The Insiders: कैबिनेट सचिव के नोट से खुली मैराथन मीटिंग्स की पोल, सीनियर आईएएस की सनक से कर्मचारी परेशान, सबसे अमीर मंत्री की कमिश्नर संग जुगलबंदी
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें अफसरों का जमीन और मीटिंग्स प्रेम
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल| उज्जैन की पवित्र क्षिप्रा नदी के तट पर जहां कभी अमृत की बूंदें छलकी थीं, आजकल वहां जमीन के टुकड़ों पर सियासी राल टपक रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर लगे भू-घोटालों के आरोपों ने मध्य प्रदेश की राजनीति में महाभारत की नई स्क्रिप्ट लिख दी है। यह स्क्रिप्ट किसने लिखी या पीठ में खंजर किसने घोंपा, ये बातें अब आम हो चुकी हैं। और यह भी कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का पर्चा लीक हुआ था और अब सीएम के बहाने भाजपा का पर्चा लीक हो गया। यानी शह और मात किसकी, यह आप अपने ड्राइंग रूम में चर्चा कीजिए। हम इससे इतर बात कर रहे हैं नेताओं और आईएएस अफसरों के उस ‘जमीन-प्रेम’ की, जो लैला-मजनू के इश्क से भी गहरा है।
वैसे तो ईशावास्योपनिषद कहता है—“मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” (किसी के धन या जमीन का लोभ मत करो)। लेकिन हमारे आधुनिक यदुवंशियों का नया नारा है—“ये खेती, ये प्लॉटिंग, ये फाइलें… सब मेरे लिए ही हैं!” साहब की कलम और मंत्री जी के आशीर्वाद से मामूली जमीन भी सोना बन जाती हैं और रातों-रात वीआईपी कॉलोनियों के नक्शे में बदल जाती है। जमीन की यह वैश्विक मोहब्बत नई नहीं है। सिकंदर भी पूरी दुनिया जीतने निकला था, पर अंत में कहां गया? आज यूक्रेन से लेकर गाजा तक जो बारूद बरस रहा है, वह भी इसी मिट्टी के टुकड़े की तो जिद है। मशहूर विचारक टॉलस्टॉय ने अपनी कहानी में पूछा था— ‘एक आदमी को कितनी जमीन चाहिए?’ अंत में उस लालची इंसान को सिर्फ छह फीट जमीन ही नसीब हुई।
महाकाल के दरबार में बड़े-बड़े राजा आए और मिट्टी में मिल गए। फिलहाल, जनता हंसते हुए सोच रही है कि काश! नेताओं की यह भूख थोड़ी कम होती, तो आम आदमी को सिर छुपाने के लिए दो कमरों का मकान सस्ता मिल जाता। पर साहेब, यह मध्य प्रदेश है, यहां जमीन हिलती नहीं, बल्कि जमीनें बड़े-बड़ों के पैर हिला देती हैं! अगर इतना पढ़कर आप बोरियत महसूस कर रहे हैं, तो चलिए शुरू करते हैं आज का ‘द इनसाइडर्स’… पढ़िए और गुदगुदाइए!
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30 साल का अनुभव या एक ही अनुभव 30 सालों तक दोहराया
लो साहब, दिल्ली के गलियारों से लेकर हमारे मध्य प्रदेश के मंत्रालय (वल्लभ भवन) तक इन दिनों कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन का एक बेहद कड़क नोट चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने हुक्मरानों को आईना दिखाते हुए एक ऐसा चुटीला सवाल दाग दिया है, जिसने कई सीनियर अफसरों की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। कैबिनेट सचिव ने पूछा है—“हमें सिविल सर्विस में सचमुच 30 साल का शानदार अनुभव चाहिए या फिर सिर्फ एक साल का घिसा-पिटा अनुभव, जिसे 30 बार दोहराया गया हो?” उन्होंने मीटिंग की टाइम-पास संस्कृति को बदलने के लिए बाकायदा 10 पन्नों की एक ‘गाइडबुक’ जारी की गई है, जिसमें मीटिंग करने का क..