The Insiders: आईएएस ने सजा में मिली कलेक्टरी को आनंद में बदला, सीनियर आईएएस 900 चूहे खाकर दिल्ली जाएंगे, राजधानी में चौपाया मीट का अनूठा आयोजन

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़िए रसूखदारों की सविर्स मीट का रोचक अंदाज में वर्णन

कुलदीप सिंगोरिया | भोपाल
@9926510865

प्रवासी पक्षियों की विशेष श्रृंखला को इस बार अस्थाई विराम। वजह – 19 दिसंबर से— राजधानी भोपाल में एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। किसका? कहा जा रहा है—यह मेहनतकश चौपायों  का वार्षिक सर्विस मीट है। वही जीव, जो जीवन भर बोझ (नेताओं की जी हुजूरी) ढोते हैं, मार खाते हैं, फिर भी निष्ठा और भोलेपन में कमी नहीं आने देते। उन्हें समझ नहीं आता कि दुनिया उन्हें चौपाया क्यों कहती है—वे तो खुद को तंत्र का आधारस्तंभ (स्टील फ्रेम) मानते हैं। इन चौपायों की दुनिया ठीक वैसी ही है— जहाँ मालिक की एक लाठी उन्हें दिशा दिखाती है और एक पुचकार व कुछ अदद रोटी के टुकड़े (डकैती की रकम) उन्हें निष्ठावान बनाती है। वर्षों की सेवा में उन्होंने इतना सीख लिया है कि झूठी ताकत को असली सुख समझ बैठते हैं। उनकी रोज़मर्रा की दिनचर्या में मेहनत है, दौड़भाग है, पैसा है और फैसले भी हैं— लेकिन जीवन के असली आनंद? वो तो कहीं खूँटे पर ही बंधे रह जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी गलतफहमी भी वही है जो हर चौपाया की होती है— “मैं न चलूँ तो दुनिया रुक जाएगी।” जबकि दुनिया को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इस फेर में जनता को मूर्ख समझ कर उनसे ये जरूर रोजाना ढेचूं-ढेचूं करवा लेते हैं। हालांकि, जनता—जो इस कहानी में मालिक से भी बड़ी ताकत है—मौका पड़ने पर उन्हें चौपाया होने का अहसास करवा देती है।

वापस आते हैं चौपाया एनुअल मीट की तैयारियों पर। तो इस बार के मेले में व्यवस्था वाहक यानी दलालों ने इन बोझवाहकों की “मौज” के लिए सम्मान–राशि भी वसूल ली है। ठेकों से पेटियां ऑर्डर हो गई हैं। जो मेहमान चौपाया आएंगे, उन्होंने खुद के पुराने पैंसठियों(चापलूस की विशिष्ठ प्रजाति) की मदद से सुंदरियों की तलाश कर ली। वहीं, ठेकेदारों ने भी हँसते हुए अपने खजाने खोल दिए हैं। यह तो मौका जब इन मेहनतकशों की पीठ पर हाथ फेरने और सवारी का मौका मिलेगा? पीठ पर बोझ हो या बोझ बढ़ाने वाला हाथ — आदत दोनों की हो चुकी है। उधर महल के सुल्तान—जो हर बार दावत में आते थे— इस बार पहले ही कह चुके थे कि नहीं आएँगे। अब आएँगे या नहीं, यह बाद का किस्सा है। वैसे, सहलाना सबको पसंद है तो आ ही जाएंगे। पर चौपायों में खुसर-पुसर जारी है— मालिक आए तो भी उनकी कृपा, न आएँ तो भी उनकी महिमा। दिन में खेल-कूद होगा, शाम को सांस्कृतिक रंग टपकेंगे और रात में जाम छलकेंगे। पर श्रेणी-क्रम में नीचे वाले बोझवाहकों यानी पूर्व में हम्माली करने वालों के लिए यह सब क्या है? उसी पुरानी रेहड़ियों की गूँज— जिसे वे वर्षों से सुनते, निभाते और ढोते आए हैं। और अंत में निष्कर्ष वही— चौपाया की सबसे बड़ी चूक यह है कि पॉवर को अपने जीवन का मुकुट समझने लगता है। सत्ता के खेत में चरने वाला चौपाया यही भूल जाता है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका भोला परिश्रम है… और सबसे बड़ी कमजोरी—उस पर गर्व करना। तो फिर आपको और ज्यादा इंतजार न कराते शुरु करते हैं चौपाया की मेहनत पर बना आज का द इनसाइडर्स…

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कलेक्टर साहब: सज़ा में मिली कलेक्टरी, और जिले को मिली ईमानदारी की रोशनी

