The Insiders: ‘यारों’ पर फिदा बड़े साहब, एसीएस का अधूरा होमवर्क और ध्वजारोहण में मंत्रीजी का त्याग!
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें स्वतंत्रता दिवस पर मंत्रियों के ध्वजारोहण के अनसुने किस्से।
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | 15 अगस्त 1947…वह ऐतिहासिक दिन जब मुल्क फिरंगियों की गुलामी की जंजीरें तोड़कर अपनी किस्मत का खुदमुख्तार (Tryst With Destiny) बना। शनिवार को समूचे वतन के साथ हम सबने भी जश्ने-आज़ादी का तिरंगा पूरे फख्र और धूमधाम से लहराया। जब पूरा देश देशभक्ति के तराने गुनगुना रहा हो, तो हमने भी सोचा कि एक दिन के लिए फाइलों, तबादलों और सत्ता के गलियारों की कानाफूसी को छुट्टी दे दी जाए। लिहाजा, शनिवार का नागा करके स्वतंत्रता दिवस की ढेरों मुबारकबाद के साथ आज इतवार की इस फुर्सत भरी सुबह हम फिर हाजिर हैं। वही बेबाक तेवर, वही गुदगुदाने वाला अंदाज़ और नौकरशाही से लेकर सियासत के बंद कमरों में पकने वाली सबसे लजीज खिचड़ी के साथ पेश है—‘द इनसाइडर्स’ का नया अंक!
तिरंगा फहराने में भी राजनीति के शिकार हुए मंत्रीजी
मध्य प्रदेश में रिवायत रही है कि 15 अगस्त पर मुख्यमंत्री राजधानी भोपाल में तिरंगा फहराते हैं, मंत्री अपने प्रभार वाले जिलों में सलामी लेते हैं और बाकी बचे जिलों में कलेक्टर साहबान रस्म निभाते हैं। लेकिन इस बार हुकूमत ने दरियादिली दिखाते हुए फरमान जारी किया कि मंत्रीजी जहाँ चाहें—यानी अपने गृह जिले में भी तिरंगा फहरा सकते हैं। अब छूट मिली तो लगा कि सब ऑल इज़ वेल रहेगा, पर सत्ता के गलियारों में बिना शह-मात के खेल कैसा! छूट के साथ ही ऐसा ‘सियासी रायता’ फैला कि मंत्रियों के बीच मनमुटाव की चिंगारियां फूट पड़ीं। सरकार ने जिले की बिसात पर ऐसा पासा फेंका कि एक कद्दावर मंत्रीजी को उनके ही अपने गृह जिले से बेदखल कर दूसरा जिला थमा दिया गया। जले पर नमक यह कि उन्हीं के गृह जिले में दूसरे माननीय मंत्रीजी को मंच और सलामी सौंप दी गई! सियासी पंडित चुटकी ले रहे हैं कि कद्दावर साहब को उन्हीं के घर में घेरने और कद नापने का यह तरीका बेहद नायाब था। मंत्री जी मालवा से आते हैं और हम उनके लिए कहेंगे –
“अपनों ने ही लूटा, गैरों में कहाँ दम था,
हमारी कश्ती वहाँ डूबी, जहाँ पानी कम था!”
