Trending

The Insiders: मोहन की अनुरागी संस्कृति का खेल; भागीरथ-पुरा की गंगा के बाद भोपाल में गौ-वध का महापाप, पश्चाताप कब? धुरंधर और धुंधकारी की जोड़ी का धमाल

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें भोपाल के स्लाटर हाउस में गौ-वध की इनसाइड स्टोरी

कुलदीप सिंगोरिया | 9926510865

भोपाल | भारतीय संस्कृति में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि चेतना का साक्षात स्वरूप है। वह ‘कामधेनु’ है और ‘कपिला’ भी। हमारे संस्कार सिखाते हैं कि दिन की पहली रोटी गाय की है, क्योंकि उसके अस्तित्व में तैंतीस कोटि देवताओं का वास है। अथर्ववेद का स्पष्ट उद्घोष है— “गावो विश्वस्य मातरः” अर्थात, गायें समस्त विश्व की माताएँ हैं। ऋग्वैदिक काल के ऋषि जिस गाय को ‘अघन्या’ (जिसका वध कभी न किया जा सके) कहकर पूजते थे, आज उसी ‘माता’ की पुकार भोपाल की गलियों में सिसक रही है। यह हमारी सनातन संस्कृति की आत्मा पर गहरा प्रहार है।

सबसे बड़ी विडंबना तो सत्ता के शीर्ष पर बैठी है। ट्रिपल इंजन की सरकार। प्रदेश के मुख्यमंत्री का नाम ‘मोहन’ है—वही गोपाल (कृष्ण) जिनका जीवन गौ-सेवा से शुरू हुआ। वे यदुवंश से आते हैं, फिर भी उनके राज में राजधानी की सड़कों पर गाय का मांस? मुख्यमंत्री जी, आपके नाम और वंश की मर्यादा क्या इस ‘नरक निगम’ के कसाइयों से छोटी पड़ गई?

अब प्रशासनिक मशीनरी के शीर्ष चेहरों को देखिए— मुख्य सचिव अनुराग जैन और निगम कमिश्नर संस्कृति जैन। जहाँ ‘अहिंसा परमो धर्म:’ जीवन का प्राण हो, उन्हीं ‘जैन’ अधिकारियों के संरक्षण में गौ-वध का होना लज्जास्पद है। मुख्य सचिव साहब, आपके अनुरागी प्रशासन में गौ-माता असुरक्षित क्यों हैं? और कमिश्नर साहिबा, यह कैसी ‘विकृत संस्कृति’ पनप रही है? क्या धर्म और नाम की गरिमा सिर्फ सरकारी दस्तावेजों की शोभा बढ़ाने के लिए है?

यह मामला सिर्फ लापरवाही नहीं, एक सोचा-समझा षड्यंत्र है। नियमों को ताक पर रखकर ऐसी शर्तें बुनी गईं कि काम ‘असलम चमड़े’ को ही मिले। टेंडर की फाइलों में छिपे भ्रष्टाचार ने कसाइयों के लिए निगम के दरवाजे खोल दिए। एक अजीब संयोग देखिए—इंदौर के भागीरथपुरा में ‘जल-मृत्यु’ के पीछे जो पानी विभाग के इंजीनियर संदिग्ध थे, भोपाल के स्लाटर हाउस टेंडर में भी उसी विभाग के इंजीनियर की मौजूदगी चर्चा में है। ऐसा लगता है कि निगम के इंजीनियरों ने ‘जल’ और ‘जमीन’ कहीं भी पवित्रता नहीं रहने देने की कसम खा ली है।

