The Insiders: देश के ‘नंबर टू’ कारोबारी को मिलेगी भेल की बेशकीमती जमीन; रिजॉर्ट में ‘बायफ्रेंड’ के साथ मैडम की हुई नो-एंट्री तो डल गया छापा, सम्मान निधि कम हुई तो आईएएस ने करीबियों को निपटाया!
द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें उत्तर प्रदेश और बिहार से आए नौकरशाहों की नौकरी काल के दूसरे चरण के किस्से
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | “प्रवासी पक्षी और ख़ानाबदोशी.. भाग-13”… उत्तर प्रदेश और बिहार (बुद्धि प्रदेश) से आए प्रवासी पक्षी यानी नौकरशाही का चरित्र-चित्रण करते हुए हमने पिछले अंक में बताया था कि यहां से “कुछ” अफसर ऐसे आते हैं जो राहु की तरह मुख में अमृत और मस्तिष्क में विष लेकर मध्यप्रदेश आते रहे हैं। अब इनके नौकरीकाल के दूसरे चरण यानी 12 से 22 साल या “द्वितीय एकादशक” को पढ़िए। इन “कुछ” लोगों के बारे में इन बुद्धि प्रदेशों में कुछ इस तरह की लोकोक्ति है…
“मिर्जापुरी मुख में राम बगल में छुरी…खांवे सतुआ और बतावें पुरी। “
ये कहावत मिर्जापुर के लिए मात्र नहीं कही जाती बल्कि बुध्दि प्रदेश के अंदर ही एक दूसरे को चिढ़ाने के लिए अंत में पुर शब्द वाले सभी शहरों (भागलपुर, गोरखपुर, कानपुर आदि) पर कही जाती है। नौकरी के पहले 11 साल में हमारे ये “खानाबदोश राहू” मध्यप्रदेश की ट्रेन में न सिर्फ चढ़ चुके होते है, बल्कि सजातियों और अपने प्रदेश के भैया लोगों के सपोर्ट से अच्छी खासी जमावट भी जमा चुके होते हैं। अपने पुश्तैनी स्थान पर घर को हवेली में बदल कर भूतलक्षीय प्रभाव से रसूख कायम करने की कोशिश करते हैं। पर बुद्धि प्रदेश के उनके पड़ोसियों-रिश्तेदारों पर उनकी इस ऊपरी कमाई का कुछ खास असर होता नहीं है। और जो थोड़ा बेनामी इन्वेस्टमेंट अपने रिश्तेदारों के नाम किया गया होता है …वो डूब सा गया होता है। हालांकि ये खानाबदोश बेनामी इन्वेस्टमेंट के लिए अपने प्रदेश से ज्यादा “लोकल मूर्खों” पर भरोसा करते हैं। क्योंकि “कम्बल से कम्बल की गांठ नहीं लगती…।” लगे भी कैसे? जहाँ मात्र दो लाख के टेंडर में गोली चल जाती हो, वहां करोड़ों के बेनामी इन्वेस्टमेंट करके कौन अपनी जान जोखिम में डालेगा। तो फिर लोकल के पैंसठियों (चापलूसों) पर रिस्क लिया जाता है। ये लोकल वाले इनकी नज़र में नादान/ मूर्ख तो होते ही हैं, पॉवर क्षेत्र में होने से रिस्क कम रहता है। इनके दम पर बेनामी इन्वेस्टमेंट और कमाई का एक बड़ा स्ट्रक्चर खड़ा कर लेते हैं।
द्वितीय एकादशक में भी इनकी modus operandi भी “कलम कास्ट प्रधान और कट्टा गौण” ही रहती है मगर अब इन सभी उच्च/विशिष्ट जाति के लोगों की कास्ट बदल कर सिर्फ एक जाति “कैश-प्रेमी”(चौथा – क) हो चुकी होती है। दरअसल ये लोग भाव विहीन लोग होते हैं। ये जितनी भी भावनाएं शुरू-शुरू में प्रदर्शित करते हैं, वो दिल से नहीं बुद्धि से पैदा की गई होती हैं। यानी एक SURVIVAL TACT होता है।
अब तो जात बड़ी न मैया। सबसे बड़ा रुपैया…।।
