The Insiders Breaking: मध्यप्रदेश में हर घर में दुकान-ऑफिस खोलने की मिली छूट, रहवासी इलाकों में व्यवसायिक गतिवधियों से बढ़ेंगी ट्रैफिक व इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतें
राज्य सरकार ने भूमि विकास नियम में संशोधन का नोटिफिकेशन जारी किया, मिक्स लैंडयूज को दी मंजूरी

कुलदीप सिंगोरिया। भोपाल
मध्यप्रदेश के शहरी नियोजन (Urban Planning) के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला नीतिगत यू-टर्न ले लिया गया है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा जारी असाधारण राजपत्र ने पूरे प्रदेश के मास्टर प्लान की मूल आत्मा को झकझोरकर रख दिया है। सरकार ने मध्यप्रदेश भूमि विकास नियम, 2012 में संशोधन का जो नया ड्राफ्ट पेश किया है, वह ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर लाया तो गया है, लेकिन इससे प्रदेश की रहवासी इलाकों में दुकान-ऑफिस या व्यवासायिक गतिवधियों को छूट देने का प्रावधान किया गया है। यानी कि अब आवासीय, व्यवसायिक, सार्वजनिक अर्ध सार्वजनिक जैसे अलग-अलग लैंडयूज को मिक्स कर दिया गया है। सरल शब्दों में समझे तो भोपाल अरेरा कॉलोनी, शाहपुरा और इंदौर के विजयनगर जैसे पॉश रिहायशी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियां अब वैध तरीके से संचालित हो सकेंगी। यानी आपके घर का सुकून भरा वातावरण छिन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एक तरफ जहाँ भोपाल नगर निगम (BMC) इन दिनों अरेरा कॉलोनी जैसे शांत आवासीय क्षेत्रों में बिना अनुमति चल रही कमर्शियल गतिविधियों, बड़े कोचिंग सेंटरों, रेस्टोरेंट्स और शोरूम्स पर सीलिंग और भारी जुर्माने के नोटिस थमा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार का यह नया नियम इन अनधिकृत व्यावसायिक गतिविधियों के लिए एक स्थायी ‘कानूनी कवच’ (वैधता) तैयार कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के नियम आने से मास्टर प्लान की उपयोगिता ही खत्म हो जाएगी। हर जगह-हर लैंडयूज की अनुमति वैध हो जाएगी तो फिर प्लानिंग किस तरह हो पाएगी। जैसे आवासीय क्षेत्रों में व्यवसायिक गतिवधियां चलने लगेंगी तो फिर सीवेज, पानी सप्लाई, इलेक्ट्रीसिटी लोड, ट्रैफिक और कानून व्यवस्था की नई चुनौतियां उत्पन्न होंगी। इससे सरकार कैसे निपटेंगी, इसका कोई प्रावधान नहीं किया गया है। हालांकि सूत्र बताते हैं कि सरकार ने यह संशोधन केंद्र सरकार के अर्बन रिफार्म के तहत किया गया है।
सरकारी अधिसूचना के मुख्य प्रावधान: क्या खुला, क्या बंद?
