The Insiders: भागीरथ पुरा की गंगा को गटर में बदलने वाले IAS अफसर का दंभ, SSP को मिला अनोखा बर्थडे विश, घंटा शब्द के फेर में सिलावट गायब

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें इंदौर के भागीरथपुरा की घटना की इनसाइड स्टोरी

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | जहाँ पूरी दुनिया नए साल की खुमारी और जश्न के उल्लास में डूबी थी, वहीं इंदौर के भागीरथपुरा से आई एक खबर ने मानवता के मन को छलनी कर दिया। हम 21वीं सदी के उस मुहाने पर खड़े हैं जहाँ हम मंगल पर बस्तियाँ बसाने के ख्वाब देख रहे हैं, लेकिन धरातल पर हमारी ‘इंसानी अकर्मण्यता’ हमें पैशाचिक युग की ओर धकेल रही है। प्रसिद्ध चिंतक और लेखक अल्बर्ट कामू (Albert Camus) ने एक बार कहा था: “एक समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे लाचार और कमजोर वर्ग के साथ कैसा व्यवहार करता है।”

इंदौर की घटना चीख-चीख कर कह रही है कि हम इस परीक्षा में पूरी तरह विफल रहे हैं। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि हमारी सभ्यतागत मूल्यों का उपहास है।  भारतीय मनीषा में ‘भागीरथ’ वह नाम है, जिनकी घोर तपस्या ने स्वर्ग की गंगा को पृथ्वी पर उतारा ताकि मानवता का उद्धार हो सके। लेकिन आज का प्रशासन कितना ‘महान’ है कि उसने उसी भागीरथ के नाम पर बसे भागीरथपुरा में गंगा जैसी निर्मल जलधारा की बजाय, नलों से गटर का कालकूट जहर परोस दिया। यह केवल दूषित पानी की सप्लाई नहीं है, यह उस पांच हजार साल पुरानी सबसे उन्नत शहरी सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर अब तक के मानवीय विकास नामक भरोसे की हत्या है जो एक नागरिक अपनी चुनी हुई व्यवस्था पर करता है। प्रसिद्ध विचारक निकोलो मैकियावेली ने सत्ता के चरित्र पर कहा था: “जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था का अंत निकट है।” भागीरथपुरा में जो हुआ, वह इसी ‘भक्षक’ प्रवृत्ति का परिणाम है। यही कारण है कि इस बार ‘द इनसाइडर्स’ के इस अंक में हम न तो नव वर्ष की शुभकामनाओं की औपचारिकता करेंगे और न ही अपनी नियमित ‘प्रवासी पक्षी- खानाबदोश’ सीरीज पर चर्चा करेंगे। आज जश्न का नहीं, आत्म-चिंतन का समय है। हमने अपने पिछले अंकों में नौकरशाही की कार्यशैली और प्रशासनिक जड़ता पर तीखे प्रहार किए थे। हमारा उद्देश्य आलोचना मात्र नहीं, बल्कि सुधार की एक छोटी सी लौ जलाना था। यदि उन चेतावनियों को गंभीरता से लिया गया होता, तो शायद आज इंदौर को यह काला दिन न देखना पड़ता।

चूंकि आज हमारा मन व्यथित है, इसलिए आज का अंक हमेशा की तरह ‘चुटीला’ या ‘मजेदार’ नहीं होगा। आज के शब्द तीखे हैं, क्योंकि सच हमेशा कड़वा होता है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो: “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।” यदि इस अंक को पढ़ते हुए आपको मिर्ची लगे या मन में बेचैनी हो, तो अपने पास पानी और मीठे का प्रबंध जरूर रखिएगा। क्योंकि आज ‘द इनसाइडर्स’ प्रशासन के उस जख्म पर नमक छिड़कने आया है, जिसे वे ‘नॉर्मल’ कहकर भूल जाना चाहते हैं। आइए, चलते हैं आज के विशेष अंक की ओर…

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योग: अकर्मसु कौशलम बना नया ध्येय वाक्य

