The Insiders: मंत्री का निज सचिव प्रेम, इनकी गिनती करने का मिला चैलेंज; एक और आईएएस तैयार कर रहे शीशमहल, आईपीएस ने की काम से तौबा, मामा जी की लस्सी का चला जादू
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें नौकरशाहों की 'रीढ़ की हड्डी' के हाल! कहीं झुकी, कहीं टूटी और कहीं मलाई में डूबी, कुछ की स्टील जैसी फौलादी भी।
कुलदीप सिंगोरिया@9923510865
भोपाल | बीती 21 अप्रैल को पूरे देश में ‘सिविल सर्विस डे’ मनाया गया। यह वही दिन है जब आजाद भारत में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आईएएस अफसरों को ‘Steel Frame of India’ कहा था। सेवा का ध्येय वाक्य भी बड़ा भारी-भरकम रखा गया— योग: कर्मसु कौशलम् (काम में कुशलता ही योग है)। लेकिन आज के दौर में इस ‘स्टील फ्रेम’ की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। ‘द इनसाइडर्स’ ने अपनी आईएएस पर आधारित एक सीरिज में बार-बार बताया है कि कैसे इस सेवा के मूल्यों का पतन हुआ है। असलियत तो यह है कि पिछले कुछ सालों में आईएएस अफसरों की एक बड़ी फौज ने जनसेवा की बजाय ‘चोरी-चकारी’ को ही अपना धर्म बना लिया था। हर दूसरा साहब कुर्सी पर बैठते ही यह सोचने लगता था कि उसे तो अंबानी-अडानी ही बनना है। जिलों में विकास के पहिये थमे रहे, पर साहबों की तिजोरियों और संपत्तियों के ग्राफ रॉकेट की तरह ऊपर भागते रहे। भ्रष्टाचार का आलम यह था कि रसूखदारों के आगे नतमस्तक होना और जी-हुजूरी करना ही इन साहबों की नई काबिलियत बन गई थी। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा था:
सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।
अर्थात्, जब प्रशासन (सचिव) स्वार्थ या डर के मारे केवल वही बोलने लगे जो सत्ता को सुनने में अच्छा लगे, तो समझ लीजिए कि विनाश तय है। लेकिन, कहते हैं न कि रात कितनी भी काली हो, सुबह की एक किरण सब बदल देती है। हाल ही में घटी कुछ घटनाओं ने इस सड़ते हुए सिस्टम पर उम्मीद का मरहम लगाया है। जब राजधानी में ‘नारी शक्ति वंदन’ का बड़ा राजनीतिक आयोजन हुआ, तो हमेशा की तरह यह मान लिया गया था कि कलेक्टर और मैदानी अमला ही भीड़ और संसाधन जुटाएगा। पर इस बार एक सीनियर महिला आईएएस ने व्हाट्सएप पर सीधा मैसेज दाग दिया— “यह कार्यक्रम सरकारी नहीं है, इसलिए कोई भी कलेक्टर व्यवस्था न करे।” यह एक मैसेज उन तमाम साहबों के गाल पर तमाचा था जो अपनी कुर्सी बचाने के लिए राजनीतिक पार्टियों के ‘इवेंट मैनेजर’ बन जाते हैं। इसी तरह, एक और सीनियर आईएएस ने नगरीय निकायों की खस्ताहाल हालत को देखते हुए दो-टूक कह दिया कि स्वागत द्वारों पर जनता का पैसा फूंकने की जरूरत नहीं है। सरकार की नाराजगी का डर होने के बावजूद साहब ने अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखी। वहीं, जब एक विधायक ने युवा आईपीएस के खिलाफ बदजुबानी की, तो अतल गहराइयों में सोई ‘आईपीएस एसोसिएशन’ जाग उठी और आईएएस बिरादरी ने भी साथ आकर उसे आइना दिखा दिया। कुल जमा बात यह है कि अगर इस ‘स्टील फ्रेम’ में तनिक सा असली स्टील (ईमानदारी) वापस लौट आए, तो प्रशासनिक व्यवस्था फिर से खड़ी हो सकती है। बेशक कुछ लोग अंबानी बनने के चक्कर में पूरी सेवा को बदनाम कर रहे हैं, लेकिन इन मुट्ठी भर जांबाज अफसरों ने दिखा दिया है कि आज भी सिस्टम में ‘दम’ बाकी है। अगर ये अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, तो अंततः आम आदमी की ही जीत होगी। और अब शुरू करते हैं अपने जाने-पहचाने वाले अंदाज में आज का द इनसाइडर्स…
