द इनसाइडर्स: रात 9 बजे वसूली पर निकलती है ‘स्त्री’, 2 किलो दाल-चावल की सुरक्षा में डटे रहे विधायकगण, आईएएस मैडम का इंतकाम
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें यूपी-बिहार से आए अफसरों की नौकरी के आखिरी वर्षों की लूट-खसोट
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | “प्रवासी पक्षी और ख़ानाबदोशी.. भाग-14 the final chapter”… उत्तर प्रदेश और बिहार (बुद्धि प्रदेश) से आए नौकरशाहों के नौकरीकाल के अंतिम चरण यानी 22 से सेवानिवृत्ति साल या “तृतीय एकादशक” को पढ़िए। इनमें से “कुछ” लोगों के बारे में चर्चा करने से पहले कुछ प्रचलित तथ्य जानिए।
- कहते हैं कि विवाह के 20 वर्ष बाद पति-पत्नी, भाई-बहन जैसा सोचने लगते हैं। मतलब एक सा सोचने लगते हैं।
- विवाह के समय पति की आवाज घर में नगाड़े सी गूंजती थी। पर 20 वर्ष बाद नक्कारखाने की तूती की तरह हो जाती है। और पत्नी अपनी बच्चों की सेना के दम पर लगभग उसे कुचल ही देती है ।
- अभाव से जनित भाव दिमाग पर गहरी छाप छोड़ता है। अभाव वो सिखाता जो भरा पेट कभी भी सिखा नहीं सकता।
अब आते हैं हम मूल कथानक पर। नौकरी के 22 वर्ष पूर्ण करने के बाद हमारे इन “कुछ” प्रवासी पक्षियों के जीवन चित्रण पर। इस वक्त तक IAS/IPS/IFS, हम्माल सेवा या अन्य विभागों के PSC अफसर अपने अपने विभाग के बड़े अफसर बन चुके होते हैं। बच्चे पढ़ाई/नौकरियों पर बाहर होते हैं। और इनके पास बहुत बड़े बड़े बंगले व बहुत बड़ा आफिस। लेकिन ऊपर के तीनों बिंदु इन “कुछ” साहबान पर हावी रहते हैं। सामान्य परिवारों में इस अवस्था में घरों में पत्नियों का राज स्थापित हो चुका होता है तो सोचिए राजकुंवरी (अफसर की पत्नी) के सामने उस मुनीम (पति) का क्या ही हाल रहता होगा? मुनीम बेचारा मालिक बन पाए, न बन पाए पर राजकुंवरी और उसके बच्चों के लिए चिराग के जिन्न से ज्यादा कुछ बन नहीं पाता है। चिराग को घिसो..जिन्न से डिमांड करो..और जिन्न साहब लग जाते हैं काम पर..किसी को टोपी पहनाने के या किसी मुर्गे की तलाश में। कुल मिलाकर भले ही ऑफिस में ये बड़के साहब रहते हैं लेकिन घरों में होते हैं सबसे बड़के गुलाम। हर रोज चार इमली/74 बंगले से अरेरा हिल्स तक सुबह कार का सफर घर में मिले हुक्मनामों की तामीली के लिए प्लानिंग के गुनताड़े गुजरता है। और ऑफिस पहुंचते ही बड़का गुलाम वापिस बड़का अफसर का रूप धारण कर लेता है। इस अवस्था में कास्ट तो पहले से ही कन्वर्ट होकर कैशप्रेमी हो चुकी होती है। अब भाई साहब कलम को कट्टे की तरह इस्तेमाल करके ..मातहतों की कनपटी पर लगा कर …कागजों से फंसा फंसा के माल कमाने लगता है।