हाईकोर्ट का यह सवाल सटीक है— क्या अधिकारी यहाँ सिर्फ मौज करने आते हैं? ये युवा ‘RR’ (IAS) अधिकारी निगम को सिर्फ प्रोफाइल बनाने और विदेश यात्राओं का जरिया समझते हैं। पीछे छूट जाता है बरसों से एक ही कुर्सी पर जमा वह ‘पुराना अमला‘, जिसके लिए शहर की परेशानियां ‘समस्या’ नहीं, बल्कि ‘उगाही’ का अवसर हैं। वर्षों पहले जब मैंने नगर निगम की रिपोर्टिंग के दौरान तत्कालीन यादवी महापौर को गौ-वध की जानकारी दी थी, तब भी जवाब ‘मौन’ ही मिला था। सच ही कहा गया है— “परेशानियां समेट के सारे शहर की जब कुछ न बन सका, तो नगर निगम बना दिया।”

श्रीमद्भागवत पुराण की कथा कहती है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा नृग महान दानवीर थे, लेकिन अनजाने में हुए मात्र एक ‘गौ-दोष’ के कारण उन्हें हजारों वर्षों तक गिरगिट बनकर अंधे कुएं में रहना पड़ा था। जब अनजाने में हुई भूल का इतना भयानक दैवीय दंड है, तो भोपाल में जहाँ सचेत रूप से, भ्रष्टाचार और टेंडर के जरिए ‘माता’ को काटा गया, वहां दंड क्या होगा? गरुड़ पुराण के अनुसार गौ-संहार में सहायक बनने वाले भी ‘कुम्भीपाक’ नरक के भागी हैं। पर यहाँ केवल सत्ता दोषी नहीं, भोपाल की वह जनता भी पाप की हिस्सेदार है जिसने मौन रहकर ऐसी व्यवस्था को स्वीकार किया और वोट भी दिया।

मुख्यमंत्री मोहन यादव, मुख्य सचिव अनुराग जैन और कमिश्नर संस्कृति जैन शायद अपने नाम, वंश और धर्म की मर्यादा भूल गए हों, लेकिन भोपाल को याद रहेगा कि उनकी नाक के नीचे ‘अहिंसा’ की सरेआम हत्या हुई। ‘विश्व की माता’ आज अपनी संतानों से पूछ रही है“क्या मेरा मोल सिर्फ एक चुनावी नारा ही था?”

यह सब लिखने के बाद मन की वेदना ऐसी तीव्र हो उठी है कि आज का द इनसाइडर्स का अंक लिखने की मन:स्थिति नहीं है। लेकिन श्रीमद् भगवत गीता का संदेश ही कर्म का है तो हम भी अपना फर्ज निभाते हुए शुरू करते हैं आज का द इनसाइडर्स का अंक…


धुरंधर और धुंधकारी की जोड़ी ने मचाया धमाल

चोर मचाए शोर फिल्म का वह गाना तो आपने सुना ही होगा— “ये चोर ये चोर ये चोर चोर चोर चोर… मचाए शोर!” आजकल धुरंधर और धुंधकारी की जोड़ी ने पानी से जुड़े एक विभाग में बिल्कुल वैसा ही धमाल मचाया हुआ है। पुराने पाठक धुंधकारी (प्रमुख अभियंता) से भली-भांति परिचित होंगे ही। नए पाठकों के लिए हम लिंक दे देते हैं। वहीं, विभाग के मुखिया को आजकल उनकी ‘कमाई’ और ‘अय्याशियों’ के चलते ‘धुरंधर’ नाम मिल गया है। ताजा किस्सा यूं है कि पंगत में बच्चों को दोने में खीर परोसी गई। परन्तु बच्चे खीर का सेवन करते, उससे पहले ही आयोजकों ने दक्षिण भारत से आए हुए एक वीआईपी बच्चे के लिए खीर समेत दोने वापस ले लिए। बच्चे बस मुँह देखते रह गए। अब इस कहानी में हमारे किरदार फिट करते हैं। तो यहां आयोजक धुरंधर और धुंधकारी थे। उन्होंने प्रदेश में ठेकेदारों को भुगतान के लिए इंजीनियरों को पेमेंट यानी आवंटन आदेश जारी किया, लेकिन तभी धुरंधर की मेधा प्रज्ञावान हुई और उन्हें अपनी स्वदेशी दक्षिण भारतीय कंपनी की याद आ गई। तुरंत धुंधकारी को आवंटन आदेश वापस लेने का आदेश हुआ और उसने आज्ञाकारी बालक की भांति आदेश वापस लेकर एक निगम को सौंप दिए, जहाँ से कंपनी को पेमेंट किया गया। इसके बाद से विभाग के सारे इंजीनियर और ठेकेदार उन बच्चों की भांति मुँह ताक रहे हैं जिनके हाथ से निवाला छीन लिया गया हो। सच है— “अंधा बांटे रेवड़ी, चीन्ह चीन्ह कर दे।”

