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The Insiders: एसीएस बनीं सिफारिशी मैडम, फाइल लीक पर मचा हड़कंप, कद्दावर मंत्री का स्मार्ट फॉर्मूला और X-Y के चक्रव्यूह में ब्यूरोक्रेसी

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें अफसरों का अफसरी करने का X-Y फार्मूला

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865

भोपाल | मप्र सरकार की नई पदोन्नति नीति ने ब्यूरोक्रेसी का शाश्वत सत्य उजागर कर दिया है। सरकार ने जैसे ही दावा किया कि पदोन्नति में अब कोई अड़चन नहीं है, मंत्रालय में पदोन्नति वाले पदों की गणना के लिए X और Y का गणितीय खेल शुरू हो गया। शनिवार व रविवार की छुट्टी के दिन भी अफसर गुणा-भाग करते रहे। लेकिन दार्शनिक चश्मे से देखें, तो इन साहबान का पूरा जीवन ही इन दो अक्षरों का बंधक है।

यह सफर जीवविज्ञान की प्रयोगशाला से शुरू होता है, जहां पिता के X और Y क्रोमोसोम शिशु का लिंग और जन्म तय करते हैं। मगर साहब का वास्तविक जन्म तब होता है, जब वे यूपीएससी की वैतरणी पार कर प्रशासनिक स्टील फ्रेम बनते हैं। सत्ता में आते ही वे अर्थशास्त्र के उस गणित में पारंगत होते हैं, जहां X और Y का अज्ञात मान ढूंढते-ढूंढते वे सरकारी फाइलों से निजी तिजोरी तक कमाई के सारे समीकरण सुलझा लेते हैं। इस आर्थिक सिद्धि से वे परिवार ही नहीं, बल्कि अपने पैंसठिया (चापलूसों) तक की अर्थव्यवस्था सेट कर देते हैं। जब सत्ता (X) और पैसे (Y) का यह चक्र मजबूत होता है, तो प्रवेश होता है भोग-विलास की अनंत तृष्णा का। साहब की यह कभी न मिटने वाली इच्छा X-ग्रेड वेबसाइट और चमड़ी के सुख पर आश्रित हो जाती है। यह X उनके भीतर की उस अतृप्त भूख का प्रतीक बन जाता है, जिसका कोई अंत नहीं है। अपनी आभासी विद्वता के प्रदर्शन के लिए वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सक्रिय होते हैं, तो कुर्सी पर टिके रहने के लिए रीढ़ का X-Ray करवाते हैं।

मंत्रालय की माथापच्ची इसी अंतहीन तृष्णा का प्रशासनिक उत्सव है। अफसर भूल चुके हैं कि फाइलों में X और Y की सीमाएं तय करने वाले वे खुद इस ब्रह्मांड के सबसे नश्वर ‘वेरिएबल’ (चर) हैं। और हम भी चर-अचर के सिद्धांत में न पड़ते हुए शुरू करते हैं अपने चुटीले और गुदगुदाने वाले अंदाज में आज का द इनसाइडर्स…

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एसीएस मैडम की रूचि निगम-मंडल में, परेशान हुए अध्यक्ष महोदय

प्रदेश के निगम-मंडलों में राजनीतिक नियुक्तियां क्या हुईं, नेताओं को लगा कि अब राज उनका चलेगा। नियम तो यही कहता है कि निगम-मंडल अध्यक्ष और एमडी (MD) की जुगलबंदी से चलते हैं, लेकिन एक कद्दावर विभाग की एसीएस (ACS) मैडम ने इस नियम की ऐसी-तैसी कर रखी है। मैडम का अपने विभाग के मातहत आने वाले निगम-मंडलों में सिक्का आज भी वैसे ही चल रहा है, जैसा अध्यक्ष की नियुक्ति से पहले। मैडम सीधे एमडी को फोन घुमाकर ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर तमाम कामों की धड़ाधड़ सिफारिशें ठोक रही हैं और अपने हिसाब से काम करने का कड़ा निर्देश दे रही हैं। पहले तो यह व्यवस्था पूर्व मंत्री जी के रहते चल रही थी, लेकिन अब नए मनोनीत अध्यक्ष जी आ चुके हैं। अध्यक्ष महोदय बार-बार मंच से दहाड़ रहे हैं कि “अब न मंत्री दखल देंगे, न एसीएस मैडम!” पर उनकी सुने कौन? बेचारे अध्यक्ष जी की हालत “दीवार पर टंगी तस्वीर” जैसी हो गई है। हालांकि अध्यक्ष महोदय भी कम नहीं है। वे भी निकल जाते हैं दौरों पर और विपक्ष के नेता के वेयरहाउस को ही आड़े हाथ ले लेते हैं।

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‘साहब’ का पाप, जनता पर टैक्स की मार!

