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The Insiders: सागर शराब कांड में यादव जी का डिस्लरी कनेक्शन, सिर्फ एक दिन से डीजीपी की दौड़ में शामिल हैं आईपीएस, दक्षिण से बिहार शिफ्ट हो रहा पावर सेंटर, 250 करोड़ का जादूगर आईएएस

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़े सागर की जहरीली शराब कांड में छिपाई जा रही सच्चाईयों को…

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | पहली खबर रायसीना हिल्स से है। जिस दौर में हुकूमतों को अफसरों से रीढ़ की हड्डी नहीं, सिर्फ जी-हुजूरी का हुनर दरकार होता है, वहां कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन और गृह सचिव गोविंद मोहन को सालभर का सेवा विस्तार मिल गया। अंदरखाने की खबर यह है कि जंतर-मंतर पर बेजा सख्ती की सियासी ख्वाहिश के आगे इन दोनों ने नियमों की लक्ष्मण रेखा लांघने से साफ इनकार कर दिया था। यानी करिश्मे अब भी होते हैं, बशर्ते आपके भीतर सही को सही और गलत को गलत कहने का माद्दा बाकी हो।

दूसरी खबर भी राजधानी दिल्ली से आई एक खामोश चीख है, जहां पूर्व मुख्य सचिव ने अकेलेपन से तंग आकर अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर ली। कुर्सी पर रहते वक्त जिनके आगे-पीछे चमचों और सलाम ठोकने वालों का हुजूम रहता था, रिटायरमेंट के बाद वही अफसर चारदीवारी के सन्नाटे से हार गए। वजह साफ है—नौकरी की अकड़ जब इंसानियत निगल जाती है, तो सेवामुक्ति के बाद आदमी समाज के लायक नहीं बचता।

और तीसरी खबर विदिशा से है, जहां दिल का दौरा पड़ने से एक सेवारत आईएएस अफसर ने दम तोड़ दिया। खबर यह है कि 19 साल तक लगातार ‘क-प्लस’ सीआर पाने वाले इस साहब की फाइल पर पहली बार ‘ख’ श्रेणी चढ़ी थी। महकमे का तनाव और सीआर का डिमोशन दिल झेल नहीं पाया।

इन तीन घटनाओं का कुल लब्बोलुआब यही है कि भले आप आईएएस बन जाएं, पर सुख-दुख, बीमारी और मौत के कायदे आपके लिए अलग से नहीं लिखे गए। आप न अजर हैं, न अमर। पद का लोभ जितना पालेंगे, साजिशों का हिस्सा भी उतना ही बनेंगे और अंततः शिकार भी खुद ही होंगे। यदि यह नहीं भी करेंगे तो भी एक्सटेंशन मिल सकता है। बेहतर होगा कि कुर्सी की धूप सेकते हुए सेहत का भी ख्याल रखें, तनाव से किनारा करें और यह याद रखें कि ताउम्र साथ सिर्फ आपकी इंसानियत ही चलती है, पद की तख्ती नहीं। तीनों खबरों के साथ जय सिया राम जी। और अब शुरू करते हैं आज के द इनसाइडर्स की इनसाइड स्टोरी वाला अंक…

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  1. ग्वालियर वाले यादवजी तक नहीं पहुंची जांच की आंच

