द इनसाइडर्स: शालीमार थैरपी में बन रही एमपी की एपस्टीन फाइल; सरकार की ‘कोठरी’ वाले नेता ने की ‘जमीनी’ धोखाधड़ी, यंग आईएएस ने ‘जैन कनेक्शन’ से बनाया कमीशनखोरी का सिंडिकेट!
द इनसाइडर्स में इस बार में पढ़ें यूपी व बिहार से आई नौकरशाही की खेप के पहले 11 साल की नौकरी की करतूतें
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | प्रवासी पक्षी और ख़ानाबदोश.. भाग-12… पिछले अंक में हमने भगवान राम का उदाहरण देते हुए उत्तर प्रदेश और बिहार से मध्यप्रदेश आने वाली सद्गुणी आत्माओं का जिक्र किया था। अब हम उन “कुछ” आत्माओं की चर्चा करेंगे, जो राहु की तरह मुख में अमृत और मस्तिष्क में विष लेकर मध्यप्रदेश आते रहे हैं। “प्रथम एकादशक”: इन कुछ लोगों के मध्यप्रदेश की ओर रुख करने का एक बड़ा कारण यह भी है कि यहाँ न सिर्फ उपजाऊपन है, बल्कि मूल निवासियों की ओर से कोई प्रतिरोध भी नहीं मिलता। यह सोच होना लाज़मी भी है, क्योंकि वे उन प्रदेशों से आए होते हैं जहाँ दो लाख के टेंडर के लिए गोली चलना आम बात है। किसी अमीर राजकुंवरी से विवाह कर, ससुर से अपनी UPSC/PSC की मेहनत का एकमुश्त ‘मुआवजा’ वसूलने वाले ये “ठग-पिंडारी” जब मध्यप्रदेश आते हैं, तो नौकरी के पहले 11 वर्षों में इनका हाव-भाव भीड़ से ठसाठस भरी ट्रेन में जगह बनाने की जद्दोजहद कर रहे यात्री जैसा होता है। इनका पहला प्रश्न हमेशा फिक्स होता है— “आप कहाँ के रहने वाले हैं और आपकी जाति क्या है?” मकसद साफ होता है— अपनी जाति और अपने प्रदेश के पहले से आए लोगों के कंधों पर पैर रखकर अपना साम्राज्य खड़ा करना। इन 11 वर्षों की ‘मॉडस ऑपरेंडी’ (कार्यशैली) में ‘कास्ट‘ और ‘कलम‘ प्रधान होती है, जबकि ‘कट्टा‘ गौण हो जाता है। यानी ये “कुछ” लोग जेएनयू (JNU), डीयू (DU) या हॉस्टलों की रटी-रटाई जानकारी (जिसे ये लोग ज्ञान समझते हैं) का जबरदस्त प्रदर्शन कर मूल निवासियों को समय-समय पर मूर्ख साबित करने की कोशिश करते हैं। रटने की आदत के चलते ये सरकारी नियमों को भी रट लेते हैं और इसी ज्ञान से अपना सिक्का जमाते हैं। फिर, अपनी जाति के दम पर प्रदेश के राजनीतिक लोगों से संबंध स्थापित करते हैं। ये जहाँ भी जाते हैं, इनके रीडर को निर्देश होते हैं कि “पिछले साहब से हमारा परसेंटेज ज्यादा रहेगा।” गोया कि पिछला वाला “लोकल मूर्ख” था और ये “बुद्धि-प्रदेश” से आए ज्ञानी हैं, तो इनकी दक्षिणा तो ज्यादा होनी ही चाहिए!