सरकार व्यापार और उद्योग को बढ़ावा देने के लाख दावे करे, लेकिन इसकी आड़ में ब्यूरोक्रेसी क्या खेल खेलती है, यह जगजाहिर है। हाल ही में कैबिनेट के एक फैसले ने फिर साबित कर दिया कि नौकरशाही जो ठान ले, वह सरकार से करवा ही लेती है। मामला एक कंपनी की सब्सिडी का था। सरकारी नीति के तहत सब तय था, लेकिन बिना ‘सेवा-शुल्क’ (कमीशन) के फाइल आगे बढ़े, ऐसा अफसरों की डिक्शनरी में कहाँ लिखा है! फाइल अटकते ही कंपनी कोर्ट पहुंच गई। हाईकोर्ट से फैसला हक में आया, तो अफसरों ने अपनी मूंछ की लड़ाई बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी ठोक दी। जब वहां से भी मुंह की खानी पड़ी और कंपनी ने अवमानना (Contempt) का केस लगाया, तब जाकर “ऊंट पहाड़ के नीचे आया।” पर अफसरों ने तिकड़म लगाई और कैबिनेट से कंपनी को सब्सिडी और ब्याज देने का प्रस्ताव पास करा लिया। जबकि हाईकोर्ट ने लिखा था कि ब्याज या पेनॉल्टी की रकम दोषी अफसरों की जेब से वसूल की जा सकती है। पर जिन दो आईएएस ने फाइल की मूवमेंट रोक उसे निरस्त किया था, उन्हें बचाने के लिए यह चाल चली गई। लिहाजा, कैबिनेट की आड़ लेकर जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई लुटा दी गई।  अफसरों पर कार्रवाई? वह तो सपने में भी मत सोचिएगा! सूरदास जी शायद ऐसे ही भाईचारे के लिए लिख गए थे: “सूरदास खल कारी कामरि, चढ़इ न दूजो रंग॥” बता दें कि जो दो अफसर इसमें शामिल थे, वे बैचमेट भी हैं। यह अलग बात है कि दोनों ही एक दूसरे पर निपटाने का आरोप लगाते रहे हैं। पर यहां तो दोनों ही बच निकले।

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स्वास्थ्य‘ तो बहाना है, पुरानी अदावत का हिसाब चुकाना है!

मंत्रालय के गलियारों में चर्चा गरम है कि इन दिनों दो आईएएस अफसरों का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है। एक ही विभाग के दो टॉप बॉस—एक कद्दावर एसीएस (ACS) साहब और दूसरे उनके जूनियर कमिश्नर साहब—के बीच ऐसी जंग छिड़ी है कि ‘अंदरूनी बुखार’ चरम पर है। शुरुआत में तो दोनों की ट्यूनिंग राम-लक्ष्मण जैसी दिख रही थी, लेकिन जूनियर साहब अपनी मनमर्जी और कड़क तेवरों के लिए जाने जाते हैं। जब जूनियर की मनमर्जी हद से बढ़ने लगी, तो सीनियर आजिज आ गए। उन्होंने गुस्से में आकर सीधे कमिश्नर साहब के पर ही कतर दिए और उनके अधिकार काटकर दूसरे अफसर की झोली में डाल दिए। असल में इस लड़ाई के तार पुराने सचिवालय से जुड़े हैं। जब जूनियर साहब किसी जिले के कलेक्टर हुआ करते थे, तब यही सीनियर साहब राजधानी में रसूखदार पोजिशन पर बैठे थे। कहते हैं, उस वक्त सीनियर ने ही लूप लाइन का रास्ता दिखाते हुए उन्हें कलेक्टरी से हटवाया था। यानी यह अदावत आज की नहीं, बल्कि “बदलापुर” की पुरानी स्क्रिप्ट है। अब देखना यह है कि इस आपसी दंगल में कौन वेंटिलेटर पर जाता है?

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मैडम का फरमान, बाबू परेशान और फाइलें नजरबंद!