कलेक्टरी किसे नहीं भाती? पर एक अफसर थे—सत्ता की बंदरगुलाटी देख-देखकर इतने विरक्त कि कुर्सी को साधु की तरह ठुकरा बैठे। सिस्टम का अहं जागा और सज़ा में उन्हें दो तहसीलों वाले छोटे व नए नवेले जिले का कलेक्टर बना दिया गया। फाइलों की भाषा में—“नीचा दिखाना”। लेकिन साहब ऐसे थे जिन्हें गिराया नहीं जा सकता। जहाँ कदम रखें, उसे कर्मभूमि–कुंभ बना दें। 27 साल पहले ढाई तहसीलों का प्रभार संभाल चुके थे; अब दो तहसील भी उनके हाथों में सम्मान बन गईं। जिले के लोग भी पहली बार बेइमानी की जकड़न से राहत महसूस करने लगे। एक दिन खनिज ठेकेदार साहब रूटीन की तरह महीने की ₹1,00,000/- की “किस्त” लेकर पहुँचे। साहब मुस्कुराए— “ये लौटा दीजिए… यहाँ इसकी जरूरत नहीं।” ठेकेदारों की आँखों में सुकून उतर आया। बोला— “साहब, ऊपर से तो आजकल रोज फोन आते हैं… हम तंग आ चुके हैं। आपकी वजह से अब थोड़ा ठीक से कमा पाएँगे।” और उसी पल पूरे जिले में संदेश फैल गया
ईमानदारी आज भी चलती है—अगर कोई उसे चलने दे।
सज़ा में आए थे कलेक्टर साहब, लेकिन जिले को ईमानदारी का उपहार दे गए—एक ऐसी कहानी, जो आगे आने वालों और खासकर यूपीएससी में सी-सेट प्रणाली के बाद आने वाली पीढ़ी को राह दिखाएगी।

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900 चूहे खाकर बिल्ली दिल्ली चली

राजधानी के गलियारों में इन दिनों एक सीनियर अफसर की दिल्ली जाने की चर्चा गर्म है। तैयारी पूरी, पैकिंग मुकम्मल, और शायद नए साल में आधिकारिक आदेश भी आ जाए।  यानी मुहावरा पूरा सार्थक— “900 चूहे खाकर बिल्ली दिल्ली चली।” हालांकि, अब विभाग पानी की कमी से सूखा ग्रस्त है। इसलिए साहब ने मध्यप्रदेश में ही दूसरे विभाग में अपनी दाल गलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर बड़े साहब ने हर कोशिश पर ऐसा पानी फेरा कि मसाले भी घुलने के पहले बह गए। यही नहीं, एक निगम में पदस्थ एक ईमानदार आईएएस ने इनकी कमाई पर सीधा प्रहार कर दिया। अपने निगम के पीडी—जो साहब के विभाग के विभाग में ईएनसी भी है—को हटाकर उन्होंने साहब के पर ऐसे कतर दिए कि उड़ान का कोण ही बदल गया। कहा जा रहा है कि यही वह क्षण था जब दिल्ली जाने का फैसला पक्का हुआ।  हालांकि साहब की मासूम सफाई यह है कि सारे चूहे तो पिछले वाले निपटा दिए थे। उधर, इस उड़ती खबर से मौजूदा विभाग के ईएनसी तो जैसे मुक्त–उत्साह में दीपावली मना रहे हों। हफ्ता–वसूली की थकान से हलक सूख चुका था। कहते हैं— “साहब इतनी निचोड़ लगाते थे कि जेब में हवा भी मुश्किल से बचती थी।” अब जब बोझ हट रहा है तो विभाग को ऐसा लग रहा है जैसे वर्षों बाद रेन वाटर हार्वेस्टिंग का कोई स्रोत खुल गया हो। फिर भी साहब की काबिलियत का लोहा उन्हें मानना पड़ेगा— बड़े घोटाले में फँसे 150 इंजीनियरों में से अधिकतर को बचाने का प्रबंधन उन्होंने इतनी सफाई से किया कि विभाग के रिकॉर्डर भी शर्मा जाएँ। ऊपर से डाँट–फटकार, नीचे से प्रबंधन— यानी संतुलन की ऐसी कला जो सिर्फ अनुभवी कलाकार ही कर सकें। अंत में सवाल वही— 900 चूहों की गिनती कौन करे? और दिल्ली जाकर बिल्ली कितने और चूहे खाएगी? यह समय बताएगा। फिलहाल तो विभाग में राहत की साँस है और राजधानी? वह तो वैसे ही तैयार रहती है— नई बिल्लियों, नए चूहों और नए खेलों के लिए।