केरल के प्रवासी पक्षियों की तरह ये भी अपने रिश्तेदारों को ‘अच्छी खुराक’ के लिए बुला लेते हैं। दोनों में फर्क यह है कि केरल के प्रवासी पक्षी अपने रिश्तेदारों को नौकरी लगवा देते हैं और वे मेहनत से जम जाते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश-बिहार से आए ये रिश्तेदार अक्सर साहब के विभाग में ‘पेटी-ठेकेदार’ बना दिए जाते हैं। धीरे-धीरे वे साहब की ‘राजकुंवरी’ के चाकर बनकर रह जाते हैं। यानी बहुत कम ही यहाँ स्थायी वास कर पाते हैं, बाकी ज्यादातर आपसी खींचतान के बाद वापस लौट जाते हैं। अब यक्ष प्रश्न यह है कि इन “कुछ” लोगों की संख्या कितनी है? इसका उत्तर हम सुधि पाठकों के अपने अनुभव पर छोड़ते हैं। बाकी बातें अगले अंक में। और अब शुरू करते हैं आज के ‘द इनसाइडर्स’ के इनसाइड किस्से…
आईएएस की कार्यशैली से सीएमओ हुआ आलोकित
मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के गलियारों में समय की धारा के साथ कई अधिकारी आए और कई गए, हर किसी के काम करने का अपना ढंग रहा। किंतु वर्तमान में हम्माल सेवा से प्रमोट होकर आईएएस बने अधिकारी की कार्यशैली ने अपनी संवेदनशीलता से जन-जन के मन को जीत लिया है। इन ‘साहब’ के व्यवहार में न तो पद की कोई ऐंठ है और न ही सत्ता का रूआब; यहाँ तो बस सेवा की नेकनीयती और अपनों सा बड़प्पन झलकता है। उनकी सहजता का आलम यह है कि बस एक फोन करिए और यदि संभव हुआ, तो काम फोन पर ही संपन्न हो जाता है। इतना ही नहीं, यदि कहीं कोई अड़चन आए तो वे स्वयं फोन कर सूचित करते हैं और बड़े ही प्रेम से पूछते हैं कि “आपका काम और किस तरह से हो सकता है?” उनकी इस भलाई भरी सोच ने आमजन के जीवन को बेहद सुगम बना दिया है। अब न तो लोगों को पास बनवाने के लिए वल्लभ भवन की लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है और न ही अन्य साहबों की तरह मिलने के लिए घंटों का इंतज़ार करना पड़ता है। साहब का सीधा और सात्विक सा फंडा है—जो काम होने वाला है, उसे तुरंत कर दो; किसी को झुलाने, लटकाने या भटकाने में वक्त की बेवजह बर्बादी है। अपनी इसी निस्वार्थ कार्यशैली से उन्होंने न केवल फाइलों का निपटारा किया है, बल्कि पूरे सीएमओ को अपनी नेकनीयती से आलोकित कर एक ऐसी नई राह दिखाई है, जहाँ जनसेवा ही सर्वोपरि धर्म है। उनके इस सेवाभावी स्वरूप को देखकर मानस की ये पंक्तियाँ चरितार्थ होती हैं:
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥” (अर्थात्: दूसरों की भलाई करने के समान कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है।)
शालीमार थैरपी में लिखी जा रही मध्यप्रदेश की ‘एपस्टीन फाइल’ राजधानी में इन दिनों ‘शालीमार थैरपी’ की खूब चर्चा है। यह वह जगह है जहाँ वे सब कृत्य होते हैं जो कुख्यात जेफरी एपस्टीन अपने निजी द्वीप पर करता था। यानी, यहाँ वेल्थ, वाइन और वूमन (WWW) के जरिए रसूखदारों को ‘ट्रेप’ में फँसाया जाता है। इस खेल का असली खिलाड़ी एक पंजाबी ठेकेदार है, जो खुद भी एपस्टीन की तरह ही बेहद शौकीन और ‘हैंडसम’ है। उसने शालीमार के एक फ्लैट में सभी विलासितापूर्ण सुविधाएं विकसित कर रखी हैं। यहाँ जो भी ‘फरमाइश’ होती है, उसकी तत्काल आपूर्ति की जाती है। जरूरत पड़ने पर दिल्ली-मुंबई से विशेष थैरपिस्ट बुलाए जाते हैं, और कुछ वरिष्ठ अधिकारी तो ‘सैंडविच थैरपी’ की भी मांग करते हैं। कई बड़े विभागों के अफसर यहाँ के नियमित मेहमान हैं। जिस दिन यहाँ के राज उजागर होंगे, तय मानिए कि यह मध्यप्रदेश का ‘एपस्टीन फाइल’ कांड होगा। जैसे कुछ वर्ष पूर्व एक ‘प्यारे’ ने विष्णु हाइटेक सिटी में नाबालिग लड़कियों के शोषण का घिनौना कांड किया था। हमने इसे ‘शालीमार थैरपी’ का नाम इसलिए दिया है क्योंकि यह शालीमार नामक जगह पर स्थित है।