धुंधकारी कौन था, पढ़े यह किस्सा – द इनसाइडर्स: मंत्री को हुआ गृह क्लेश, धुंधकारी इंजीनियर का नया कारनामा, अफसर का कोलार में बन रहा महल

पिछला अंक पढ़ें : The Insiders: कमीशनखोरी के अमृत से भागीरथ की गंगा विषैली, आईपीएस की खजुराहो यात्रा में दलाल की जुगलबंदी, रोटी की ज्वाला में आईएएस झुलसी

शादी के लिए मूंगफली वाले साहब ने तेज किए दौरे

एक संभागायुक्त साहब के सुपुत्र की शादी है, इसके लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई। लेकिन यह क्या, वे शादी की तैयारियों की बजाय आजकल इन्सपेक्शन-इन्सपेक्शन खेल रहे हैं। अपने मातहत आने वाले जिलों में इन्सपेक्शन करने पहुंच जाते हैं और सुबह-सुबह आबकारी, पीडब्ल्यूडी, खनिज आदि के अफसरों को कमरे में तलब करते हैं। अंदर क्या बात हुई, यह तो नहीं पता? लेकिन बाहर आकर अफसर भी ठेकेदारों से कहने लगते हैं— “भाई कमिश्नर साहब के यहां शादी है, कुछ इंतजाम करो।” वैसे शादी के बहाने वसूली की यह अच्छी ट्रिक है। साहब के बारे में हमने पहले भी बताया था कि एक दिन इन्होंने मीटिंग में कह दिया था कि “यहां तो कोई मूंगफली की भी नहीं पूछता”, तो एक कर्मठ जनसंपर्क अधिकारी ने इनके केबिन में ही मूंगफली का ढेर रख दिया था।

यह अंक भी पढ़ें – The Insiders: भागीरथ पुरा की गंगा को गटर में बदलने वाले IAS अफसर का दंभ, SSP को मिला अनोखा बर्थडे विश

छूट की ‘उज्जैनी’ पटकथा

राजनीति जैसी दिखती है, वैसी होती नहीं है। अब देखिए न, ग्वालियर मेले में वाहन छूट के लिए कैबिनेट में बहुत घमासान हुआ। अफसरों ने जीएसटी का हाल बता औचित्य पर सवाल उठाए और बताया कि छूट का दुरुपयोग हुआ है, व्यापार को कोई लाभ नहीं हुआ। लेकिन महाराज के मंत्रियों के आगे सारे प्रयास असफल रहे। और फिर सुल्तान ने हस्तक्षेप कर छूट के प्रस्ताव को कैबिनेट से स्वीकृति दिलवा दी। असल कहानी की पटकथा यह है कि खजाना और प्रशासनिक कारणों से छूट संभव नहीं थी, लेकिन उज्जैन में भी मेला छूट देनी थी। इसलिए ग्वालियर मेले को आगे कर दोनों जगह छूट ले ली गई। पहली बार दोनों मेलों के लिए एक साथ आदेश निकलेगा। लेकिन कुछ मंत्रियों ने इस पर अपनी रोटी भी सेंकी; एक मंत्री ने कहा कि बरमान घाट के मेले में छूट दो, वहीं एक पूर्व मुख्यमंत्री ने भी विदिशा के लिए छूट की मांग कर दी। यह भी चर्चा हुई कि हर जिले में ही छूट देनी चाहिए। यह बात अलग है कि जब वे लंबे वक्त मुख्यमंत्री रहे तो कभी छूट नहीं दी। इसलिए कोई भी छूट सिर्फ राजनीतिक होती है, उसका व्यापार से मतलब नहीं होता।