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नर्मदा परिक्रमा: देह–विदेह का द्वंद्व और प्रचार का प्रवाह

नर्मदा तट पर इन दिनों एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी और उनकी धर्मपत्नी की पदयात्रा खूब सुर्खियाँ बटोर रही है। परिक्रमा तो धार्मिक और आध्यात्मिक साधना मानी जाती है—मौन, तप, अंतर्दृष्टि और अहं के विसर्जन का मार्ग। पर यहाँ दृश्य उलटा है। यात्रा शुरू होने से पहले बाकायदा प्रचार, पोस्टर, वीडियो… और यात्रा के दौरान नियमित इंटरव्यू। भक्तिभाव की वह पवित्र खामोशी कहीं पृष्ठभूमि में धुँधली पड़ रही है। लोग चुटकी ले रहे हैं— आश्रम से शुरू हुई परिक्रमा में विदेह तो दूर, देह का विस्तार ही मुखर है। ज़मीन पर फुसफुसाहट यह है कि यदि यह सचमुच धार्मिक यात्रा है तो फिर इतनी सांसारिक हलचल किसलिए? इंटरव्यू में वे स्वयं को “वानप्रस्थ में प्रवेश” करते बताते हैं— पर जनता पूछ रही है: वानप्रस्थ है या वैनिटी प्रोजेक्ट? यात्रा की मंशा चाहे कितनी भी निर्मल बताई जाए, दिखावे की कशिश उसके ऊपर एक पतली-सी परत बनकर चिपकी रहती है। आश्रम को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं— क्या यह संपत्ति उनके घोषित प्रापर्टी डिक्लरेशन में दर्ज है? कहा जा रहा है कि यह परिक्रमा केवल आत्मिक खोज भर नहीं, बल्कि नर्मदा पथ पर संभावित स्प्रिच्युअल टूरिज़्म की संभावनाएँ टटोलने का भी प्रयोग है। यानी यात्रा के हर पड़ाव पर एक अनकहा प्रश्न— कहाँ–कहाँ रिसॉर्ट–नुमा आश्रम उग सकते हैं? अब यह तय करना जनता का काम है कि यह
यात्रा परम–पथ का अनुष्ठान है
या परमिट–पथ का सर्वेक्षण

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कलेक्टर और कप्तान साहब का अलाप… “मेरी मर्ज़ी”

नई-नई कलेक्टरी और कप्तानी का रोमांच कई बार नौजवानों पर ऐसे हावी होता है कि होश ठिकाने से उतर जाते हैं। और इसी बौराहट में हास्यास्पद कारनामों की सूची लंबी होती चली जाती है। कुछ ऐसा ही उत्तर-पश्चिम के एक जिले में हुआ। यहाँ पहुँचीं नौजवान मैडम ने कप्तान के साथ होमगार्ड स्थापना दिवस पर परेड जीप में बैठकर सलामी ले ली—जबकि प्रोटोकॉल कहता है कि यह हक़ सिर्फ़ राष्ट्रीय दिवसों का है। पर “मेरी मर्ज़ी” गाना गोविंदा का हो या मैडम का—तर्ज़ एक ही रहती है। सो, धूमधाम से सलामी भी ली गई और उसका प्रचार-प्रसार भी। बदकिस्मती से कुछ दिलजलों ने यह बात राजधानी तक पहुँचा दी है। हितोपदेश में लिखा भी है—“काकस्य विधि नष्टा भवति”—सीमा लाँघने पर व्यक्ति हास्यास्पद ही बनता है।

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सलाहकारी छोड़ लॉबिंग में जुटे पंडित जी

धर्म, संस्कृति और राजनीति—तीनों में एक साथ सिद्धहस्त, और सुल्तान के खासम-खास, पंडित जी का मीडिया प्रेम नया नहीं है। रिटायरमेंट के बाद तो मीडिया मुगलों की छतरी तले बाकायदा नौकरी भी की। किस्मत पलटी तो फिर सुल्तान की चौखट पर लौट आए। अब मूल काम छोड़कर यह देखना कि किसकी मुलाकात करानी है, किस मीडियाकर्मी को कहाँ टिकवाना है और किस चैनल का सुर मिलाना है—इसी में पूरा दिन बीत जाता है। इससे कई लोग असंतुष्ट हैं… और कईयों की तो जैसे लॉटरी खुल गई हो। हम तो बस पंडित जी से यही कहेंगे— आखिरी पारी बिना राग-द्वेष के खेल लीजिए। वरना लोकायुक्त में एक ही दिन में छह प्लॉट खरीदने जैसी नई शिकायतें फिर से मंडराने में देर नहीं लगेगी।