ख..ग सिखाया गया है। अब जरा इस गाइडबुक के बहाने अपने मध्य प्रदेश के अफसरों के मिजाज को भी देख लीजिए। हमारे यहां भी मंत्रालय में बड़े साहब समेत कुछ साहबों को सुबह से शाम तक सिर्फ लंबी-लंबी मैराथन बैठकें करने का गजब का चस्का है। कई बार तो फाइल पर एक छोटा सा फैसला लेने के लिए इतनी मीटिंग्स हो जाती हैं कि फैसला आने से पहले फाइल ही बूढ़ी हो जाती है। इस नई गाइडबुक में साफ लिखा है कि जो काम एक छोटे से ईमेल, फोन कॉल या वॉट्सऐप मैसेज से हो सकता है, उसके लिए पूरी फौज को कुर्सी तोड़ कर बैठने की कोई जरूरत नहीं है। यही नहीं, इसमें यह भी ज्ञान दिया गया है कि अगर कोई बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग हो, तो उसे छुट्टी के ठीक पहले या ठीक बाद वाले दिन बिल्कुल न रखें, क्योंकि आधे से ज्यादा साहब लोग तो वैसे ही ‘लॉन्ग वीकेंड’ के मूड में छुट्टी मार लेते हैं। गाइडबुक में सबसे मजेदार बात मातहत कर्मचारियों और बॉस के रिश्तों को लेकर कही गई है। इसमें लिखा है कि जब बड़े साहब मीटिंग बुलाते हैं, तो जूनियर अफसर बॉस इज ऑलवेज राइट के डर से सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते और ‘भेड़ चाल’ (हर्ड मेंटैलिटी) का शिकार हो जाते हैं। ऐसे में मीटिंग में किसी एक को ‘डेविल्स एडवोकेट’ (यानी जानबूझकर विरोध करने वाला) बनना चाहिए, ताकि सिक्के का दूसरा पहलू भी सामने आ सके। लेकिन साहब, हमारे मध्य प्रदेश के प्रशासनिक कल्चर में तो अगर किसी जूनियर ने बड़े साहब के सामने ज़रा भी डेविल्स एडवोकेट बनने की हिमाकत की, तो साहब उसका ऐसा आलोकित करते हैं कि वो सीधे लूप लाइन के किसी कोने में योग करता हुआ नजर आता है! अब देखना यह है कि दिनभर मीटिंग-मीटिंग का खेल खेलने वाले हमारे शौकीन अफसर इस प्रैक्टिकल सलाह को अपनी शाही लाइफस्टाइल में उतारते हैं या फिर लकीर के फकीर बनकर वही एक साल का पुराना तजुर्बा अगले 30 साल तक दोहराते रहते हैं!
वेजीटेरियन बूचड़ की हुई विदाई, ठेकेदारों ने ली राहत की सांस!
लो साहब, आखिरकार पानी से जुड़ी बड़ी और मलाईदार स्कीमों में काम करने वाले जैन साहब की विदाई हो ही गई। उनके जाने के बाद जैन निगम से एक जैन कम हो गया है। वैसे उनकी इस रवानगी से दफ्तर के बाबू तो ठीक, छोटे से लेकर बड़े ठेकेदार तक ऐसे झूम रहे हैं मानो कोई त्योहार आ गया हो। वैसे तो जैन साहब अपने खान-पान और रस्मों-रिवाजों से कक्के शाकाहारी थे, लेकिन जब बात ठेकेदारों से ‘मुद्रा’ वसूलने की आती थी, तो उनका दिल पत्थर का हो जाता था। पैसे ऐंठने के मामले में उनका रवैया ऐसा क्रूर होता था कि ठेकेदारों का दम ही निकल जाए, पर साहब को हर हाल में अपना हिस्सा चाहिए ही होता था। इसी बेरहम अंदाज की वजह से गलियारों में वे ठेकेदारों के बीच ‘वेजीटेरियन बूचड़’ यानी ‘शाकाहारी कसाई’ के नाम से बेहद लोकप्रिय हो चुके थे। अब जब साहब का पत्ता कट चुका है, तो पीड़ित ठेकेदार राहत की सांस लेते हुए कह रहे हैं—“चलो, देर से ही सही, इस शाकाहारी कसाई के चंगुल से तो मुक्ति मिली!”
सबसे अमीर मंत्री तबादला उद्योग में नियमों की बलि ली!