उच्च वर्ग के आईएएस का बदले वाला ‘प्लॉट’
निचले तबके से आने वाले अफसरों और कर्मचारियों के लिए एक साहब ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। उनके हकों की लड़ाई लड़ते-लड़ते वे अपने ही सेवा के लोगों की आँखों की किरकिरी बन गए। अब साहब रिटायर हो चुके हैं, तो उच्च तबके वाले एक ‘ठाकुर साहब’ उनके बेटे से बदला ले रहे हैं। ठाकुर साहब ने पूर्व एसीएस के बेटे का प्लॉट कैंसिल कर दिया है। अपनी कार्रवाई को सही साबित करने के लिए उन्होंने अन्य लोगों के भी प्लॉट रद्द किए हैं, लेकिन उसी लिस्ट से उच्च वर्ग से आने वाले एक सीनियर मंत्री के रिश्तेदार और एक पूर्व आईएएस अफसर के प्लॉटों को चालाकी से बाहर रखा गया है। साहब की इस ‘हिप्पोक्रेसी’ से सब हैरान हैं। बता दें कि साहब को ‘दरबार’ लगाने का बहुत शौक है, इसीलिए काम कम और दिखावा (बताले) ज्यादा करते हैं, जिससे उनका विभाग भी उनसे आजिज आ चुका है।
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सत्ताधारी नेता की एक ‘डील’ ने फँसाया संकट में
सत्ताधारी दल के एक नेता एक डील को लेकर भारी संकट में हैं। राजधानी में इन नेताजी की कई प्रॉपर्टीज हैं, लेकिन अभी जिस जमीन को उन्होंने खरीदा है, उसमें हुई धोखाधड़ी ने सौदे को बेहद विवादित बना दिया है। नेताजी ने अपने रसूख के दम पर ऐसा खेल रचा कि लोग दाँतों तले उँगली दबा लें। अयोध्या बायपास में जो जमीन सालों पहले सड़क में चली गई थी और जिसका मुआवजा भी लिया जा चुका है, उस जमीन के खसरे को हेरफेर कर दूसरे की जमीन पर दर्शा दिया गया। फिर डिजिटलाइजेशन रिकॉर्ड में गड़बड़ी की गई और इसी आधार पर नेताजी ने अपने नाम पर रजिस्ट्री करा ली। पीड़ित पक्ष ने हर दरवाजे पर फरियाद लगाई, लेकिन ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज’ कौन सुनता है? चूँकि जमीन करीब 50 करोड़ रुपए की है, तो पीड़ित पक्ष ने नेताजी को बेनकाब करने की ठान ली है। बता दें कि ये नेताजी सरकार की ‘कोठरी’ के सबसे खास सदस्यों में से एक हैं।
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मंत्री जी के ‘रिसोर्ट प्रेम’ से नदी के अस्तित्व पर संकट
विंध्य क्षेत्र के एक पावरफुल मंत्री जी का ‘जमीन प्रेम’ आजकल राजधानी में सिर चढ़कर बोल रहा है। उनके बिल्डर सहयोगी पहले ही पुराने शहर में बड़ा प्रोजेक्ट ला चुके हैं, और अब मंत्री जी राजधानी से सटे इलाके में एक रिसोर्ट बनवा रहे हैं। यह रिसोर्ट कलियासोत नदी के किनारे बन रहा है, जहाँ ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ की सीमाओं को ताक पर रखकर निर्माण किया गया है। इसी वजह से अब एनजीटी (NGT) की नजर उन पर टेढ़ी हो गई है। हालांकि, मंत्री जी के ‘मैनेजमेंट’ से सब वाकिफ हैं, इसलिए कयास लगाए जा रहे हैं कि वे कोई न कोई सेटिंग कर ही लेंगे। गौरतलब है कि उन्होंने पहले सीहोर के पास भी एक रिसोर्ट बनवाया था, जो व्यावसायिक दृष्टि से बेहद कामयाब रहा।
यंग आईएएस ने ‘पानी’ में से निकाला कमाई का तरीका