पूत के पांव पालने में दिखे
कहते हैं— “पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं।” एक कलेक्टर साहब को जिले की कमान संभाले अभी ‘जुमा-जुमा’ आठ दिन ही हुए हैं, लेकिन अपनी कार्यशैली से उन्होंने साफ कर दिया है कि वे केवल फाइलों के ही नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े अफसर हैं। भीषण गर्मी के बीच साहब ने कलेक्ट्रेट की ठंडी एसी में बैठने के बजाय बेजुबान पक्षियों की सुध ली और परिसर में मिट्टी के पात्रों (सकोरों) में पानी भरकर एक ऐसी ‘नेक’ पारी की शुरुआत की है, जिसकी चर्चा अब आम है। आमतौर पर जब नए साहब ज्वाइन करते हैं, तो महकमे में खौफ होता है कि साहब ‘सख्त’ होंगे या ‘नरम’। लेकिन साहब ने विश्व वसुंधरा दिवस पर हाथों में सकोरे थामकर अपनी स्टाइल खुद ही जगजाहिर कर दी। नेचुरल फार्मिंग, सेहत व जल संरक्षण की एक-एक बूंद का महत्व समझाते हुए साहब ने जब ‘योग’ की बात की, तो लगा कि वाकई ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ के ध्येय वाक्य को वे जिले की धरती पर उतारने आए हैं।
पिछला अंक पढ़ें – The Insiders: घूसखोर ‘स्त्री’ ट्रेप, आईपीएस का फरमान- ‘हंसना मना है’, आईएएस मैडम को ‘दीदी’ से एतराज, नीति पर चर्चाओं का बाजार गर्म
मंत्रियों के पीए: गिनती का खुला चैलेंज!
सुना था कि सेना की बटालियन होती है, पर यहाँ तो ‘माननीय उपमुख्यमंत्री’ जी के बंगले पर पीए (निजी सहायकों) की पूरी फौज तैनात हो गई है। आलम यह है कि एक दूसरे कद्दावर नेताजी के यहाँ पदस्थ अफसर ने बाकायदा ‘खुला चैलेंज’ दे डाला है कि— “मियां, कोई इनकी सही-सही गिनती करके तो दिखाए!” खबर है कि मंत्री जी के यहाँ करीब 40 से ज्यादा पीए ‘सेवा’ में जुटे हैं। अब ये क्या काम करते हैं, यह तो वही जानें, लेकिन गलियारों में चर्चा है कि ‘विधायक प्रतिनिधि’ की तर्ज पर अब एमपी में ‘मंत्री प्रतिनिधि’ कल्चर की धमाकेदार शुरुआत हो चुकी है।
मामाजी की लस्सी ने बचा ली बड़े साहबों की नाक
हमारे ‘मामाजी’ ने हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र में कृषि मेले का भारी-भरकम जलसा किया। पहले दिन जब भीड़ नहीं आई, तो दिल्ली से आए बड़े-बड़े ‘साहबों’ के माथे से पसीना बहने लगा। बड़े विजन वाले फेल हो गए, तब एक ‘अदने’ से स्थानीय अफसर ने ‘लाल बुझक्कड़’ स्टाइल में एक नुस्खा दिया— “साहब, फ्री में लस्सी बांटने का ऐलान कर दो!” पहले तो बड़े अफसरों ने त्योरियां चढ़ाईं, पर ‘मरता क्या न करता’। दूसरे दिन लस्सी का जादू ऐसा चला कि भीड़ का ‘रैला’ लग गया। मामाजी खुश हुए और उन बड़े साहबों की नाक कटने से बच गई, जो लस्सी के आगे अपना विजन भूल गए थे।
दिल्ली दूर है, पर ‘शीशमहल’ पास है!
