The Insiders: आईएएस की ‘अटूट दोस्ती’ का पुराना राज, सीनियर आईपीएस के ‘चिराग’ पर रिश्वत का दाग और सीएम के लिए फिर खिलेंगे गुलाब
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़िए मुख्यसचिव के भ्रष्टाचार वाले ताजा बयान की तहकीकात करने वाले जमीन किस्से।
इश्क, भ्रष्टाचार और बेशर्मी का ‘अभ्युदय’
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | बसंत पंचमी की आप सभी सुधि पाठकों को ढेरों शुभकामनाएं। इस शुभ मौके पर मध्य प्रदेश के एक ‘बड़े साहब’ की जिह्वा पर साक्षात मां सरस्वती विराजमान हो गईं। उनके श्रीमुख से सत्य निकल पड़ा— “सीएम बोलते हैं कि कोई भी कलेक्टर बिना पैसे लिए काम नहीं करता।” इसी बीच छत्तीसगढ़ के एक विधायक जी ने भी ज्ञान की गंगा बहाई। उन्होंने फरमाया— “इश्क और भ्रष्टाचार कभी ख़त्म नहीं होते, केवल बाबू बदल जाते हैं।” लेकिन मध्य प्रदेश में इन दोनों के साथ एक तीसरी चीज़ भी अमर है— बेशर्मी! आयरिश विचारक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने ठीक ही कहा था— “बेशर्मी वह ढाल है, जिसके पीछे हर तरह की अयोग्यता छिपाई जा सकती है।” आज एमपी का पूरा सिस्टम इसी ढाल के पीछे छिपा है। उदाहरण देखिए— इंदौर में 27 लोगों की ‘जल-मृत्यु’ हुई। मातम के कुछ वक्त बाद ही नगरीय प्रशासन विभाग ने मिंटो हॉल में अवॉर्ड बांटने का जश्न मना लिया। भोपाल में गौ-वध का महापाप हुआ, पर जिम्मेदारों के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई। 90 डिग्री वाला ब्रिज, मेट्रो का गलत निर्माण और जल जीवन मिशन की धांधली में अफसरों की बेशर्मी सरेआम दिखी। हद तो तब हो गई जब ऐसे संवेदनशील वक्त में साहब लोग सरकारी कार्यक्रमों में ‘कपल डांस’ में व्यस्त रहे।
सीएम का उद्देश्य ‘अभ्युदय मध्यप्रदेश’ है, पर यहाँ शायद सिर्फ ‘बेशर्मी’ का अभ्युदय हो रहा है। फिल्म ‘पठान’ का गाना है— “बेशर्म रंग अभी कहाँ देखा है दुनिया वालों ने…”। यदि इसके गीतकार यहाँ के बेलगाम मंत्रियों के ‘घंटा’ से लेकर ‘सोफिया’ तक के बयान सुन लेते, तो वे शर्तिया लिखते— “असली बेशर्म रंग तो मध्य प्रदेश ने देखा है!” तुलना कीजिए— स्पेन में ट्रेन हादसे में 42 मौतें हुईं, तो वहां 3 दिन का राष्ट्रीय शोक रखा गया। पर हमारे यहाँ? इसीलिए कहते हैं— मध्य प्रदेश अजब है, गजब है! इसी अजब-गजब मध्यप्रदेश के अफसरों के इस हफ्ते के चटपटे किस्सों के साथ शुरू करते हैं— ‘द इनसाइडर्स’…
साहब का एक ही दोस्त क्यों है?
