The Insiders: बड़े साहब जेन-जी के आगे नतमस्तक, सीनियर आईपीएस ने बड़े कप्तान को बनाया मोहरा; धाकड़ एसपी की आमद से दहशत, साउथ लॉबी को सीएम का कड़ा संदेश
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़िए जेन जी और अल्फा की वजह से नौकरशाही का बिगड़ा खेल
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | “यद् यद् आचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।”…श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कहता है कि श्रेष्ठ यानी बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं, लोग भी उसी का अनुकरण करती है। लेकिन अगर आप आज की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था को देखें, तो हमारे ‘माई-बाप’ अफ़सरों और नेताओं की बनाई इस परिपाटी को Gen-Z और Gen-Alpha ने पूरी तरह से उल्टा घुमाकर रख दिया है! अब सिर्फ़ सत्ताधारी दल ही युवाओं के आक्रोश से परेशान नहीं है, बल्कि हमारी रोबदार पुलिस और मुग़ल-ए-आज़म वाले अंदाज़ में हुकूमत चलाने वाली अफ़सरशाही भी दोधारी तलवार की धार पर खड़ी छटपटा रही है। मुकम्मल बानगी देखनी हो तो भोपाल का रुख कीजिए! भरी सड़क पर एक जेन जी युवती ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के गाल पर सनसनाता थप्पड़ जड़ देती है, और पूरी की पूरी ‘खाकी’ मूकदर्शक बनकर तमाशा देखने पर मजबूर हो जाती है। वजह? ऊपर से माननीयों का कड़ा हुक्म—“ मामले को तूल मत देना!”
असली चुनौती तो फ़ील्ड में तैनात उन अफ़सरों की है, जिन्होंने अभी तक सिर्फ़ निर्बाध, मनमाने और बिना किसी रोक-टोक के हुकुम चलाना ही सीखा था। अब जब उनका सामना इस नई जेनरेशन से हुआ, तो उनके हाथ-पांव फूल गए। जिन अफ़सरों की सुबह और शाम ‘WWW’ यानी वेल्थ (Wealth), वाइन (Wine) और वूमन (Women) के मोहपाश में डूबी रहती थी, और जो अपनी रियाया व मातहतों के साथ बातचीत की शुरुआत गरम मिज़ाज से करते थे, फिर कुछ पैसे मिलने थोड़े नरम पड़ते थे और अंत में अपने चुंगल में फंसे व्यक्ति को लूटने के लिए पूरी तरह बेशर्म हो जाते थे… अब उन साहिबों के पावर का भूत छिटक रहा है! वे बेबस होकर उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान साहब की इस मशहूर कव्वाली को अपने अंदाज़ में गुनगुनाने पर मजबूर हैं:
“सोचता हूँ कि वो कितने मासूम थे,
क्या से क्या हो गए देखते-देखते!
आते-जाते थे जो हुक्म बन के कभी,
वो हवा हो गए देखते-देखते…!”
साहिबों के लिए सबसे बड़ा डर यह है कि ज़रा-सी चूक हुई तो सोशल मीडिया रातों-रात उन्हें खलनायक बनाकर ट्रेंड करा दिया! हालाँकि, एक बात की तारीफ़ करनी होगी कि अफ़सरों और पुलिस ने अभी तक अपना आपा नहीं खोया है। शायद मसूरी के LBSNAA की ट्रेनिंग का असर है। हम तो ईश्वर से बस यही प्रार्थना और कामना करेंगे कि ‘WWW’ के हैंगओवर के बीच लगे इस सदमे से हमारे साहिब जल्द से जल्द उबर सकें! तो आइए, इसी चटपटे और चुभते अंदाज़ के साथ शुरू करते हैं आज का ‘द इनसाइडर्स’…
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जेन-जी के सामने बड़े साहब ने स्वीकारी अपनी अज्ञानता
