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The Insiders: आरआरआर के शौकीन ‘जेन जी’ आईएएस, स्त्री 3 का ट्रेलर जारी, रसूख से रास्ता रोकते पूर्व आईएएस और दवा खरीदी के टेंडर की काली कमाई खपाते बेखौफ साहब

द इनसाइडर में इस बार पढ़िए ब्यूरोक्रेसी और सत्ता का कॉकरोचिया स्टाइल

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | सोशल मीडिया पर इन दिनों वायरल ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का मीम ट्रेंड महज मनोरंजन नहीं है। यह दरअसल आज की ‘जेन जी’ (Gen Z) पीढ़ी का वो तीखा डिजिटल चाबुक है, जिससे वे व्यवस्था की सड़ांध को सरेबाजार नंगा कर रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि एक तरफ इसी पीढ़ी के आम युवा मीम्स के जरिए इस व्यवस्था का मखौल उड़ा रहे हैं, तो दूसरी तरफ इसी उम्र के जो सबसे काबिल चेहरे आईएएस-आईपीएस बनकर आ रहे हैं, वे इसे सुधारने के बजाय इसकी सड़ांध को और गाढ़ा कर रहे हैं। आरआरआर फिल्म की तरह नई ब्यूरोक्रेसी का फलसफा अब आरआरआर यानी ‘रसूख, रील और रिश्वत’ तक सिमट गया है।

इस पीढ़ी की प्रशासनिक अराजकता देखनी हो तो जबलपुर का रुख कीजिए। वहां के एक नए-नवेले साहब ने ‘चेन ऑफ कमांड’ की धज्जियां उड़ाते हुए सीधे मंत्री जी के खिलाफ ही एसोसिएशन में शिकायत दर्ज करा दी। खुद के गिरेबान में झांकने की बजाय यह सोचते हैं कि हमारा एसोसिएशन बचा लेगा। इन ‘रील-वीर’ अफसरों को लगता है कि आईएएस का तमगा मिलते ही उन्हें सिंघम की तरह सीधे कैमरे के सामने नायक बनने का परमिट मिल गया है। यह आक्रामकता जनता के दुख-दर्द दूर करने के लिए नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम पर लाइक्स और अटेंशन बटोरने की ‘जेन जी’ वाली बीमारी है।

बात सिर्फ पब्लिसिटी की होती तो सिस्टम झेल जाता, मगर यहां तो बेलगाम लालच हावी है। नरसिंहपुर का हालिया घूसकांड इसका क्लासिक उदाहरण है, जहां एक एसडीएम मैडम का स्टेनो तीस हजार की रिश्वत लेते धरा गया। हैरान करने वाली बात यह है कि जिन मैडम के नाम पर यह सौदा हुआ, उनका चयन सीधे आईएएस के लिए हो चुका था। यानी वे देश के सर्वोच्च पद की दहलीज पर खड़ी थीं, फिर भी जाते-जाते ‘कलेक्शन’ का मौका नहीं छोड़ना चाहती थीं। यह तो वही बात हुई कि फाइव स्टार होटल का न्योता जेब में हो, फिर भी ढाबे से दो रोटियां चुराने की फिराक हो। ‘द इनसाइडर्स’ के गलियारों से साफ दिख रहा है कि कॉकरोच की तरह ही ये नए साहब भी हर नियम और लोक-लाज से बचकर निकलने का हुनर सीख चुके हैं। एसी कमरों में बैठी यह काबिल पौध आज उसी सड़ांध को और बदबूदार बनाने में मसरूफ है, जिसे उनकी ही पीढ़ी सोशल मीडिया पर एक्सपोज कर रही है। आज के लिए इतना ही.. और अब शुरू करते हैं आपको गुदगुदाने वाले द इनसाइडर्स के रोचक किस्से…

