The Insiders: नवरात्र में प्रमोटी अफसरों को मिली शक्ति, महिलाओं से टकरा गए एसपी साहब, रिटायरमेंट के बाद भी मंत्री को कट दिया, हुई साहब की वापसी
महिला आईएएस अफसरों को सप्तऋषियों ने समझाया, फिर भी जिद पर अड़ी..आधी रात को तबादला, जानिए इनसाइड स्टोरी
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | शक्ति का पावन पर्व नवरात्र। मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना और साधना का पर्व। इसके ठीक बाद अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व दशहरा है। द इनसाइडर्स के सभी सुधि पाठकों के लिए हमारी ढेरों मंगलकामनाएं कि देवी मां और विजयादशमी का यह पर्व आपके सभी मनोरथ पूर्ण करे। दुर्गासप्तशती में जगदंबा की महिमा गाते हुए कहा गया है:
“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
हमारे पाठकों में से अधिकांश चूंकि नौकरशाही के शीर्षस्थ पदों पर आसीन हैं, इसलिए वे पहले से ही उस ‘शक्ति’ से परिपूर्ण हैं जिसकी कल्पना भी आम आदमी आसानी से नहीं कर पाता। लेकिन अफ़सरशाही में सत्ता का नशा ऐसा है कि अफ़सर अक्सर भूल जाते हैं कि शक्ति का सही उपयोग संतुलन में है, वर्ना सत्ता के इस रंगमंच पर ‘पावर-फुल’ से ‘पावर-लेस’ होने में ज़रा भी देर नहीं लगती।
अब ज़रा ताज़ा बानगी देखिए! यही सरकार कल तक सीना ठोककर दावा कर रही थी कि उसके कार्यकाल में रिकॉर्ड संख्या में देवी स्वरूपा शक्तियां ज़िलों की कमान (कलेक्टरी) संभाल रही हैं। लेकिन नवरात्र के ही इस पावन अवसर पर, आधी रात को आदेश जारी कर दो-दो महिला आईएएस अफ़सरों—यानी साक्षात शक्ति स्वरूपा—को फील्ड से हटाकर वल्लभ भवन की लूप लाइन में पटक दिया गया। तब से ही सरकार की काम करने की संस्कृति पर सवाल उठ रहे हैं।
वैसे, इन महिला अफ़सरों का कसूर केवल इतना था कि वे हाल ही में आई फिल्म ‘हनुमान अंश’ के लोकप्रिय लोकगीत की तर्ज पर सरकार के खास कारिंदों से जिद कर गईं:
“जब जिद पे आ गई पार्वती, पार्वती, पार्वती…
समझाने पहुँचे सप्तऋषि, सप्तऋषि, सप्तऋषि…
काय जिद कर-रही, काय को हुमर-रही?
ऐसे वर के लाने, ऐसे वर के लाने…”
वे भी सरकार के नियमों के अनुरूप न होने वाले आदेशों को न मानने की जिद पर अड़ी थीं। लेकिन जैसे ही उनके सिर से जैनवाद का पुराना संरक्षण हटा, सत्ता ने बिना वक्त गंवाए, उनकी अनचाही विदाई का आदेश आधी रात को ही जारी कर दिया!
यानी संदेश साफ है—चाहे देवी हों या देव, अगर आप सर्वशक्तिमान आईएएस होकर भी सत्ता के आगे नतमस्तक होने के बजाय नियमों की ‘ज़िद’ पर उतरेंगे, तो आपको निस्तेज होने में देर नहीं लगती।
दुर्गासप्तशती का एक सूत्र कहता है—“सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातन”। पर हमारे प्रशासनिक तंत्र में यही सृष्टि, स्थिति और विनाश अब आधी रात के तबादले, कलेक्टरी और लूप-लाइन के फेर में सिमट कर रह गया है। शक्ति पाने की इस अंधी दौड़ में अफ़सर इतने तल्लीन हैं कि उनकी ज़िंदगी का असली शक्ति स्रोत यानी आत्मीय आनंद ही गायब हो चुका है।
नौकरशाही का यह दस्तूर पुराना है—कोई शक्ति पाता है, तो कोई शक्तिहीन होता है। पर याद रहे, नवरात्र के बाद दशहरा यही सिखाता है कि अहंकार और मनमानी की अति का अंत तय है। सत्ता का बैलेंस गड़बड़ाएगा, तो कुर्सी खिसकेगी और फिर ‘धड़ाम’ की आवाज़ भी उतनी ही ज़ोरदार होगी!