बिंदु क्रमांक 3 के अनुसार संघर्ष के दिनों का अभाव का भाव इतना प्रगाढ़ रहता है कि खुद की कमाई से ज्यादा हर मातहत, सहयोगी की कमाई का पूरा हिसाब साहब को रहता है। और घर में लॉकर भले ही भरे पड़े हों पर कुछ लोगों की पैसों की मानसिक भूख के कारण व्यवहार लगभग वैसा होता है, जैसे किसी भिखारी को अचानक हलवाई की दुकान पर बिठा दो। मतलब उसका बस चले तो वो शटर बंद करके पूरे दुकान की मिठाई वो अकेला ही खा जाए। साहब कलम रूपी कट्टा चलाते हैं और मेम साहब वसूली करके राहत देतीं हैं। कई आफिस तो बंगलों से ही चलते हैं। बच्चों को दिल्ली /पुणे/मुम्बई या विदेश में सुविधाओं के लिये पैंसठियों (चापलूस या दलाल) को लगाया जाता है। रिश्तेदार तो कबके दूर हो चुके होते हैं इसलिए अब मेम साहब इन पैंसठियों को ही लक्ष्मण जैसा भाई मान बैठतीं हैं। फिर बारी आती है बच्चों के विवाह की। इसके लिए जाति कोई बंधन नहीं। बस लड़का IAS/IPS होना चाहिए। देखा जाए तो IAS/IPS/IFS ग्रेडेशन लिस्ट में जाति का उल्लेख होता भी नहीं है। तो साहब प्रदेश की तथाकथित उच्च जाति को भूल कर बच्चों का विवाह ग्रेडेशन लिस्ट में आंख बंद करके कर दिया जाता है। अब बारी आती है साहब की सेवानिवृत्त की। इसके उपरांत शायद ही कोई बिहार या UP लौटता है। अलबत्ता नोएडा या लखनऊ में एक घर जरूर बनवा लेते हैं। इस प्रदेश के निवासियों को मूरख समझने वाले …अंततः इसी प्रदेश में बस जाते हैं। अब तथाकथित लक्ष्मण जैसे पैंसठिये भाग चुके होते हैं। कास्ट, कलम और कट्टा को भूल चुके होते हैं और तीन नए “क” का पदार्पण हो चुका होता है। अपने “कनक-महल” के किसी कमरे के कोने में “कसक” लिए बैठे होते हैं कि “काश” हमने अपने प्रदेश के साथ “बुद्धि” के साथ “बुद्ध” को भी लाए होते। और बेचारा मुनीम कनक महल में अपनी राजकुंवरि को निहारते हुए कभी कभी कसक के साथ बशीर बद्र की लाइने बुदबुदाता है कि “…लम्हों ने खता की थी और सदियों ने सजा है पाई….
छोटा सा निवेदन…इस सीरीज़ को दिल पर मत लीजिएगा। हमारा उद्देश्य व्यंग्य के साथ बस सूचना देना है। साथ ही पुराने अफसरों के लिए आत्म विश्लेषण और नए वालों के लिए eye opener का काम करना भी है। चलिए अब आपको और बोरियत न कराते गुदगुदाने वाले अंदाज में शुरू करते हैं आज का द इनसाइडर्स…
रात 9 बजे वसूली पर निकलती है ‘स्त्री‘
आपने फिल्म ‘स्त्री’ जरूर देखी होगी। उसमें एक रहस्यमयी आत्मा रात के अंधेरे में गांव में निकलती है और मर्दों को नाम लेकर पुकारती है। अगर कोई उसकी आवाज़ सुनकर बाहर निकला, तो समझो वह ‘गायब’! भोपाल संभाग के एक जिले की सीएमएचओ (CMHO) मैडम का भी कुछ ऐसा ही ‘स्त्री’ जैसा खौफ है। साहब, यहाँ ‘स्त्री’ रोज रात 9 बजे के बाद वसूली पर निकलती है। यदि कोई मैडम की बातों (यानी डिमांड) में आ गया, तो उसकी जेब गायब! और जिसने नाफरमानी की, उसके यहाँ अगले दिन जांच और छापों का ‘भूत‘ नाचता है। फिर भी कोई न माना, तो बकायदा ‘अखबारबाजी’ करवाकर उसे हर तरह से निस्तेनाबूत कर दिया जाता है। तंग आकर मेडिकल पेशे से जुड़े लोगों ने अब फिल्म वाला फॉर्मूला अपना लिया है और दीवारों पर (सांकेतिक रूप से) लिख दिया है— “ओ मैडम, कल आना।” वैसे मैडम की ‘पटेली ताकत‘ का राज यह है कि वह पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और वर्तमान विधायक जी की धर्मपत्नी की बैचमेट हैं। तभी तो “सैंया भए कोतवाल, तो अब डर काहे का” की तर्ज पर उनका बाल भी बांका नहीं हो पा रहा।
विधायकों की चिंता: कहीं दो किलो दाल-चावल पर कोई हाथ न फेर दे!