पीने को पानी चाहिए तो भागीरथपुरा की नलों से मौत बहती है, बीमार पड़े तो छिंदवाड़ा वाला कफ सिरप जिंदगी की फाइल ही बंद कर देता है। नौनिहालों को खाना नसीब हो तो बालाघाट का कुपोषण निगल जाता है, और जब इंसान सारे गम भुलाने के लिए मयखाने का रुख करे तो सागर की जहरीली शराब चिता सजा देती है। हवा अलबत्ता अभी चल रही है, हालांकि वह भी इतनी जहरीली हो चुकी है कि फेफड़ों को किश्तों में मार रही है; बस गनीमत इतनी है कि एक साथ थोक में लाशें नहीं गिर रहीं, इसलिए वल्लभ भवन के गलियारों में किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। जहरीली शराब कांड के बाद निलंबन, छापे, शार्ट एनकाउंटर और बयानों की नूराकुश्ती चालू है। पर सरकार और जांच एजेंसियों की पूरी फुर्ती सिर्फ भट्टी सुलगाने वाले और पाउच बेचने वाले छोटे मोहरों तक सिमट कर रह गई है। अब चूंकि हम द इनसाइडर्स हैं, तो आपके लिए इससे जुड़ी सबसे बड़ी इनसाइड खबर भी लेकर आए हैं। पूरी जांच में किसी माई के लाल ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि इस मौत के सामान की बुनियादी ईंट यानी वह जहरीली स्प्रिट आखिर आई कहां से? तो इनसाइड खबर यह है कि यह स्प्रिट ग्वालियर की एक नामी डिस्टलरी से निकली थी। लेकिन मजाल क्या कि फाइल पर डिस्टलरी का नाम तक दर्ज हो जाए! वजह बेहद मुकम्मल है—डिस्टलरी के मालिक रसूखदार ‘यादव जी’ हैं, जिनकी एक मुखिया संग सीधी और तगड़ी पार्टनरशिप की चर्चा सत्ता के गलियारों में आम है। जब तार सीधे ऊपर से जुड़े हों, तो आबकारी कमिश्नर, कलेक्टर और कप्तान साहब की कुर्सियों पर कोई आंच कैसे आ सकती है? तुलसीदास जी सदियों पहले सियासत का यह नियम लिख गए थे—समरथ को नहीं दोष गोसाईं!

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  1. लिट्‌टी चोखा के मजे में डूबा प्रदेश

हमने पहले ही बताया है कि जहरीली शराब कांड में एसपी और कलेक्टर नहीं नपेंगे। उलटे नए लिट्‌टी चोखा वाले प्रदेश से आए दो अफसरों ने सागर में आमद दे दी है। यह बात तब है जब दोनों अफसरों को लूप लाइन में रखा जाना था तो उन्हें फील्ड पोस्टिंग कैसे मिली? यानी यह बात और पुष्ट हो चली है कि बड़े साहब का लिट्‌टी चोखा प्रेम परवान चढ़ चुका है। वैसे पहले वाले आईएएस साहब तो अपने सीनियर जो कि दक्षिण गैंग के सदस्य है, उनसे लड़-भिड़ चुके थे, फिर भी उनका बाल-बांका न हुआ। दूसरे आईपीएस साहब के भी सरकार से कोई खास रिश्ते नहीं बताए जा रहे हैं। और समुदाय विशेष का भी ठप्पा था। फिर भी देश की सबसे बड़ी कंपनी के साथ ही एक विशेष अफसर की मदद और लिट्‌टी चोखा ने उन्हें पदभार ग्रहण करवा दिया। हालांकि साहब थोड़ा और ऊपर ग्वालियर-चंबल जाना चाहते थे, पर वहां की दाल नहीं गल पाई। क्योंकि सरकार का मकसद वहां यादवी शक्ति का ही राज कायम रखना था।

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  1. कलेक्टर साहब का प्रशासनिक ज्ञान!

संस्कारधानी में जब मीडिया ने शराब दुकानों पर बिल न मिलने का सवाल उछाला, तो जिले के सर्वोच्च हाकिम ने कैमरे के सामने बड़ी बेफिक्री से नया ‘कानून’ गढ़ दिया— “बिल देने का कोई वो नियम नहीं है!” अब साहब के इस ऐतिहासिक प्रशासनिक ज्ञान पर माथा न पीटें तो क्या करें? आबकारी विभाग का नियम 15(XV) चीख-चीखकर कहता है कि शराब की हर बिक्री पर ग्राहक को बिल (इनवॉइस) देना  अनिवार्य है। पर जब जिले का मुखिया ही गजट और नियमों को अपनी सहूलियत से दरकिनार कर दे, तो अंदाजा लगाइए कि साहब पूरे जिले की व्यवस्था और फाइलों की नैया कैसे खेते होंगे! जब हाकिम को अपने ही विभाग के कायदे-कानून का ‘ककहरा’ न पता हो, तो मातहतों और ठेकेदारों की पौ-बारह होना लाजिमी है। बस साहब के इस बयान को जरा इस जहरीली शराब कांड से जोड़कर देखिए। तो आपको यहां होने वाली मौतों की असल वजह का कुछ अंदाजा जरूर हो जाएगा।