आइए, नवरात्र और दशहरे के इस माहौल में ‘द इनसाइडर्स’ के इस विशेष अंक में नौकरशाही के इसी ‘शक्ति-मोह’, उसके पीछे के छलावे और वल्लभ भवन के गलियारों की अंदरूनी जोड़-तोड़ की परतों को उघाड़ते हैं…
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सरकार की सांस्कृतिक चूक
महिला आईएएस अफ़सरों को मैदान से हटाने की धुनी में सरकार ऐसी रमी कि हड़बड़ी में एक और सांस्कृतिक चूक कर बैठी। नए निगम कमिश्नर की ताजपोशी तो हो गई, लेकिन अफ़सरशाही का स्थापित भूगोल ही बदल गया! कमिश्नर साहब प्रमोटी हैं—यानी पूर्व में राज्य सेवा से आए हुए, जबकि उसी बैच के एक सीधी भर्ती (RR) वाले साहब पहले से वहीं एक जूनियर पद पर विराजमान हैं। अफ़सरशाही की ग्रेडेशन लिस्ट चीख-चीखकर कह रही है कि RR वाले साहब सीनियर हैं, पर अब फरमान ऐसा निकला है कि सीनियर को अपने ही बैच के प्रमोटी के मातहत सलाम ठोकना पड़ेगा। पहले ऐसी अपवाद वाली नौबत आती भी थी, तो सीनीयॉरिटी का ख्याल रखकर RR वाले को प्रमोटी के ऊपर रखा जाता था। अब तक यह आदेश नहीं बदला है। इसलिए अब इसे सरकार की मासूम भूल कहें या अफ़सरशाही की चूक, पर गलियारों में ठहाकों के साथ बस यही चर्चा है—समय होत बलवान।
संस्कारधानी छोड़ राजधानी आ गए राम
हम्माल सेवा के जिस अफ़सर को राजधानी का निगमायुक्त बनाया गया है, उनके भी खूब चर्चे हैं। अफ़सर साहब जहाँ से आए हैं—यानी कि संस्कारधानी से—वहाँ एक पूर्व मंत्री व वर्तमान विधायक ने तो उन्हें साक्षात ‘राम’ की ही संज्ञा दे दी! माननीय ने यहाँ तक लिख दिया कि दशहरे के दिन संस्कारधानी के ‘राम’ का हरण हो गया। उधर सोशल मीडिया के पोस्टरों में अफ़सर की तस्वीर के साथ बड़े-बड़े अक्षरों में छपा है कि जबलपुर से ‘राम’ का ट्रांसफर भोपाल हुआ है। अब साहिब संस्कारधानी के राम थे या वल्लभ भवन के दुलारे, यह तो आने वाला वक्त बताएगा; पर इतना तय है कि रामजी की इस ‘राजधानी वापसी’ ने नौकरशाही के बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी सोच में डाल दिया है!
हम्मालों को भी मिलने लगी तरजीह
पूर्व में कलेक्टर की पोस्ट हो, निगम कमिश्नर हो या विकास प्राधिकरण—प्रमोटियों को खूब तवज्जो मिलती थी। पर नई रिजीम आते ही हर जगह हमारी हम्माल सेवा को खूब दुत्कार झेलना पड़ा। पूर्व बड़े साहब की आँखों पर ‘आरआर’ (RR) के प्रेम की पट्टी ऐसी बँधी थी कि उसके आगे उन्हें हम्मालों की मेहनत नज़र ही नहीं आती थी। पर अब प्रमोटी अफ़सर को भोपाल जैसे शहर में नगर निगम कमिश्नर का पद देना शायद उसी पुरानी परंपरा को जीवित करने जैसा है। यहाँ करीब 14 साल बाद किसी प्रमोटी अफ़सर के हाथ में कमान आई है, जबकि इससे पहले तो इस सेवा में ज्वाइंट कलेक्टर रैंक वाले को भी कमिश्नर बनने का मौका मिल जाता था। यानी उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में आरआर, प्रमोटी और हम्मालों में भेदभाव कम होगा, जिससे काबिल अफ़सरों की नई पौध फिर देखने को मिल सकती है। उधर संस्कारधानी से सीधे राजधानी के इस शानदार प्रमोशन पर उन्हीं के बैच के साथी ‘रावण’ की तरह ईर्ष्या में जल-भुन रहे हैं, जबकि जूनियर हम्मालों में जश्न का माहौल है कि उनके कैडर का एक अफ़सर इतने बड़े पद पर पहुँचा है—कम से कम उनके लिए भी आगे का रास्ता तो साफ हुआ!