राजधानी के एक कन्वेंशन सेंटर में सरकार के एक बोर्ड ने शानदार जलसा किया। मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों सहित कई आला अधिकारियों ने कृषि के नए नुस्खे सीखे। अगवानी के वक्त कृषि विभाग ने माननीयों को एक-एक भारी-भरकम बैग भी थमाया। हमारे विधायक जी और उनके साथी पूरे समय उस बैग को सीने से लगाए ऐसे घूमते रहे जैसे उसमें “कुबेर का खजाना” छिपा हो। साथ में कोई सहकर्मी नहीं था, तो खुद ही बोझ ढोते रहे कि कहीं कोई इस ‘कीमती’ सौगात पर हाथ न साफ कर दे। उन्हें लगा शायद बैग के वजन में ही “लक्ष्मी का वास” है। लेकिन घर जाकर जब बैग खुला, तो माननीयों ने माथा पकड़ लिया। उसमें सिर्फ दो किलो चावल और दो किलो दाल थी! “खोदा पहाड़, निकली चुहिया” वाला हाल हो गया। हालांकि उन्हें यह इल्म नहीं था कि यह ‘प्राकृतिक खेती’ का प्रसाद था। यानी हेल्थ के लिए तो यह ‘सोना’ था, पर वेल्थ के शौकीन विधायकों के लिए मामला ‘फिसड्डी’ निकला।
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नेताओं की ‘जमीन‘ और सफेदपोशों की ‘खोजबीन‘
भोपाल के पश्चिमी बायपास के लिए जमीन अधिग्रहण की सूचना अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापनों के रूप में छपी। इन विज्ञापनों में जो नाम उभरे हैं, वे कहीं से भी ‘किसान’ नहीं लगते। यानी “मुँह में राम, बगल में छूरी”—ये विशुद्ध निवेशक हैं जो अपनी काली कमाई को सफेद करने में जुटे हैं। इन्हें पहले से ही इल्म था कि बायपास कहाँ से निकलेगा, तभी तो कौड़ियों के दाम वाली जमीन आज ‘सोना’ उगल रही है। हमने जो नाम खोजे हैं, उनमें विभागीय मंत्री, जमीन का हिसाब-किताब रखने वाले मंत्री, जिला हुकुम के करीबी दलाल और सरकार के ‘पायलट’ जैसे रसूखदार शामिल हैं। हालांकि, सरकार की ‘कान और नाक’ (खुफिया विभाग) भी अब पूरे मामले की कुंडली जुटा रही है। खैर, “अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता”—सड़क तो बनेगी ही, पर असली मलाई तो इन रसूखदारों ने पहले ही काट ली है।
आईएएस मैडम का इंतकाम
मैडम ने मिन्नतें कीं, हुज्जत की, रोईं और बेचारगी का वीडियो भी वायरल हुआ। यह सब देख बड़े साहब का दिल पसीज गया और मैडम को पहली बार कलेक्टरी का ‘राजयोग’ मिल गया। लेकिन “पांव जमीन पर न टिकना” इसी को कहते हैं—पद मिलते ही मैडम ने होश खो दिए। थोड़े ही वक्त में कलेक्टरी छिन गई और मैडम वापस मंत्रालय लौट आईं। कहानी का ‘ट्विस्ट’ यहीं से शुरू होता है। मैडम ने जिस विभाग में आमद दी, उसी विभाग में हुए कांड की वजह से उनकी कलेक्टरी गई थी। हुआ यह था कि मैडम ने जिले में विभाग के कर्मचारियों के थोक में तबादले कर दिए थे। प्रमुख सचिव ने समझाया कि यह “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” जैसा नियम विरुद्ध काम है, फिर कोर्ट में भी याचिकाओं की झड़ी लग गई। जब बड़े साहब का माथा ठनका, तो विभाग से गोपनीय जांच कराई गई और फिर मैडम की रवानगी तय हुई। अब मैडम मंत्रालय में लौटकर हर उस व्यक्ति से खार खा रही हैं जिसने जांच में सहयोग किया था। वे ‘इंतकाम’ की आग में इतना जल रही हैं कि छोटे कर्मचारी तक झुलस रहे हैं। मैडम को तो बस यही सलाह है कि “बदलापुर” के चक्कर में कहीं फिर से अपना ही नुकसान न कर बैठें।
कलेक्टर साहब का साहस: माल के चक्कर में हाईकोर्ट के आदेश पर ‘स्टे‘!
