The Insiders: IPS की खुशामदीद आई काम, मिली धांसू पोस्टिंग, आईएएस की पत्नी का सीएसआर का फंडा, पीपुल्स ऑफिसर के अवतार में आईएएस, रील्स की बाढ़ में बहे नेताजी, पूर्व आईएएस के भाई ने रची मैडम को हटाने की साजिश

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों की संवेदनशीलता, सादगी के साथ उनके धुरंधर अवतारों के किस्से

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | आईएएस-आईपीएस अफसरों को लेकर आम जनमानस में कैसी-कैसी छवियां तैरती हैं, यह बताने की ज़रूरत नहीं। सबसे आम फहम तस्वीर तो यही है कि साहब बेहद कड़क और सख्त मिजाज हैं। किसी से आसानी से घुलते-मिलते नहीं, चेहरे पर हमेशा एक रूखी गंभीरता तारी रहती है और जो बोलते हैं, नपा-तुला बोलते हैं। हालात चाहे जितने भी बेकाबू क्यों न हों, मजाल है कि उनके चेहरे पर शिकन या माथे पर एक भी सिलवट उभर आए; वे हर मुश्किल घड़ी में बेहद ठंडे दिमाग और धैर्य से फैसले लेते हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनकी सहजता और सरलता ही उनकी पहचान बन जाती है। वे पद के आभामंडल को परे रखकर हर किसी की बात सुनते हैं और उनकी यही मानवीय संवेदना लोगों के दिलों को छू लेती है। लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसे ‘धुरंधर’ भी होते हैं जो बेहद शातिर और सियासतदां मिजाज के होते हैं—जिनके होंठ कुछ और कहते हैं और दिल की दिशा कुछ और ही होती है। प्रशासनिक गलियारों के इन्हीं दो विरोधाभासी चेहरों और व्यक्तित्वों के चटपटे किस्सों को समेटे पेश है ‘द इनसाइडर्स’ का यह अंक, गुदगुदाने और किस्सागोई वाले खास अंदाज में…

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कमिश्नर की सादगी व संवेदनशीलता से मिला असल सम्मान

नगर निगम का सभागार तालियों से गूंज रहा था। मंच की जगमगाहट में शॉल ओढ़ाने और स्मृति-चिह्न थमाकर सधी हुई मुस्कान के साथ तस्वीरें खिंचवाने की औपचारिकताएं अपने शबाब पर थीं। लेकिन इसी चकाचौंध से कुछ दूरी पर, सीढ़ियों के एक शांत कोने में एक दिव्यांग कर्मचारी बैठा था। पैरों की लाचारी के चलते वह देर तक खड़ा नहीं रह सकता था। हाथ में सम्मान की ट्रॉफी तो थी, मगर आँखों में वही चिर-परिचित प्रशासनिक झिझक तैर रही थी, जो बड़े अफसरों के साए में किसी छोटे मुलाजिम के चेहरे पर अक्सर उतर आती है। तभी वहाँ से निगम की कमिश्नर मैडम गुजरीं। अमूमन प्रोटोकॉल की रवायत यही है कि बड़ा अफसर सिर हिलाकर मुस्कुराए और आगे बढ़ जाए, या फिर मातहत दौड़कर कर्मचारी को सहारा देकर खड़ा कराने की जुगत में लग जाएं। मगर उस रोज़ व्यवस्था के सारे कायदे एक किनारे धरे रह गए। कर्मचारी पर नजर पड़ते ही कमिश्नर के कदम ठिठक गए। उन्होंने उसे खड़े होने का कोई इशारा नहीं किया, बल्कि पलक झपकते ही खुद पद और रुतबे की सारी दीवारें गिराकर उसी ठंडी सीढ़ी पर उसके बिल्कुल बराबर बैठ गईं। उस एक लम्हे में वह सीढ़ी किसी भी सजे-धजे मंच से कहीं ज्यादा मुकम्मल और भव्य हो गई। मंच पर बुलाकर पदक थमा देना व्यवस्था की औपचारिक ड्यूटी हो सकती है, लेकिन किसी लाचार के बराबर ज़मीन पर बैठकर उसकी आँखों में देखना और अपनापन जताना—यही रूहानी सम्मान है। कमिश्नर की उस आत्मीय बातचीत और कर्मचारी के चेहरे पर खिली राहत भरी मुस्कान ने बिना कुछ कहे यह समझा दिया कि कुर्सी कितनी भी ऊंची हो, इंसानियत और संवेदनशीलता की जमीन से बड़ी कोई हैसियत नहीं होती। वह भावुक और आत्मीय पल यह सिखा गया कि सम्मान केवल पदकों या प्रशस्ति-पत्रों में बंद नहीं होता।