मंत्रालय में एक सचिव स्तर की मैडम अपने लाव-लश्कर और राजसी ठाट-बाठ के लिए मशहूर हैं, लेकिन अब उनके सख्त तेवरों से स्टाफ त्रस्त है। मैडम ने फरमान जारी किया है कि उनके सेक्शन से कोई फाइल नंबर या मूवमेंट की जानकारी बाहर न जाए। हद तो यह है कि यदि किसी फाइल की इंक्वायरी आई, तो सीधे पीए और बाबुओं की गर्दन नाप दी जाएगी। यानी—“करे कोई, भरे कोई!” अब मैडम को ब्यूरोक्रेसी का ककहरा कौन सिखाए कि सरकारी फाइलें कोई ‘गोपनीय तिजोरी’ नहीं हैं। सरकार में फाइलें कई विभागों के बीच समन्वय के लिए दौड़ती हैं। ऐसे में अगर दूसरा विभाग अपनी ही फाइल ट्रैक कर रहा है, तो इसमें गलत क्या है? स्टाफ के साथ एक दिक्कत यह भी है कि मंत्रालय में जो दूसरे सीनियर अफसर हैं, उन्हें कैसे मना करें?   भयभीत स्टाफ अब बंद कमरों में यही गुनगुना रहा है: “दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा…” तुलसीदास जी ने भी शायद ऐसे ही हठ के लिए लिखा था: “जस मति तोरि तस तुम मुसकाई…”

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टुकड़ों में आया काफिला, मंत्री जी का ‘स्मार्ट’ फॉर्मूला!

ईंधन बचाने की पीएम मोदी की अपील पर देश-प्रदेश में सीएम सहित कई दिग्गजों ने अपने काफिले छोटे कर लिए। लेकिन मालवा के हमारे कद्दावर मंत्री जी—जो इन दिनों अपने ‘चिट्ठी बम’ की वजह से सुर्खियों का तापमान बढ़ाए हुए हैं—भला अपना रसूख कैसे कम करते! उन्होंने सिस्टम की आंखों में धूल झोंकने की ऐसी अनूठी तरकीब निकाली कि “सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।” मंत्री जी ने ‘किश्तों में काफिला’ बुलाने का फॉर्मूला खोजा है। कार्यक्रम स्थल पर पहले साहब की दो गाड़ियां आकर रुकती हैं। फिर ठीक दो-दो मिनट के अंतराल पर—एक गाड़ी… फिर एक गाड़ी… फिर एक गाड़ी और फिर एक गाड़ी! मीडिया और जनता समझती है काफिला छोटा है, पर असल में लाव-लश्कर पूरा रहता है। मंत्री जी की इस कलाबाजी पर यह फिल्मी गाना बिल्कुल सटीक बैठता है: “पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा!” रीतिकाल के प्रसिद्ध हिंदी कवि महाकवि बिहारीलाल भी शायद इसी चतुराई के लिए कह गए थे—“सटपटाती सी ससिमुखी, मुख घूंघट पट ढाँपि…” यानी रसूख भी बच गया और सादगी का घूंघट भी डल गया!

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मलाई की महिमा और कलेक्टर साहब का ‘अभयदान’!

राजधानी के सबसे करीब वाले जिले में तैनात शहर एसडीएम साहब का तबादला क्या हुआ, मानों उनके सुख-चैन पर ग्रहण लग गया। उन्हें भेजा गया है राजधानी के एक ‘सूचना’ से जुड़े आयोग में—जिसे प्रशासनिक भाषा में विशुद्ध ‘लूप लाइन’ कहा जाता है। अब भला एसडीएम जैसी मलाईदार पोस्ट छोड़कर कौन उस सूखी जगह जाए? गलियारों में चर्चा इस बात की है कि कलेक्टर साहब और एसडीएम साहब के बीच गजब की ‘केमिस्ट्री’ है, तभी तो उन्हें कलेक्टर साहब से ‘अभयदान’ मिला हुआ है। दोनों को उम्मीद है कि जुगाड़ बैठेगा और तबादला निरस्त हो जाएगा। इधर साहब के न हटने से उन दावेदारों के अरमानों पर ‘तुषारापात’ हो गया है, जो इस मलाईदार कुर्सी पर बैठने के सपने संजोए थे। बता दें कि साहब के पिताश्री हाल ही में आईपीएस के पद से रिटायर हुए हैं, इसलिए रसूख और प्रशासनिक दांव-पेच तो इन्हें विरासत में मिले हैं। अब देखना है कि यह मलाई की महिमा भारी पड़ती है या सरकार का आदेश!