विंध्य क्षेत्र के एक जिले में कलेक्टर साहब ने वह कर दिखाया है, जिसे सुनकर कानून के दिग्गजों को पसीना आ जाए। साहब ने “बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया” की तर्ज पर दो आवेदनकर्ताओं से ‘माल’ लिया और उनके पक्ष में आदेश जारी कर दिया। अजब-गजब कारनामा यह है कि साहब ने सीधे हाईकोर्ट के आदेश पर ही ‘स्टे’ दे दिया! दरअसल, हाईकोर्ट ने दो कर्मियों की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश दिया था और जिला पंचायत ने उसका पालन भी कर दिया। लेकिन कर्मियों ने साहब को ऐसा ‘पटाया’ कि साहब ने हाईकोर्ट और संभागायुक्त, दोनों को ‘बायपास’ कर दिया। कायदे से अपील सुनने का अधिकार कमिश्नर को था, लेकिन साहब तो “माल के लिए आग से खेलने” को तैयार बैठे हैं। अब देखना यह है कि कानून के हाथ साहब के गिरेबां तक कब पहुँचते हैं।
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हिस्सा बटोरने के लिए साहब ने भेजी ‘घर की लोकेशन‘
पानी से जुड़े एक विभाग के एक चीफ इंजीनियर (CE) ने भ्रष्टाचार का ऐसा डिजिटल और ‘स्मार्ट’ अवतार पेश किया है कि वल्लभ भवन भी दंग है। जैसे ही ईएनसी (ENC) ने काम के लिए पैसों के आवंटन का आदेश जारी किया, साहब ने “देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए” की तर्ज पर उस सरकारी आदेश के साथ अपने ‘घर की लोकेशन’ सभी इंजीनियरों को व्हाट्सएप कर दी। साहब का तर्क बड़ा निराला था—लोकेशन इसलिए भेजी गई ताकि कोई इंजीनियर पते की गफलत में न रहे और न ही कोई बहाना बना सके। साहब चाहते थे कि आवंटन की राशि के हिसाब से उनका ‘हिस्सा’ तुरंत और सीधे उनके घर की दहलीज तक पहुँच जाए। इसे कहते हैं “न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी”—यानी न कोई बहाना चलेगा, न ही कमीशनखोरी में कोई अड़चन आएगी।
कलेक्टर साहब ने जनता को याद दिलाया पाषाण युग
गोंडवाना इलाके के एक ‘घाटों वाले’ नाम वाले जिले के कलेक्टर साहब इन दिनों ‘छपास रोग’ (पब्लिसिटी का जुनून) के शिकार हैं। जिले में गैस की किल्लत क्या हुई, साहब ने “नाम बड़े और दर्शन छोटे” वाली कहावत चरितार्थ कर दी। साहब ने लोगों को गैस संकट से उबारने के बजाय, प्रागैतिहासिक काल में प्रचलित लकड़ी से खाना पकाने की विधि पर बकायदा वीडियो बनवाए और अपने हैंडल पर पोस्ट कर दिए। अब जनता पूछ रही है कि साहब, पत्थर युग की याद दिलाना कौन सा ‘नवाचार’ है? इससे अच्छा तो साहब प्रशासनिक कौशल दिखाकर गैस संकट दूर करते और लोगों को तकलीफ से उबारते। गौरतलब है कि साहब दिन में “अंगूर की बेटी” (सुरा) के रसास्वादन के लिए भी खासे प्रसिद्ध रहे हैं। साहब, रील बनाने से अच्छा है थोड़ा रियल प्रशासनिक काम कर लें।
आईएएस भी शरमा जाएं: संविदा वाले साहब का ‘सोना-संसार‘