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पीपुल्स ऑफिसर

हमने ऊपर संवेदनशीलता, सादगी आदि की बात की है। तो इसका एक दूसरा रूप भी देखिए। बड़ी मशक्कत के बाद दिल्ली की सैर यानी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर पहुंचे मध्य प्रदेश कैडर के एक सीनियर आईएएस इन दिनों सोशल मीडिया पर खासे छाए हुए हैं। उनके हैंडल्स पर रील्स की जबरदस्त बहार है, लेकिन दिलचस्प यह है कि सारा नैरेटिव उनकी मातृभाषा यानी दक्षिण भारतीय भाषा में गढ़ा जा रहा है। वीडियो में उन्हें बाकायदा पीपुल्स ऑफिसर के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। साहब अपने गृह राज्य के पैतृक जिले में कभी जनता के बीच घिरे दिखते हैं, कभी ओजस्वी भाषण देते हैं, तो कभी सामाजिक सरोकारों में रमे नजर आते हैं। रील्स की ऐसी पेशेवर ब्रांडिंग देखकर तो मंझे हुए राजनेता भी सोच में पड़ जाएं। चर्चा गरम है कि भोपाल से वाया दिल्ली होते हुए साहब की अगली मंजिल उनका गृह राज्य ही है। तैयारी अब कुर्सी पर बैठकर फाइलें निपटाने वाले अफसर की नहीं, बल्कि खादी पहनकर जननेता बनने की लगती है। वैसे भी वे जब मध्य प्रदेश में थे, तब भी अपने काम से ज्यादा निजी पीआर और ब्रांडिंग के लिए ही मशहूर रहे। इनसाइड स्टोरी यह है कि पदस्थापना चाहे भोपाल में रही हो या दिल्ली के दफ्तरों में, वीकेंड आते ही साहब सीधे अपने गृह राज्य की उड़ान भर लेते हैं। वहाँ शनिवार-रविवार को जनता के बीच कैमरे की चमक बिखेरते हैं और हफ्ते भर रील्स के जरिए उसे परोसते हैं। जब अफसर खुद को जनता का सेवक साबित करने के लिए प्रायोजित प्रचार पर उतर आए, तो समझ लीजिए कि मकसद जनसेवा नहीं, बल्कि आने वाले कल की सियासी दावेदारी है।

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सीनियर आईपीएस को मिला मलाईदार महकमा

खाकी बिरादरी के गलियारों में इन दिनों एक वरिष्ठ आईपीएस के चेहरे की चमक देखते ही बनती है। अरसे से जिस मलाईदार जिम्मेदारी पर निगाहें टिकी थीं, आखिरकार हुकूमत ने वही चाबी उनके हाथ में थमा दी। इस मनचाही ताजपोशी की पटकथा भी बड़ी नफासत से तैयार की गई थी। साहब अफसरों के उस संगठन के अगुआ भी हैं, जिसका वजूद ही साथियों के हितों की पैरवी करना है। लेकिन रवायत के उलट, साहब ने उस मंच का इस्तेमाल अपनों की पैरवी के बजाय सत्ता के सामने अपनी चमक और धमक बढ़ाने के लिए ज्यादा किया। लिहाजा, साहब की इस खुशामदीद का सरकार ने नजराना देते हुए उन्हें युवाओं से जुड़े विभाग की कमान थमा दी।