पिछले हफ्ते हमने बताया था कि ट्रांसफर उद्योग में इस बार महंगाई ने ऐसा रिकॉर्ड तोड़ा कि अच्छे-खासों के हाथ-पैर फूल गए। रेट इस कदर बढ़ा दिए गए कि मासूम कर्मचारी मन मसोस कर बैठ गए और एक स्टिंग में तो एक मंत्री जी का स्टाफ भी बकायदा कैद हो चुका है। अब जरा बाकी मंत्रियों के कारनामे भी सुनिए। सूबे के सबसे अमीर मंत्री जी ने तो इस सीजन में अपने विभाग के कमिश्नर साहब के साथ मिलकर वक्त से पहले ही ‘जमकर दीवाली’ मना ली। दोनों की जुगलबंदी ने नोटों की ऐसी गंगा बहाई कि सारे नियम-कायदे धरे के धरे रह गए। अंधाधुंध कमाई के चक्कर में नियमों को इस कदर धता बताया गया कि जूनियर अफसरों को सीनियर का प्रभार सौंप दिया गया और बेचारे सीनियर जूनियर के अंडर काम करने को मजबूर हो गए। यही नहीं, इस उद्योग में मानवीय संवेदनाओं को भी ताक पर रख दिया गया; कई अफसरों का तो रिटायरमेंट से ठीक पहले ही तबादला कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब जिन अफसरों के तबादले को महज एक साल ही हुआ था, उन्हें भी दोबारा बोरिया-बिस्तर समेटने पर मजबूर कर दिया गया।
आईएएस मैडम की शाही ठसक और मजलूमों की पेंशन पर ब्रेक!
चौथी मंजिल के बड़े साहब ने हाल ही में मजलूमों, बुजुर्गों और विधवाओं की महीनों से रुकी पेंशन न बंटने पर एक आईएएस मैडम की क्लास लगा दी। बड़े साहब ने तल्ख लहजे में आईना दिखाते हुए साफ कहा—“यदि आपको तीन महीने का वेतन न मिले तो कैसा लगेगा?” मगर साहब, मैडम के कान पर जूं रेंगती तो बात ही क्या थी! मैडम टस से मस नहीं हुईं, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि वे आईएएस हैं। यही वजह है कि मैडम की ठसक दफ्तर तक ही सीमित नहीं है; उन्होंने तो प्रशासनिक एकेडमी में ‘डायरेक्टर’ के लिए ईयर-मार्क्ड (आरक्षित) आलीशान बंगले पर भी अवैध रूप से कब्जा जमा रखा है। लाख कोशिशों के बाद भी मैडम बंगला खाली करने को तैयार नहीं हैं। वैसे, इस पूरे मामले ने सरकार की उस मंशा को भी उजागर कर दिया है जो चुनावी दौर में बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए बड़े-बड़े दावे करती है। हकीकत यह है कि इस जनहित वाले विभाग को खुद सचिवालय में लूप लाइन माना जाता है। तभी तो पूरे सूबे से नकारे और लूप-लाइन किए गए अफसरों को ठिकाने लगाने के लिए इसी विभाग में डंप कर दिया जाता है।
3 घंटे का योग सेशन, साहब की सनक से कर्मचारी परेशान!
एक सीनियर आईएएस साहब को आजकल एक अजीब और अनूठी धुन सवार है। साहब, मातहत कर्मचारियों को तीन-तीन घंटे की जबरन योग क्लास करवा रहे हैं। मजे की बात देखिए, दूसरों को सेहत का ज्ञान बांटने वाले साहब खुद इस कसरत से कोसों दूर रहते हैं, शायद यही वजह है कि वे खुद भारी-भरकम मोटापे का शिकार हैं। इसे कहते हैं—“पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे!” साहब की सनक यहीं खत्म नहीं होती; वे ट्रेनिंग देने के लिए 70 साले के बुजुर्ग रिटायर्ड प्रोफेसर की सेवाएं ले रहे हैं। अब इन प्रोफेसर के अकादमिक ज्ञान का तो नहीं पता, लेकिन प्रशासन का ‘क..ख..ग’ नहीं आता। नतीजा यह है कि कर्मचारी काम छोड़ दिनभर योग और थ्योरी के बीच पिस रहे हैं। वैसे, साहब जब वे ‘श्रम’ वाले विभाग में तैनात थे, तब भी वे खुद कड़ा श्रम करने से बचते थे। उनकी इन्हीं सनक भरी और अजीबोगरीब हरकतों की वजह से सरकार ने उन्हें लंबे वक्त से लूप लाइन में डाल रखा है।
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सीधी-साधी मंत्री जी को अफसर ने दिया जख्म