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मंत्री की मनचाहे जिले में ध्वजारोहण की जिद
स्वतंत्रता दिवस पर ज़िलों के बँटवारे का सबसे दिलचस्प और चटपटा ड्रामा तो राजधानी भोपाल में देखने को मिला। राजधानी में खुद सरकार ध्वजारोहण करते हैं, तो लाज़मी था कि भोपाल के दोनों माननीय मंत्रियों को बाहर का रुख करना था। एक मंत्रीजी बेहद चतुर निकले; उन्होंने वक्त की नज़ाकत को भाँपा और तुरंत जुगाड़ बिठाकर राजधानी से बिल्कुल सटा पड़ोस का ज़िला अपने नाम अलॉट करा लिया। वहीं दूसरी माननीय मंत्री महोदया आराम फरमाती रहीं। जब उनकी तरफ से कोई अर्ज़ी नहीं आई, तो सरकार ने राजधानी से सीधे 300 किलोमीटर दूर उनके प्रभार वाले ज़िले में झंडा वंदन का फरमान थमा दिया! जब लिस्ट जारी होने की नौबत आई, तब मैडम की नींद टूटी। फिर क्या था—सचिवालय से लेकर सत्ता के शीर्ष तक ताबड़तोड़ फोन घनघनाए गए! पड़ोस के विकल्प तलाशे गए, तो महज़ एक ज़िला खाली मिला, वो भी 140 किलोमीटर दूर। मैडम की ज़िद थी कि भोपाल वाले दूसरे मंत्रीजी को दूर भेजा जाए और पास वाला ज़िला उन्हें मिले। सरकार इस अदला-बदली की शर्त पर तैयार नहीं हुई, तो आनन-फानन में एक तीसरे नेकनीयत मंत्रीजी को आगे किया गया। त्याग की मिसाल पेश करते हुए उन भले मंत्रीजी ने अपना गृह ज़िला छोड़ा, खुद दूर जाने को तैयार हुए और भोपाल से महज़ 40 किलोमीटर दूर वाला अपना ज़िला इन मंत्री महोदया की झोली में डाल दिया। तब जाकर सरकार के सामने खड़ा ईगो क्राइसिस टला। वैसे,अंदर की खबर है कि दो अन्य ज़िलों में भी झंडा फहराने को लेकर माननीयों के बीच ऐसी ही ज़बरदस्त खींचतान मची रही!
यारों की नगरी में खासमखास लॉबी!
बड़े साहब जब जंगलात मामलों के मुखिया थे, तब राजधानी से महज़ 50 किमी दूर यारों की नगरी वाले इलाके पर उनका उमड़ता प्रेम जगजाहिर था। कहने वाले तो यहाँ तक कहते थे कि इस मलाईदार इलाके में साहब की भी हिस्सेदारी है, हालांकि हम इस बात से बिल्कुल इत्तेफ़ाक नहीं रखते! लेकिन इस इलाके की लॉबी का रसूख देखिए—जिस ज़मीन को महकमा जंगल मान रहा था, उस पर अड़ने वाले एक सीनियर आईएफएस अफ़सर को रातों-रात लूप लाइन में रवाना कर दिया गया। यहाँ का इतिहास गवाह है कि जिसने भी इस इलाके की तरफ नज़र उठाई, चाहे वो पटवारी हो, एसडीएम, डीएफओ या एसडीओ—उसे तुरंत ‘नाप’ दिया गया। कहावत है-सैंया भए कोतवाल, अब डर काहे का! जब साहब का वरदहस्त हो, तो क़ानून और जंगल के कायदे तो फाइलों में ही दफ़न होने थे।
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कलेक्टरी वाली वसूली की आदत मंत्रालय में भी बरकरार