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  1. एक दिन की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू!

“एक चुटकी सिंदूर की कीमत तुम क्या जानो…”—सिनेमा के इस मशहूर डायलॉग को अगर आज खाकी के गलियारों में दोहराया जाए, तो नया जुमला बनेगा: ‘एक दिन की कीमत तुम क्या जानो साहब!’ सूबे के सबसे बड़े कप्तान की कुर्सी खाली होने में अभी दो महीने का वक्त है, लेकिन दिल्ली से लेकर भोपाल तक ताल ठोंकी जा चुकी है। हुकूमत ने डीजीपी के लिए 12 नामों का पैनल दिल्ली भेजा है। सबसे आगे तैर रहे पहले तीन नामों के कनेक्शन इतने बड़े हैं कि उनका कच्चा-चिट्ठा किसी और दिन खोलेंगे, पर फिलहाल दाद देनी होगी इनमें से एक दावेदार की तकदीर की। नियम कहता है कि डीजीपी की रेस में वही शामिल हो सकता है, जिसके रिटायरमेंट में कम से कम 180 दिन बाकी हों। अब साहब के सितारों का खेल देखिए—पैनल बनते वक्त उनके रिटायरमेंट में एक्यूरेट ठीक 180 दिन ही बचे थे। अगर कैलेंडर का पन्ना महज 24 घंटे पहले पलट जाता और 179वां दिन लग जाता, तो साहब की सारी तपस्या, जोड़-तोड़ और वर्षों की हसरतें एक झटके में धरी रह जातीं। इसी को कहते हैं किस्मत का मेहरबान होना। बाकी दो दावेदारों के पास रसूख है, लेकिन इस साहब के पास वक्त का वह एक दिन है जो उन्हें मुकाबले में जिंदा बनाए हुए है।

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  1. युवा जिला हुकुम की सराहनीय पहल

सम्राट अशोक से संबंध रखने वाले एक ऐतिहासिक जिले में तैनात युवा कलेक्टर की संवेदनशील पहल ने साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो, तो सरकारी दफ्तर भी उम्मीदों की पाठशाला बन सकते हैं। साहब ने खाकी वर्दी पहनने का ख्वाब देखने वाली बेटियों के लिए पुराने पुलिस कंट्रोल रूम की कायापलट कर दी और नींव रखी ‘सशक्त वाहिनी’ अभियान की। इसके तहत साधारण पृष्ठभूमि की करीब 145 युवतियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की नि:शुल्क कोचिंग और मैदान पर कड़ा फिजिकल प्रशिक्षण दिया जा रहा है। निजी अकादमियों की भारी फीस और गाइडेंस के अभाव में जो बेटियां हिम्मत हार जाती थीं, उनके कदमों को अब प्रशासनिक संबल मिल गया है। यह नवाचार इतना असरदार साबित हुआ कि दिल्ली में बैठे नीति आयोग ने भी इस मॉडल की पीठ थपथपाई। हुक्म चलाने वाले हाकिम तो बहुत देखे होंगे, पर जब कोई मुखिया बेटियों के सपनों को अपनी जिम्मेदारी मान ले, तो व्यवस्था के प्रति जनता का भरोसा कई गुना बढ़ जाता है। बता दें कि साहब आईएएस बनने से पहले आईपीएस भी रहे हैं।