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“यह तो अपुन का स्टाइल है…”

“मेरे स्वभाव में तेढ़ापन है”—सरकार के मुख से निकली यह पंक्ति प्रेस वार्ता में सुनकर कई लोग चौंक गए। लेकिन कहते हैं—दिल का दर्द कभी-कभी सीधे जुबान पर छलक ही जाता है। सरकार के दो साल पूरे होने पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में बड़े साहब नदारद थे। तभी भोले से एक पत्रकार ने ऐसा सवाल दाग दिया जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। सरकार पहले अचकचाए, पर जवाब ऐसा दिया कि पूरा हॉल चुप हो गया। संदेश साफ था— भले ही पर्ची वाले सत्ता के चेहरे हों, पर फोन वाले बड़े साहब कितने भी ताकतवर हों, तेढ़ापन झेलकर ही गुजरना पड़ेगा। सरकार की यह स्टाइल अब चर्चा का केंद्र है। एक ही जवाब ने बता दिया—अगर अफसरों ने तिया-पांचा किया, तो नकेल कसने में देर नहीं लगेगी। और बीते दो साल में इस बात के उन्होंने पर्याप्त नजीरें पेश की है। और न समझ में आए तो फिर भी दिल है हिंदुस्तानी फिल्म का यह गीत गुनगुना लीजिए –
हम लोगो को समझ सको तो, समझो दिलबर जानी
जितना भी तुम समझोगे, उतनी होगी हैरानी

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हमसे गिला क्यों

पिछले अंक में राजधानी की एक हाईप्रोफाइल शादी के रिसेप्शन का ज़िक्र किया था—जहाँ देश के अमीरी में नंबर दो और सत्ता-समीकरण में नंबर वन उद्योगपति समेत कई दिग्गज शामिल हुए। इतने बड़े आयोजन में जाने को प्रदेश के कई अफसर बेताब थे, पर बुलावा आया ही नहीं—सो मनमसोसकर बैठना पड़ा। उधर पड़ोसी राज्य से अफसरों की खेप आई तो एक साहब बुदबुदा उठे— “हमारा कैडर भी वहीं का होता तो पूछ-परख होती।” उद्योगपति पूरे परिवार के साथ आए, और आवभगत में एक पूर्व नौकरशाह तो ऐसे लगे हुए थे मानो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हों—क्योंकि आजकल उनकी दाल-रोटी वहीं से चल रही है। हाँ, चर्चा का एक और बिंदु रहा—प्रदेश के सरकार प्रमुख की उद्योगपति संग कोई फोटो न दिखना। और वह नौकरशाह, जिन्होंने अंतिम साल में वीआरएस लिया—उनकी मौजूदगी का निशान तक नहीं मिला। यह कूलिंग-ऑफ पीरियड का असर भी हो सकता है… या कुछ और।

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धुंधकारी की आत्मा बांस में अटकी

अंत में मोक्ष के लिए गुराण पुराण की कथा भी सुन लीजिए। वैसे भी, द इनसाइडर्स में धुंधकारी का उल्लेख न हो, तो यह अधूरा ही है। पिछले हफ्ते बताया था कि धुंधकारी ने बेटे की शादी धूमधाम से रचाने की तैयारी की थी। वेडिंग कार्ड पर दो-दो पद ठोंक दिए थे, मानो यह कार्ड नहीं—कर्मकांड का परिशिष्ट हो। पर पानी वाले निगम के प्रमुख को उनका दूसरा पद खटका और झटके से छीन लिया। बस, धुंधकारी भड़क उठे—जानते थे कि इस फैसले से शादी में आने वाले लिफाफों का वजन हल्का हो जाएगा। सो दुख की जड़ ऐसी पनपी कि गोकर्ण की कथा सुनने के बाद भी, धुंधकारी की आत्मा बांस में ही अटक गई—अटक गई तो अटक गई। नतीजा यह हुआ कि विवाह में स्टेज के सामने बाकायदा मेज सजाकर दो लोग तैनात किए गए—जो हर लिफाफा वहीं खोलकर एंट्री करते जाते थे। यह दृश्य इतना असहज था कि कई लोग टेबल तक गए ही नहीं। पर ठेकेदारों ने समझदारी दिखाई—लिफाफों का वजन बढ़ा कर।

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नोट – यह व्यंग्य कॉलम है। इसे व्यंग्य की भावना के अनुरूप पढ़े। फिर भी किसी को ठेस पहुंचती है या भावनाएं आहत होती है तो टीम द इनसाइडर्स क्षमा प्रार्थी है।
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