बात जब जेन-जी की छिड़ी ही है, तो हमारे ‘बड़े साहब’ की एक ताज़ा नज़ीर भी सुन लीजिए! कुछ दिनों पहले साहब एआई (AI) पर आधारित एक कॉनक्लेव में मुख्य अतिथि बनकर भोपाल के एक निजी कॉलेज पहुंचे। वहाँ उनका सामना सीधे ‘जेन-जी’ के नौनिहालों से हो गया। अब नई पीढ़ी तो ठहरी नई पीढ़ी—साहब के मंच पर पहुँचते ही उन्होंने अपनी जेनरेशन के तेवरों के मुताबिक सवालों की बौछार कर दी! लेकिन दाद देनी होगी ‘बड़े साहब’ के धैर्य और संयम की। वे न तो अकड़े और न ही अफ़सरी का रोब दिखाया। बड़े ही शांत भाव से उन्होंने जेन-जी से मुस्कराकर माफ़ी मांगी और कहा—“भाई, मैं तो उम्रदराज़ हो चुका हूँ। टेक्नोलॉजी और एआई के मामले में ज़्यादा नहीं जानता। इसलिए बेहतर होगा कि आप ही लोग मुझे कुछ नया सिखा दीजिए!” साहब की इस सादगी और बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी अज्ञानता स्वीकार करने के अंदाज़ पर जेन-जी ने हॉल में जमकर तालियाँ बजाईं। और सच भी यही है—आज के दौर में जेन-जी से उलझने या उन पर बेवजह रोब झाड़ने के बजाय अगर उनसे ऐसा ही सार्थक संवाद कायम किया जाए, तो टकराव की नौबत ही नहीं आएगी!
बड़े कप्तान क्यों सठियाए?
बड़े कप्तान साहब की ईमानदारी की मिसालें तो ऐसे दी जाती थीं मानो वे साक्षात राजा हरिश्चंद्र के आधुनिक अवतार हों! उनका भोलापन भी कुछ ऐसा ही मशहूर था। लेकिन हाल ही में उन्होंने रिटायरमेंट की तारीख के लिए साहब सरकार से एक दिन अतिरिक्त (एक्स्ट्रा) माँग लिया। जबकि ऐसा कोई नियम अस्तित्व में नहीं था! हालाँकि, जब इस ‘मासूमियत’ के पीछे का असली खेल छनकर बाहर आया, तो वही पुरानी प्रशासनिक साज़िश और लालच सामने आया, जो नौकरशाही के गलियारों में आम है। दरअसल, एक दिन के इस हेर-फेर का गणित ऐसा था कि अगर यह साज़िश कामयाब हो जाती, तो एक नए अफ़सर को डीजीपी बनने की रेस में एंट्री मिल जाती और रेस में आगे चल रहे एक सीनियर का पत्ता साफ हो जाता! अब पूरे पुलिस महकमे में बस यही एक सवाल गूँज रहा है—आख़िर बड़े कप्तान साहब को किसी और के मोहरे में ढलकर क्या मिला? उनकी वह बरसों पुरानी सुचिता और राजा हरिश्चंद्र वाली ईमानदारी आख़िर कहाँ हवा हो गई? गलियारों में चुटकी लेते हुए लोग यहाँ तक कह रहे हैं कि साहब रिटायरमेंट से ठीक पहले सठिया गए हैं! ज़ाहिर है, पूरी नौकरी के दौरान साहब ने खाकी वर्दी की जो साख कमाई थी और जो बेदाग शोहरत हासिल की थी, वह महज़ ‘एक दिन’ के चक्कर में मिट्टी में मिल गई।
तुम प्रदेश को जानते ही कितना हो?
हाल ही में हुई एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की अंदरूनी ख़बर ने अफ़सरशाही के गलियारों में हलचल मचा दी है! वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए प्रदेश सरकार के मुखिया और ‘बड़े साहब’ प्रदेश के तमाम दिग्गज अफ़सरों के साथ समीक्षा बैठक ले रहे थे। इसी बीच एक प्रमुख सचिव महोदय प्रदेश में बोवनी के आँकड़े और अपनी बात रखने लगे। फिर क्या था… सरकार ने साहिब को बीच में ही टोकते हुए साफ़ लफ़्ज़ों में कहा—“पहले मेरी बात तो सुनो, अपना ही राग अलापने लगे!” और फिर तुरंत ही एक तीखा तीर छोड़ा—“तुम प्रदेश को जानते ही कितना हो?” असल में, प्रमुख सचिव महोदय ठहरे दक्षिण भारत के! बस इसी बात पर सरकार ने उनकी भौगोलिक पकड़ और कृषि ज्ञान पर सरेआम सवालिया निशान लगा दिया। तंज़ का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; बड़े साहब ने भी अपने ही ‘हमवतन’ एक कलेक्टर साहब को स्वामित्व योजना में ढिलाई बरतने पर जमकर फटकार लगा दी। वैसे तो बैठक में करीब 5-6 कलेक्टरों को अच्छी-खासी ‘क्लास’ झेलनी पड़ी। पर अब वल्लभ भवन से लेकर ज़िलों के हलकों तक चर्चा इस बात की नहीं है कि किसे फटकार पड़ी, बल्कि चर्चा इस बात पर गरमाई हुई है कि इन अफ़सरों के समीकरण आख़िर कहाँ गड़बड़ा गए? और अचानक मिली इस ‘डांट-फटकार’ के पीछे के असली सियासी और प्रशासनिक मायने क्या हैं!
