द इनसाइडर्स वैचारिकी – IAS की कुर्सी से सियासत तक: कितना हकीकत, कितना कल्पनालोक है दिव्या मित्तल का सपना?
नई पार्टी और उत्तर प्रदेश चुनाव की घोषणा के बीच पूर्व सिविल सर्वेंट डॉ. विजय अग्रवाल ने दिव्या मित्तल के राजनीतिक आदर्शों, जमीनी अनुभव और बदलाव के दावों पर उठाए सवाल।

डॉ. विजय अग्रवाल | अंततः वही हुआ, जिसका मुझे अंदेशा था। 2013 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अफसर दिव्या मित्तल ने अगस्त में इस्तीफा दिया था और लगभग दो महीने बाद ही अपनी राजनीतिक पार्टी की घोषणा भी कर दी – जन नीति भारत पार्टी के नाम से। साथ ही उन्होंने यह घोषणा भी कर दी कि उनकी पार्टी अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ेगी और वे खुद सदर मिर्जापुर से खड़ी होंगी।
दिव्या मित्तल ने एक वीडियो में बाकायदा अपनी इस पार्टी की नीति के तीन स्तंभ बताए हैं। पहला यह कि नीतियाँ लोग बनाएँगे। दूसरा यह कि लोग अपनी जरूरत के हिसाब से नीतियाँ बनाकर उनकी निगरानी करेंगे और तीसरा यह कि सब कुछ पारदर्शी होगा।
मैडम मित्तल ने अपने जीवन के तेरह वर्ष प्रशासन को दिए हैं। वे देश की सर्वोत्तम सेवा के लिए चुनी गई थीं। हमारा संविधान; विशेषकर किसी भी सिविल सर्वेंट के लिए, एक धर्मग्रंथ की तरह होता है। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए, उनकी पार्टी के उद्देश्यों को सुनने के बाद मेरे मन में स्वाभाविक रूप से कुछ प्रश्न कुलबुलाने लगे।
पहला प्रश्न तो यही आया कि क्या उनकी पार्टी के उद्देश्यों और अब्राहम लिंकन द्वारा दी गई लोकतंत्र की परिभाषा में तनिक भी कोई अंतर है? क्या जो अन्य राजनीतिक पार्टियाँ हैं, उनके उद्देश्य मैडम मित्तल के उद्देश्यों से अलग हैं? और यदि इनका उत्तर है ‘नहीं’, तो फिर प्रश्न यह है कि वे पार्टियाँ ऐसा क्यों नहीं कर पा रही हैं? खासकर उत्तर प्रदेश; जहाँ से वे अपनी पार्टी का चुनाव में नेतृत्व करेंगी, वह तो इस तरह के आकाशीय आदर्शों पर राजनीतिक पार्टियों की प्रयोगशाला ही रहा है। क्या समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की घोषणाएँ उनके उद्देश्यों से अलग थीं? इन दोनों पार्टियों को जन का भरपूर समर्थन मिला। इनकी सरकारें भी बनीं। कई-कई बार बनीं। लेकिन उत्तर प्रदेश के लोगों का जीवन ज्यों का त्यों ही बना रहा।
दिव्या जी की भाषा काफी अच्छी है। लच्छेदार है। उपमाएँ और रूपक रोचक, प्यारे और आकर्षक लगते हैं। उनमें भावनाओं का तड़का भी है। लेकिन उनकी बातें भविष्य के प्रति बिलकुल भी आश्वस्त नहीं करतीं। मुझे नहीं पता कि उन्हें इस सच्चाई का आभास है या नहीं। न तो ज्वार का उठान ज्यादा समय तक टिकता है और न ही दूध का उफान। उन्हें देखना चाहिए कि कहीं वे अभी इसी तरह की मानसिकता के दौर में तो नहीं हैं?
दिव्या मित्तल वह पहली नौकरशाह नहीं हैं, जिन्होंने अपनी सेवा से त्यागपत्र देकर राजनीति में प्रवेश किया है। अजीत जोगी इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। कांग्रेस पार्टी की ओर से उन्हें नए छत्तीसगढ़ राज्य का प्रथम मुख्यमंत्री तक बनने का सौभाग्य मिला था, लेकिन वे क्या कर पाए, यह जगजाहिर है।
अरविंद केजरीवाल तो इसके सर्वोत्तम मॉडल कहे जा सकते हैं। नौकरी छोड़ी। फिर एक गैर-पंजीकृत एनजीओ बनाया। उसे नाम दिया ‘परिवर्तन’, अन्ना हजारे के आंदोलन में भागीदारी की। इस पृष्ठभूमि के साथ आम आदमी पार्टी (जो जन के ही करीब है) बनाई। चुनाव लड़े। जीते भी और जीतकर देश की राजधानी के मुख्यमंत्री भी बन गए। वे क्या कर पाए, यह जगजाहिर है। क्यों नहीं कर पाए, यह अध्ययन का विषय है।
फिर दिव्या मित्तल के पास न तो जन आंदोलन का अनुभव है और न ही जन कार्यों का। प्रशासन करना इसका एक छोटा-सा अंश मात्र है। ऐसी स्थिति में उनके आदर्श कितने फलीभूत हो पाएँगे, कम-से-कम मुझे तो इस पर कोई संदेह नहीं है। मुझे यह शब्दों के आडम्बर से बना राजनीति के एक कल्पनालोक से अधिक कुछ भी नहीं लगता।

डॉ. विजय अग्रवाल प्रख्यात लेखक, प्रशासनिक चिंतक एवं पूर्व भारतीय सूचना सेवा (IIS) अधिकारी हैं। वे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के निजी सचिव रह चुके हैं और 80 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं।



