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The Insiders: आईपीएस ने जारी किया वसूली का नया रेट कार्ड, दिल्ली के दूत से वल्लभ भवन में बढ़ी बेचैनी, सीनियर आईएएस ने फिर से प्लेटिनम प्लाजा की ‘दलाल स्ट्रीट’ को दी एंट्री

'द इनसाइडर्स' में इस बार पढ़िए यूपी व बिहार से आए अफसरों के कारनामें।

कुलदीप सिंगोरिया @ 9926510865

भोपाल | प्रवासी पक्षी और खानाबदोश सीरीज: भाग-10

यूपी-बिहार की उपजाऊ भूमि में पैदा हुई जिजीविषा और रेगिस्तानी संघर्ष के तीन “क” यानी— कास्ट, कट्टा और कलम के बारे में पिछली सीरीज में बताया था। जनसंख्या विस्फोट से उपजे आजीविका संघर्ष के बीच इन प्रदेशों के मां-बाप अपने बच्चों को “कलम” के जरिए आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश करते हैं; अन्यथा की स्थिति में कास्ट, कट्टा और कल्टी (पलायन) जैसे विकल्पों का चुनाव बच्चा खुद ही कर लेता है। इन दोनों प्रदेशों में सामाजिक विषमता के साथ जबरदस्त आर्थिक विषमता भी देखने को मिलती है। बावजूद इसके, माँ-बाप पेट काट-काटकर बच्चे को पढ़ने के लिए इलाहाबाद के ‘झा एंड झा’ हॉस्टल या फिर दिल्ली में DU/JNU भेजते हैं—इस सोच के साथ कि बच्चा पढ़-लिखकर कुल का तारणहार बनेगा। कुछ बच्चे संघर्ष के दम पर UPSC, PCS, SSB या बैंकिंग आदि की परीक्षाएं निकाल लेते हैं, तो कुछ बेचारे थोड़े से अंकों से चूक जाते हैं। जो चूक जाते हैं, वे लौटते नहीं बल्कि दिल्ली में ही बस जाते हैं। कमाल यह है कि वे या तो पत्रकार बन जाते हैं, या नेता या फिर NGO की शक्ल में दलाल। आजकल संघ और राजनीतिक दलों में भी ऐसे लोगों की भरमार है, जो ‘बैक डोर’ से सत्ता की मलाई का आस्वादन करते हैं। खैर, हम चर्चा करेंगे उनकी, जो UPSC/MPPSC निकालकर हमारे प्रदेश (मध्य प्रदेश) में आते हैं।

साहब! समुद्र मंथन जैसे संघर्ष से निकलकर आए ये लोग जीवट, जुझारू और कुछ अलहदा ही होते हैं। इन पर मसूरी या हैदराबाद अकादमी में पिलाई जाने वाली ‘सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स’ की घुट्टी का कोई असर नहीं होता। ये खुद को बुद्धि का देवता मानते हैं। अक्सर ये अपने ही कैडर के जीवनसाथी का चुनाव कर SIP का लाभ लेने के बजाय, किसी रसूखदार धनाढ्य सजातीय परिवार की ‘राजकुंवरी’ से विवाह करना अधिक लाभप्रद समझते हैं। ऐसे विवाह के कई फायदे हैं— पहला, नामी-गिरामी परिवार का नाम जुड़ने से कुटुंब की इज्जत बढ़ जाती है। दूसरा, SIP की तुलना में पूरी जिंदगी की सैलरी से ज्यादा दहेज एकमुश्त मिल जाता है। तीसरा, अकादमी के शेयर मार्केट में ‘फेस वैल्यू’ के लिमिटेड ऑप्शन होते हैं, जबकि ओपन मार्केट में अनेक। अपवाद के तौर पर इन्हीं प्रदेशों से आए एक प्रवासी पक्षी, जो स्वयं प्रतिष्ठित परिवार से हैं, उन्होंने हाल ही में अपनी फेस वैल्यू के दम पर इन्हीं लिमिटेड ऑप्शन (कैडर) में 10 साल के भीतर 3 विवाह कर डाले। हालांकि, इसके कुछ नुकसान भी हैं; क्योंकि ‘अमीर की छोकरी और बनिये की नौकरी’ निभाना कठिन होता है। वल्लभ भवन के चर्चित किस्सों में से एक है कि बरसों पहले अधिकारी अमीर की छोरी से ब्याह रचा लाए थे। 70 के दशक की फिल्मों से प्रभावित होकर उन्होंने विवाह के बाद जब अपनी पहली सैलरी राजकुंवरी के हाथ में रखी, तो वह बोली— “यह क्या है? इतनी सी सैलरी! इससे ज्यादा तो मेरे मायके के मुनीम को मिलती है!” अब बेचारा भावुक अफसर सैलरी तो बढ़ा नहीं सकता था, सो “मुनीम से मालिक बनने” की जद्दोजहद में अपनी मौलिकता खोकर ऊपरी कमाई में हम्मालों की तरह जुट गया। इसी उधेड़बुन में जिंदगी गुजार दी। यह अलग बात है कि वे मालिक बन पाए या नहीं, लेकिन सेवानिवृत्ति तक जोरू के गुलाम जरूर बने रहे। शेष अगले अंक में… और अब शुरू करते हैं अपने चुटीले अंदाज में रसूखदारों के अंदरूनी किस्सों से भरपूर आज का ‘द इनसाइडर्स’

