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The Insiders: 40 की उम्र में आईएएस ने रचाया तीसरा ब्याह, दो पूर्व पत्नियां कलेक्टर और तीसरी भी आईएएस, आईपीएस की ख्याति की जांच सरकार तक पहुंची, कलेक्टर साहब बन गए सिपाही

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें उत्तर प्रदेश और बिहार से आए अफसरों की कहानी

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865 
भोपाल | प्रवासी पक्षी और ख़ानाबदोशी …भाग 9। पिछले हफ्ते के ‘द इनसाइडर्स’ में हमने बताया था— “पहाड़ मेहनत सिखाते हैं, रेगिस्तान संघर्ष सिखाता है, जंगल प्रकृति से मिलाते हैं, समंदर अध्यात्म सिखाता है… और उपजाऊ भूमि ‘राजनीति’ पैदा करती है।” शायद यही वजह है कि पाटलिपुत्र-काशी काल में भी उत्तर प्रदेश और बिहार में खूब राजनीति हुई और आज भी हो रही है। इस क्षेत्र ने देश को बड़े-बड़े आंदोलन और राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री आदि दिए… पर विडंबना यह है कि उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्र में मिर्जापुर, बेगूसराय, गोरखपुर और पूर्वांचल में हिंसा तथा रेगिस्तान वाला संघर्ष भी खूब देखने को मिलता है। “उपजाऊ भूमि में रेगिस्तानी संघर्ष?” क्योंकि आबादी के विस्फोट से 300 बीघा वाले जमींदार का पोता/परपोता अब 4 से 5 बीघा का सीमांत किसान रह गया है। इस तरह मात्र 50-60 साल में आर्थिक स्थिति बदहाली पर आ गई। उत्तर प्रदेश (विभाजित) व बिहार में कमोबेश हर जाति के साथ यही हुआ। बदहाली इतनी बढ़ी कि कुछ लोगों ने गमछे में बंधे सत्तू को घोलकर पीने और मूस (चूहा) मारकर खाने के दिन भी देखे। दोनों प्रदेशों में न जंगल थे, न खदानें थीं और न ही परती (पड़त) भूमि थी (इसलिए उद्योग भी नहीं थे)। तो मजबूरन काशी-नालंदा के बुद्धि प्रधान प्रदेशों में… ‘SURVIVAL IS THE UTMOST INSTINCT’ के चलते तीन “क” यानी कास्ट, कट्टा और कलम की शुरुआत हुई। कास्ट (जाति) के दम पर दूसरों का दमन यानी राजनीति; कट्टे के दम पर सरकारी और रेलवे के ठेकों पर कब्जा और कलम के दम पर सरकारी नौकरियों को पाना और फिर वसूली करना। और जो ये तीनों न कर पाया, उसने चौथा “क” यानी ‘कल्टी’ (पलायन) का रास्ता पकड़ लिया। अपने उच्च कुल के जाति अभिमान को प्रदेश में ही छोड़कर, वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक मजदूरी करने या मुंबई-दिल्ली-कोलकाता में ड्राइवरी करने के लिए ‘पलायन’ कर बैठे। हमारे प्रदेश में आए इन प्रवासियों के आचार-विचार पर उनकी पृष्ठभूमि के इन “3-क” का क्या-क्या प्रभाव रहता है? बताएंगे अगले अंकों में… और अब शुरू करते हैं इस हफ्ते के ब्यूरोक्रेसी के ‘टॉप टेन’ इनसाइड किस्से…

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तीन-तीन महिला आईएएस से ब्याह रचाने वाला ‘कैसानोवा’