जहाँ एक तरफ सूबे के कई माननीयों ने इस तबादला सीजन में तबादला उद्योग के जरिए जमकर मलाई काटी, वहीं एक सीधी-साधी और शरीफ स्वभाव की मंत्राणी जी को इस मामले में अपनी ही अफसर से गहरा जख्म मिला है। हुआ यह कि मंत्री के विभाग की कमान संभाल रहीं एक अड़ियल आईएएस मैडम ने तबादलों की फाइल में ऐसा स्पीड ब्रेकर लगाया कि पूरे विभाग में नाम मात्र के ही ट्रांसफर हो पाए। बात सिर्फ तबादलों तक सीमित होती तो भी ठीक था; इन प्रशासनिक मैडम का रवैया विभाग के अन्य जरूरी और जनहित के कामों में भी बिल्कुल ऐसा ही अड़ंगेबाज बना हुआ है। वे हर फाइल पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। चूँकि मंत्री जी स्वभाव से बेहद शांत और सीधी हैं, इसलिए मामला अभी तक दबा हुआ है। गलियारों में चर्चा है कि किसी भी दिन मंत्री जी के मन का यह गुबार ज्वालामुखी बनकर बाहर आ सकता है। आईएएस मैडम शायद एक बात भूल रही हैं कि मंत्री जी भले ही खुद शांत दिखती हों, लेकिन उनके पिता अपने दौर के बेहद कद्दावर और नामी राजनेता रहे हैं। यानी राजनीति का क..ख..ग और दांव-पेच उन्हें विरासत में मिले हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि पिता का यह खानदानी राजनीतिक अनुभव किसी भी दिन आईएएस मैडम की सारी ठसक को मिट्टी में मिलाकर उन्हें चारों खाने चित कर सकता है। आख़िरकार—“शेर का बच्चा, शेर ही होता है!”
मरीज का इलाज करने वाले कलेक्टर साहब को पड़ी फटकार
सूबे के एक जिला हुकुम इन दिनों जमकर सुर्खियां बटोर रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारी बनने से पहले वे बकायदा एमबीबीएस (डॉक्टर) थे। हाल ही में कलेक्टरी के बीच उनके भीतर का डॉक्टर अचानक जाग उठा। साहब एक सरकारी अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे और खुद कुर्सी पर बैठकर मरीजों के पर्चे फाड़ने लगे। मरीजों को देखने का यह वीडियो जैसे ही वायरल हुआ, बड़े साहब ने इसे प्रशासनिक मर्यादा के खिलाफ मानते हुए कलेक्टर महोदय को जमकर फटकार लगा दी। वैसे, इन साहब का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी कम दिलचस्प नहीं है। यहां आने से पहले वे स्वास्थ्य विभाग की सबसे बड़ी योजना के सीईओ थे। चर्चा है कि साहब वहां ऐसा ‘रायता’ फैलाकर आए हैं कि अब दूसरों से समेटते नहीं बन रहा है। उस वक्त उनके कर्मचारी अस्पतालों के इम्पैनलमेंट के खेल में एक स्टिंग में भी फंसे थे, पर एक रसूखदार ‘कनेक्शन’ के कारण साहब बच निकले थे। अब देखना है कि इस नए वीडियो के बाद बड़े साहब उनका क्या इलाज करते हैं!
गॉसिप गैंग हो जाए सावधान, एक और लिस्ट है तैयार!
सूचियों और तबादलों के फेरबदल पर दिन भर ‘ज्ञान गंगा’ बहाने वाले और चाय की थड़ियों पर गॉसिप करने वाले ‘विशेषज्ञों’ के लिए एक ताज़ा और बड़ी सूचना है। गलियारों में सुगबुगाहट तेज है कि आईएएस अफसरों की एक और नई लिस्ट धमाका करने वाली है। धमाका कब होगा, इसकी टाइमिंग पर अभी संदेश है। हालांकि, अंदरखाने की खबर है कि इस बार की लिस्ट में एक-दो कमिश्नर, एक-दो कलेक्टर पर गाज गिर सकती है और कुछ के प्रभार में बड़ा हेर-फेर देखने को मिल सकता है। इतना ही नहीं, सबसे बड़ी हलचल तो पांचवीं मंजिल यानी मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में होने की चर्चा है, जहां किसी नई रसूखदार पोस्टिंग की तैयारी चल रही है। तो भाई, जो लोग पिछले सीजन की मलाई का हिसाब-किताब लगाने में मसरूफ हैं, वे अपनी कुर्सी की पेटी बांध लें। कयासों का बाजार एक बार फिर गर्म होने वाला है, क्योंकि ‘पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!’