इनमें से कुछ लोगों की होस्टल के संघर्ष के दिनों में पढ़े मस्तराम साहित्य से उपजीं दमित अभिलाषाएं धन और सत्ता की बारिश में बीज से वृक्ष बन कर बाहर आ जातीं है। समझदार लोग कार्यस्थल पर शुचिता बनाये रखते हुए अपनी गर्मी दिल्ली, बॉम्बे या विदेश जाकर निकाल आते हैं पर कुछ लोगों से नियंत्रण नहीं हो पाता। वैसे, I AM SUPREME की मदहोशी भी होती है कि ये लोग कार्य स्थल पर ही वारदात को अंजाम देने लगते हैं। और फ़िर ये या तो किसी हनी ट्रैप का शिकार बन जातें हैं या हमारे कॉलम के हीरो। अब सेवाकाल के आखिरी एकादशक (11 वर्ष) कैसे बीतते हैं, ये देखेंगे हम अगले अंक में। और अब शुरू करते हैं अपने वही चुटीले अंदाज में सत्ता के गलियारों की गहशप से भरपूर इस हफ्ते के टॉप टेन किस्सों वाला द इनसाइडर्स…
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नंबर टू उद्योगपति लेंगे राजधानी की सबसे कीमती जमीन
देश के ‘नंबर टू’ उद्योगपति अब भोपाल की फिजाओं में तगड़ी एंट्री लेने वाले हैं। उनके लिए वल्लभ भवन के गलियारों में “दिन को रात और रात को दिन” किया जा रहा है। पर्दे के पीछे से शासन के तीन प्रमुख विभाग—इंडस्ट्री, रेवेन्यू और अर्बन डेवलपमेंट—उस बेशकीमती जमीन का विवाद सुलझाने में लगे हैं, जिस पर दशकों से बड़े-बड़े सूरमाओं की नजर थी। ताज्जुब तो यह है कि नीचे के बाबुओं को यह तक नहीं पता कि यह ‘बेगारी’ किसके लिए हो रही है। भेल (BHEL) की हजारों एकड़ जमीन पर कई वर्षों से कोर्ट-कचहरी और फाइलों की दौड़ जारी थी, लेकिन जैसे ही ‘बड़े सेठ’ की नजर इनायत हुई, रातों-रात ‘इंटीग्रेटेड टाउनशिप पॉलिसी’ के नियम बदल दिए गए। चूंकि निर्देश सीधे ‘दिल्ली दरबार’ से आए हैं, इसलिए भेल प्रबंधन को भी पीछे हटने का इशारा मिल गया है। बहुत जल्द आपको सुनने को मिलेगा कि मामला ‘आउट ऑफ कोर्ट’ सेटल हो गया और कोर्ट के रास्ते उद्योगपति को जमीन आवंटन का प्रस्ताव मेज पर होगा।
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मैडम को रूम नहीं मिला तो दिखाई ‘औकात’
कहते हैं “समरथ को नहिं दोषु गुसाईं”, लेकिन जब अहंकार सिर चढ़कर बोले तो तमाशा सरेआम होता है। नर्मदा किनारे वाले जिले की नेशनल पार्क से सटी तहसील में इन दिनों एक एसडीएम मैडम का भारी ‘भौकाल’ है। कथित तौर पर बताया जा रहा है कि मैडम अपनी होने वाली इंगेजमेंट (सगाई) की प्री सेलीब्रेशन में एक महंगे निजी रिजॉर्ट में माल-ए-मुफ्त में रुकने पहुँची थीं, लेकिन ‘किस्मत की हेराफेरी’ देखिए—रूम्स पहले से बुक थे। मंगेतर के सामने हुई इस ‘ना’ से मैडम का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने तुरंत फूड, फॉरेस्ट, रेवेन्यू, पुलिस और आबकारी की ‘संयुक्त सेना’ को रिजॉर्ट पर धावा बोलने भेज दिया। सबने मैडम को खुश करने के लिए रिजॉर्ट में कमियों का ऐसा अंबार लगा दिया जैसे “अंधेर नगरी चौपट राजा” का दृश्य हो। पर सच तो पांच दिन बाद फॉरेस्ट के एक प्रेस नोट से बाहर आ ही गया। अब चर्चा यह है कि मंगेतर साहब के सामने अपनी ‘धाक’ जमाने के चक्कर में मैडम ने पूरे तंत्र को ही अपना ‘चाकर’ बना लिया।
पूर्व मंत्री का फ्लैट प्रेम और ब्लैक मनी का सागर