अक्सर दूसरी सेवाओं के अफसर रोना रोते हैं कि भ्रष्टाचार में आईएएस का कोई सानी नहीं, लेकिन जब आरक्षक स्तर के अदने से कर्मचारी पर छापे पड़ते हैं तो “आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।” मध्य प्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम में संविदा पर तैनात एक साहब ने भ्रष्टाचार के ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं कि बड़े-बड़े सूरमा शरमा जाएं। पहले ये नियमित पद पर थे, लेकिन एक आरोप लगने के बाद त्यागी हो गए। यानी इस्तीफा दे दिया। लेकिन यह त्याग भी सिर्फ एक खेल था। कुछ ही दिनों बाद वे संविदा वाले रास्ते के जरिए वापस आ गए। साहब का ‘खेला’ तब खुला, जब उन्होंने अपने मकान के पास वाले नाले का रुख मोड़कर सरकारी जमीन पर ही कब्जा कर लिया। इसके बाद जो संपत्तियों की लिस्ट बाहर आई, उसने सबके होश उड़ा दिए—भोपाल के ‘व्हीस्परिंग पाम’ में 27,000 वर्गफीट का आलीशान प्लॉट, चूना भट्टी जैसे पॉश इलाके में मकान, और दिल्ली से लेकर उत्तराखंड तक फैली जमीनें। इस्तीफा देते समय साहब ने दिल्ली के बड़े शिक्षा संस्थानों में भी भारी निवेश किया था। यह सब निगम के एमडी, पेपर इंडस्ट्री और प्रिंटर्स की ‘जुगलबंदी’ का कमाल था। अब शायद “बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी”, क्योंकि जांच एजेंसियों तक साहब की कुंडली पहुँच चुकी है।
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अहिंसावादियों के भी उधड़ेंगे चमड़े?
राजधानी की फिजाओं में एक बार फिर गौ-हत्या का मुद्दा गूंज रहा है। नवरात्रि के वक्त मुख्य सरगना असलम को जमानत मिली, तो घबराई सरकार ने आनन-फानन में ‘NSA’ लगाकर उसे वापस जेल भेज दिया। जोश में आए एक सत्ताधारी नेताजी ने तो यहाँ तक कह दिया कि— “सबके चमड़े उधेड़ देंगे।” पर असली सवाल यह है कि असलम से ‘रिश्वत’ की मलाई खाने वाले वो ‘अहिंसावादी’ सफेदपोश कौन हैं? क्या उनके चमड़े भी उधड़ेंगे? जिस तरह हैदराबाद भेजे गए डीएनए सैंपल ‘खराब’ हुए हैं, उसे देखकर तो यही लगता है कि “रात गई, बात गई”—यानी मामला फिर ठंडे बस्ते में जाने को तैयार है।
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अच्छी पोस्टिंग के लिए नए सूत्र
तबादला सूची का इंतजार कर रहे अफसर एक बार फिर निराश हो गए हैं। हालांकि, जिनकी रवानगी तय थी, उनके चेहरे “अभी तो मैं जवान हूँ” की तर्ज पर कुछ और दिन के लिए खिल गए हैं। तैयारियों से लग रहा है कि सूची अप्रैल के पहले हफ्ते में आ सकती है, लेकिन अच्छी पोस्टिंग चाहने वालों के लिए एक नया ‘सूत्र’ डिकोड हुआ है। जैसा कि आप जानते हैं, ‘बड़े साहब’ को अपने बराबरी वाले यानी आरआर (RR- सीधी भर्ती) अफसर इतने पसंद हैं कि उन्होंने पहली बार जूनियर आईएएस को भी राज्य हम्माल सेवा (एसएएस) वाले पद जैसे नगर निगम कमिश्नर, अपर आयुक्त और प्राधिकरणों के सीईओ तक सौंप दिए हैं। कलेक्टरी में भी आरआर का ही जलवा है। यानी जैन और ‘सुलेमानी ताकत’ के साथ ‘आरआर’ होना मलाईदार कुर्सी की पहली शर्त है। इसके उलट, हमारे ‘डॉक्टर साहब’ का पूरा भरोसा ‘हम्माल सेवा’ (एसएएस से प्रमोटेड) पर टिका है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में 80 प्रतिशत अधिकारी इसी सेवा से हैं। यही नहीं, यहाँ पदस्थ अधिकारी अपने कैडर की चिंता भी बखूबी कर रहे हैं, जिसकी झलक बीती सूची में दिखी भी थी। यानी ‘डॉक्टर साहब’ से अप्रोच करनी है, तो हम्माल सेवा से प्रमोट हुए अफसर कोशिश करें। तो भाई, “जिसकी लाठी उसकी भैंस”—अपनी पोस्टिंग के लिए अप्रोच इसी हिसाब से सेट कर लीजिए।
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