The Insiders: IPS के ससुर के लिए व्यापारी से भिड़ी कमिश्नर, महिला IAS को मिला नजराना, गुप्त खाते का नया राजकुमार कौन?

द इनसाइडर्स में इस बार पढ़ें महाराष्ट्र से आए अफसरों के प्रशासनिक कौशल की डिकोडिंग

कुलदीप सिंगोरिया@9926510865

भोपाल | “प्रवासी पक्षी और खानाबदोशी…भाग 5” गतांक में हमने गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत से आने वाले प्रवासी खानाबदोशों के बारे में चर्चा की। अभी सूर्य दक्षिणायन है तो आज हम भी प्रदेश की दक्षिण दिशा में चलेंगे। आजकल एक फ़िल्म द ताज स्टोरी चर्चाओं में है। इसका मूल कथानक है कि वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास की अतिरंजनाओं पर पर्दा डालने के लिए सनातनी इतिहास के साथ अन्याय किया। और हम मानते हैं कि दक्षिण के इतिहास को इतिहासकारों ने पूरी तरह अनदेखा किया। दक्षिण के राज्यों का गौरवशाली इतिहास रहा है…वीर मराठा.. चालुक्य..चोल…पल्लव …राष्ट्रकूट…गौरवशाली वास्तुकला और स्थापत्यकला के मंदिर ..रामेश्वरम तंजौर से लेकर मदुरई अजंता एलोरा तक…।लेकिन न इतिहासकारों ने किताबों में ज्यादा पृष्ठ दिए और न ही हिंदी प्रदेश के जन ने अपने मानस पटल पर विशेष स्थान। खैर हमारा मुद्दा कुछ और है UPSC /PSC से आने वाले खानाबदोश दक्षिण से PSC में लगभग शून्य और UPSC से ठीक ठाक तादाद में प्रवासी पक्षी (अफसर) आते हैं। समझने के लिए हम दक्षिण को दो भागों में बांटेंगे। पहला देवनागरी शैली की भाषा वाला महाराष्ट्र और दूसरा द्रविड़ प्रदेश (केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र और तेलंगाना)। शुरूआत महाराष्ट्र से – जो कभी मुम्बई प्रेसिडेंसी और CP बरार का हिस्सा था। अर्थात विदर्भ, कोंकण, मराठवाड़ा, खानदेश और पश्चिमी हिस्से से बना प्रदेश। वीर मराठों का प्रदेश। गोडसे, अम्बेडकर, संघ HQ और देश की आर्थिक राजधानी का प्रदेश। इस प्रदेश के लोग अपेक्षाकृत सिन्सियर और कल्चर्ड होते हैं।

पानी की कमी से इनके आचार विचार में मितव्ययिता आ गई। अनाज का व्यय रोका और इसी वजह से रोटी के चौथाई टुकड़े करके थाली में परोसने के संस्कार आए। यदि आप किसी मराठी परिवार में जाएं और भोजन से पहले वहनी(भाभी) आपसे पूछे कि आपको कितनी रोटी की भूख है तो बुरा न माने। तो जो भी UPSC के खानाबदोश इस प्रदेश में आते हैं, वो अक्सर इस मितव्ययता की बीमारी से पीड़ित रहते हैं। छुपकर, खींसे निपोरते हुए, मधुरता और सद्भाव के साथ कमाई बेहिसाब करते हैं मगर पैसे जेब से नहीं निकलते। खर्च नहीं करते तो टीम भी नहीं बना पाते। हालांकि इस प्रदेश के नौकरशाहों की काम की गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है। ऐसे अफसर सेवानिवृत्त हो कर पुणे/नागपुर/मुम्बई में बसना पसंद करते हैं। हालांकि आपला मानूस का भाव इनके भीतर तक धंसा रहता है। शेष अगले अंक में… और अब शुरू करते हैं रसूखदारों के रहस्य, रोमांच और नए कारनामों को उजागर करता हुआ आज का द इनसाइडर्स…