इन दिनों दिल्ली में अरविंद केजरीवाल जिस नए बंगले में शिफ्ट हुए हैं, उसे भाजपा ‘नया शीशमहल’ बताते हुए फोटो जारी कर रही है। अब दिल्ली तो दूर है, हमें उससे क्या मतलब? लेकिन वहां हुई इस चर्चा का असर भोपाल के गलियारों में भी दिखने लगा है। लोग यहां भी एक सीनियर अफसर के घर में चल रहे काम को ‘शीशमहल’ से जोड़ने लगे हैं। ये साहब फिलहाल शहरों में प्रशासन करने वाले विभाग के आला अफसर हैं। साहब की कर्मठता पर कोई शक नहीं है— उन्होंने सफाई और पानी सप्लाई में लगे 25 दिन वाले दिहाड़ी मजदूरों को निकालकर सरकार के 80 करोड़ रुपए बचाए हैं। तो साहब का हक तो बनता ही है कि अपने सरकारी बंगले को शीशमहल जैसा बनवा लें। इनसाइडर्स बता रहे हैं कि इसमें पत्थर से लेकर हर चीज इतनी महंगी है कि आंखें चुंधिया जाएं। वाह साहब! गरीबों की दिहाड़ी की बलि और अपने लिए ‘नूरानी’ कोठी!
भेल की जमीन: ‘नंबर टू’ की नजर और ‘इनसाइडर्स’ की मुहर
जब सारी दुनिया सो रही थी, तब हमने आपको बताया था कि ‘भेल’ की सोने जैसी कीमती जमीन पर देश के ‘नंबर टू’ उद्योगपति की तिरछी नजर है। अब राजस्व विभाग ने इसका प्रस्ताव भी तैयार कर लिया है। बड़ी सफाई से खबरें फैलाई जा रही हैं कि इससे सरकार और भेल को ‘मोटा फायदा’ होगा। हम भी कह रहे हैं कि फायदा तो होगा, पर सवाल वही है— ‘फायदा किसका?’ कहने को तो टेंडर-फेंडर का नाटक होगा, पर असलियत यही है कि ‘सौदा’ पहले ही हो चुका है। बस दुनिया ‘नेपोटिज्म’ और ‘क्रोनिज्म’ का एक और तमाशा देखेगी।
एसपी साहब की काम से ‘तौबा’
एक जिले में थानेदार महोदय अपने ‘रसूख’ के दम पर शराब, ड्रग्स और वसूली का धंधा चला रहे थे। एक मीडिया संस्थान ने स्टिंग किया तो पत्रकारों पर ही शामत आ गई। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो एसपी साहब ने ‘काम’ से ही तौबा कर ली। अब साहब कभी-कभार ऑफिस जाते हैं और पूरा सिस्टम ‘वेंटिलेटर’ पर है। साहब की फिलॉसफी बड़ी सीधी है— “जब ऊपर की ‘पत्ती’ नहीं मिल रही, तो काम की टेंशन क्यों लें?” विपत्ति के समय घर पर आराम फरमाना ही साहब की नई ‘सुरक्षा नीति’ है।
यूपी-बिहार पर पहला अंक पढ़ें – आईपीएस की जोड़ी दिल्ली चली, फंड की कमी तो वसूली के रेट दोगुने, बड़े साहब खुद ही बन गए ‘चारण’
हवा में तीर: ‘मियां’ अगली कप्तान क्या ‘खातून’ होंगी?