सरकार ने नियम 37 में नया उपनियम 1(क) जोड़कर पूरी व्यवस्था को पलट दिया है। पुराना नियम कहता था कि जो लिस्ट में है वही काम कर सकते हैं, लेकिन नया नियम कहता है कि “प्रत्येक भूमि उपयोग परिक्षेत्र में सभी गतिविधियाँ अनुमत होंगी, सिवाय उनके जो ‘निषिद्ध सूची’ (Negative List) में दर्ज हैं”। इसके तहत जमीन और भवनों का क्षैतिज (Horizontal) या ऊर्ध्वाधर (Vertical) मिश्रित उपयोग पूरी तरह मान्य होगा।
राजपत्र के अनुसार प्रमुख ज़ोन और उनकी पाबंदियां (Negative List) इस प्रकार हैं:
| ज़ोन / भूमि उपयोग श्रेणी | सामान्यतः निषिद्ध गतिविधियाँ (ये काम नहीं हो सकेंगे) |
| 1. आवासीय क्षेत्र (Residential Zone) |
हानिकारक व खतरनाक उद्योग, भारी विनिर्माण, गोदाम, प्रदूषणकारी उद्योग, बूचड़खाने, कबाड़खाने, संक्रामक रोग अस्पताल, जेल, बड़े परिवहन टर्मिनल, थोक व्यापार, तेल डिपो, गैस गोदाम, खनन, सुअर/मुर्गी/दुग्ध पालन, श्मशान व कब्रिस्तान। (यानी इन्हें छोड़कर दुकान, ऑफिस, कोचिंग व अस्पताल आदि सब वैध हो सकेंगे)। |
| 2. व्यावसायिक क्षेत्र (Commercial Zone) |
भारी उद्योग, खतरनाक/विषाक्त रसायनों व विस्फोटकों का भंडारण, थोक भंडारण डिपो, प्रदूषणकारी औद्योगिक गतिविधियां, खनन, सुअर/मुर्गी/दुग्ध पालन, श्मशान व कब्रिस्तान। |
| 3. औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Zone) |
पूर्णतः आवासीय टाउनशिप (कर्मचारी आवास छोड़कर), स्कूल, असंबंधित कमर्शियल मनोरंजन उपयोग, विरासत संरक्षण गतिविधियां, ईको-सेंसिटिव उपयोग। |
| 4. जल निकाय / तालाब क्षेत्र (Water Body Area) |
भूमि भराव (Land Filling), स्थायी निर्माण, औद्योगिक अपशिष्ट डंपिंग, अतिक्रमण, खनन, सुअर/मुर्गी/दुग्ध पालन, श्मशान व कब्रिस्तान। |
| 5. विरासत / संरक्षण क्षेत्र (Heritage Zone) |
बिना अनुमति के विध्वंस, असंगत ऊंची इमारतों का निर्माण, विशुद्ध आवासीय बस्तियां, प्रदूषणकारी उपयोग, भारी उद्योग, गोदाम, जेल, परिवहन टर्मिनल, थोक व्यापार। |
| 6. मनोरंजन / हरित क्षेत्र (Green Zone) |
आवासीय बस्तियां, उद्योग, कमर्शियल परिसर/गतिविधियां, गोदाम, खनन, थोक बाजार, तेल व गैस गोदाम, श्मशान व कब्रिस्तान। |
| 7. कृषि क्षेत्र (Agricultural Zone) |
शहरी आवासीय अभिन्यास (Layouts), urban commercial complexes, बड़ी कमर्शियल परियोजनाएं, उच्च घनत्व वाली आवासीय योजनाएं, भारी उद्योग, बड़े मॉल। |
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ग्राउंड रिपोर्ट: आखिर क्यों सुलग रहा है विवाद?
1. रहवासियों का ‘राइट टू पीस’ खत्म, कॉलोनियों में मचेगी भारी अव्यवस्था!