 दिल्ली का दूत और वल्लभ भवन की धड़कनें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे पावरफुल सिपहसालार की पिछले हफ्ते हुई भोपाल यात्रा प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा में है। बताया गया कि साहब एक निजी कार्यक्रम में शामिल होने आए थे, लेकिन राजभवन (लोक भवन) में राज्यपाल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ उनकी लंबी बैठक ने कई कयासों को जन्म दे दिया है। हालांकि, मुलाकात का ब्यौरा ‘टॉप सीक्रेट’ रखा गया है, पर कानाफूसी है कि दिल्ली के दूत ने राज्य की प्रशासनिक उठापटक की कुंडली खंगाली है। यही वजह है कि वल्लभ भवन की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। इसे नौकरशाही के लिए एक सीधा और कड़ा संदेश माना जा रहा है कि सूबे के ‘परफार्मेंस’ पर दिल्ली की नजर 360 डिग्री तिरछी बनी हुई है। वैसे, सरकारी सुर में कहें तो चर्चा सिंहस्थ 2028 और केंद्र की योजनाओं पर ही सिमटी रही।

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प्लेटिनम प्लाजा (दलाल) स्ट्रीट ने फिर बनाई साहब से करीबी

वल्लभ भवन हो या सत्ता के गलियारे, बिना ‘बिचौलियों’ के सब सूना रहता है। राजधानी की मुलाकातों के उजागर होने के डर से अब ‘दलाल स्ट्रीट’ का नया ठिकाना ‘प्लेटिनम प्लाजा’ बन गया है। आलम यह है कि आयकर विभाग से लेकर ईडी तक यहाँ तांका-झांकी करती रहती है। इसी गली की सोहबत में एक साहब को पहले ‘लूप लाइन’ की सैर करनी पड़ी थी। अब खबर है कि मां नर्मदा की सेवा में लीन एक अफसर ने प्रोफाइलिंग वाले साहब से ‘सेटिंग’ बिठाई और साहब को एक छोटा लेकिन ‘इंडिपेंडेंट’ विभाग मिल गया। यह सुनते ही दलाल स्ट्रीट फिर से साहब के इर्द-गिर्द मंडराने लगी है। साहब को तो बस ‘विटामिन-एम’ (माया) चाहिए, लिहाजा उन्होंने दलालों को सीधे अपने घर के किचन तक एंट्री दे दी है। गौरतलब है कि साहब का मन मध्य प्रदेश से ऊब चुका था, लेकिन दिल्ली की 360 डिग्री जांच में वे अनफिट पाए गए, सो अब यहीं मलाई कूट रहे हैं।

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आईपीएस ने पूछा— कितना कमाते हो?