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  1. 250 करोड़ की दाल में कुछ भी काला नहीं

हाल ही आपने एक महिला आइएएस की एक व्हाट्सएप ग्रुप में यह गुहार सुनी ही होगी कि किस तरह सिर्फ एक साल में उनके चार तबादले कर दिए गए हैं। वैसे, पहले भी उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव के खासमखास की जांच कर डाली थी तो उन्हें इतना परेशान किया गया कि अन्य आईएएस अफसरों को यह उलाहना दी जाने लगी कि ज्यादा तेज चलोगे तो उस अफसर जैसा हश्र कर दिया जाएगा। खैर ताजा मामला यह है मैडम के पास एक दिन प्रमुख सचिव महोदय ने गलती से एक जांच भेज दी। मैडम ने भी तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई और गड़बड़ी की पूरी फेहरिस्त खोल दी। रिपोर्ट जब भ्रष्टाचार करने वाले अफसर के पास पहुंची तो मंत्री और अन्य अफसरों की जुगलबंदी से इसे किनारे कर दिया गया। फिर, शिकायतें बड़े साहब तक भी पहुंची पर भ्रष्ट आईएएस ने सब कुछ मैनेज कर लिया और 250 करोड़ रुपए के इंटरेक्टिव पैनल आदि की खरीदी को अंजाम दे दिया गया। जब खरीदी हो ही गई तो अचानक एक जांच एजेंसी भी कूद पड़ी। साहब को नोटिस दर नोटिस थमाए गए। फिर हुआ नजराने का खेल। शिकायतकर्ता से लेकर तमाम अफसरों को एक बड़े रसूखदार के कहने पर मैनेज किया गया और जांच को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। और जब सब कुछ हो गया तो मैडम के मुताबिक उनका अपमान कर बाहर निकाल फैंका गया। समझ रहे हैं न आप… ऐसी तरुणाई महिमा है हमारे भ्रष्ट आईएएस अफसर की।

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  1. साहब की टिप्पणी से निकली खच्चर पार्टी

छोटे बच्चों की शिक्षा से जुड़े एक केंद्र में आईएएस की कार्यशैली से सभी परिचित हैं। चूंकि साहब दबाकर पैसे लेते हैं, इसलिए अब कर्मचारियों में भय खत्म हो चुका है। पर साहब को एक इमरजेंसी काम की याद आई तो वर्षों से जमे मातहतों की कलम भी हमेशा की तरह ठंडी ही रही। यह देखकर साहब का पारा पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। साहब ने उन्हें सीधा खच्चर की उपाधि से नवाज दिया। पर साहब भूल गए कि अब जमाना जी-हुजूरी का नहीं, बल्कि जेन-जी तेवरों का है। सुप्रीम कोर्ट के मुखिया की एक पुरानी टिप्पणी से जैसे कॉकरोच पार्टी अवतरित हुई थी, ठीक उसी तर्ज पर अपमानित बाबुओं ने भी डिजिटल मोर्चे पर ‘खच्चर कर्मचारी पार्टी’ (केकेपी) की नींव रख दी। नारा भी माकूल गढ़ा— “बोझ उठाया है, अब आवाज़ उठाएंगे!” हालांकि यहां छात्रों की बजाए कुद कर्मचारियों का का मामला था, इसलिए खच्चर पार्टी ज्यादा चर्चित नहीं हो सकी और साहब ने भी राहत की सांस ली।

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  1. सावधान… एआई की मदद से एसीएस पकड़ रहे भ्रष्टाचार