भोपाल में इंतज़ार…
बात एक और हम्माल सेवा वाले साहब की है। इंदौर में लंबे समय से राज्य प्रशासनिक सेवा से आए अफ़सर ही बैठते आए हैं, पर ‘पुराने बड़े साहब’ ने अपने दौर में परंपरा तोड़कर वहाँ सीधी भर्ती (RR) वाले आईएएस को तैनात कर दिया था। अब नए निज़ाम में पासा फिर पलटा और इंदौर में दोबारा प्रमोटी अफ़सर की वापसी हो गई। हालाँकि, पुराने बड़े साहब ने भोपाल के विकास प्राधिकरण में आरआर वाले अफ़सर को बिठा रखा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इंदौर की तर्ज़ पर भोपाल प्राधिकरण में प्रमोटी साहबों का वनवास कब खत्म होता है और कब यहाँ भी प्रमोटी की वापसी का आदेश जारी होता है!
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आरआर के लिए एक और झटका
आरआर (RR) वाले आईएएस अफ़सरों को सरकार ने एक और करारा झटका दिया है। एक तरफ प्रमोटी को तरजीह दी गई, तो दूसरी तरफ सीधी भर्ती वाले नान-परफॉर्मिंग कलेक्टरों पर सीधे गाज़ गिरी। हालिया सूची में पाँच ऐसे कलेक्टर लूप लाइन भेजे गए, जो बहुत ही कम वक्त में कलेक्टरी से हाथ धो बैठे। वरना अब तक का दस्तूर तो यही था कि पहली कलेक्टरी पाने वाले आरआर अफ़सर को दूसरी कलेक्टरी ज़रूर बख्शी जाती थी। लेकिन इस बार इसके ज़िम्मेदार अफ़सर खुद ही हैं—दफ़्तर से दूरी और जनता के मुद्दों में अरुचि की शिकायतें आम थीं। सो, सरकार ने साफ संदेश दे दिया है कि केवल ‘आरआर’ का तमगा होने से कलेक्टरी पक्की नहीं मानी जाएगी। वैसे, कुछेक सुस्त कलेक्टरों को सुधरने की ‘मुहलत’ ज़रूर दी गई है। अगर साहब वक्त रहते न सुधरे, तो ज़ाहिर है कि जल्द आने वाली अगली तबादला सूची में उनका नाम भी मुकम्मल तौर पर दर्ज मिलेगा!
और हो गई डीपीसी
बात जब शक्ति साधना की हो रही हो, तो हम्माल सेवा के उस अफ़सर को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने अपनी शक्ति का गज़ब इस्तेमाल कर सीनियर बैच की ग्रेडेशन लिस्ट में ही सेंध लगा दी थी! इस ‘घुसपैठ’ पर राज्य प्रशासनिक सेवा के 2008 बैच में जमकर सिर-फुटौव्वल हुई। शुरुआत में जब कोर्ट का फैसला साहब के पक्ष में आया, तो 2008 बैच के अफ़सरों ने भी एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया। आखिरकार अपील में पासा पलटा और फैसला बदलते ही अटकलों पर विराम लग गया। इसके साथ ही आईएएस (IAS) प्रमोशन के लिए अटकी पड़ी डीपीसी (DPC) का रास्ता भी साफ हो गया और इसी हफ्ते पदोन्नति की मुहर भी लग गई। यानी नौकरशाही का पावर बैलेंस अब भी मुकम्मल बना हुआ है!
शक्ति को नाराज़ किया, एसपी की कुर्सी गई
हाल ही में एक ज़िले के कप्तान (एसपी) साहब को रातों-रात ‘सिंगल ऑर्डर’ जारी कर चलता कर दिया गया। ढिंढोरा तो यही पीटा गया कि सरकार के दौरे के दौरान ढिलाई बरतने की वजह से गाज़ गिरी है। लेकिन इनसाइडर्स की ख़बर छुपती कहाँ है! असली वजह छनकर बाहर आई तो पता चला कि साहब पर महिला पुलिसकर्मियों ने गंभीर आचरण संबंधी आरोप लगाए थे। यानी नवरात्र के इस मौसम में ‘शक्ति’ को नाराज़ करना साहब को बहुत भारी पड़ गया। पर इस पूरी घटना का सबसे मज़ेदार पहलू यह रहा कि सरकार ने मामले की नज़ाकत को देखते हुए वहाँ नई कप्तान के रूप में एक महिला एसपी की ही ताजपोशी कर दी। मकसद साफ है—कम से कम अब दोबारा कोई अफ़सर आचरण की ऐसी सीमाएँ न लांघ सके और ‘शक्ति’ का सम्मान बना रहे!