श्रीमद्भगवद्गीता का अमर श्लोक— ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का ध्येय वाक्य है। इसका सीधा अर्थ है: कुशलता के साथ काम करना ही योग है। इसके भावार्थ के लिए आप महान हस्तियों की टीकाएं पढ़ सकते हैं, और हमने भी अपनी एक पूरी सीरीज में ‘द इनसाइडर्स’ स्टाइल में इसे समझाया है। अब आज के मुद्दे पर आएं। इस ध्येय वाक्य का एक प्रतिशत भी यदि इंदौर नगर निगम कमिश्नर दिलीप यादव और अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया ने पालन किया होता, तो भागीरथपुरा की घटना कभी न होती। लेकिन यादव साहब यूपी-बिहार की तरह ‘यादवी दंभ’ में चूर रहे। सिसोनिया साहब की हरकतें तो हम उनके हरदा कार्यकाल के दौरान ही बता चुके हैं। वे जनप्रतिनिधियों की खूब अवहेलना करते थे और एक सीनियर महिला जनप्रतिनिधि को तो ‘बाई’ कहकर संबोधित करते थे। एक अफसर तो चुपरासीनुमा हरकत से भी बाज नहीं आते। अपनी शादी में ठेकेदारों को सिर्फ भारी लिफाफा देने के लिए आमंत्रित किया और हर गांव से लेकर पंचायत सचिव तक से कथित वसूली की गई।

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इंजीनियर चोर, तो महाचोर को क्यों बख्शा?

आम धारणा के तहत जिन इंजीनियरों को अफसर हमेशा ‘चोर’ कहते थे, देखते ही देखते अब ये अफसर खुद ‘महाचोर’ बन बैठे हैं। तकनीकी स्वीकृति तक ये अब खुद ही जारी करने लगे हैं। इंजीनियरों को ‘चोर व कमीशनखोर’ बोलकर इतना डराया गया कि वे इनके सामने पूरी तरह सरेंडर हो गए और इसका फायदा उठाकर अफसर खुद ‘मीर’ बन गए। इंदौर वाले केस में इंजीनियर इतने कर्मण्य तो थे कि टेंडर की फाइल लिए इन अफसरों के आगे-पीछे घूमते रहे, लेकिन अफसरों को न जाने कौन से लालच या आलसीपन ने ऐसा जकड़ रखा था कि उन्होंने एक अदद दस्तखत तक नहीं किए। फिर भी, हमेशा की तरह वरिष्ठ नौकरशाहों ने संजीव श्रीवास्तव समेत तमाम इंजीनियरों को सस्पेंड कर दिया, लेकिन इन अफसरों को ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ के टैग के कारण सिर्फ स्थानांतरित (Transfer) किया गया। क्या इन अफसरों को सस्पेंड कर विभागीय जांच शुरू नहीं होनी चाहिए थी? लेकिन प्रशासन को तो बस घटना का ‘घंटा’ बजाना था। कुछ समय बाद घटना, पीड़ितों और मृतकों को भुलाकर ये अफसर फिर अच्छी पोस्टिंग के लिए अरेरा व श्यामला हिल्स के मंदिर की परिक्रमा करेंगे और वहां घंटा बजाकर अगली कुर्सी का पूजन करेंगे।

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रसूखदारों की एंट्री और उज्जैन का ‘चमत्कार’

हटाए गए अफसरों की जगह जिन नए चेहरों को लाया गया है, वे दोनों ही बेहद प्रभावशाली और रसूखदार हैं। इनमें से एक प्रखर सिंह की शादी हाल ही में हुई है, जिसमें देश के नंबर दो उद्योगपति सपरिवार पधारे थे। भाजपा के कार्यवाहक अध्यक्ष, प्रदेश और पड़ोस के दिग्गज नेता और बड़े-बड़े अफसरों ने शिरकत की। वजह है अफसर के सुसराल पक्ष का भारी-भरकम रसूख। ससुर साहब खुद उस उद्योगपति के लिए काम कर रहे हैं; अब उनकी परछाई से दूर प्रखर सिंह वाकई जनता की सेवा कर पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। दूसरे अफसर आकाश सिंह हैं जो उज्जैन में भी पदस्थ रहे हैं। आजकल यह लाजिमी सा हो गया है कि ‘उज्जैन कांटेक्ट’ की वजह से अफसरों को मलाईदार पोस्टिंग मिलती है। यह विशुद्ध योग्यता है या कनेक्शन, यह अफसर ही जानें, लेकिन आकाश सिंह पर भ्रष्टाचार के पुराने आरोपों का दाग तो गहरा है ही। तीसरे अफसर आशीष पाठक हैं जो कि पूर्व में राज्म हम्माल सेवा के प्रतिनिधि रहे हैं और अब प्रमोटी आईएएस का तमगा लगवा चुके हैं। यह भी पूर्व में नगर निगम उज्जैन कमिश्नर रह चुके हैं।

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‘घंटा’ की वजह से कैलाश टेंशन में, मौज में सिलावट और ‘मियां नौशाद’