यह अंक पढ़ें – The Insiders: निधि पर मेहरबान हुए सीनियर आईएएस, सांसद जी की टंगड़ी समझ नहीं पाए एमडी, बड़े साहब को करना पड़ा निकम्मे आईएएस का काम

राजधानी में नए यादव वीर की एंट्री

राजधानी में यादव मंत्री कृष्णा गौर के इलाके में नए यादव वीर की एंट्री हो चुकी है। यादव वीर सुल्तान की डीगें हांक-हांक कर नए-नए मुर्गों को हलाल कर रहा है। उनकी डीगों के फेर में कई फंस चुके हैं और कई से बातचीत चल रही है। इसमें साथ प्रशासनिक अधिकारी भी दे रहे हैं। हालांकि जिला हुकुम तो सिर्फ नादानी में साथ दे रहे हैं, पर असल खिलाड़ी ‘उप अधिकारी’ हैं, जो इनके साथ डील कर विवादित जमीनों का निपटारा कर रहे हैं। सुल्तान से गुजारिश है कि इनसे संबंधों का पर्दाफाश करें, नहीं तो किसी दिन यह अनर्थ करवा देंगे।

योग: कर्मसु कौशलम विशेष श्रृंखला पढ़ें – द इनसाइडर्स : ऑफिस चैंबर से रिश्वत के 9 लाख गायब, 15 लाख रुपए में हो रहा ट्रांसफर का सौदा, शाहनामा के जरिए बने बड़े कप्तान साहब

नालायक बेटे को फटकार, लायक को पुचकार

भोपाल में स्टार्टअप कॉन्क्लेव हुआ। इसकी जिम्मेदारी राज्य हम्माल सेवा के एक अफसर पर थी, लेकिन वे नकारा निकले। इस पर विभाग प्रमुख ने उनकी खूब खैर खबर ली और यहाँ तक कह दिया कि “जब काम नहीं आता है तो यहां से चले क्यों नहीं जाते?” फिर संकटमोचक और दूसरे लायक बेटे ने जिम्मेदारी संभाली, जिन्हें प्रशासन में अच्छा ‘इवेंट मैनेजर’ कहा जाता है।

यह अंक भी पढ़ें – The Insiders: कार पलटी के बाद कमिश्नर की चुप्पी, आईपीएस की जांच में फिर क्वेरी का कांटा, एसीएस मैडम ने आईएएस की खोली पोल, बेनामी निवेश में मंत्री की सांस अटकी, धुंधकारी का पद रिसेप्शन से पहले गायब

कलेक्टर साहब के ‘बोल-बच्चन’

नर्मदापुरम संभाग के एक जिले के जिला हुकुम उज्जैन कलेक्टर नहीं बन पाए, इसलिए अब दूसरी अच्छी पोस्टिंग चाहते हैं। हाल ही में एक स्कूल के भवन को गिराने के लिए उन्होंने सांप्रदायिकता का इस्तेमाल किया, ताकि सरकार में उनका नंबर बढ़ जाए। यह स्टाइल एक अन्य कलेक्टर ने भी अपनाई थी जो अब मंत्रालय में हैं। वैसे, विरोधियों ने उनकी बदजुबानी पर उन्हें घेरना शुरू कर दिया है। हाल ही में एक बैठक में उनकी जुबान पर फिर सरस्वती की जगह ‘बेताल’ सवार हो गया। उन्होंने एक अधिकारी को बैठक में इतनी गाली दी कि वह रोते हुए बाहर निकला। वह अधिकारी इतना नाराज है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात करने वाला है। इस बीच उनका वह पुराना वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें उज्जैन पोस्टिंग के दौरान वे एक पुलिसकर्मी से भिड़ गए थे।