दया कुछ तो गड़बड़ है
अमूमन हफ्ते में एक बार मंगलवार को कैबिनेट बैठक का अघोषित नियम रहा है, पर नई सरकार में यह परंपरा बार-बार टूटती दिख रही है। पिछले हफ्ते तो सोमवार और गुरुवार को दो-दो बैठकें हो गईं! खैर, बैठकें एक हों या दो, फर्क तो काम-काज की रफ्तार से पड़ता है। लेकिन गुरुवार की बैठक ने एक और नई चर्चा को पंख दे दिए। बीते कुछ समय से दोनों डिप्टी सीएम की सरकार से अनबन की खबरें लगातार गलियारों में तैर रही थीं और वे रह-रहकर निगेटिव खबरों का निशाना बन रहे थे। सो, माहौल बदलने के लिए तय हुआ कि इस बार कैबिनेट के फैसलों की प्रेस ब्रीफिंग दोनों डिप्टी सीएम मिलकर करेंगे। लेकिन एन वक्त पर यह प्लान धरा का धरा रह गया और बाज़ी सरकार ने संभालते हुए खुद प्रेस ब्रीफिंग ले ली! बस फिर क्या था… इस अचानक हुए यू-टर्न ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में इस चर्चा को और हवा दे दी कि—दया, कुछ तो गड़बड़ है!
कागजखोर की हुई विदाई
जब बाघ इंसान को खाने लगे तो उसे आदमखोर कहते हैं। ठीक वैसे ही, एक निगम में पदस्थ एक जीएम साहब जब भारी मात्रा में ‘कागज’ (कमीशन) डकारने लगे, तो अफ़सरशाही में उनका नाम ही ‘कागजखोर’ पड़ गया! साहब का पूरा सेवाकाल ही विवादों से घिरा रहा। वीआरएस (VRS) लिया, फिर संविदा पर लौटे और पूरे निगम पर अपना शिकंजा कस लिया। आलम यह था कि साहब खुद ही सारा खेल चलाते थे और आईएएस अफ़सर कठपुतली बने अपना हिस्सा गिनते रहते थे। लेकिन एक नए कड़क आईएएस साहब ने इस पुरानी रिवायत को हवा में उड़ा दिया और संविदा रद्द कर जीएम साहब को सीधे घर का रास्ता दिखा दिया! हालाँकि, इन आईएएस महोदय की अपनी कार्यशैली भी कुछ कम सवालों के घेरे में नहीं है। इसलिए निगम के पीड़ित कर्मचारी भी आज मायूस होकर यही गुनगुना रहे हैं—“कोऊ नृप होइ हमें का हानि, चेरि छाड़ि अब होब कि रानी!”
और फिर मंत्री के यहाँ विजय पताका फहराई
एक अफ़सर साहब को मंत्रियों के दरबार में हाज़िरी बजाना बेहद पसंद है, और सेवा के बदले मिलने वाला मेवा चखने के तो वे पुराने आदी हैं! पूर्व में एक मंत्री जी का माल दबाने का तमगा मिलने के बावजूद एक नई-नवेली मंत्री साहिबा ने इन पर भरोसा जता ही दिया। साहब भी अपनी पुरानी आदत से मजबूर, सट्टेबाज़ों की तर्ज़ पर ‘खाईवाली’ के खेल में जुट गए। जब मंत्री जी को गड़बड़ी की भनक लगी, तो जाँच बैठाई गई और आरोपों की पुष्टि भी हो गई। फिर भी मंत्री जी ने समझदारी दिखाते हुए अफ़सर के रिटायरमेंट का इंतज़ार किया। जैसे ही साहब रिटायर हुए, बंगले के कर्मचारियों ने राहत की साँस लेते हुए कहा—चलो, बला टली! लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी था। रिटायर होते ही मंत्री जी को साहब की असली ‘काबिलियत’ का अहसास हो गया। आख़िरकार, अफ़सर भले ही बीच में अपनी कटमनी (खाईवाली) मार लेता था, पर मंत्री जी की झोली में पहुँचने वाला कट सबसे भारी और मोटा वही लाता था! सो, रिटायरमेंट के बाद साहब ने फिर से मंत्री जी के यहाँ अपनी विजय पताका फहरा दी है और पूरे हिसाब-किताब की कमान संभालकर मुस्तैदी से डटे हुए हैं।