यूरोप में एक शब्द ‘कैसानोवा’ (Casanova) बेहद लोकप्रिय है। इसका उपयोग ऐसे पुरुष के लिए किया जाता है जो बेहद आकर्षक हो, महिलाओं के बीच लोकप्रिय हो और जिसके कई प्रेम संबंध (Affairs) हों। सरल शब्दों में कहें तो इसे ‘रंगीन मिजाज’ या ‘दिलफेंक’ व्यक्तित्व का पर्याय माना जाता है। ऐसा ही एक कैसानोवा मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में भी है। साहब 2014 बैच के आईएएस हैं। लंबी, ऊंची और छरहरी काया के धनी है। महज 40 साल की उम्र में ही साहब तीन-तीन शादियां रचा चुके हैं। तीसरी तो हाल ही में हुई। हालांकि साहब पूरी तरह से खानदानी हैं और उत्तर प्रदेश में उनके एक रिश्तेदार सीएम योगी से पहले सबसे लंबे वक्त तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं। खास बात यह है कि तीनों महिलाएं भी आईएएस हैं। इनमें से दो कलेक्टर हैं और तीसरी भी एक-दो साल में कलेक्टर बन जाएंगी। यानी साहब का मोहपाश या अदा ऐसी है कि बहुत बड़े पदों पर आसीन महिलाएं भी उनकी ओर खिंची चली आती हैं। एक बात जरूर है कि साहब ने कानूनी प्रकियाओं का पूरा पालन करते हुए पहले तलाक लिया और फिर अन्य महिला से विवाह। अजब-गजब मध्य प्रदेश में तीसरी शादी के साथ ही साहब के तमाम किस्से सामने आ गए हैं। लेकिन बहुत सारे लोग उनकी किस्मत पर रश्क कर रहे हैं। कुछ को तो एक पत्नी भी नसीब नहीं होती, लेकिन यहाँ ‘दिल तो बच्चा है जी’ की तर्ज पर साहब ब्याह पर ब्याह रचा रहे हैं। वैसे, जब मामला मोहब्बत और दो जवां दिलों की रजामंदी का हो, तो हम भी उनकी खुशियों में शामिल होते हैं और उन्हें तीसरे वैवाहिक जीवन की शुभकामनाएं देते हैं। कैसानोवा के बारे में भी बताते चलें कि यह नाम इटली के जियोवानी जियाकोमो कैसानोवा (1725–1798) के नाम पर पड़ा। वह 18वीं शताब्दी का एक इतालवी लेखक, जासूस और दार्शनिक था। उसने अपनी आत्मकथा ‘Histoire de ma vie’ (मेरे जीवन की कहानी) लिखी, जिसमें उसने अपने दर्जनों प्रेम संबंधों और कारनामों का बेबाकी से वर्णन किया है। शायद हमारे साहब की भी कभी ऐसी ही आत्मकथा आए।

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इश्क की ख्याति ने पहुँचाया नुकसान

बात इश्क-विश्क की चल ही रही है तो एक आईपीएस का भी जिक्र कर देते हैं। जब साहब एसपी थे तो अपने इश्क के लिए इन्होंने बहुत ‘ख्याति’ बटोरी थी। सबसे पहले ‘द इनसाइडर्स’ ने ही इनकी मोहब्बत के किस्से को आप तक पहुंचाया था। अब इन्होंने जिनसे इश्क किया, वह भी पुलिसवाली ही थीं, लेकिन उनके पति को यह मोहब्बत नागवार गुजरी। फिर ‘पति, पत्नी और वो’ का किस्सा चला। और अब मोहब्बत में फना होने की बारी आईपीएस महोदय की है। साहब का पहले एसपी पद गया। फिर भी माशूका के पति का इंतकाम पूरा नहीं हुआ तो कई जगहों पर शिकायत कर दी। अब विभागीय जांच की अनुशंसा सरकार के पास पहुंच गई है। कभी भी सरकार ने इश्क पर तिरछी नजर की तो आईपीएस महोदय की मुश्किल बढ़ सकती है। वैसे, हमारी सलाह तो यही है कि हमने ऊपर जिस कैसानोवा कैरेक्टर का जिक्र किया है, उनसे थोड़ी सीख लेकर नए इश्क पर आगे बढ़ा जाना चाहिए।

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सेम सरनेम वाले साथी ने ही निपटाया

कैसानोवाई कैरेक्टर पर चर्चा चल ही रही है तो एक और केस की वजह से खाकी वर्दी में तूफान आया हुआ है। एक साहब जिन्हें आईपीएस अवॉर्ड होना था, अचानक ही एक महिला की वजह से दिक्कत में फंस गए। महिला ने मय सबूतों के साथ गंभीर आरोप लगाए हैं। ये आरोप आप अखबारों में पढ़ ही चुके होंगे, इसलिए हम दोहराव नहीं करते। सीधे मुद्दे पर आते हैं कि अब साहब का महिला से इश्क था या कुछ और? जांच रिपोर्ट काफी कुछ बयां कर रही है। लेकिन फिलहाल उस भेदिया की खोजखबर ली जा रही है, जिसने जांच रिपोर्ट को लीक किया। इसकी जानकारी भी दे देते हैं। साहब जब बेहद पावरफुल थे, तब सत्ता के नशे में अपनी ही बिरादरी वालों का नुकसान कर दिया। उनसे बिरादरी में सेम सरनेम वाले एक साथी नाराज हो गए। पंडित जी ने चुटिया बांध ली और अब जब वे पावरफुल हुए तो साहब को दिन में ही तारे दिखा रहे हैं। इसी साथी ने साहब की प्रेम कहानी को आम करने में अहम भूमिका निभाई है।

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क्या बड़े कप्तान साहब वाकई में भोले भंडारी हैं?