राम नाम की मची है लूट का नया वर्जन मध्यप्रदेश में इस तरह हो गाया जा रहा है… भ्रष्टाचार की मची है लूट, लूट सके तो लूट। पीछे फिर पछताओगे, जब कुर्सी जाएगी छूट।। जी हां। एक एसीएस और एक कमिश्नर ने जब शहरों के शासन चलाने वालों को उनके भ्रष्टाचार का आइना दिखाया तो सबने ऊंगली दातों तले दबा ली। दोनों ने एक सरकारी एजेंसी के एक ईडी साहब से जांच कराई। ईडी ने भी एआई का उपयोग किया और जैम पोर्टल पर हुई खरीदी के सभी विवरणों को जांच दिया। खुलासे तो बहुत सारे हैं। जैसे कैसे डार्क वेब पर पूरे सरकारी सिस्टम की जानकारी और लॉगिन आईडी व पासवर्ड उपलब्ध है। पर खरीदी से जुड़े भ्रष्टाचार के उदाहरण सबसे अहम हैं। एआई ने पकड़ा कि एक शहरी निकाय में 5 रुपए प्रति लीटर की दर से फिनाइल खरीदा गया तो दूसरे निकाय में 33 हजार रुपए प्रति लीटर। इसी तरह से 60 वाट की लाइट 306 रुपए में खरीदी गई जबकि सरकार की नाक के नीचे यही कीमत 11800 रुपए हो गई। अभी तक यह माना जाता था कि ज्यादा तादाद या थोक में खरीदी सस्ती पड़ती है। पर यहां कम सामान खरीदना सस्ता और ज्यादा सामान महंगा पड़ता है। हालांकि जैम पोर्टल को मोदी सरकार जिस उद्देश्य से लेकर आई थी, उसके लूप होल्स का यह छोटा सा नमूना है। हालांकि बड़े साहिब लोगों ने जूनियर अफसरों को आईना तो दिखा दिया पर यह नहीं बताया कि कार्रवाई कब होगी? बाकी आप समझदार हैं ही।

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  1. दिन में वर्कशॉप, मेल सुबह 8 बजे

एक सचिव महोदय टाइम के कितने पंक्चुअल है, इसका नजारा हाल ही में देखने को मिला। साहब की आदत है कि उन्हें हर काम तत्काल में चाहिए होता है। और याद भी अचानक ही आती है। यानी खुद भूल जाते हैं। इसलिए उनका स्टाफ परेशान है। हाल ही में न्यू लेबर कोड पर एक वर्कशॉप आयोजित की गई थी। साहब को इसकी पूर्व सूचना थी लेकिन वे विभाग में बताना भूल गए। उन्हें याद भी तब आया जिस दिन वर्कशॉप होनी थी। उन्होंने सुबह 7:41 को ईमेल फारवर्ड कर दिया और अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए। कई अधिकारी-कर्मचारी सुबह-सुबह ईमेल नहीं देख पाए तो वर्कशॉप में पहुंचे नहीं तो सचिव महोदय ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। साहब अपनी भूल का भी एक नोटिस जारी कर लेते।

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  1. शिवगामी देवी पर तीन एसीएस की कृपा

हमने पिछले अंक में बाहुबली फिल्म के शिवगामी देवी वाला कैरेक्टर तो आपको याद होगा ही। हमने इसी किरदार से मिलते-जुलते अधिकारी को आपसे पिछले अंक में परिचित कराया था। मेरा वचन ही शासन की तर्ज पर काम करने वाली इस अधिकारी पर एसीएस की टेड़ी नजर पड़ गई है। इसलिए उन्हें नोटिस जारी हो गया है। हालांकि शिवगामी देवी इससे बेपरवाह हैं और कह रही हैं कि उन्हें डी टाइप आवास तीन-तीन एसीएस ने दिलवाया है। तो यह चौथे एसीएस क्या बिगाड़ लेंगे। वैसे मैडम दिन भर काम नहीं करती हैं और पुरुषों की बातों में ही रुचि लेती है। मैडम दो पतियों को भी छोड़ चुकी हैं और गर्व से कहती हैं-मेरा वचन ही शासन है। मैडम की जिम्मेदारी वित्त की है। ऐसे में यहां काम न होने से पूरे विभाग का बट्टा बैठा हुआ है।

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