पारंपरिक शहरी नियोजन (Traditional Urban Planning) का सबसे बुनियादी सिद्धांत यही है कि ‘आवासीय क्षेत्र को आवासीय ही रखा जाए’। लोग अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई लगाकर शांत कॉलोनियों में प्लॉट या मकान इसलिए खरीदते हैं ताकि वे व्यावसायिक शोरगुल, प्रदूषण और बाहरी भीड़भाड़ से दूर रह सकें।
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इंफ्रास्ट्रक्चर का कबाड़ा: आवासीय क्षेत्रों की आंतरिक सड़कें (30-40 फीट चौड़ी) केवल घरेलू वाहनों के लिए होती हैं। मिक्स लैंड यूज़ की खुली छूट के बाद वहां कमर्शियल गाड़ियों की अवैध पार्किंग (Over-parking) का अंबार लग जाएगा।
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नागरिक सुविधाओं पर डाका: कॉलोनियों की सीवरेज लाइनें, पानी की सप्लाई और बिजली के ट्रांसफार्मर केवल घरेलू लोड (Domestic Load) के अनुसार डिजाइन होते हैं। वहां बड़े ऑफिस, शोरूम या कमर्शियल हब खुलने से पूरा नागरिक सिस्टम क्रैश हो जाएगा और कॉलोनियों में प्रशासनिक अराजकता की स्थिति बन जाएगी।
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गिग इकोनॉमी को संजीवनी: इस नीति का दूसरा पहलू यह भी है कि कोविड के बाद से शुरू हुए ‘वर्क फ्रॉम होम’, बुटीक, आईटी कंसलटेंट, क्लाउड किचन और ई-कॉमर्स वेयरहाउसिंग जैसे छोटे व्यवसायों को ‘अवैध’ घोषित होने के डर से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी और उन्हें बार-बार डायवर्जन शुल्क नहीं देना होगा।
2. क्या भूमि विकास नियम बदलने से मास्टर प्लान बदल जाएगा? (कानूनी पेच)
यह इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रशासनिक झोल है। मध्यप्रदेश में विकास योजनाएं (मास्टर प्लान) ‘मप्र नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973’ के तहत कानूनी रूप से तैयार और स्वीकृत की जाती हैं।
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एक्ट बनाम नियम का टकराव: मास्टर प्लान एक ‘अधिनियम (Act)’ के तहत आता है, जबकि भूमि विकास नियम महज एक ‘नियमावली (Subordinate Rules)’ है।
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अवैध को वैध करने की मंशा: कानूनी जानकारों के मुताबिक, मास्टर प्लान के ज़ोनिंग नियमों को सीधे बदलना एक बेहद जटिल और लंबी प्रक्रिया है, इसलिए सरकार ने अधिनियम की धारा 24 की उपधारा (3) और धारा 85 की उपधारा (1) का सहारा लेकर भूमि विकास नियमों के रास्ते से मास्टर प्लान को बाईपास करने की कोशिश की है। अगर यह ड्राफ्ट फाइनल हो गया, तो नगर निगमों की वर्तमान नोटिस कार्रवाई कानूनी रूप से शून्य (बेअसर) हो जाएगी।
ग्लोबल ट्रेंड बनाम मप्र का मॉडल: दुनिया कहाँ है और हम कहाँ जा रहे हैं?
सरकार का दावा है कि वह वैश्विक तर्ज पर ‘मिश्रित भूमि उपयोग’ (Mixed Land Use) ला रही है, लेकिन विशेषज्ञों ने इसके कार्यान्वयन (Implementation) के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं:
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सिंगापुर और यूरोपीय मॉडल: सिंगापुर में मिक्स्ड लैंड यूज़ (Live-Work-Play Model) बेहद सफल है, लेकिन वहां ‘इम्पैक्ट और परफॉरमेंस असेसमेंट’ होता है। यदि आपकी कमर्शियल गतिविधि से पड़ोसियों की शांति, वेंटिलेशन या पार्किंग प्रभावित होती है, तो भारी जुर्माना लगता है और लाइसेंस रद्द हो जाता है। मध्यप्रदेश के नए ड्राफ्ट में ऐसी कोई जवाबदेही या स्थानीय नागरिकों की सहमति की शर्त तय नहीं की गई है।
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दिल्ली (MPD) बनाम मप्र की खुली छूट: दिल्ली जैसे महानगरों में मिक्स्ड लैंड यूज़ केवल चुनिंदा, चौड़ी और पहले से अधिसूचित (Notified) व्यावसायिक सड़कों पर ही अनुमत है। इसके विपरीत, मप्र सरकार का नया नियम पूरे ज़ोन में खुली छूट दे रहा है, जो शांत कॉलोनियों को अव्यवस्थित व्यापारिक ठिकानों में बदल सकता है।
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विरासत और पर्यावरण पर सख्त पहरा: इस पूरे ड्राफ्ट का दूसरा सराहनीय पक्ष यह है कि सरकार ने जल निकायों (Ponds) और हेरिटेज ज़ोन के संरक्षण के लिए कोई ढील नहीं दी है और वहां पक्के निर्माण और डंपिंग को पूरी तरह प्रतिबंधित रखा है।
द इनसाइडर्स विश्लेषण: तो क्या भू-माफियाओं को फायदा पहुंचाने की है मंशा?