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आपदा में रील्स की बाढ़

प्रदेश के पूर्वी हिस्से में नदियां उफान पर हैं और कई जिले जलमग्न। मगर इस भयावह सैलाब के बीच एक और समानांतर बाढ़ आ गई है, और वो है नेताओं के ‘दर्दभरे वीडियो’ की बाढ़! शुरुआत माननीय सांसद महोदय ने की। कार की पिछली सीट पर कैमरा फिट करवाया और खुद आगे की सीट पर एसी की ठंडी हवा का आनंद लेते हुए उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री को फोन घुमाया। और रिकार्ड कर लिया वीडियो। फिर क्या था? सियासी गलियारे में संदेश चला गया कि अगर आपदा में वीडियो न डाला, तो जनता समझ लेगी कि नेताजी को तैरना नहीं आता। होड़ मच गई। मैदान में एक माननीया मंत्री जी भी कूद पड़ीं। उन्होंने भी कार में तपाक से कलेक्टर साहब को फोन लगाया, लाउडस्पीकर ऑन किया और रौबदार आवाज में दिशा-निर्देश दागने का वीडियो बनवाकर इंटरनेट पर राहत सामग्री की तरह बांट दिया। अब पूर्व विधायक जी क्यों पीछे रहते? सत्ता की कुर्सी न सही, स्मार्टफ़ोन तो जेब में था ही! उन्होंने सीधे कैमरे के आगे हाथ जोड़कर प्रशासन से गुहार लगा दी कि ‘हे व्यवस्था, मेरे इलाके को बचा लो!’ कमाल देखिए—पानी से घिरे पीड़ितों के पास राशन पहुंचे न पहुंचे, लेकिन नेताओं की गंभीर मुद्रा वाले ये वीडियो 5G की रफ्तार से सब तक पहुंच गए। मजे की बात यह है कि इन तमाम डिजिटल सूरमाओं में से एक भी घुटने भर पानी में उतरकर किसी पीड़ित की पीठ थपथपाने नहीं पहुंचा। भला कीचड़ में जूते और कुर्ते कौन खराब करे, जब मोबाइल स्क्रीन से ही जनसेवा का मोक्ष मिल रहा हो? कहावत पुरानी है कि आपदा में अवसर तलाशा जाता है, मगर हमारे रहनुमाओं ने नया मुहावरा गढ़ा है—आपदा में रील्स!

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100 करोड़ की एफडी का इनसाइड खेल!

किस्सा थोड़ा सा पुराना है पर हैं मौजूं। एक बैंक के प्रतिनिधि लंबे समय से अपनी शाखा के लिए किसी भारी-भरकम सरकारी एफडी के जुगाड़ में एड़ियां घिस रहे थे। हर चौखट पर माथा टेका, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। जब हर दांव उलटा पड़ गया, तो एक सीनियर आईएएस साहब के पहुंचे हुए पीए ने उन्हें मोक्ष का असली गुप्त मार्ग दिखाया। पीए की नेक सलाह पर बैंक वाले सीधे आईएएस साहब के बजाय गृह मंत्रालय यानी मैडम की शरण में जा पहुंचे। वहाँ औपचारिक बातचीत के बजाय कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का नया व्याकरण गढ़ा गया। बैंक की तरफ से मैडम को सीएसआर के तहत खर्च होने वाली मोटी रकम बतौर नजराना पेश कर दी गई। फिर क्या था, विभाग का भले ही कोई सामाजिक उद्धार न हुआ हो, पर मैडम का पर्सनल CSR’ तुरंत सफल हो गया। डील पक्की होते ही हुक्म की तामील हुई। मैडम ने पतिदेव के मातहतों को सीधा फरमान सुना दिया—निजी बैंक से 100 करोड़ की एफडी तुरंत तोड़कर ‘सौदागर बैंक’ के खाते में जमा करा दी जाए। निचले अमले को समझ आते देर नहीं लगी कि जब हुक्म सीधे ‘साहब के घर’ से आया हो, तो नियमों की कौन सुने! इसे कहते हैं सीएसआर का असली कॉरपोरेट अवतार, जहाँ समाज की भलाई बाद में, पहले घर की मलाई तय की जाती है। हालांकि अब साहब इस विभाग की बजाय जंगल में पाए जाते हैं।

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आरआर की काबिलियत पर उठ रहे सवाल

सीधी भर्ती (आरआर) के चार आईएएस इन दिनों एक के बाद एक विवादों में घिरे हैं। उनकी कार्यशैली और प्रशासनिक समझ पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इनमें से दो अफसर तो सीधे अपने ही मातहतों के निशाने पर आ गए। कर्मचारियों से ऐसा टकराव बढ़ा कि उन्होंने साहबों के खिलाफ बाकायदा मोर्चा खोल दिया। वहीं बाकी के दो अफसर फैसलों के वक्त पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आए। स्थिति यह बनी कि एक साहब की अनिर्णय की स्थिति के चलते स्कूली छात्रों की यूनिफॉर्म की खरीद समय पर नहीं हो सकी, तो दूसरे की लेटलतीफी के कारण बच्चों के पोषण आहार जैसे अति-संवेदनशील मामले में भी खासी देरी हुई। चर्चा इसलिए भी गर्म है क्योंकि इन चारों अफसरों का विवादों से पुराना नाता रहा है और इनकी पिछली पदस्थापनाओं में भी ऐसे ही किस्से सामने आते रहे हैं। अब प्रशासनिक गलियारों में सवाल यही तैर रहा है कि ट्रेनिंग के बड़े दावों के बाद भी ये आरआर अफसर फील्ड में इतने लड़खड़ाते क्यों नजर आ रहे हैं?