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रिटायर्ड एसीएस की दादागिरी

राजधानी की विस्परिंग पॉम कॉलोनी में इन दिनों एक एसीएस स्तर से रिटायर आईएएस की दादागिरी के किस्से गूंज रहे हैं। कॉलोनी से सटी जमीन पर जब खरीदारों ने नियमानुसार टीएंडसीपी और निगम से परमिशन लेकर निर्माण शुरू किया, तो साहब ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर डंपरों का रास्ता ही रोक दिया। मामला कोर्ट पहुंचा, तो खरीदारों को राहत मिल गई। अब खीझ में साहब एक अन्य पूर्व आईएएस जोड़ीदार के साथ मिलकर प्रशासन पर निर्माण तुड़वाने का दबाव बना रहे हैं। मगर साहब भूल गए कि जिनके घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं उछालना चाहिए। नियम कानून का पाठ पढ़ाने वाले इन साहब का खुद का रिकॉर्ड यह है कि 600 वर्गफीट की अनुमति के विपरीत इन्होंने 4 हजार वर्गफीट का आलीशान अवैध साम्राज्य तान रखा है। जब तक नौकरी में थे, तक भी नियमों को ठेंगा दिखाना इनकी आदत थी। रिटायरमेंट के बाद भी पावर के नशे में चूर ‘कॉकरोच’ प्रवृत्ति के ऐसे ही साहबों की वजह से सिस्टम आज भी कराह रहा है।

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कॉकरोचिया सड़ांध का केंद्र बना नया निगम मुख्यालय

तंगहाली से जूझ रहे नगर निगम की मैडम इन दिनों अपनी चमचमाती, महंगी हाइक्रॉस क्रिस्टा की सवारी को लेकर सुर्खियों में हैं। खुद के लिए ‘फाइव स्टार’ सहूलियत जुटाने वाली मुखिया का एक और तुगलकी फरमान अब पूरे निगम और जनता के लिए जी का जंजाल बन चुका है। मैडम ने आनन-फानन में बिना एसी और बिना फायर सेफ्टी सेंसर वाले अधूरे मुख्यालय में सभी दफ्तर शिफ्ट करा दिए। नतीजा यह है कि भोपाल के 46 डिग्री वाले टॉर्चर चैंबर में क्या अधिकारी, क्या कर्मचारी और क्या जनता—सब उबल रहे हैं। जब इतनी भयानक गर्मी बर्दाश्त से बाहर होकर दिमाग पर चढ़ती है, तो काम कराने आए फरियादी का भी भेजा भन्ना जाता है। मैडम, जब अपनी सवारी और अपने चैंबर निर्माण के लिए निगम का खजाना खुल सकता है, तो थोड़ी व्यावहारिक सहानुभूति इन कर्मचारियों के लिए भी रख लेतीं। रसूख और रील्स की भूखी ‘जेन जी’ ब्यूरोक्रेसी के ऐसे ही असंवेदनशील फैसलों से सिस्टम में कॉकरोचिया सड़ांध का जन्म होता है।

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हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या”

RRR (रसूख,रील और रिश्वत) से हटकर C SAT पीढ़ी का एक फक्कड़ बंजारा फकीर नुमा RR अफसर भी है। जो अपनी धुन में मस्त है। नवाचार शिष्टाचार और सदाचार उसके रग रग में बसा है । MANAGEMENT BY PERSUATION का यह महारथी टेक्नोलॉजी का उपयोग करके ई आफिस और सार्थक ऐप्प के जरिये अपने निगम को महीनों पहले ही पेपर लेस बना चुका है,पर बन्दा यहीं नहीं रुका। अब प्राइवेट  वाहनों का टेंडर निकाला तो उसमें जीपीएस की अनिवार्यता रखी ताकि निगम(शासकीय) वाहनों का दुरुपयोग न हों और लॉग बुक और जीपीएस हिस्ट्री के मैच होने पर ही पेमेंट हो। बन्दा ऐसे ही नहीं “बड़ेसाहब” की नाक का बाल बना हुआ है। हालांकि उनके इस नवाचार का क्रेडिट अपने पिछले अंक के प्रीफेस को नहीं देंगे, जिसमें हमने व्यंग के माध्यम से जीपीएस लगाने की बात कही थी। निसन्देह इस तरह के अधिकारी की तारीफ सभी को करनी चाहिए।

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विवाद आते रहेंगे, बस बैटिंग धुआंधार हो