बाजार के जानकारों और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के रिटायर्ड अधिकारियों का कहना है कि इस संशोधन के पीछे एक बड़ी मंशा उन रसूखदार बिल्डर्स और रीयल एस्टेट माफियाओं को बचाना भी हो सकती है जिन्होंने आवासीय अनुमतियों (Residential Permissions) पर गुपचुप तरीके से बड़े-बड़े कमर्शियल कॉम्प्लेक्स तान दिए हैं और अब नगर निगम की सीलिंग की रडार पर हैं। इस नए नियम के लागू होते ही वे बिना किसी ‘चेंज ऑफ लैंड यूज़’ (CLU) या भारी-भरकम पेनाल्टी दिए सीधे साफ बच निकलेंगे।
15 दिनों का अल्टीमेटम: जनता के पास आखिरी मौका
नगरीय विकास विभाग के उपसचिव प्रमोद शुक्ला द्वारा जारी इस अधिसूचना के अनुसार, इस नए नियम से प्रभावित होने वाले नागरिकों और रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन्स (RWA) के पास अपनी आपत्तियां और लिखित सुझाव सरकार के समक्ष दर्ज कराने के लिए केवल 15 दिनों का समय है। अगर भोपाल और इंदौर के सजग नागरिकों ने समय रहते इस खुली मिक्स लैंड यूज़ नीति के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो आने वाले समय में आपके बेडरूम की खिड़की के ठीक बगल में कोई भी कमर्शियल प्रतिष्ठान, शोरूम या ऑफिस खुलना पूरी तरह कानूनी हो जाएगा। आम नागरिक इस पूरे राजपत्र को www.govtpress.mp.gov.in से डाउनलोड कर सकते हैं।
आगे क्या: मास्टर प्लान में लाना होगा संशोधन
15 दिन की दावा-आपत्ति के बाद सरकार इसका फाइनल नोटिफिकेशन जारी करेगी। लेकिन पेंच यह है कि जब तक यह प्रावधान शहरों के मास्टर प्लान में समाहित नहीं होते, तब तक अमल नहीं होगा। यानी सरकार को जिन शहरों में मास्टर प्लान लागू हैं, उनमें इन प्रावधानों को शामिल करने के लिए फिर से नोटिफिकेशन जारी करना होगा। इस पर भी सुनवाई होगी। इसके बाद सरकार फाइनल नोटिफिकेशन जारी कर इन नियमों को लागू कर पाएगी। हालांकि जिन शहरों के मास्टर प्लान नहीं बने हैं, वहां यह प्रावधान सीधे लागू हो जाएंगे।
रिहायशी क्षेत्रों में बिना समुचित अध्ययन के Mixed Land Use लागू करने का blanket नियम एक अत्यंत विनाशकारी कदम सिद्ध हो सकता है। इससे शहर का मूल शहरी चरित्र (Urban Character) ही बदल जाएगा और सुनियोजित आवासीय क्षेत्र धीरे-धीरे पुराने, अव्यवस्थित शहरों की तरह ‘नीचे दुकान–ऊपर मकान’ वाली संस्कृति में बदल सकते हैं। ऐसी नीति से यातायात का दबाव, पार्किंग की समस्या, आधारभूत संरचना (Infrastructure) पर अतिरिक्त बोझ, ध्वनि एवं पर्यावरण प्रदूषण, तथा रिहायशी क्षेत्रों की सुरक्षा और निजता (Safety, Security & Privacy) गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। इसके दूरगामी प्रभाव कानून-व्यवस्था और नागरिक जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ सकते हैं। किसी भी शहर में Mixed Land Use केवल वैज्ञानिक शहरी नियोजन, विस्तृत यातायात अध्ययन, उपलब्ध अवसंरचना क्षमता और स्थानीय परिस्थितियों के मूल्यांकन के आधार पर, क्षेत्र-विशेष के अनुसार लागू किया जाना चाहिए—न कि एक समान blanket नीति के रूप में।
— जी. वेंकटेश
प्रसिद्ध वास्तुविद एवं नगर नियोजक




