The Insiders Special: रात की रोशनी हो गई प्रदूषित, पर्यावरण और सेहत के लिए गंभीर संकट
चकाचौंध में डूबे भारतीय शहर: उपग्रह अध्ययनों के चौंकाने वाले आंकड़े, अब भी नहीं संभलें तो रातों की नींद हो जाएगी गायब
सुदर्शन सोलंकी | स्रोत फीचर
बचपन की वे रातें भी कितनी पुरसुकून, मखमली और रेशमी हुआ करती थीं… मानो कुदरत ने अपने आंचल में सितारों के अनगिनत जुगनू टांक रखे हों। गांव में खुले आंगन या शहर में छत में बिछी चारपाई पर जब हम पीठ के बल लेटकर टकटकी बांधे आसमान को तकते थे, तो ठंडी हवा की मंद-मंद थपकियां पलकों पर ख्वाबों की चादर ओढ़ा जाती थीं।
उस गहरे, सुरमई अंधेरे में झिंगुरों की गूंजती झंकार किसी मीठे संगीत की तरह रूह में उतरती थी। आंगन के एक कोने में रखी लालटेन या ढिबरी की वह कांपती, मद्धिम लौ… जो मिट्टी की दीवारों पर परियों और किस्सों की परछाइयां उकेरती थी। अमावस की उस स्याह-काली रात में भी एक गजब का अपनापन और रूहानी सुकून था, जो आज के उजालों में कहीं नहीं मिलता। शहरों की भीगी सड़कों पर स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी में गिरती बारिश की बूंदें… लगता था जैसे आसमान से सुनहरी मोतियों की लड़ी बिखर रही हो।
मगर अफ़सोस, वक्त की रफ्तार ने उस रेशमी सम्मोहन को छीन लिया है। विकास की अंधी होड़ में शहरों ने कंक्रीट और कांच की ऐसी चादर ओढ़ ली है कि रात होते ही कृत्रिम रोशनी की तीखी, बेदर्द चकाचौंध आंखों को चुभने लगती है। जिस मद्धिम अंधेरे की गोद में कभी चैन की नींद और मीठे सपने पला करते थे, आज वह रोशनी के इस प्रदूषण में हमेशा के लिए गुम हो चुका है। हां आपने सही पढ़ा रोशनी का प्रदूषण। जैसे वायु प्रदूषित हुई, मृदा प्रदूषित हुई और जल भी। वैसे ही अब भारत समेत दुनिया अब गंभीर प्रकाश प्रदूषण की चपेट में है।
दरअसल, रोशनी या प्रकाश को प्रगति और विकास का प्रतीक माना गया है। लेकिन अंधकार पर विजय पाने की इस होड़ की एक भारी पारिस्थितिक और स्वास्थ्य सम्बंधी कीमत चुकानी पड़ रही है। आज प्रकाश प्रदूषण एक ऐसे संकट के रूप में उभर चुका है, जिसे फिलहाल भारत सहित दुनिया भर में प्रदूषण की श्रेणी में गंभीरता से स्वीकार नहीं किया जाता।
भारतीय शहरों की स्थिति
क्लाइमेट स्टार्टअप प्राणा एयर और उपग्रह अध्ययनों के अनुसार, दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हर रात कृत्रिम रूप से आलोकित आकाश तले जीवनयापन कर रही है। 2014 से 2022 के बीच दुनिया में रात के समय कृत्रिम रोशनी लगभग 16 प्रतिशत बढ़ी है।
भारत के महानगरों में रात का प्राकृतिक अंधेरा लगभग गायब हो चुका है। सामान्य प्राकृतिक रात की तुलना में:
– नई दिल्ली में रातें 61 गुना ज़्यादा चमकीली हो चुकी हैं।
– बेंगलुरु में 59 गुना, मुंबई में 52 गुना और इंदौर में 42 गुना अधिक चमक दर्ज की गई है।
– प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान यह चकाचौंध 91 गुना तक पहुंच गई थी, जो देश में सर्वोच्च स्तर है।
एलईडी का विरोधाभास
भारत में प्रकाश प्रदूषण के तेज़ी से बढ़ने की मुख्य वजह ऊर्जा-दक्ष तकनीकों का अनियंत्रित उपयोग है। ‘उजाला योजना’ के तहत देश भर में 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्ब वितरित किए गए और पिछले एक दशक में स्थानीय निकायों द्वारा 1.34 करोड़ से ज़्यादा नई सड़क बत्तियां (स्ट्रीट लाइटें) लगाई गईं।
हालांकि सोडियम वैपर लाइट की तुलना में एलईडी 8 गुना अधिक रोशनी देती है और बिजली बचाती है, लेकिन रोशनी का उपयोग बेहद सस्ता होने के कारण आवश्यकता से अधिक लाइटिंग की जाने लगी है। अर्थशास्त्र में इसे ‘जेवन्स विरोधाभास’ (Jevons Paradox) कहते हैं। जेवन्स विरोधाभास एक आर्थिक अवधारणा है। यह बताता है कि जब कोई उपकरण किसी संसाधन के उपयोग को अधिक कुशल बनाता है, तो उस संसाधन की कुल खपत कम होने की बजाय बढ़ जाती है। बेहतर दक्षता के कारण संसाधन का उपयोग सस्ता हो जाता है, जिससे समग्र मांग में भारी वृद्धि होती है। इसके अलावा, देश में मौजूद 35 करोड़ से अधिक वाहनों की हेडलाइट्स ने रातों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।