‘घंटा’ शब्द का प्रयोग कर ‘नेशनल क्रश’ बने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के पुराने बयान सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ ला रहे हैं। मंत्री जी ने अपने ‘मैकओवर’ की काफी कोशिश की, पर नुकसान की भरपाई का हर प्रयास उन्हें और ज्यादा ट्रोल कर गया। मंत्री जी याद रखिए, कमान से छूटा तीर और जुबान से निकले शब्द वापस नहीं आते। इसलिए कबीरदास की वह बात गांठ बांध लें: ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय, औरन को सीतल करै, आपहुं सीतल होय”। खैर, कैलाश जी के शोर में दूसरे जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट की मौज हो गई। आखिर वे भी इंदौर के ही हैं, लेकिन मजाल है कि किसी ने उनसे एक सवाल पूछा हो या उन्होंने भागीरथपुरा जाने की जहमत उठाई हो। उनके विभाग में ‘नौशाद’ नामक एक प्राणी के खूब चर्चे हैं; कहा जाता है कि मियां नौशाद ही ‘असली मंत्री’ हैं। मुमकिन है कि मियां नौशाद इस नाते भागीरथपुरा तफरीह भी कर आए हों, पर हमें इसकी खबर नहीं लगी। विपक्षी खेमे को भी शायद सिलावट जी की याद नहीं आई, जिसकी एक वजह विपक्ष के नेता के क्षेत्र की बड़ी स्कीम का एक टेंडर भी हो सकता है।

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ईमानदारी के क्षितिज की अग्निपरीक्षा

जांच, सस्पेंशन और ट्रांसफर के अंतहीन सिलसिले के बीच नगर निगम कमिश्नर के तौर पर 2014 बैच के क्षितिज सिंघल की पदस्थापना ने घाव पर थोड़ा मरहम जरूर लगाया है। ‘ईमानदारी’ जो कि आज के दौर में दुर्लभतम है, वह गुण सिंघल में कूट-कूट कर भरा है। हालांकि, खुद ईमानदार होना एक बात है और सड़े-गले सिस्टम को ठीक करने के लिए भ्रष्टों पर डंडा चलाना दूसरी बात। यह उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। वैसे भी इंदौर में लोग रिश्वत देने में बहुत बुरा नहीं मानते, ऐसे में भ्रष्ट व्यवस्था पर लगाम कसना चुनौतीपूर्ण होगा। कहा जा रहा है कि सिंघल जबलपुर जाना चाह रहे थे क्योंकि उनकी अर्धांगिनी सिवनी की कलेक्टर हैं। पर फिलहाल उन्हें इंदौर के कीचड़ को साफ करने की जिम्मेदारी दी गई है।

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सरकार ने अलग राग अलापा

भागीरथपुरा की घटना से ‘सुल्तान’ भी व्यथित हैं, इसलिए धड़ाधड़ कार्रवाई हो रही है। हालिया बैठक में सुल्तान ने कह दिया कि यदि नगर निगम पानी की सप्लाई ठीक से नहीं कर पा रहा, तो जिम्मेदारी PHE को सौंप दी जाए। अब यह बात कितनी आगे बढ़ती है, यह सरकार जाने। लेकिन सवाल यह है कि PHE ने ‘जल जीवन मिशन’ में भ्रष्टाचार के जो कीर्तिमान रचे हैं, क्या उनकी चिंता नहीं होगी? यहाँ अफसरों ने बड़ी ‘उम्दा’ कारस्तानी की है: पानी साफ करने वाले उपकरणों की खरीदी में करीब 100 करोड़ रुपये फूंक डाले। बाद में IIT मद्रास की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि उन उपकरणों से पानी साफ ही नहीं होता। इसी कारण पिछले साल केंद्र सरकार की टीम को जांच में हजारों गांवों में दूषित पानी मिला और इस बार भी 36 प्रतिशत गांवों में पानी की गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं पाई गई। गांवों में दूषित पानी से इक्का-दुक्का मौतें होती हैं, इसलिए किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती। PHE मुखिया पी. नरहरि और पंचायत विभाग की मुखिया दीपाली रस्तोगी के बीच पिछले डेढ़ साल से मेंटेनेंस कौन करेगा पर खींचतान जारी है। नतीजा: जिन गांवों में काम पूरा हो गया है, वहां सप्लाई भगवान भरोसे है या बंद है। देख रहे हो बिनोद… कैसे ये ‘बड़के’ लोग हमें बेवकूफ बनाते हैं?