नर्मदा किनारे वाले जिले के एक यंग आईएएस, जो जिला पंचायत के सीईओ हैं, ने आते ही उन कामों पर नजर डाली जहाँ ‘मलाई ही मलाई’ थी। वाटरशेड के ज्यादातर काम फर्जी होते हैं, लिहाजा सबसे पहले उन्होंने वहाँ के अफसरों को चमकाया और अपना कमीशन दोगुना कर लिया। खबर है कि अब इसी सफल फॉर्मूले को वे अन्य कार्यों में भी अप्लाई कर रहे हैं, जिससे जिले का मातहत अमला काफी परेशान है। हालांकि, सीईओ साहब को अपने ‘जैन कनेक्शन’ होने पर काफी गर्व है और वे बेखौफ ‘बेटिंग’ कर रहे हैं। उनकी पत्नी भी आईएएस हैं और नर्मदा के दूसरे पार वाले जिले में पदस्थ हैं।
राजधानी की पुलिसिंग में ‘पावर शिफ्ट’ का खेल
राजधानी के थानों से लेकर सत्ता के गलियारों तक खासी बेचैनी है। वजह है नए पुलिस कमिश्नर का आगमन। साहब की ‘तेज-तर्रार’ छवि ने उन रसूखदारों के पसीने छुड़ा दिए हैं, जो अब तक पुलिसिया कामकाज पर अपनी उंगलियों का नाच नचाते थे। ‘नई झाड़ू, नई तरह से चलती है’—साहब ने यहाँ कदम रखते ही वर्षों पुराने ढर्रे को बदल दिया है। वे कभी भी जनता के बीच धमक पड़ते हैं। अब पुलिस अफसरों की नींद हराम हो गई है क्योंकि साहब की सक्रियता ने सबको काम पर लगा दिया है। सबसे बड़ा उलटफेर यह हुआ है कि अब साहब किसी भी रसूखदार का फोन उठाने की जहमत नहीं उठाते। अब केवल आम जनता की सुनी जा रही है। साहब की इस सक्रियता ने शहर की पुलिसिंग में नई जान फूँक दी है।
साध्वी का जलवा और नतमस्तक पुलिस
ऊपर हमने पुलिस कमिश्नर की तारीफ की, लेकिन एक अपवाद भी है। राजधानी में इन दिनों एक साध्वी के एक्सीडेंट वाले केस की खूब चर्चा है। पहली नजर में जिसने सुना, उसे साध्वी के साथ सहानुभूति हुई, लेकिन ‘द इनसाइडर्स’ के मुताबिक हकीकत बिल्कुल उलट है। साध्वी के दबाव में पुलिस ने पीड़ितों को ही आरोपी बनाकर जेल भेज दिया है और ऐसी धाराएं लगाई हैं कि उन्हें जमानत तक नहीं मिल पा रही है। इसके चलते सत्ताधारी दल को थोक में वोट देने वाला समाज अब प्रदर्शन पर मजबूर है। पहली बार पूरा समाज एकजुट हो गया है। अपने साथ हुई नाइंसाफी पर अंदर ही अंदर धधक रहा है। यानी लावा कभी भी फूट सकता है। सूत्र बताते हैं कि सरकार ने जल्द ही समाज के प्रतिनिधियों से बात नहीं की तो भाजपा को दो सीटों पर डैमेज कर सकता है। हालांकि, हमारा मानना है कि साध्वी को भी संत होने के नाते थोड़ा बड़प्पन दिखाना चाहिए।
पूर्व सीएम के भांजे की कंपनी को मिली ‘सुलेमानी ताकत’
पिछले अंक में हमने बताया था कि बड़े साहब के करीबी और वीआरएस लेने वाले एक आईएएस अफसर का कूलिंग पीरियड इस महीने खत्म होने वाला है। वे एक बड़ी कंपनी में मोटा जॉइनिंग बोनस लेकर आधिकारिक तौर पर जुड़ेंगे। उन्होंने अनौपचारिक रूप से एक साल में ही कंपनी को मध्यप्रदेश के बड़े पावर प्लांट का काम दिलवा दिया है, वह भी तब, जब कंपनी विपक्ष के एक पूर्व सीएम के भांजे की है। साहब के इसी ‘पावर मैनेजमेंट’ के चलते पक्ष और विपक्ष, दोनों ही उनके मुरीद हैं।
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सरकारी बंगले की आदत और सार्वजनिक पार्क पर कब्जा
एक पूर्व अफसर अभी भी अपने अफसरी रुआब में जी रहे हैं। नेता बनने की कोशिश में कामयाब न हो पाए तो अपने समधी संग निर्माणाधीन फाइव स्टार होटल में पार्टनर बन गए। सरकारी बंगले की आदत की वजह से उन्होंने अरेरा कॉलोनी में अपने घर को वैसा ही बनाने की कोशिश में पड़ोसियों की शामत ला दी है। साहब ने सरकारी एजेंसियों की मदद से घर के सामने वाला पार्क चमकवा दिया और फिर इसे अपनी ‘जागीर’ बना लिया। अन्य व्यक्तियों के लिए अब इसमें प्रवेश निषिद्ध है। हाल ही में एक सज्जन ने इसमें प्रवेश किया तो साहब ने उन्हें भूत बना डाला!