एक मलाईदार ‘आवाजाही’ वाले विभाग में सीनियर आईपीएस साहब की वापसी हुई है। साहब ने पदभार संभालते ही ‘कमाऊपूतों’ की क्लास ली। पहला ही सवाल दाग दिया— “कितनी कमाई होती है?” हर काम के रेट चार्ट मंगवाए गए और फिर मंथन हुआ कि जो ‘कमिटमेंट’ ऊपर (आकाओं को) किया है, वह इस पुराने रेट से पूरा नहीं होगा। बस फिर क्या था, तत्काल फरमान जारी हुआ कि फलां-फलां काम के रेट ‘दूने’ किए जाएं। यही नहीं, पुराने रसूखदारों का ‘नजराना’ भी बंद करवा दिया गया है। गलियारों में चर्चा है कि साहब या तो रेट बढ़ाकर बवाल काटेंगे या फिर ‘रणछोड़दास’ बन जाएंगे। हद तो तब हो गई जब ग्वालियर में बंगला आवंटित होने के बावजूद साहब राजधानी में नियम विरुद्ध बंगले के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।

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गार्ड से भिड़ गए सीनियर आईएएस

पिछली तबादला सूची में एक साहब की किस्मत चमकी और उन्हें ‘सेहत’ से जुड़े महकमे की कमान मिली। नई पोस्टिंग का सुरूर ऐसा चढ़ा कि साहब ‘नायक’ फिल्म के हीरो की तरह औचक निरीक्षण पर निकल पड़े। जल्दबाजी में खुद ही स्टेयरिंग थामी और सरकारी अस्पताल जा पहुंचे। गाड़ी ‘नो पार्किंग’ में खड़ी की तो गेट पर तैनात गार्ड ने टोक दिया। बस, साहब का पारा सातवें आसमान पर! गार्ड अपनी ड्यूटी कर रहा था और साहब अपनी ‘हनक’ दिखा रहे थे। हंगामा बढ़ते देख अस्पताल प्रबंधन दौड़ा, साहब को पहचाना और बेचारे गार्ड को ही बलि का बकरा बना दिया। साहब की मान-मनौव्वल तो हो गई, लेकिन मशविरा यही है कि अगर आम आदमी बनकर सिस्टम सुधारने निकले हैं, तो फिर आम आदमी की तरह सहना भी सीखिए। बेचारे गार्ड को क्या पता कि आप ‘खुदा’ हैं!

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मलाई के मोह में प्रमोशन नहीं चाहिए

प्रशासनिक व्यवस्था में एक ‘कनिष्ठ बेगारी सेवा’ (पटवारी, आरआई, तहसीलदार) होती है, जिनका काम साहबों के लिए बुके से लेकर ‘अंगूर की बेटी’ (शराब) और भोजन तक का प्रबंध करना है। इसी सेवा के एक साहब का राजधानी में जबरदस्त जलवा है। उन्हें ‘हम्माल सेवा’ (SAS) में प्रमोट होने का मौका मिल रहा है, लेकिन वे अपनी ‘बेगारी’ छोड़ने को तैयार नहीं। असल वजह सेवा नहीं, बल्कि वह ‘मलाई’ है जो प्रॉपर्टी डीलिंग वाले उनके क्षेत्र से निकलती है। उनकी करतूतों से तंग आकर इलाके के ताकतवर विधायक ने उन्हें हटाने की कोशिश की, तो ‘जिला हुकुम’ ढाल बनकर खड़े हो गए। दबाव बढ़ा तो हुकुम ने तहसीलदार को कान में कह दिया— “मैं ट्रांसफर कर रहा हूँ, तुम कोर्ट से स्टे ले आओ।” अब तहसीलदार साहब मजे से ‘बेगारी’ कर रहे हैं और विधायक जी मन मसोसकर रह गए।

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मौत के सौदागर आईएएस की तगड़ी बैटिंग

धार्मिक राजधानी में निगमायुक्त की कुर्सी पर बैठे एक आईएएस साहब का दामन ‘भागीरथपुरा जल कांड’ के दागों से भरा है। जहरीले पानी से हुई मौतों के लिए उन्हें जिम्मेदार माना गया, लेकिन ‘मैनेजमेंट’ के उस्ताद साहब बच निकले। अब वे बेखौफ होकर अपनी नई पारी में ‘धुआंधार बैटिंग’ (वसूली) कर रहे हैं। उनके इस ‘स्लॉग ओवर’ के चर्चे अब गोपनीय विभाग तक पहुंच चुके हैं। मुमकिन है कि जल्द ही सरकार तक भी यह खबर पहुंचे और ‘सिक्स’ लगाने के चक्कर में साहब क्लीन बोल्ड हो जाएं।

