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The Insiders: मंत्री के विशेष सहायक ने ‘स्वामीजी’ संग की उत्तम मनी लॉन्ड्रिंग, ACS ने झक्कीपन में सार्वजनिक किया बैंक स्टेटमेंट, मंत्री के IAS दामाद का प्रोटोकॉल ड्यूटी से इनकार

द इनसाइडर्स में इस बार में पढ़ें यूपी व बिहार से आई नौकरशाही की खेप के मप्र में आने की वजह

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | प्रवासी पक्षी और ख़ानाबदोश.. भाग-11

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को प्रणाम कर आज की चर्चा का श्रीगणेश करते हैं। प्रभु श्री राम ने अपने वनवास के 12 वर्ष चित्रकूट में और अंतिम वर्ष नासिक के पंचवटी में बिताया था। हमारे लिए यह परमानंद का विषय है कि चित्रकूट और नासिक के मध्य ही हमारा मध्य प्रदेश स्थित है। रामचरितमानस के अयोध्या कांड का वह प्रसंग स्मरण कीजिए, जब प्रभु चित्रकूट पहुंचे थे:
“यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥ कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥”
जब वहाँ की मूल जातियों—कोल और किरात (वनवासियों)—को प्रभु के आने की सूचना मिली, तो वे दोना भर-भरकर कंद-मूल और फल लेकर उनके स्वागत में ऐसे दौड़े मानो किसी रंक को स्वर्ण भंडार मिल गया हो। इसका मूल कारण था— ‘अध्यात्म और प्रेम का सरलता द्वारा आत्मीय स्वागत।’ सवाल यह है कि वन-गमन के लिए प्रभु श्री राम ने दक्षिण की ओर ही प्रस्थान क्यों किया? जबकि उत्तर का हिमालय अयोध्या के कहीं अधिक समीप था। दरअसल, अनेक गूढ़ कारणों में से एक था— ‘अध्यात्म का सरलता से मिलन’, जो चित्रकूट की पावन धरा पर चरितार्थ हुआ। काशी, अयोध्या, प्रयाग, माया, मथुरा और नालंदा (आज के यूपी-बिहार) से बौद्धिकता और ज्ञान की धारा सदियों से हमारे प्रदेश में बहती रही है। हमारे प्रदेश की ‘पिछड़ी और आदिम जातियों की सरलता’ ने हमेशा इस ज्ञान का आदर और सत्कार किया है। यही परंपरा अंग्रेजों के समय ICS से शुरू होकर आजादी के बाद UPSC और PSC के माध्यम से आज भी अनवरत जारी है। बहुत से अधिकारी और शिक्षक यहाँ ‘अमृत रूपी ज्ञान’ लेकर आए और प्रदेश का मार्ग प्रशस्त किया। प्रभु श्री राम के युग से लेकर अब तक आए ऐसे समस्त ज्ञानपुंजों और मार्गदर्शकों को हमारा कोटि-कोटि नमन। लेकिन… लेकिन… लेकिन…

इसी जिजीविषा और संघर्ष के मंथन से ‘कुछ’ राहू भी अवतरित हुए, जो मुख में अमृत और मस्तिष्क में विष लिए अपनी मायावी लीला रचने लगे। चूँकि हमारा ध्येय पाठकों को ‘रोचकता’ परोसना है, इसलिए हम इन्हीं ‘कुछ’ खानाबदोश किरदारों के कारनामों को समझेंगे। (शेष पुण्यात्माओं को पुनः सादर नमन)। एक सरकारी सेवा सामान्यतः 30 से 35 वर्ष की होती है। शासन के मानदंडों में 33 वर्ष की सेवा को अर्धवार्षिकी का पैमाना माना जाता है। अतः इन ‘खास’ खानाबदोशों के सेवाकाल को हम 11-11 वर्षों के तीन कालखंडों में बांटेंगे और अगले अंक में ‘ प्रथम एकादशक’ ( सेवा के पहले 11 साल) के कारनामे जानेंगे… और अब शुरू करते हैं आज का द इनसाइडर्स, अपने वही पुराने गुदगुदाने वाले अंदाज में…