सरकार है कि मानती नहीं!
जब सरकार को मालूम था कि जल्द ही दूसरी तबादला सूची भी निकालनी पड़ेगी, तब भी ज़िले में अदला-बदली का खेल खेल दिया गया। हुआ यूँ कि पूर्व पदस्थ कलेक्टर साहब को मंत्रालय बुलाकर नए कलेक्टर साहब की तैनाती कर दी गई। अब नए साहब ने ज़िले में आकर जैसे-तैसे जॉइनिंग की औपचारिकता पूरी ही की थी कि पता चला उनका शासन स्तर पर तय विशेष ट्रेनिंग कार्यक्रम का वक्त हो गया। लिहाजा, साहब पदभार संभालते ही सीधे ट्रेनिंग पर रवाना हो गए! नतीजा यह हुआ कि ज़िला पंचायत सीईओ को एक ही हफ्ते में दूसरी बार ज़िले की कमान का प्रभार संभालना पड़ा। अब वल्लभ भवन के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि जब नए अफ़सर को तुरंत ट्रेनिंग पर ही भेजना था, तो पुरानी कमान बदलने की ऐसी क्या जल्दबाज़ी थी?
सनकी एसीएस की मेहरबानी और ‘प्रदूषित’ सैटिंग
वैसे तो एक एसीएस (ACS) साहब नियमों का ऐसा पहाड़ा पढ़ाते हैं मानो साक्षात क़ायदे-क़ानून के रखवाले वही हों! पर जब बात किसी खास की आ जाए, तो तमाम नियम-कायदों को उठाकर ताक पर रख दिया जाता है। उनके इसी प्रदूषण की वजह से आज पूरे प्रदेश के उद्योगपति खून के आँसू रोने पर मजबूर हैं। किस्सा यह है कि साहब ने सरकार की प्रशासकीय अनुमति लिए बिना ही वल्लभ भवन में पदस्थ एक उपसचिव मैडम को बोर्ड में सचिव का अतिरिक्त प्रभार थमा दिया। अब मैडम को बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिला, तो वे भी बिल्ली का पूरा दूध दुहने के काम में मुस्तैदी से जुट गईं! आलम यह है कि मैडम ने वल्लभ भवन का रुख करना ही छोड़ दिया है और अब सीधे कंपनियों से ‘सैटिंग’ के खेल में व्यस्त हैं। मज़ेदार बात यह है कि जहाँ मैडम पर साहिब की ‘असीम अनुकंपा’ बरस रही है, वहीं इसी विभाग की एक अथॉरिटी के अध्यक्ष साहब के साथ सरेआम भेदभाव किया जा रहा है।
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प्रमोटी वन सेवा अफसरों पर बड़े साहब‘ की मेहरबानी
जैसा कि हमने पिछले हफ्ते खुलासा किया था कि नए बड़े साहब को राज्य प्रशासनिक सेवा (यानी हमारी हम्माल सेवा) का कामकाज बेहद रास आता है, जिसके चलते कलेक्टरी से लेकर कई अहम पदों पर प्रमोटी अफ़सरों के दबदबे की शुरूआत हो गई है। हालाँकि, हमारे इनसाइडर्स ने जब साहब के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड की पड़ताल की, तो एक और दिलचस्प राज़ फाश हुआ! साहब का यह प्रमोटी प्रेम कोई नया नहीं है, बल्कि उनके पूर्व विभागों से चला आ रहा है। जब साहब वन विभाग में तैनात थे, तब भी वे आरआर अफ़सरों के बजाय राज्य वन सेवा से प्रमोट होकर आए अफ़सरों को ही ज़िलों की फ़ील्ड पोस्टिंग में तरजीह दिया करते थे। एक इनसाइडर ने तो यहाँ तक बताया कि साहब की बनाई वह परिपाटी आज भी बदस्तूर जारी है। आलम यह है कि वर्तमान में राज्य वन सेवा के करीब 70 फीसदी अफ़सर ज़िलों में फ़ील्ड पोस्टिंग का लुत्फ़ उठा रहे हैं, जबकि सीधी भर्ती वाले आईएफएस अफ़सरों के हिस्से महज 30 फीसदी सीटें ही आई हैं! अच्छा है साहब की इस पहल से कम से कम पिछले बड़े साहब के समय हम्मालों के साथ हुआ भेदभाव कुछ हद तक कम तो हो ही जाएगा।
निष्क्रिय एसपी विदा, अब ‘धाकड़’ एसपी ने बढ़ाई मातहतों की टेंशन!