दो तहसीलों को तराशकर बने एक नए-नवेले ज़िले में कलेक्टरी काट चुके एक साहब ने आजकल मंत्रालय के गलियारों में ग़दर काट रखा है। सरकार की तो नेकनीयती है कि महकमों में अटके प्रमोशन फटाफट निपटाए जाएं और सबको तरक्की मिले, पर साहब ने इस सरकारी मंशा को अपनी मलाई का जरिया बना लिया है। ज़मीनों से जुड़े एक मलाईदार विभाग में संभागायुक्तों की जांच में जो कर्मचारी बेदाग साबित हो चुके हैं, उनके लिए मंत्रालय से महज़ एक औपचारिक क्लीयरेंस आर्डर निकलना बाकी है। इसी कागज़ के दम पर पदोन्नति का सील बंद लिफाफा’ खुलना है। तकनीकी तौर पर सब कुछ शीशे की तरह साफ़ है, लेकिन साहब की मेज़ पर फाइल आते ही पहिए जाम हो जाते हैं। साहब हर लिफाफे की कीमत वसूलने पर आमादा हैं। कहावत है—“गंगा गए तो गंगादास, जमुना गए तो जमुनादास!” पर साहब तो ज़िले से मंत्रालय आकर भी वसूली के पुराने हैंगओवर से बाहर नहीं निकल पाए हैं।
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एसीएस साहब बिना होमवर्क बड़े साहब की बैठक में आए
सूबे में इन दिनों मास्टर प्लान को लेकर चर्चाएं गरम हैं, खैर इसकी अंदरूनी कहानी फिर कभी। ताज़ा किस्सा इससे जुड़ी मेट्रोपॉलिटन कमेटी की अहम बैठक का है, जिसे खुद सबसे बड़े साहब ने तलब किया था। बैठक में नीति-निर्माण पर माथापच्ची होनी थी, लेकिन एक एसीएस साहब बिना किसी तैयारी के ही तशरीफ़ ले आए। जब बोलने की बारी आई, तो साहब अपने महकमे के उन्हीं पुराने घिसे-पिटे बिंदुओं को दोहराने लगे जो पहले से ही स्क्रीन पर चल रहे प्रजेंटेशन में दर्ज थे। उन्होंने अपने विभाग से संबंधित कोई भी नया सुझाव नहीं दिया। शायद साहब ने कैबिनेट सचिव की बैठकों से जुड़े उस हालिया कड़े पत्र को अपनी संस्कृति का हिस्सा नहीं बनाया है, जिसमें स्पष्ट सरकारी मीटिंग्स के बारे में दिशा-निर्देश थे। कहावत है—“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय!” जब इतने सीनियर साहब ही बिना होमवर्क किए सिर्फ प्रजेंटेशन की नकल पढ़कर इतिश्री कर रहे हों, तो नीचे वाले अफसरों से ठोस जमीनी विज़न की उम्मीद भला कैसे की जाए!
संविदा कंसल्टेंट के भरोसे होगी मेट्रोपॉलिट अथॉरिटी का भविष्य
सरकारी योजनाओं का हश्र क्या होता है, यह किसी से छिपा नहीं है; पर अफ़सरशाही की फ़ाइलें तो इसी पहिए पर घूमती हैं। मेट्रोपॉलिटन कमेटी और अथॉरिटी की पहले के किस्से में बताई गई हाई-प्रोफाइल बैठक में एक और हैरतअंगेज़ ‘मास्टरस्ट्रोक’ सामने आया। तय यह हुआ कि शहर के 20-30 साल आगे का डेवलपमेंट प्लान और विज़न तैयार करने के लिए अलग-अलग विभागों में संविदा पर रखे गए कंसल्टेंटों की खिचड़ी बनाई जाएगी। यह पूरी टीम नीति बनाने वाले राज्य नीति आयोग की निगरानी में काम करेगी। कायदे से जहाँ देश-विदेश के प्रख्यात नगर-नियोजकों (टाउन प्लानर्स), विषय विशेषज्ञों और अनुभवी वरिष्ठ आईएएस अफसरों के गंभीर इनपुट्स वाली किसी पेशेवर एजेंसी की ज़रूरत थी, वहाँ मामला जुगाड़ू संविदा कंसल्टेंट्स के मत्थे मढ़ दिया गया। बड़े साहब चुटकियों में फ़ैसले लेने और फाइलें निपटाने के लिए जाने जाते हैं, यह उनकी बड़ी खूबी है। लेकिन जब पूरे महानगर के भविष्य और बुनियादी ढांचे का सवाल हो, तो इतनी त्वरित गति की जगह थोड़ी दूरदर्शिता और सोच-विचार भी लाज़िमी था।
बुजुर्ग की शादी की अर्ज़ी! कलेक्टर साहब ने की हंसी-ठिठोली
