व कलेक्टर साहब ने भी आईएएस व्हाट्सएप ग्रुप में खुले दिल से बधाई पोस्ट की। बस, यहीं से खुसर-पुसर शुरू हो गई। दरअसल, नए साहब दौरों में जहाँ भी जाते, यही रोना रोते कि—“यहाँ तो पहले कुछ काम ही नहीं हुआ है!” पर यह पदस्थ रहे पूर्व कलेक्टर ने इस तंज को दिल पर न लेकर सार्वजनिक बधाई दी और बड़ा दिल दिखाया। कहावत है—“बड़प्पन ढोल पीटने से नहीं, नीयत से दिखता है।” नए साहब भले ही पुराने कामों में खोट निकालकर अपनी कमीज़ ज़्यादा सफ़ेद दिखाने में जुटे हों, पर पूर्व साहब ने अपनी शराफ़त से महफ़िल लूट ली।
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चार्मिंग साहब की मुस्कान और मौन की ताकत
आदिवासियों से जुड़े एक संवेदनशील मामले में हाईकोर्ट ने एक कलेक्टर साहब को व्यक्तिगत रूप से तलब कर लिया। अदालत ने कटघरे में खड़े साहब से सवाल-जवाब दागे, पर साहब बिल्कुल मौन साधे रहे—शायद इसलिए कि वे मानते हैं कि मौन में बड़ी ताकत होती है! हालांकि, उनकी इस रहस्यमयी चुप्पी पर कोर्ट ने जमकर फटकार लगा दी और बात अखबारों की सुर्खियां बन गई। फिर क्या था, मौका ताड़कर नेता प्रतिपक्ष ने भी फौरन मामला लपका और सोशल मीडिया पर ट्वीट दाग दिया। वैसे, हमारे कलेक्टर साहब बेहद चार्मिंग हैं और अपनी कातिलाना मुस्कान से सबका दिल जीत लेते हैं। पर इस बार अपनी खिंचाई के बाद भी शांत रहने की उनकी मौन रणनीति ने उन्हें सूबे में एक बार फिर फेमस कर दिया। कहावत है—“एक चुप, सौ सुख!” पर यहाँ तो साहब की चुप्पी ही जी का जंजाल बन गई।