हम्माल सेवा से आईएएस बने साहब की ‘ईमानदार’ दरियादिली

आमतौर पर साहबों का सबसे प्रिय शगल होता है—अधीनस्थों के खिलाफ जांच बैठाना और फिर उसकी फाइल दबाकर मोटी वसूली करना। कई बार बेचारा कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी निर्दोष होने के बावजूद ‘क्लियरेंस’ के लिए एड़ियां रगड़ता रहता है। कुछ साहब तो ट्रांसफर या रिटायरमेंट से ठीक पहले इन फाइलों की धूल झाड़ते हैं ताकि जाते-जाते जेबें गर्म हो सकें। लेकिन ‘हम्माल सेवा’ (SAS) से प्रमोट होकर आईएएस बने एक साहब ने गृह निर्माण से जुड़ी संस्था में कदम रखते ही ‘जांच वाली कुंडली’ खोल दी। साहब की सहृदयता देखिए—उन्होंने बरसों से अटकाई गई फाइलों के किरदारों को खोजा और निर्दोषों को बाइज्जत बरी कर दिया। बरी होने वालों में वो इंजीनियर भी थे जो सालों पहले रिटायर हो चुके थे। साहब की इस ‘बिना सेवा-शुल्क’ वाली दरियादिली को देख इंजीनियरों की आंखों में आंसू आ गए। साहब का साफ कहना है—”किसी को परेशान करने के लिए फाइलें पेंडिंग मत रखो।” यदि ऐसे ही कुछ और ‘साहिबान’ मिल जाएं, तो रामराज्य आने में देर नहीं लगेगी।

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मंत्री का दामाद हूँ, सीएम की ड्यूटी नहीं करूँगा!

राजधानी के प्रशासनिक गलियारों में एक आईएएस साहब के तेवर इन दिनों सातवें आसमान पर हैं। वजह? वे एक पावरफुल कैबिनेट मंत्री के ‘दामाद श्री’ जो ठहरे। कुछ समय पहले व्यवस्था बनी थी कि स्टेट हैंगर पर सीएम साहब के प्रोटोकॉल में कलेक्टर के अलावा एडीएम रैंक के अफसर भी ड्यूटी करेंगे। व्यवस्था सुचारू चल रही थी कि तभी ‘दामाद साहब’ की पोस्टिंग एक रसूखदार प्राधिकरण में हो गई। शुरू में तो उन्होंने जैसे-तैसे ड्यूटी की, लेकिन फिर एक दिन उनका ‘अहं’ जाग गया। उन्होंने ससुर जी (मंत्री जी) के कान में प्रोटोकॉल की व्यथा सुना दी। बस फिर क्या था, तब से दामाद साहब को सीएम की ड्यूटी से ‘अलिखित’ और स्थायी छूट मिल गई है। इसे कहते हैं—ससुराल का पावर!

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मीटिंग… वसूली… बस यही काम है मेरा!

प्रदेश की आर्थिक राजधानी (इंदौर) में कानून के एक रखवाले साहब का ‘वसूली अंदाज’ खाकी वालों में खौफ पैदा कर गया है। साहब सुबह से शाम तक ‘मीटिंग-मीटिंग’ का खेल खेलते हैं। इस समीक्षा के चक्रव्यूह में फंसे वरिष्ठ अफसर न तो फरियादी की पुकार सुन पा रहे हैं और न ही मैदान में उतर पा रहे हैं। नतीजा—केसों की पेंडिंग लिस्ट लंबी होती जा रही है और साहब फिर उन्हीं पेंडिंग केसों पर मीटिंग बुला लेते हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसका गुरुत्वाकर्षण हर दो-तीन महीने में किसी न किसी टीआई की जेब खाली करता है। थाने में टिके रहना है तो ‘एक खोखे’ से ऊपर का नजराना देना ही पड़ता है।

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एसीएस ने व्हाट्सएप पर लगा दिया करोड़ों का बैंक स्टेटमेंट!

एक एसीएस (ACS) साहब अपने ‘झक्कीपन’ के लिए मशहूर हैं और इसी मिजाज के कारण उन्हें ‘मलाईदार’ विभाग नसीब नहीं होते। हाल ही में साहब ने अपनी झक में व्हाट्सएप स्टेटस पर अपने बैंक स्टेटमेंट की कॉपी लगा दी। जिसने भी देखा, उसकी आंखें फटी रह गईं—खाते में करोड़ों रुपए जमा थे! अब इतने पैसे कहाँ से आए, यह तो साहब जानें, लेकिन चर्चा है कि वे शेयर मार्केट के पुराने खिलाड़ी हैं। साहब तब से निवेश कर रहे हैं जब हर्षद मेहता कांड के डर से लोग बाजार को छूते भी नहीं थे। पर साहब, अगली बार झक में कुछ और ‘सार्वजनिक’ न हो जाए, इसका ध्यान रखिएगा।

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लौट रही है सुलेमानी ताकत!