जनसुनवाई में बैठे जिला हुकमों को कब किस अजब-गज़ब स्थिति का सामना करना पड़ जाए, इसका कोई सरकारी मैनुअल नहीं होता। ऐसी असहज स्थितियों के वीडियो अमूमन बाहर नहीं आ पाते, बशर्ते खुद ज़िला हुकुम यानी हमारे कलेक्टर साहब सोशल मीडिया पर ‘रीलबाज़ी’ के शौकीन न हों! एक ज़िले में कैमरे की चकाचौंध के बीच साहब की जनसुनवाई चल रही थी। एक बुज़ुर्ग अपनी भारी-भरकम समस्या की अर्ज़ी लेकर पहुंचे। कैमरे के सामने कलेक्टर साहब ने भरपूर सहृदयता और संवेदनशीलता दिखाई। साहब का इतना मीठा और अपनापन भरा अंदाज़ देखकर बुज़ुर्ग का हौसला सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने सोचा जब सरकार इतनी मेहरबान है, तो ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुराद भी यहीं पूरी करा ली जाए! बुज़ुर्ग ने तपाक से अर्ज़ी आगे बढ़ाई कि साहब, मेरी शादी करवा दीजिए! यह सुनते ही कलेक्टर साहब हलके से मुस्कुराए और रस्म अदायगी वाला आश्वासन देने लगे। बुज़ुर्ग ताड़ गए कि साहब उनकी मांग को महज़ हंसी-ठिठोली समझ रहे हैं। वे तुरंत बिफर पड़े और कैमरे के सामने ही डांटने के अंदाज़ में बोल उठे—“अरे हुज़ूर! यह कोई हंसने वाली बात नहीं है, गंभीर मसला है!” साहब चले थे सोशल मीडिया पर सुलझे प्रशासक की रील चमकाने, पर बुज़ुर्ग की शादी की मांग ने पूरे प्रशासनिक अमले की बोलती बंद कर दी। अब देखना यह है कि इस अर्ज़ी पर कौन सा विभाग बारात सजाने का टेंडर निकालता है!
प्रमुख सचिव बनना चाहते हैं गब्बर सिंह
अक्सर रिटायरमेंट के बाद पूर्व अफ़सरान क्लबों, शादियों या महफ़िलों में अपनी पुरानी ठसक चमकाने के लिए “व्हेन आई वाज़ कलेक्टर…” (जब मैं कलेक्टर था) का जुमला दोहराते नज़र आते हैं। यह तो समझ आता है, लेकिन मंत्रालय में एक वर्तमान प्रमुख सचिव (PS) साहब सर्विस में रहते हुए ही यह राग अलापने लगे हैं! लंबे समय तक लूप लाइन की धूल फांकने के बाद हाल ही में एक तकनीकी इंजीनियरिंग विभाग की मलाईदार कुर्सी पर काबिज़ हुए यह साहब आजकल अपने हर मातहत को यही ज्ञान पेल रहे हैं कि “जब मैं कलेक्टर था…”। अरे हुज़ूर! आप डायरेक्ट रिक्रूट (RR) आईएएस हैं, तो कलेक्टरी तो की ही होगी; इसमें ऐसा कौन सा चांद पर झंडा गाड़ दिया जो हर फाइल पर इसका ढोल पीटना ज़रूरी है? विभाग के गलियारों में चर्चा है कि साहब शायद यह जुमला फेंककर ‘शोले’ के गब्बर सिंह जैसा खौफ़ पैदा करना चाहते हैं कि—“यहाँ से पचास-पचास कोस दूर जब कोई बाबू सुस्ती दिखाता है, तो लोग कहते हैं चुपचाप काम कर, नहीं तो पीएस साहब आ जाएँगे!”
“तारीफ़ अपने आप की करना फ़िज़ूल है,
ख़ुशबू बता ही देती है कौन सा फूल है!”
लेकिन साहब के इन सनक भरे फैसलों और हर बात पर ‘कलेक्टरी का रौब’ झाड़ने की आदत से विभागीय इंजीनियर और कर्मचारी बुरी तरह हलकान हैं।
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व्हाट्सएप पर रिटायर्ड साहब का ‘क्रांतिकारी अवतार’ और प्रमोशन की लड़ाई!