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दो मंत्रियों और सचिवों में तनातनी

सरकारी गलियारों में जब दो कद्दावर विभाग आपस में भिड़ जाएं, तो समझो मनोरंजन का फुल डोज तैयार है। मामला ‘श्रोमोदय स्कूलों’ के मालिकाना हक का है। श्रम विभाग कहता है—”ये बच्चे हमारे, ये स्कूल हमारे।” उधर शिक्षा विभाग हाथ धोकर पीछे पड़ा है कि “जब बात पढ़ाई की है, तो तुम बीच में क्यों आ रहे हो?” इसी रस्साकशी में दोनों विभागों के माननीय मंत्रियों और साहबों (सचिवों) के बीच ऐसी तीखी बहस हुई कि लगा मानो “तुम डाल-डाल, तो हम पात-पात!” सीएस साहब भी इस सिरदर्द से तंग आकर फाइल सीधे मुख्यमंत्री दरबार में सरका चुके हैं कि “प्रभु, अब तुम्हीं नैया पार लगाओ।” इधर इस जंग में नया मोड़ तब आया जब महामहिम (राज्यपाल) ने भी हस्तक्षेप कर दिया कि आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों को मर्ज करने से पहले थोड़ा सोच-विचार कर लो, वरना “लेने के देने पड़ जाएंगे।” करोड़ों के बजट वाले इन स्कूलों के संचालन पर मचे इस घमासान को देखकर तो रहीम दास जी भी यही कहते:

“कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत…”

खैर, जब तक मुख्यमंत्री जी का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक साहब लोग एक-दूसरे को फिल्मी अंदाज में यही गा रहे होंगे—“तुझको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ!”

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अकादमी में गूंजा राग

आजकल साहबों को ट्रैनिंग देने वाली अकादमी में नए-नवेले अफसरों को सुशासन और नीति-नियम सिखाने के अलग ही अनूठे प्रयोग चल रहे हैं। हुआ यूं कि एक रिटायर्ड सीनियर आईएएस साहब को युवा प्रशिक्षुओं को बेहतर प्रशासन और लीडरशिप के गुर सिखाने के लिए आमंत्रित किया गया था। युवा अफसर भी डायरी-पेन लेकर पूरी तैयारी से बैठे थे कि आज प्रशासनिक बारीकियों का अमृत मिलेगा, लेकिन साहब तो किसी और ही मूड में मंच पर पधारे थे। साहब ने माइक संभालते ही प्रशासन की नीरस फाइलों को दरकिनार कर सीधे संगीत का सुर छेड़ दिया! बात शास्त्रीय संगीत और राग-रागिनियों से शुरू होकर सीधे बॉलीवुड के बदलते गानों के ट्रेंड पर जा पहुंची। सामने बैठे भावी नीति-निर्माता बस सिर खुजलाते रह गए कि “दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन…” पर वक्ता महोदय इतने सीनियर थे कि किसी की बीच में टोकने की हिम्मत ही नहीं हुई। सब परम धैर्य से साहब का ‘राग’ सुनते रहे। वैसे कहा भी गया है – “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ…”

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लिफाफा क्या बंद हुआ, साहब की ‘वर्दी’ ही टंग गई!

हाल ही में आईपीएस में प्रमोशन के लिए डीपीसी की बैठक बैठी, तो एक साहब का नाम सूची में सबसे ऊपर, यानी नंबर वन पर चमक रहा था। साहब और उनके सिपहसालार मान चुके थे कि अब तो कंधे पर आईपीएस (IPS) के सितारे चमकने ही वाले हैं। अखबारों में सुर्खियां तैर गईं, वॉट्सऐप ग्रुप्स बधाई संदेशों से पिंग-पिंग करने लगे और साहब के फोन पर घंटियों का ऐसा तांता लगा कि लगा मानो साक्षात कुबेर जी ने डायरेक्ट कॉल कर दिया हो। साहब भी मंद-मंद मुस्कुराते हुए बधाइयां बटोर रहे थे। कबीरदास जी शायद ऐसे ही मौकों के लिए लिख गए थे:“झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद…” पर अफ़सोस, साहब प्रशासनिक चक्रव्यूह के उस अदृश्य तीर को नहीं देख पाए जिसे विभागीय जांच कहते हैं। दो-तीन दिन बाद जैसे ही डीपीसी के आधिकारिक मिनट्स बाहर आए, सारा मुगालता कपूर की तरह उड़ गया। पता चला कि जांच के चलते साहब का नाम ‘बंद लिफाफे’ में ही कैद रह गया। फिल्मी गानों के शौकीन साहब के कान में अब एक ही धुन बज रही होगी: “अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का…” चूंकि अगले साल साहब 56 वर्ष के हो रहे हैं, इसलिए आईपीएस अवार्ड होने की संभावना अब शून्य हो चुकी है। साहब को अब गीता के इसी ज्ञान के साथ संतोष करना पड़ेगा—कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। कर्म तो (जांच वाले) हुए ही थे, फल की इच्छा अब छोड़ ही दें तो बेहतर। हालांकि उनका लिफाफा बंद होने से एक अन्य जूनियर साहब की किस्मत चमक गई। उन्हें साहब की जगह आईपीएस अवार्ड हो गया है।

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