राज्य हम्माल सेवा सीरिज का पहला अंक भी पढ़ें – द इनसाइडर्स: मंत्री के बंगले पर ताला लगाने का अनोखा राज, आईपीएस ने हुस्न की सजा भुगती और मैडम सिखा रही पुलिस को योग

WWW के शौकीनों को सार्थक ने पहुंचाई क्षति

कृषि से जुड़े संस्थान में पिछले दिनों सार्थक एप्प से ऑन लाइन अटेंडेंस अनिवार्य क्या हुई, संस्थान के वित्त से जुड़े “राजा साहेब” परेशान हो गए हैं। दरअसल साहेब WWW (Wealth, Wine, Woman) के शौकीन हैं। सुबह देर से होती है और शाम होते तक “तलब” लग जाती है। कड़ाके की सर्दी में 4 बजे ही गाड़ी पोर्च में लग जाती है। इन जैसे अफसरों पर यह शेर खूब फबता है: “जाड़ों में सूरज भी सरकारी अफसर हो जाता है… सुबह देर से आता है और शाम को जल्दी चला जाता है।” चर्चा तो यह भी है कि सरकार ई-उपस्थिति के साथ अब इन जैसे अफसरों की गाड़ी में GPS और कमरे में कैमरा लगवा दे, तो और बड़े खुलासे होंगे।

प्रवासी पक्षी सीरिज का पहला अंक पढ़ें – दलित महिला आईएएस ने पूछा- हमें कलेक्टर क्यों नहीं बनाया? चैटजीपीटी से नकल करने पर पड़ी डांट, मंत्री जी फिर चकमा खा गए

कलेक्टर-कमिश्नर कांफ्रेंस के लिए किसे वक्त नहीं?

शासन-प्रशासन कैसा चल रहा है, इसकी बानगी देखनी हो तो कलेक्टर-कमिश्नर कांफ्रेंस की रिव्यू बैठक देख लीजिए। 31 दिसंबर, फिर 5 जनवरी और आखिर में 15 जनवरी, लेकिन बैठक नहीं हुई। हर बार नई तारीख के साथ प्रोफार्मा बदल जाता है और उसमें भी ऐसे बिंदु जुड़ जाते हैं जो कांफ्रेंस में तय नहीं हुए थे। डांट से बचने के लिए जिले की टीम सिर्फ प्रोफार्मा तैयार करने में वक्त जाया करती है और वल्लभ भवन तारीख आगे खिसकाता जाता है। एक जिले के अधिकारी ने कह भी दिया— “प्रोफार्मा तैयार करते रहेंगे तो प्रशासन जनता से बहुत दूर चला जाएगा।” और ऐसे में कोई घटना हो गई तो किरकिरी सरकार की ही होगी।

यह अंक पढ़ें – द इनसाइडर्स: मंत्री जी का डिजिटल लोकतंत्र, आईपीएस की सीआर न लिख पाने से एसीएस मैडम भनभनाई, एमडी साहब की आड़ में नया वसूली मंत्र


लेखक की टिप्पणी: ‘द इनसाइडर्स’ का उद्देश्य प्रशासनिक गलियारों की उस ‘इनसाइड स्टोरी’ को सामने लाना है जो अक्सर फाइलों के नीचे दबी रह जाती है। यह व्यंग्य सत्ता और व्यवस्था को आईना दिखाने का एक विनम्र प्रयास है। किसी को भी ठेस पहुँचाना हमारा मकसद नहीं है।

चुगली श्रृंखला पर विशेष अंक पढ़ें – द इनसाइडर्स: मंत्री के विशेष सहायक के पांच ड्राइंग रूम का राज, आईएएस ने कांवड़ यात्रा में धोए पाप, मामा नहीं बने गजनी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button