मौजूदा बड़े कप्तान साहब के रिटायरमेंट में अभी वक्त है, लेकिन ‘हवाई तीर’ चलाने वालों ने भोपाल स्टाइल में अफवाहें गर्म कर दी हैं। कहा जा रहा है कि इस बार ‘नारी शक्ति’ की वंदना करते हुए सत्ता किसी ‘खातून’ (महिला अफसर) को बड़ा कप्तान बना सकती है। तर्क ये भी है कि जिन मैडम की बात हो रही है, उनके भाई साहब अभी हाल ही में एक राज्य के ‘बड़े साहब’ (मुख्य सचिव) बने हैं। वैसे तो मामला 16 आने सच लग रहा है, पर हम तो यही कहेंगे कि सत्ता के शतरंज में ‘शह और मात’ का खेल अभी बाकी है!
मंत्रियों के दंगल में स्काउट्स का ‘राम नाम सत्य’!
सत्ता के गलियारों में इन दिनों ‘विभागीय दखलंदाजी’ का एक बेहद दिलचस्प और शर्मनाक अध्याय लिखा जा रहा है। किस्सा कुछ ऐसा है कि बजट किसी और का, जमीन किसी और की, लेकिन ‘चेयरमैन’ की कुर्सी पर कब्जा किसी और का! जी हां, स्कूल शिक्षा विभाग के करोड़ों के फंड पर पलने वाले स्काउट्स एवं गाइड्स के संगठन में एक ऐसा ‘सियासी बाईपास’ बनाया गया है, जिसने विभागीय मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। इस पूरे खेल में विभाग के ‘माननीय’ को पूरी तरह दरकिनार कर, ‘उच्च’ पद की धौंस जमाकर पड़ोसी विभाग के मंत्री जी को संगठन का अध्यक्ष बना दिया गया है। यानी— “कमाए कोई और, उड़ाए कोई और!” चर्चा है कि स्कूल वाले मंत्री जी इस ‘सियासी पटखनी’ से अंदर ही अंदर सुलग रहे हैं, लेकिन फिलहाल ‘अनुशासन’ की पट्टी आंखों पर बंधी है। हैरानी की बात तो यह है कि संगठन में सचिव की कुर्सी पर भी एक ऐसे साहब को बैठाया गया है, जिनकी उम्र भी इस सेवा की ‘एक्सपायरी डेट’ पार कर चुकी है। CMO तक इस बात की गूंज है कि नियमों को ताक पर रखकर आखिर किसके ‘वरदहस्त’ से यह मनमानी चल रही है। कुल जमा बात यह है कि स्काउट्स जैसा अनुशासित संगठन अब ‘दो मंत्रियों’ की ईगो और वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बन गया है।
अपनों ने ही मंत्री जी की ‘संपत्ति’ पर उठाया सवाल!
एक जिले में आयोजित सामूहिक विवाह सम्मेलन में शादियां तो हुईं, पर चर्चा ‘माननीय मंत्री मैडम जी’ की कार्यशैली की रही। मंच पर मंत्री जी अपनी ‘सरपंच बेटी’ के साथ विराजी थीं, लेकिन तभी इलाके के एक ‘पूर्व जननायक’ (पूर्व विधायक) का सब्र जवाब दे गया। उन्होंने सरेआम मोर्चा खोलते हुए मंत्री जी की ‘संपत्ति’ (प्रभाव) पर ही सवाल खड़ा कर दिया। आरोप जड़ा कि साहब! आपकी मेहरबानी से विकास के डेढ़ करोड़ रुपए वापस लौट गए। तंज गहरा था— लोग चुटकी ले रहे हैं कि जहाँ ‘नाम’ ही संपत्ति हो, वहाँ विकास की ‘संपत्ति’ (फंड) का वापस लौट जाना जनता के साथ बड़ा अन्याय है। पूर्व माननीय को मलाल यह भी था कि उन्हें ‘मंच’ पर बैठने तक की जगह नहीं मिली। तंज की सुई सीईओ साहब पर भी घूमी, जिन पर पुराने दिग्गजों को ‘नजरअंदाज’ करने का आरोप लगा। समझ लीजिए कि मंत्री जी के लिए अपनी सियासी ‘संपत्ति’ बचाना अब बड़ी चुनौती होगी।