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पूर्व आईएएस के भाई ने आईएएस मैडम को हटाने की साजिश रची

इन दिनों एक महिला आईएएस अपने ही मातहतों के तीखे विरोध का सामना कर रही हैं। कर्मचारियों ने न केवल उनके खिलाफ हड़ताल का बिगुल फूंका, बल्कि मीडिया में भी खुलकर बयानबाजी की। मैडम पर तानाशाही रवैया अपनाने और ऐसे अव्यावहारिक निर्देश देने के आरोप मढ़े गए, जिनका पालन करना कर्मचारियों के लिए नामुमकिन बताया गया। पहली नजर में यह किसी सख्त अफसर के खिलाफ कर्मचारियों का स्वाभाविक गुस्सा लगा, लेकिन इस हंगामे के पीछे की इनसाइड स्टोरी कुछ और ही बयां कर रही है। हमारे इनसाइडरों की मानें तो यह महज मुलाजिमों की नाराजगी का मामला नहीं, बल्कि कुर्सी के पीछे से खेला गया एक सोचा-समझा खेल है। दरअसल, महिला आईएएस ने दफ्तर में कामकाज को पटरी पर लाने के लिए जब सख्त रवैया अख्तियार किया, तो महकमे में वर्षों से मलाई काट रहे एक अफसर के पर कतरने लगे। यह अफसर कोई और नहीं, बल्कि एक रसूखदार पूर्व आईएएस के भाई हैं। उन्होंने मैडम को अपने रास्ते से हटाने की पूरी बिसात बिछा दी। खुद सीधे मोर्चे पर आने के बजाय उन्होंने कर्मचारियों के असंतोष को हवा दी। पर्दे के पीछे से पूरी पटकथा लिखी गई और कर्मचारियों को आगे कर हड़ताल व बयानबाजी का ‘पहला चरण’ सफलतापूर्वक निपटा दिया गया।

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सीएस ने लगाई सीनियर आईएएस को फटकार

पूर्व में हम्माल सेवा में अपना जलवा दिखा चुके एक सीनियर आईएएस को हाल ही में सीएस की तीखी फटकार का सामना करना पड़ा। नाराजगी की वजह यह थी कि साहब ने छोटे उद्योगों से जुड़े काम अधूरे छोड़ रखे थे और तो और, बैठक में जरूरी तैयारी और पुख्ता जानकारी के बिना ही चले आए थे। इस लापरवाही पर सीएस का पारा चढ़ गया। बता दें कि यह वही अफसर हैं, जो पहले अपने ही विभाग के सचिव से खुलेआम उलझ चुके हैं और उन्हें यह तक नसीहत दे डाली थी कि ‘मुझे बेइज्जत न करें।’ वैसे, इस फटकार से पहले हुई समीक्षा बैठक में भी अफसरों ने आंकड़ों की जमकर बाजीगरी दिखाई थी। आलम यह रहा कि यदि किसी एक प्रोजेक्ट के लिए पांच अलग-अलग प्रस्ताव आए, तो अफसरों ने उन सभी को आपस में जोड़कर एक भारी-भरकम निवेश का सब्जबाग दिखा दिया; जबकि हकीकत यह है कि किसी एक प्रोजेक्ट पर एक ही प्रस्ताव अमल में लाया जा सकता है। इसी तरह, खनन कार्य के लिए तैयार किए जाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर को निवेश माना जाना चाहिए था, लेकिन कागजों को चमकाने के फेर में अफसरों ने सीधे खनन से होने वाली कुल संभावित आय का ही आंकड़ा पेश कर दिया।

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टेंडर एक का, मेहरबानी चार पर: खरीदी निगम का अजब कारनामा!

खरीदी और सप्लाई से जुड़े एक निगम में ‘सब कुछ चंगा सी’ का दावा सिर्फ फाइलों तक सीमित है; अंदरखाने गड़बड़ियों और मनमानियों की भरमार है। ऐसा ही एक ताजा किस्सा इन दिनों गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। निगम में गाड़ियां किराए पर लेने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि पूरी चार एजेंसियों की सेवाएं ली जा रही हैं। खेल यह है कि टेंडर सिर्फ एक ही एजेंसी का हुआ था, लेकिन मेहरबानी बाकी तीन चहेती एजेंसियों पर भी बराबर बरस रही है। नियमों की इस खुली धज्जियां उड़ते देख फाइनेंस ने भी तीखी आपत्तियां दर्ज कराईं। मगर साहब के हौसले इतने बुलंद हैं कि वित्त की तमाम आपत्तियों को कचरे के डिब्बे में डालकर फाइलों को अपनी मर्जी से दौड़ाया जा रहा है।

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