रिटायरमेंट के बाद कुर्सी चली जाए, पर कुछ अफ़सरों के अंदर का लीडर कभी रिटायर नहीं होता। इन दिनों अफ़सरों के ऑफिशियल व्हाट्सएप ग्रुप में एक पूर्व साहब ने जबर्दस्त मोर्चा खोल रखा है। वे खुद को सेवारत अफ़सरों का सबसे बड़ा हमदर्द और मसीहा साबित करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं। मामला पदोन्नति से जुड़े एक नियम का है, जिस पर पूर्व साहब ने सीधे सरकार के फैसले पर सवालिया निशान लगा दिया है। ग्रुप में बाकायदा लंबा-चौड़ा ज्ञान बघारते हुए वे सभी अफसरों को शासन के खिलाफ अभ्यावेदन (रिप्रेजेंटेशन) देने के लिए उकसा रहे हैं। साहब ने तो यहाँ तक ऐलान कर दिया कि—“अभ्यावेदन का कानूनी प्रारूप तैयार है, जिसे भी सुझाव देना हो या मदद चाहिए, वो सीधे मुझसे संपर्क करे!” ग्रुप में जुड़े सेवारत अफसर मन ही मन मुस्कुरा भी रहे हैं और चटकारे भी ले रहे हैं।
“जब अपनी थी बारी, तब साधी थी चुप्पी,
अब कुर्सी गई तो सूझी वकालत की घुट्टी!”
कहावत है कि नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली! जब तक साहब खुद मलाईदार कुर्सियों पर बैठकर हुकूमत चला रहे थे, तब तो कभी मातहतों के हक और प्रमोशन के रोड़े याद नहीं आए। अब अचानक ‘खेवनहार’ बनकर कौन सी नई ज़मीन तलाश रहे हैं।
5-डे वीक बना 4-डे वीक और सूबा हुआ ‘अल्ट्रा-एडवांस’!
सरकार ने हर शुक्रवार को ‘जनविश्वास’ कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया है। जनता से सीधे जुड़ने की यह पहल वाकई सराहनीय है और हम इसका तहे दिल से स्वागत करते हैं। लेकिन इस नेक पहल का एक ऐसा ‘अप्रत्यक्ष चमत्कार’ सामने आया है जिसने सूबे को सीधे यूरोप के विकसित देशों की कतार में खड़ा कर दिया है!
दुनिया के चंद सबसे रईस और आधुनिक मुल्क इन दिनों प्रायोगिक तौर पर ‘4-डे वर्क वीक’ (हफ्ते में 4 दिन काम) का ट्रायल कर रहे हैं। हमारे मध्य प्रदेश ने बिना किसी कानून के यह उपलब्धि रातों-रात हासिल कर ली! अब ज़रा गणित समझिए—शनिवार और इतवार की आधिकारिक छुट्टी पहले से थी, और शुक्रवार ‘जनविश्वास’ की भेंट चढ़ गया। होता यह है कि अरेरा हिल्स और वल्लभ भवन के बड़े साहब जैसे ही ‘जनविश्वास’ के नाम पर काफिला लेकर दफ्तर से बाहर निकलते हैं, पीछे से छोटे साहब और मातहत कर्मचारी भी ‘विश्वास’ के साथ कुर्सियों से नदारद हो जाते हैं। नतीजा यह कि पूरे महीने में बमुश्किल 15-16 दिन ही सरकारी काम की बत्ती जलती है। सचिवालय में लोग चटखारे ले रहे हैं कि चलो, दफ्तरों में एसी का बिजली बिल तो बचेगा, भले ही दौरों के नाम पर सरकारी गाड़ियों के डीजल का बजट आसमान छू जाए! कायदे की बात तो यह है कि जनता के बीच जाने का जिम्मा उन अफसरों का होना चाहिए जो सीधे फील्ड पोस्टिंग में हैं। अरेरा हिल्स के नीति-नियंताओं को तो राजधानी में बैठकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) या ऑनलाइन तरीकों से निगरानी करनी चाहिए थी। पर जब शुक्रवार को ही वीकेंड का ‘वार्मअप’ शुरू करने का ऐसा शानदार सरकारी मौका मिले, तो भला राजधानी के एसी चैंबरों में कौन टिकना चाहेगा!