राजधानी के गैमन इंडिया वाले प्रोजेक्ट में एक पूर्व मंत्री जी ने फिर से तीन फ्लैट अपनी झोली में डाल लिए हैं। इनके बारे में कहा जा सकता है— “बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया।” पूर्व मंत्री जी के पिताजी मुख्यमंत्री रह चुके हैं, शायद विरासत में राजनीति के साथ-साथ लक्ष्मी की कृपा भी भरपूर मिली है। इससे पहले भी वे पूर्व मुख्य सचिव के करीबी ‘शर्माजी’ के बड़े तालाब वाले प्रोजेक्ट में निवेश कर चुके हैं। अब चर्चा यह है कि सत्ता से दूर रहने के बावजूद साहब के पास इतनी ‘ब्लैक मनी’ कहाँ से आ रही है कि वे अपनी औलाद के लिए फ्लैट्स की झड़ी लगाए हुए हैं? शायद साहब का मंत्र है— “अपना सपना, मनी मनी।”
कंसल्टेंट कम दलाल के साथ कमिश्नर साहब की जुगलबंदी
कपड़ों से संबंधित एक विभाग के एक कमिश्नर साहब का मिजाज ऐसा है कि “अपनी टीम, अपना खेल।” वे जहाँ भी जाते हैं, सरकारी अमले के बजाय अपने ‘प्राइवेट कंसल्टेंट्स’ को साथ रखते हैं, जो असल में दलाली का काम संभालते हैं। इन कंसल्टेंट और कर्मचारियों का वेतन भी वे आउटसोर्स के माध्यम से निकलवा लेते हैं। ताजा मामला एक सिक्योरिटी कंपनी का है। साहब ने आते ही पुरानी कंपनी को ‘टाटा-बाय बाय’ बोलने के लिए नोटिस थमाया क्योंकि टेंडर खत्म हुए कई साल हो चुका थे। यानी कंपनी एक्सटेंशन पर चल रही थी। नए टेंडर भी जारी हुए, लेकिन फिर “वही ढाक के तीन पात।” न पुरानी कंपनी हटी, न नई आई। खबर है कि साहब के ‘खास’ कंसल्टेंट ने पुरानी कंपनी से ‘सेटिंग’ कर ली है और अब मामला मलाईदार एक्सटेंशन पर टिक गया है।
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पीएस ने कारोबारी को लौटाया बैरंग
नौकरशाही में कहा जाता है— “वक्त-वक्त की बात है।” जो शराब कारोबारी कभी पूरे विभाग को अपनी उंगलियों पर नचाता था और जिसकी धमक से गलियारे दहल जाते थे, आज वह ‘बैरंग’ लौट रहा है। प्रमुख सचिव ने उन्हें इतने रूखे अंदाज में विदा किया कि कारोबारी साहब को “ठुकरा के मेरा प्यार, इंतकाम देखेगी” वाला अहसास होने लगा होगा। विभाग के कर्मचारी इस ‘बेइज्जती’ से फूले नहीं समा रहे हैं, क्योंकि अपनी बुलंदी के दिनों में इस कारोबारी ने किसी को इंसान नहीं समझा था।
सम्मान निधि की कमी से ‘दरबारियों’ की शामत
प्रमुख सचिव महोदय को ‘दरबार’ लगाने का शौक है, और दरबारियों को लगता है कि वे राजा के सबसे करीब हैं। लेकिन यहाँ कहानी “माया मिली ना राम” वाली हो गई। साहब के दो करीबियों ने अपने प्लॉट्स के काम साहब को सौंपे थे। लेकिन साहब के गृह मंत्रालय के ‘कड़क’ निर्देशों के बाद साहब ने अपने ही करीबियों की ‘लंका’ लगा दी और आवंटन निरस्त कर दिए। करीबियों ने गृह में पैठ बनाने की कोशिश तो की, लेकिन “बिना रोए तो माँ भी दूध नहीं पिलाती”, यहाँ तो मामला ‘सम्मान निधि’ (नजराना) की कमी का था, इसलिए गृह मंत्रालय के दरवाजे बंद ही रहे।
पूर्व सीएस का ‘सुरक्षा चक्र’ बनी तीन आईएएस महिलाएं
आजीविका मिशन के पुराने घोटाले का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है। कभी एक आईएएस मैडम ने इसकी जांच की थी, प्रताड़ित हुईं, पर अब कलेक्टरी मिलते ही वह सब भूल गईं। लेकिन जांच की आंच अब पूर्व सीएस और रिटायर्ड आईएफएस तक पहुँच रही है। मामला कड़ा दिख रहा था, लेकिन त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः “—तीन प्रभावशाली आईएएस मैडमों ने फाइलों को इस कदर उलझाया है कि एक भी जगह से जांच एजेंसी को जवाब नहीं मिल सका है। दोस्ती निभाने का इससे बेहतर उदाहरण और क्या होगा?