कभी मुख्य सचिव (CS) की दौड़ में रहे एक ‘सुलेमानी ताकत’ वाले अफसर ने पिछले साल अचानक वीआरएस (VRS) ले लिया था। तब कयास थे कि साहब एक साल का ‘कूलिंग ऑफ पीरियड’ काटकर सीधे अदाणी जी की शरण में जाएंगे। रहस्य से पर्दा हट चुका है—साहब फिलहाल एक दूसरी बड़ी कंपनी में ‘अवैतनिक कंसल्टेंट’ के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। मार्च में जैसे ही कूलिंग पीरियड खत्म होगा, कंपनी उनका स्वागत एक मोटे ‘जॉइनिंग बोनस’ के साथ करेगी। यह बोनस दरअसल पिछले एक साल की ‘अवैतनिक सेवा’ का पिछला भुगतान होगा। यानी कूलिंग पीरियड भी कट गया और मलाई भी सुरक्षित रही। इसे कहते हैं—असली एडमिनिस्ट्रेटिव मैनेजमेंट! हालांकि सबको पता है कि सुलेमानी ताकत वर्तमान बड़े साहब के साथ परदे के पीछे से सक्रिय रहते ही है। क्योंकि यह ताकत साहब की ब्यूरोक्रेसी में एक मात्र दोस्त है।

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मंत्री जी के विशेष सहायक पर ‘स्वामीजी’ का आशीर्वाद

गंभीर आरोपों में घिरे एक ‘स्वामीजी’ भले ही पुलिस की पकड़ से दूर हों, लेकिन उनके कृपापात्रों के होश उड़े हुए हैं। ‘द इनसाइडर्स’ को पता चला है कि आवाजाही वाले विभाग के मंत्री जी के विशेष सहायक (संजय वाली भूमिका में) स्वामीजी के बेहद करीबी हैं। इस कृपापात्र के तार उत्तम किस्म की मनी लॉन्ड्रिंग से भी जुड़े बताए जाते हैं। पूर्व में हमने खुलासा किया था कि जब यह महाशय इंदौर-जबलपुर दोनों जगह पदस्थ थे, तब ड्यूटी के लिए हवाई जहाज से ‘अप-डाउन’ करते थे। यही नहीं, एक जिले में अपने कलेक्टर साहब के लिए WWW यानी ‘वेल्थ, वाइन और वूमन’ की व्यवस्था अपने निजी फार्म हाउस पर करना इनका मुख्य पोर्टफोलियो था।

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यादव और धाकड़ की ‘टेंडर जुगलबंदी’

उच्च शिक्षा विभाग में इन दिनों दो नामों की तूती बोल रही है—यादव और धाकड़। दोनों की ‘केमिस्ट्री’ ने 52 करोड़ रुपए के कंप्यूटर लैब टेंडर को फुटबॉल बना दिया है। यादव जी अपनी ‘यादवी शक्ति’ का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो धाकड़ जी ने ‘विटामिन-M’ (मनी) के दम पर ओएसडी साहब से सांठगांठ कर ली है। इस मिलीभगत का नतीजा यह हुआ कि ‘डेल’ (Dell) जैसी नामी कंपनी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। टेंडर की शर्तों को जिस तरह मोड़ा गया है, उससे साफ है कि विभागीय प्रमुख की भी इस ‘नेक कार्य’ में पूरी सहमति है। धाकड़ जी के बाकी कारनामे अगले अंक में…

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धुरंधर और धुंधकारी की जोड़ी ने विभाग को ‘निपटाया’

फिल्म ‘धुरंधर’ में हीरो भले ही ल्यारी गैंग का खात्मा करता हो, लेकिन हमारे पानी से जुड़े विभाग के ‘धुरंधर’ (मुखिया) और ‘धुंधकारी’ (ईएनसी) ने मिलकर पूरे विभाग का ही खात्मा कर दिया है। ये दोनों साल भर तक पानी की स्कीमों के मेंटेनेंस की नीति बनाते रहे, लेकिन ग्रामीण विकास विभाग की ‘मैडम’ ने हर बार ऐसी टंगड़ी मारी कि साहब लंगड़े हो गए। आखिरकार, कैबिनेट मीटिंग में फैसला हुआ कि मेंटेनेंस का काम अब ‘ग्रामीण विकास’ ही करेगा। और इसमें जी राम जी मदद करेंगे। लिहाजा, अब पानी वाले विभाग के पास न काम बचा है, न बजट। दो-तीन सालों में यह विभाग अंतिम सांसें गिन रहा होगा, और तब ‘धुंधकारी’ शायद बांस में कैद होकर अपनी ‘भूत योनि’ से मुक्ति के लिए श्रीमद्भागवत कथा श्रवण कर रहे होंगे।

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