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‘अंगूर की बेटी’ वाले विभाग से हटाए गए अफसर के चर्चे

सुरा (शराब) का प्रबंधन करने वाले विभाग से एक आईएएस अफसर की हाल ही में विदाई हुई है। जब तक वे वहां थे, उनका ‘बैलेट’ सबसे भारी रहता था। साहब को लगा था कि बदनामी से बचने के लिए वहां से निकल जाना ही बेहतर है, पर कुकर्म कभी दबते नहीं। 75 करोड़ के फर्जी चालान और जहरीली शराब से हुई मौतों के कांड ने राष्ट्रीय अखबारों में उनकी सुर्खी बना दी। साहब, पाप का घड़ा जब भरता है, तो गूँज दूर तक जाती है।

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नेशनल क्रश बने ‘तीन शादियों’ वाले साहब

‘द इनसाइडर्स’ ने ही सबसे पहले खुलासा किया था कि एक युवा आईएएस साहब तीसरी बार ‘सेहरा’ सजाने वाले हैं। 40 की उम्र में तीनों पत्नियां आईएएस—यह अपने आप में एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है! अब साहब ‘नेशनल क्रश’ बन चुके हैं और उनकी प्रेम कहानी के चर्चे दिल्ली के लुटियंस जोन तक हैं। हमने तो उन्हें पहले ही ‘आईएएस का कैसानोवा’ घोषित कर दिया था। उनके इस रंगीन मिजाज के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा पिछला अंक जरूर टटोलें।

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काश! धुंधकारी साहब हमें सेवा का मौका देते

हमारे प्रिय पात्र ‘धुंधकारी’ (जल विभाग के प्रमुख अभियंता) पिछले दिनों विंध्य के प्रवास पर थे। वहां एक ठेकेदार ने उनके ‘गला तर करने’ और ‘सुंदरी’ का ऐसा पुख्ता इंतजाम किया कि साहब गदगद हो गए। अगले दिन मीटिंग में बाकी ठेकेदारों की शामत आ गई और वसूली के नए टारगेट सेट कर दिए गए। इंजीनियरों को भी धमकाया गया। कुछ इंजीनियरों से यह कहकर वसूली की गई कि पानी से जुड़े कामों में बड़े साहब सख्त हैं। नोटिस जारी करना होगा लेकिन मोटा माल दोगे तो धुरंधर यानी विभाग के मुखिया से कहकर बचा लूंगा। लेकिन सेवा करने वाले ठेकेदार को धुंधकारी ने कुछ नहीं कहा। अब दूसरे ठेकेदार ठंडी आहें भर रहे हैं कि “सेवा का मौका हमें क्यों नहीं दिया गया?”

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जैनवाद की गूँज

मध्य प्रदेश प्रशासन में इन दिनों ‘जैनवाद’ का बोलबाला है। खरीदी से जुड़े एक निगम में पीडब्ल्यूडी के एक रिटायर्ड ईई साहब 65 की उम्र पार करने के बाद भी ‘जैनवाद’ की कृपा से ‘कंसल्टेंट’ बनकर जमे हुए हैं। नगरीय प्रशासन से लेकर हर विभाग में ‘सुबोध-ता’ के चलते रिटायर्ड जैन अफसरों को संविदा की मलाई मिल रही है। आखिर ‘जैनवाद’ क्यों फल-फूल रहा है, इसका अंदाजा तो आप ‘बड़े साहब’ के सरनेम से लगा ही चुके होंगे!

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लेखक की टिप्पणी: ‘द इनसाइडर्स’ का उद्देश्य प्रशासनिक गलियारों की उस ‘इनसाइड स्टोरी’ को सामने लाना है जो अक्सर फाइलों के नीचे दबी रह जाती है। यह व्यंग्य सत्ता और व्यवस्था को आईना दिखाने का एक विनम्र प्रयास है। किसी को भी ठेस पहुँचाना हमारा मकसद नहीं है।

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