2013 बैच के एक आईएएस साहब का मूल मंत्र है—विवाद आते रहेंगे, बस अपनी बैटिंग धुआंधार होनी चाहिए। दवा खरीदी वाले विभाग में भले ही बाकी सब निपट गए, लेकिन साहब टेंडर-दर-टेंडर खुद की ही कमाई का रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। इस काली कमाई को खपाने के लिए साहब ने जमीन को अपना सुरक्षित ठिकाना बनाया है।हाल ही में, गुराड़ी घाट में 50 अफसरों के समूह द्वारा खरीदी गई करोड़ों की जमीन में ये भी शामिल हैं। चालाकी देखिए, अपने संपत्ति विवरण में इन्होंने समूह की जगह इसे ‘सोल प्रॉपर्टी’ (एकमात्र संपत्ति) घोषित कर दिया। साहब का रसूख ऐसा है कि केंद्र सरकार ने इस पर पूछताछ तक नहीं की। इससे पहले एक प्रसिद्ध ‘धाम’ में भी इनका नाम खूब उछला था, जहां इनके कारनामों की गाज वहां के कलेक्टर पर गिरी, जबकि हकीकत में साहब ने वहां अपनी दो नंबर की कमाई खपाई थी। ऐसे ही बेखौफ और रसूखदार ‘कॉकरोचों’ से व्यवस्था अंदर ही अंदर खोखली हो रही है।

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स्त्री 3 का टेलर रिलीज, फिल्म अगले अंक में

‘द इनसाइडर्स’ के कॉलम में हमने कुछ समय पहले आपको ‘स्त्री’ फिल्म की तर्ज पर रात के अंधेरे में वसूली (शिकार) पर निकलने वाली एक सीएचएमओ (CHMO) मैडम की कहानी बताई थी। इसके अगले पार्ट यानी ‘स्त्री २’ में खुलासा हुआ कि इस वसूली के खेल में ‘सरकटा’ (सिविल सर्जन) भी बराबर का भागीदार था। फिर क्या था, विक्की (राजकुमार राव) की टोली और जना (अभिषेक बनर्जी) ने मिलकर इस रहस्यमयी ‘स्त्री’ को लोकायुक्त के हाथों रंगे हाथों ट्रैप करा दिया। भले ही सिनेमाघरों में अभी ‘स्त्री ३’ फिल्म न आई हो, लेकिन महकमे में मैडम की ‘स्त्री ३’ का खौफनाक ट्रेलर जरूर रिलीज हो चुका है। लोकायुक्त की कार्रवाई के बावजूद मैडम ने माननीय कोर्ट का सहारा लेकर अपनी पोस्टिंग फिर से उसी मलाईदार स्थान पर करवा ली है। रसूख और ढिठाई का यह कॉकरोचिया अंदाज वाकई बेमिसाल है। इस नई पारी में ‘स्त्री ३’ क्या गुल खिलाती है, ‘द इनसाइडर्स’ जल्द ही इसका पूरा ‘पिक्चर’ उजागर करेगा।

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धुआंधार पार्टनरशिप

देवास पटाखा फैक्ट्री कांड में अब एक माननीय सांसद जी और मुख्य सरगना मनोज विज की ‘धुआंधार पार्टनरशिप’ के चर्चे आम हैं। इस पूरे दर्दनाक प्रकरण में रसूख का ऐसा सुरक्षा कवच ताना गया कि सांसद जी को आंच तक नहीं आने दी गई। जांच और कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई, जिसका नतीजा यह है कि इसी बैकडोर सपोर्ट की बदौलत मुख्य सरगना जल्द ही कानून की गिरफ्त से बेदाग छूटकर बाहर आ जाएगा। कलेक्टर जैसे अधिकारी को छोड़कर, छोटे-मोटों को निपटाकर खानापूर्ति की गई। इसके आदेश में भी गलतियां की गई। यानी, जान से खिलवाड़ करने वाले इस गंभीर मामले में भी राजनीति और रसूखदार ‘कॉकरोचों’ की जुगलबंदी ने इंसाफ को पूरी तरह कुचल कर रख दिया है।

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क्या यह विदाई का संकेत है?