आजकल गलियारों में चर्चा है कि एक पावरफुल साहब का नौकरशाही में सिर्फ एक ही दोस्त क्यों है? साहब खुद को ‘ईमानदार’ बताते हैं, पर दोस्त उतना ही बड़ा ‘बेईमान’ है। हालांकि दोस्त ने वीआरएस ले लिया है। पर साहब के फैसलों में अब तक उसकी झलक दिख जाती है। कहते हैं— “दोस्त-दोस्त ना रहा…” लेकिन यहाँ तो दोस्ती अटूट है। किस्सा पुराना है; 14-15 साल पहले जब साहब सीएम सचिवालय में थे, तब एक अन्य कॉलेज फ्रेंड के साथ केरवा डैम के किसी फार्म हाउस में ‘ट्रैप’ हो गए थे। तब उनके बैचमेट दोस्त ने उन्हें बचा लिया। अब दोस्ती का कर्ज तो चुकाना होगा! वो कॉलेज फ्रेंड जो महिला बाल विकास में था, अब साहब की कृपा से अफ्रीकी देश में मजे ले रहा है। इसी ‘खास दोस्त’ के साथ साहब ने शिवाजी नगर में ज्वाइंट रजिस्ट्री वाला मकान भी खरीदा है। साहब को पहचानना मुश्किल नहीं, उनकी हालिया टिप्पणी ने एमपी का नाम दिल्ली तक रोशन कर दिया है।
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बड़े कप्तान पर आई जांच की आंच
जब बड़े साहब ने कलेक्टर्स की रिश्वतखोरी पर मुहर लगाई, तो बबाल मचना ही था। आईपीएस लॉबी पहले तो खुश हुई कि सारा कीचड़ कलेक्टर्स पर गिर गया, लेकिन खुशी ज्यादा देर टिक नहीं पाई। ग्वालियर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने पीएचक्यू को शिकायत भेजकर ‘बड़े कप्तान साहब’ के बेटे पर एक मामले में रिश्वत का आरोप जड़ दिया। शिकायत अब जिले को भेजी गई है, जहाँ जांच का अंजाम क्या होगा, सब जानते हैं। वैसे कप्तान साहब की अपनी ‘ईमानदारी’ पर कोई शक नहीं किया जा सकता, पर “पुत्र मोह में धृतराष्ट्र” वाली स्थिति तो बन ही जाती है।
फिर शुरू हुई लेन-देन की कुप्रथा
बड़े साहब ने कलेक्टर्स द्वारा पैसे लिए जाने की बात तो मान ली, पर यह नहीं बताया कि जो ‘पैसे’ देकर पोस्टिंग लाएगा, वो कमाएगा ही। पहले दावा था कि ट्रांसफर-पोस्टिंग का बाजार बंद हो गया है, लेकिन हालिया सूची ने इस दावे की पोल खोल दी है। 5 से 6 अधिकारी ऐसे हैं जिनकी पोस्टिंग को ‘सोने से नहलाकर’ हासिल किया गया है। यानि कुप्रथा फिर से फल-फूल रही है।
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सेहत से महकाया विभाग
सेहत से जुड़े एक विभाग में वित्त सेवा के एक अधिकारी की ‘महक’ दूर-दूर तक फैल रही है। साहब ही ठेकेदारों का पेमेंट करते हैं, इसलिए शाम को जब वे कुर्सी से उठते हैं, तो झोला नोटों से भर जाता है। रोजना का कलेक्शन लाखों में है। साहब अपनी धौंस जमाते हुए सबको बताते हैं कि दिल्ली में जब बड़े साहब थे, तब एमपी भवन में उनसे और उनकी अर्धांगिनी से साहब की खूब छनती थी। अब पुरानी जान-पहचान रंग तो दिखाएगी ही!