बड़े कप्तान साहब का एक आदेश सरकार ने निरस्त कर दिया। संदेश भी दिया कि सरकार के काम में अपनी टांग न घुसाया करें। लेकिन अहम सवाल यही कि बड़े कप्तान साहब से यह गलती किसने कराई? माजरा यह है कि साहब तो भोले भंडारी हैं, लेकिन निचला स्टाफ होशियार है। इसी होशियारी में साहब से हस्ताक्षर करा लिए गए। हालांकि जब छानबीन हुई तो इस स्टाफ ने बताया कि पूर्व बड़े कप्तान के वक्त भी इस तरह के आदेश जारी हुए थे। हालांकि बड़े कप्तान साहब को यह नहीं बताया गया कि पूर्व में जब ऐसा हुआ तो तत्कालीन बड़े कप्तान को भी खूब फटकार पड़ी थी। इसके बाद भी मौजूदा स्टाफ ने आदेश निकलवा दिया। यानी यह साजिश थी या गलती से ‘दोबारा मिस्टेक’, इस पर बड़े कप्तान साहब को जरूर मंथन करना पड़ेगा।

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हम्माल सेवा को फिर नहीं मिली राहत

एक जिले में कुछ वक्त पहले कलेक्टर के साथ ही सीईओ जिला पंचायत के पदों पर एक ही बैच वाले अफसरों की नियुक्ति हो गई। कलेक्टर साहब आरआर वाले थे और सीईओ राज्य प्रशासनिक यानी ‘हम्माल सेवा’ के प्रमोटी थे। मतलब कि सेम बैच का होने के बाद भी प्रमोटी को कलेक्टर साहब के मातहत काम करना पड़ा। हम्माल सेवा के साथ नाइंसाफी हुई तो आश्वासन दिया गया कि जल्द ही उन्हें दूसरी जगह पदस्थ कर दिया जाएगा। मरता क्या न करता, सरकार पर भरोसा कर अपने ही बैच वाले कलेक्टर की हुजूरी करने लगे। कल देर रात जब सूची आई तो साहब का नाम फिर गायब था। यानी अब सरकार उन्हें भूल गई है और उन्हें कलेक्टर साहब के लिए ही हम्माली करनी होगी।

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बेशर्म प्रदेश…

कुछ समय पहले हमने लिखा था— ‘बेशर्मी का अभ्युदय’। सच में हमारे प्रदेश का सरकारी महकमा बेशर्मी के सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा है। पिछले दिनों प्रदेश के पानी से जुड़े एक विभाग में विभागीय खेलकूद का आयोजन हुआ। फाइनल के बाद इनाम का वितरण हुआ। इसमें प्रमुख अभियंता और प्रमुख किरदार ‘धुंधकारी’ के साथ एक “सौंदर्य निधि” ने प्रतिभागियों को पुरस्कार बांटे। ये वही मोहतरमा हैं जिनके हाथ कुछ समय पहले ही लाल हुए थे। अरे! आप गलत समझ रहे हैं… मेहंदी से नहीं, बल्कि जांच एजेंसी ने पकड़ कर लाल करवाए थे। और विभाग है कि उनकी जांच की अनुमति की फाइल दबाए बैठा है। मोहतरमा बहुत जूनियर हैं, पर धुंधकारी का साथ हो तो सब संभव है। इसलिए धुंधकारी ने उन्हीं के हाथ से पुरस्कार वितरण करवा दिया। अब कौन समझाए कि ये खेलकूद प्रतियोगिता के अवॉर्ड हैं, न कि भ्रष्टाचार प्रतियोगिता के इनाम। जब बेशर्मी ही नारी का श्रृंगार बन जाए तो फिर पुरुष बेचारा क्या ही करे?