‘बड़े साहब’ के रिटायरमेंट को लेकर प्रशासनिक गलियारों में कयासों का बाजार अभी से गर्म है। सितंबर आने में भले ही वक्त हो, लेकिन सवाल हवा में तैरने लगे हैं कि साहब दिल्ली जाएंगे, घर बैठेंगे या उन्हें एक और एक्सटेंशन (सेवा वृद्धि) का तोहफा मिलेगा? उनकी मौजूदा कार्यप्रणाली और कड़क अंदाज को देखकर तो यही लगता था कि जैसे अगला एक्सटेंशन उनकी जेब में रखा हो। मगर हाल ही में बड़े साहब ने आनन-फानन में सभी मातहतों को अपनी सीआर (गोपनीय चरित्रावली) लिखने और लिखवाने का जो कड़ा निर्देश जारी किया है, उसने पूरी कहानी का रुख मोड़ दिया है। ब्यूरोक्रेसी के चतुर सुजान इसे साहब की विदाई का संकेत मान रहे हैं कि वे जाने से पहले सारे पेंडिंग काम निपटाना चाहते हैं। यानी, पर्दे के पीछे साहब को भी अहसास हो चुका है कि इस बार एक्सटेंशन की राह आसान नहीं है। ‘द इनसाइडर्स’ के गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि अगर ऐसे संवेदनशील फैसले समय से पहले लीक हो जाएंगे, तो साहब का रसूख और यह सिस्टम आखिर चलेगा कैसे!

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रंगीला राजा का यंग लेडीज क्लब

महिलाओं से भी ज्यादा कोई अगर महिलाओं का खयाल रख सकता है तो बस एक ही है मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला का अवतार यानी हमारे पानी से जुड़े विभाग का रंगीला राजा (चीफ इंजीनियर)। कुछ वर्ष पूर्व जैसे ही रंगीले राजा को विभाग प्रमुख की कुर्सी मिली और साहब ने प्रदेश भर के यंत्रियों को बैठक के लिए मुख्यालय बुला भेजा। फिर साहब के विधुर मन ने पसंद कर कर के युवा महिला कर्मचारियों और अधिकारियों को अपने कार्यालय में अटैच कर लिया। ऐसा नहीं है कि इनके कार्यालय में काम करने वालों की कमी थी लेकिन जो थे वो या तो पुरुष थे या फिर उम्रदराज सी थीं। अब जिन्हें अटैच किया उनमें कुछ के बच्चे छोटे थे तो साहब ने बाकायदा एक अफसर के कमरे को खाली कराकर उसे झूलाघर सा बना दिया। बच्चे के सोने से लेकर खेलने तक की सब व्यवस्था।

ये तो प्रस्तावना थी …फ़िल्म अब शुरू होती है।

रोज सुबह ऑफिस आते ही चपरासी से पहला बुलावा युवा महिला मंडली को। उसके बाद चाय नाश्ता सब साहब की तरफ से। और खूब सारी गप शप। द्विअर्थी बातों की भरमार। रंगीले की तो महारत ही है इन बातों की। कोई पुरुष कर्मचारी या वृद्ध महिला कक्ष में बुलाये नहीं जाते और यदि कभी आये तो खड़े खड़े ही रवाना। हाँ, रंगीला और उसका लेडीज क्लब बदस्तूर जारी रहता है। धीरे-धीरे स्थिति ये हो गई है कि साहब कक्ष में रहें न रहें लेडीज क्लब फुल स्विंग पर चलता रहता है और चपरासी के लिए घण्टी बजती रहती है। साहब विधुर हैं तो रोज एक महिला कि ड्यूटी होती है कि खुद के साथ साहब का भी टिफ़िन लाएं। इसके लिए बाकायदा रोस्टर भी बना हुआ है। साहब की बातें जो माने तो जितनी चाहे उतनी छुट्टी लो जब चाहो तब आओ और जो न माने तो डिंडोरी या अलीराजपुर जैसी इंटीरियर जिलों में भेजने की धमकी। कभी कभी इस जमघट के कुछ लोग साहब की हवेली पर भी पार्टी करते देखे गए हैं। हालांकि रंगीले की दो रूप हैं युवा महिलाओं के लिए दरियादिली और बाकीयों के लिए मक्खीचूस अधिकारी। (यह चर्चा अगले अंकों में करेंगे) वैसे, अब लोग कहने लगे है कि इस कार्यालय का नाम बदलकर महिला एवं बाल विकास विभाग की एक और विंग रख देना चाहिए।

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