जैव-विविधता पर प्रहार
पृथ्वी पर जीवन का विकास 3.8 अरब वर्षों से 24 घंटे के प्रकाश-अंधकार चक्र (Circadian Rhythm) के तहत हुआ है। यदि यह गड़बड़ता है तो स्वभाविक है कि इसके असर भी होंगे।
प्रवासी पक्षियों पर असर: वर्ष 2024 में नवी मुंबई के नेरुल स्थित डीपीएस फ्लेमिंगो लेक में लगाई गई अत्यधिक चकाचौंध वाली एलईडी लाइटों के कारण हज़ारों किलोमीटर दूर से आए प्रवासी पक्षी दिशा भ्रमित हो गए और आसपास की इमारतों से टकराकर मर गए।
कीटों और परागण का नुकसान: रात्रिचर कीट (पतंगे, जुगनू) तेज़ रोशनी में भटककर अपनी ऊर्जा खो देते हैं। जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी के अनुसार, एलईडी लाइट वाले क्षेत्रों में कीटों के लार्वा की आबादी में 52 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे फसलों का प्राकृतिक परागण ठप हो रहा है।
मानव स्वास्थ्य
अंधेरा होते ही मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन नामक हार्मोन का स्राव करती है, जो गहरी नींद के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत करने और कैंसर कोशिकाओं को रोकने में भी भूमिका निभाता है। रात में एलईडी व स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 450–480 नैनोमीटर) मेलाटोनिन का बनना रोक देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने अत्यधिक रात्रि प्रकाश और नाइट-शिफ्ट वर्क को ‘संभावित कैंसरकारी’ (Group 2A) में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण शरीर की जैविक घड़ी में बाधा, मेलाटोनिन हार्मोन के कम उत्पादन और पशुओं पर किए गए शोध के आधार पर तय किया गया है।
भारत में नीतिगत शून्य
दुनिया के कई देशों ने इसे कानूनी रूप से नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइटों को ज़मीन पर फोकस न करके आसमान में रोशनी फैलाने पर 3 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना है और सफेद प्रकाश वाली लाइटों (3000K) पर प्रतिबंध है। दरअसल, 3000K यानी 3000 केल्विन तापमान पर कोई ब्लैक बॉडी ऐसा ही प्रकाश पैदा करती है। हैलोजन लैम्प की रोशनी इस तरह की होती है।
फ्रांस में रात 1 बजे के बाद दुकानों/दफ्तरों की बाहरी लाइटें बंद करना अनिवार्य है। जर्मनी में रिहाइशी इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज़ रोशनी प्रतिबंधित है।
भारत की स्थिति: वरिष्ठ पर्यावरणविदों के अनुसार, भारत में वायु, जल या ध्वनि प्रदूषण की तरह प्रकाश प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई विशिष्ट कानून या राष्ट्रीय नीति नहीं है।
समाधान
प्रकाश प्रदूषण का समाधान बेहद आसान है – रोशनी की दिशा सही करना और बेवजह की चकाचौंध को बंद करना। इसके लिए सिर्फ इतना करना होगा:
– डाउन-शिल्डेड लाइटें लगाई जाएं ताकि रोशनी केवल ज़मीन पर पड़े।
– वार्म सीसीटी (<2200K) वाली पीली रोशनी का उपयोग बढ़े।
– लद्दाख के हानले डार्क स्काई रिजर्व जैसी पहलों को बढ़ावा दिया जाए।
प्राकृतिक अंधेरा कोई अभाव नहीं, बल्कि हमारी पारिस्थितिकी का एक अमूल्य संसाधन है। यदि हमने समय रहते रोशनी के इस अतिरेक को नियंत्रित नहीं किया, तो हम न केवल आसमान के तारों को देखने से वंचित हो जाएंगे, बल्कि अपनी सेहत और जैव-विविधता की भी अपूरणीय क्षति कर बैठेंगे। (स्रोत फीचर्स)
डिसक्लेमर – स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य और खास खबर डॉट कॉम का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।