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जिला हुकुम बन गए सिपाही

एक जिला हुकुम यानी कलेक्टर साहब का कांग्रेसियों पर लाठी बरसाते हुए वायरल फोटो आप तक भी पहुंच गया होगा। साहब की इस कर्तव्यनिष्ठा पर उनकी प्रशंसा तो बनती है, पर उनकी ही बिरादरी के लोग चटखारे लेकर कह रहे हैं कि जिला हुकुम होकर एक सिपाही की भांति लाठी भांजना कितना उचित है? उचित-अनुचित तो स्थितियों पर निर्भर है, लेकिन जिस बेशर्मी से उनके जिले में छोटे से गांव में हुकुम के लिए हजारों रुपए के काजू-बादाम खरीदे जाते हों और एक छोटी सी दीवार को पोतने में सैकड़ों मजदूर और कई लीटर पेंट लगा दिए जाते हों, वहां लाठियां भांजने से क्या दिक्कत? हो सकता है इसी बहाने कलेक्टरी बच जाए। वैसे हम बता दें कि कांग्रेसियों के इस तरह के प्रदर्शन की सूचना 48 घंटे पहले यहां के कप्तान साहब को दे दी गई थी। लेकिन कप्तान साहब मुख्यालय के खास हैं, तो उनके कान पर जूं नहीं रेंगी। खैर, हम तो यही कहेंगे कि पूरे कुएं में भांग घुली थी, इसलिए किसी को भी होश न रहा।

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और साहब का मध्यप्रदेश से मोहभंग

खाकी में एक और अपवाद सामने आया है। अमूमन उत्तर प्रदेश व बिहार से आए अफसर मध्य प्रदेश में ही रमत (बस) जाते हैं। लेकिन एक पूर्व आईपीएस का मध्य प्रदेश से मोहभंग हो गया है। इसलिए अब वे अपने गृह राज्य यानी उत्तर प्रदेश शिफ्ट हो रहे हैं। लिहाजा, भोपाल में पेट्रोल पंप, वेयरहाउस से लेकर कई सारी प्रॉपर्टी बेच दी हैं। जो बची हैं, उनका भी इसी महीने सौदा हो जाएगा। बता दें कि साहब की वजह से ही ‘डायल 100’ अस्तित्व में आई थी। लेकिन बलिहारी समय की है! यूपी में परिवार की राजनीतिक पकड़ और बेटे का लखनऊ में शोरूम की वजह से उन्हें मध्य प्रदेश छोड़ना पड़ा।

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जैन हैं तो मिलेगी संविदा नियुक्ति

बड़े साहब की पहल और सख्ती की वजह से कई अफसरों का रिटायरमेंट के बाद संविदा नियुक्ति के अरमानों पर पानी फिर गया। लेकिन राजधानी में एक जैन साहब ने न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई कि सेवानिवृत्ति के बाद बड़े साहब ने उन्हें संविदा नियुक्ति दे दी है। हालांकि इसमें एक जैन आईएएस मैडम की भी भूमिका बताई जा रही है। यानी जैन-जैन कनेक्शन होगा तो निश्चित ही फायदा मिलेगा।

साहब… आप समझा करें!

महिला कर्मचारियों के देर से आने और जल्दी जाने की आदत को लगभग सभी जरूरत मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। और ऐसा करने में ही समझदारी है, वरना महिला उत्पीड़न का आरोप जाने कब लग जाए! किसी जमाने में ऑफिस में स्वेटर बुनने वाली ये शक्तियां आजकल कार्यालय में देर से आने पर कभी मेड के न आने, कभी बच्चों की खराब तबीयत, तो कभी ट्रैफिक का बहाना बताती हैं। लेकिन जब से “सार्थक ऐप” से अटेंडेंस लगने लगी, एक रोचक बात सामने आई। पूरे महीने की अटेंडेंस चेक करने पर जब वेतन आहरण अधिकारी ने एक महिला कर्मचारी से रोज लेट आने का कारण पूछा तो उसने मासूमियत से जवाब दिया— “सर, मैं रोज टाइम पर ही आती हूं, किंतु जब ऐप में लॉगिन करती हूं तो सेल्फी फोटो आधार कार्ड जैसी आती है। अच्छी फोटो लोड करने के चक्कर में बिला वजह लेट हो जाती हूं।” अब बात कुछ भी हो, अच्छा दिखना और फोटो में भी अच्छा दिखना महिलाओं का विशेषाधिकार तो है ही। साहब… आप समझा करें!

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