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कलेक्टर ने बंगले में कराया काम, फिर रोका भुगतान
बुंदेलखंड के एक कलेक्टर साहब का नया किस्सा चर्चा में है। खनन माफियाओं से साठगांठ का पुराना इतिहास रहा है। अब एक ठेकेदार ने आरोप लगाया है कि साहब ने स्मार्ट सिटी के पैसे से अपने बंगले का कायाकल्प करा लिया। अब जब पेमेंट की बारी आई, तो साहब ने हाथ रोक लिया। शर्त यह है कि ठेकेदार स्मार्ट सिटी के नए टेंडर में भाग न ले। क्योंकि साहब किसी और को यह टेंडर देने का वादा कर चुके हैं। इसलिए ठेकेदार के कोर्ट जाने पर याचिका वापसी का दबाव बनाया जा रहा है। पर ठेकेदार भी अड़ा है और जल्द ही साहब के और ‘कारनामे’ सार्वजनिक होने वाले हैं।
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सुल्तान के लिए फिर होगी गुलाब प्रदर्शनी
राजधानी में गुलाब प्रदर्शनी हुई, पर सुल्तान व्यस्तता के कारण नहीं आ पाए। अब अफसरों को फरमान मिला है कि प्रदर्शनी दोबारा लगाई जाए। अफसरों की हालत खराब है क्योंकि खिले हुए फूल दोबारा कैसे खिलाएं? प्रदर्शनी स्थल पर भी मंच व इससे जुड़ी सामग्री बिखरी पड़ी है। ताकि फिर से लगाई जा सके। जबकि, मौसम विभाग से दुआएं की जा रही हैं कि ठंड बनी रहे ताकि बाजार से नए पौधों का जुगाड़ हो सके। बेचारे फूलों का भी क्या कसूर, अब उन्हें ‘सुल्तान’ की खातिर दोबारा खिलना ही होगा।
आईपीएस भतीजे का पावर भी काम न आया
इंदौर में कनाड़िया के पूर्व टीआई का गुमान अब टूट चुका है। साहब के भतीजे भोपाल में आईपीएस हैं, इसी पावर के दम पर उन्होंने खूब माल कूटा। हद तो तब हुई जब साहब ने एक व्यक्ति से पर्याप्त वसूली न मिलने से खफा हो गए। और उसपर कई केस ठोंकने के लिए सीनियर्स को भी अनसुना कर दिया और भतीजे से फोन करवा दिया। पर मामला कोर्ट पहुँचा तो “कानून के हाथ” आईपीएस भतीजे के पावर से भी लंबे निकले। साहब अब अर्श से फर्श पर हैं।
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सुल्तान का साहस या रियल एस्टेट की चाहत?
भोपाल गैस त्रासदी स्थल पर 41 साल से कोई सुल्तान नहीं गया था, पर हमारे सुल्तान ने यह मिथक तोड़ दिया। जैसे उन्होंने धार्मिक नगर में रात ठहरने का मिथक तोड़ा, वैसे ही यहाँ भी पहुँच गए। लेकिन लोगों के पेट में दर्द ये है कि यहाँ के ‘जमीनों के उस्ताद’ ने कहीं इस वीरान जमीन में भी ‘सोना’ तो नहीं देख लिया? आखिर सुल्तान का जमीन से लगाव जगजाहिर है।
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लंदन यात्रा के लिए सीनियर आईएएस का अनोखा जुगाड़
विदेश यात्रा का शौक किसे नहीं होता? एक सीनियर आईएएस ने लंदन दौरे के लिए सैर-सपाटा बोर्ड के अपने मित्र आईएएस के साथ मिलकर गजब का जुगाड़ फिट किया। जैसे ही पता चला कि मित्र बोर्ड से हटने वाले हैं, साहब ने अपनी यात्रा स्पॉन्सर करवा ली। बोर्ड की तरफ से लंदन में एक ‘ऑफिशियल व्याख्यान’ का टूर मंजूर हुआ और साहब की सैर हो गई। इसे कहते हैं— “जाते-जाते दोस्त का भला कर जाना।”
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खाकी वर्दी से मोहभंग
एक काबिल अफसर का खाकी से मोहभंग हो गया है और वे VRS ले रहे हैं। दिल्ली में प्रतिनियुक्ति पर रणनीतिक खुफिया एजेंसी के चीफ रहे इस अफसर को शायद खाकी का रूखापन नहीं भाया। अब वे साइबर और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपना जलवा दिखाएंगे। नई पारी के लिए उन्हें बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
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लेखक की टिप्पणी: ‘द इनसाइडर्स’ का उद्देश्य व्यवस्था के छिपे हुए चेहरों को सामने लाना है। यह अंक भी उसी निष्पक्षता और पैनेपन के साथ समर्पित है।