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वर्दी नई, मानवता वहीं का राग अलाप रहे रिटा. आईपीएस
एक साहब जब तक नौकरी में थे, अपनी ‘फिटनेस’ और ‘मीडिया हीरोगिरी’ के लिए मशहूर थे। रिटायरमेंट के बाद वकालत नहीं चली तो फिर पुराने ‘नुस्खे’ पर लौट आए हैं। अब ‘वर्दी नई, मानवता वहीं’ जैसे जुमलों से खुद को महान समाजसेवक साबित करने में जुटे हैं। साहब, “बातों के बताशे” बनाने से अच्छा है जमीन पर उतरकर काम करें, वरना जनता सब जानती है कि नाम का सागर कर्मों से रोशन होता है, खबरों से नहीं।
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अस्पतालों से फिर वसूली शुरू, अफसर का नहीं हुआ बाल बांका
कहते हैं— “अंधेर नगरी, चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा।” मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना में भ्रष्टाचार का घुन ऐसा लगा है कि अब अस्पतालों से सरेआम ‘वसूली’ का नया दौर शुरू हो गया है। इस बार खेल ‘एनएबीएच’ (NABH) ग्रेडिंग का है। नियम तो अस्पतालों को बेहतर बनाने के लिए थे, लेकिन हमारे एक चतुर आईएएस साहब ने इसमें ‘कमाई’ का शॉर्टकट ढूंढ निकाला। साहब ने सभी अस्पताल संचालकों को एक ‘नेक’ मशविरा (प्रस्ताव) दिया है— “सब एकजुट हो जाओ और एक मोटी रकम चढ़ाओ, फिर देखिए एनएबीएच लागू न करने का करिश्मा!” याद दिला दें, ये वही साहब हैं जिनके पीए, खास कंसल्टेंट और दलाल कुछ समय पहले एक सनसनीखेज स्टिंग ऑपरेशन में रंगे हाथों कैद हुए थे। उस स्टिंग में भी ‘एनएबीएच’ के नाम पर सौदेबाजी का जिक्र हुआ था। यानी भ्रष्टाचार की पूरी पटकथा साहब ने पहले ही लिख डाली थी। अब जैसे ही एनएबीएच की सख्ती की बात सामने आई, उनकी चोरी एक बार फिर ‘सूरज की रोशनी’ की तरह साफ हो गई। लेकिन साहब की किस्मत तो देखिए— “सैंया भए कोतवाल, तो अब डर काहे का!” जब गाज गिरने की बारी आई, तो ‘बड़े साहब’ की कृपा ऐसी बरसी कि मुख्य आरोपी को छोड़कर उनके ऊपर के निर्दोष कमिश्नर और पीएस को ही रास्ते से हटा दिया गया। अब जब ‘अभयदान’ मिल ही गया है, तो साहब इस ‘जीवनदान’ का भरपूर फायदा उठा रहे हैं और अपनी तिजोरी भरने की स्क्रिप्ट को नए सिरे से अंजाम दे रहे हैं।
योग: कर्मसु कौशलम पर विशेष श्रृंखला पढ़ें – द इनसाइडर्स : ऑफिस चैंबर से रिश्वत के 9 लाख गायब, 15 लाख रुपए में हो रहा ट्रांसफर का सौदा, शाहनामा के जरिए बने बड़े कप्तान साहब
कलेक्टर ही नहीं कमिश्नर भी बदलेंगे
तबादला सूची के लिए आमजन में जिज्ञासा हो या न हो लेकिन नौकरशाहों को पूरा जीवन ही सूचियों में खो जाता है। मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों अटकलों और फुसफुसाहटों का दौर है। कौन कलेक्टर आएगा, कौन जाएगा? साहब क्यों हटाए जाएंगे तो कौन किसको खिसकाएगा? कौन टंगड़ी मारेगा? कौन चक्रव्यूह में फंसकर अभिमन्यु बनेगा? आदि बातों पर दांव लग रहे हैं। यानी “अगला नंबर किसका?” वाली चर्चा जोरों पर है। तबादला सूची को लेकर सस्पेंस ऐसा है जैसे किसी थ्रिलर फिल्म का क्लाईमैक्स। मुख्य सचिव के छुट्टी से लौटते ही धमाका होने की उम्मीद थी, लेकिन लगता है “अभी तो पार्टी शुरू हुई है”—यानी ईद के बाद ही सूची आएगी। संभवतः एक दर्जन कलेक्टरों के साथ रीवा, शहडोल, नर्मदापुरम और भोपाल के डिविजनल कमिश्नर भी इधर से उधर किए जा सकते हैं।
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