धुंधकारी बस मीटिंग-मीटिंग खेल रहा…

इंदौर जैसे हादसे क्यों होते हैं, इसे समझने के लिए हमारे पसंदीदा किरदार ‘धुंधकारी’ को पढ़िए। जल विभाग के इस बड़े इंजीनियर पर ‘द इनसाइडर्स’ ने पहले भी काफी कुछ लिखा है। ताजी खबर यह है कि इंदौर घटना के बाद धुंधकारी को ‘धुकधुकी’ लगी रहती है। टेंशन कम करने के लिए वे अब ‘मीटिंग-मीटिंग’ का खेल खेलने लगे हैं। हालांकि, धुंधकारी वीसी (VC) में बस बैठकर मुंगेरीलाल की तरह सुंदरियों के सपने देखते हैं और पुराने वाले ईएनसी की टीम इंजीनियरों को चमकाती रहती है। नतीजा ढाक के तीन पात—शिकायतों का अंबार कम नहीं होता। बस, मीटिंग एक बहाना है!

अनोखा बर्थ डे विश

ग्वालियर के एसएसपी धर्मवीर यादव को आरटीआई कार्यकर्ता आशीष चतुर्वेदी ने बड़े अनोखे अंदाज में जन्मदिन की बधाई दी है। दोनों के बीच अदावत पुरानी है। चतुर्वेदी ने यादव को शुभकामनाएं देते हुए चुभते सवाल पूछे हैं। उन्होंने लिखा कि IPC की धारा 409, 406, 420 से जुड़े एक प्रकरण में यादव पर कथित रूप से 20 लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप लगे। इसी मामले में CSP हीना खान द्वारा 5 लाख रुपये लेने और 50 लाख की अतिरिक्त मांग के भी आरोप हैं। चतुर्वेदी ने शुभकामना संदेश के साथ जो फोटो लगाया, उसके खूब चर्चे हैं—फोटो में यादव जी, चतुर्वेदी के एक फंक्शन में भोजन कर रहे हैं। अब इसके मायने आप खुद निकालिए। हालांकि, चतुर्वेदी पर जो मामला दर्ज हुआ था, उसमें पुलिस की बार-बार ‘उल्टी खटिया’ खड़ी हो रही है।

एसपी के आगे ‘प्रभारी’ न लिखने से नाराज आईपीएस

टीकमगढ़ में एक गजब का वाक्या सामने आया है। पुलिस महकमे में ‘प्रभारी’ शब्द का विस्मरण करना स्टेनो और कर्मचारियों को भारी पड़ गया। साहब ने ट्रेनिंग से लौटते ही 26 कर्मचारियों को नोटिस थमा कर पूछा है कि उनके नाम के आगे ‘प्रभारी’ क्यों नहीं लिखा? दरअसल, एसपी मनोहर सिंह मंडलोई 1 से 26 दिसंबर तक प्रशिक्षण पर थे। उनकी गैर-मौजूदगी में आलोक कुमार (सेनानी 18वीं वाहिनी) को प्रभार सौंपा गया था। लौटकर मंडलोई साहब ने पत्राचार देखा और पाया कि आलोक कुमार को “पुलिस अधीक्षक टीकमगढ़” तो लिखा गया, पर उसके आगे ‘प्रभारी’ शब्द नहीं था। बस, इतनी सी बात साहब की ईगो को चुभ गई और इसे ‘विभागीय अनुशासनहीनता’ करार देकर उन्होंने नोटिसों की झड़ी लगा दी।

चंबल की बदली तासीर: मौन कर्मयोगी बनाम डिजिटल योद्धा

चंबल के पानी के बारे में कहा जाता था कि यहाँ की तासीर बागियों के तेवर गढ़ती है, लेकिन अब यहाँ की फिजा दो कलेक्टरों के काम करने के अनोखे अंदाजों से महक रही है। एक तरफ मुरैना कलेक्टर लोकेश जांगिड़ हैं—एक मौन कर्मयोगी। वे सोशल मीडिया की चकाचौंध से कोसों दूर, बिना किसी शोर-शराबे के अचानक गांवों की चौपालों, स्कूलों और अस्पतालों में पहुंच जाते हैं। कैमरों से उनकी दूरी इतनी है कि उनका कोई सक्रिय अकाउंट तक नहीं है। दूसरी ओर, दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े एक डिजिटल योद्धा की तरह सक्रिय हैं। फेसबुक पर 2 लाख 80 हजार फॉलोअर्स वाले वानखेड़े साहब की हर बैठक और निरीक्षण का वीडियो तुरंत अपलोड होता है। मंत्रालय और हम उन्हें ‘सोशल मीडिया एडिक्ट’ कहते हैं, पर जनता को उनका यह ‘लाइव’ अंदाज भा रहा है।

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