एक ज़िले में हमारे कप्तान साहब इतने आरामतलब और बिस्तरपसंद थे कि कभी-कभार ही घंटे-दो घंटे के लिए ऑफ़िस दर्शन देने की ज़हमत उठाते थे। बाकी पूरा दिन घर पर ही आराम फरमाना उनका मुख्य धर्म था। साहिब का आलस तो इस दर्जे का था कि कभी-कभी वे रिश्वत की रकम तक बटोरने के लिए हाथ-पाँव हिलाना मुनासिब नहीं समझते थे! उनकी यह हालत देखकर महकमे के लोग मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी कफ़न के मुख्य किरदारों—’घीसू और माधव’ को याद करने लगते थे। आख़िरकार, सरकार को दया आई और उसने ‘घीसू-माधव’ मार्का कप्तान साहब को वहाँ से विदा कर दिया। पर असली ट्विस्ट तो अब आया है—सरकार ने उनकी जगह एक बेहद तेज़ी-तर्रार एसपी साहब को कमान सौंप दी है! अब सबसे बड़ी आफ़त उन आलसी पुलिसकर्मियों की आई है, जो पुराने कप्तान साहब की सुस्ती के साये में खुद भी काम-काज भूलकर आराम फरमाने के आदी हो चुके थे। नए एसपी साहब की एंट्री होते ही पूरा महकमा हलकान है, क्योंकि अब साहब की नज़र से बचने के लिए उन्हें भी दिन-रात फ़ील्ड में दौड़ना-भागना पड़ रहा है!
आधिकारिक घोषणा से पहले ही लग गई जिला अध्यक्ष की नेम प्लेट!
जिस पार्टी के बारे में मशहूर है कि वहाँ आख़िरी वक्त तक परिंदा भी पर नहीं मार सकता और कोई जानकारी लीक नहीं होती, उसी पार्टी में ‘Gen-Z’ के युवाओं का अति-उत्साह अनुशासन पर भारी पड़ता दिख रहा है! माज़रा यह है कि भाजपा युवा मोर्चा के एक जिला अध्यक्ष पद की आधिकारिक घोषणा से पहले ही कोतमा विधानसभा क्षेत्र में दौड़ती एक चमचमाती काले रंग की स्कॉर्पियो कार पर ‘जिला अध्यक्ष, युवा मोर्चा’ का रौबदार बोर्ड टंग गया! अब गलियारों में सवाल उठने लगा कि जब पार्टी ने कोई आधिकारिक घोषणा ही नहीं की, तो किस आधार पर गाड़ी पर ‘जिला अध्यक्ष’ का बोर्ड चमकाया गया? दिलचस्प बात यह रही कि जब बाद में पार्टी की सूची जारी हुई, तो वाकई में नाम उन्हीं का निकला! अब लोग चटखारे लेकर कह रहे हैं कि आज की जेन-जी अफ़सरशाही हो या राजनीति, फ़ैसले से पहले नेम प्लेट तैयार रखने का हुनर सब सीख चुके हैं!