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सिर मुंडाते ही ओले पड़े

राज्य हम्माल सेवा (राज्य प्रशासनिक सेवा) से प्रमोशन पाकर आईएएस बने अफसरों के साथ भेदभाव की चर्चा तो अब “कानों में बसी धुन” की तरह रोज बजती है। हालात यह कि बड़े साहब की मेहरबानी ऐसी बरसी है कि मलाईदार कुर्सियाँ तो छोड़िए, छोटे पदों पर भी अब प्रमोटी अफसरों की “गुंजाइश” कम होती जा रही है। कभी-कभी लगता है तुलसीदास इस दौर को देख रहे होते तो शायद यही कहते— “जाके प्रिय न राम वैदेही, तजिए ताहि दसों दिशि देही।” यानी राज्य हम्माल सेवा वालों को सब तरफ से तजने का अभियान चल रहा है। आलम यह है कि हम्मालों को दिए गए विकास प्राधिकरणों और अन्य छोटे संस्थानों में सीईओ जैसे परंपरागत पदों पर यूपीएससी के नए रंगरूटों पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है। कुछ हम्माल बचे हैं, तो वे भी सरकारी दया पर टंगे उस दीये की तरह—“जो हवा थोड़ी तेज हो तो बुझ जाए।” खैर, एक प्रमोटी आईएएस साहब ने अपनी पुरानी सेवा के अफसरों की हालात नहीं देखी गई तो उन्होंने प्रचार-प्रसार वाले विभाग में राज्य हम्माल सेवा से एक अफसरों को यहां पदस्थ करवा दिया। फिर क्या, विभाग में भूचाल आ गया। कलमबद्ध हड़ताल शुरू हो गई। फिलहाल राजीनामा हो गया है, लेकिन कभी भी चिंगारी भड़क सकती है। हम तो बस यही कहेंगे—माहौल ऐसा है कि राज्य हम्माल सेवा के हित की बात करना “शेर के मुँह में हाथ डालने” जैसा है। यानी सिर मुंडाते ही ओले पड़ने निश्चित हैं।

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सीरिज का पहला अंक पढ़ें – दलित महिला आईएएस ने पूछा- हमें कलेक्टर क्यों नहीं बनाया? चैटजीपीटी से नकल करने पर पड़ी डांट, मंत्री जी फिर चकमा खा गए

साहब के बाद अगला नंबर किसका?

‘एक वर्ग विशेष की बेटियों से संबंध बनाने’ वाली टिप्पणी करने वाले आईएएस साहब के लिए एक कहावत याद आती है — “ऊँची जाति का कुत्ता भी बड़ा होता है।” (मात्र एक व्यंग्यात्मक लोकोक्ति, किसी जाति पर टिप्पणी नहीं) तो साहब भूल गए कि पहले यह हम्माल सेवा से थे। आईएएस जैसी बड़ी जाति में आ गए तो कुत्ते की भांति अपने को ऊंची जाति का मान लिया। लेकिन भूल गए कि बबूल बोकर आम नहीं मिलेंगे। ‘द इनसाइडर्स’ के पाठकों को उनकी पुरानी कहानियाँ पहले से याद हैं, इसलिए दोहराना व्यर्थ होगा। हाँ, नई सूचना यह है कि जब विवाद बढ़ा तो उनकी ही प्रजाति के अफसरों ने उनसे पूछा— साहब ने मासूमियत की चादर ओढ़कर कहा— “मैं तो प्रमोटी हूँ और खास वर्ग से भी हूँ, इसलिए निशाना बनाया जा रहा है। इसमें तो सीधी भर्ती वाले आरक्षित वर्ग के एक आईएएस भी शामिल हैं।” अब साहब चाहे कुछ भी कहें, पर “जुबान की फिसलन, आदमी की किस्मत बिगाड़ देती है।” खैर सरकार के गुप्तचर अब साहब के करीबी चेले-चपाटों पर भी नजर रखे हुए हैं।
कबीर ने इसीलिए कहा था —
“चलती चाकी देख कर, दिया कबीरा रोए।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।”

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आईपीएस के ससुर की मदद में फँसेंगी कमिश्नर मैडम

एक नगरीय निकाय में नई कमिश्नर मैडम की पारी शुरू हो चुकी है। ईमानदारी ऐसी कि मानो “सफेद कपड़े पर एक भी दाग न हो।” लेकिन इंसान तो आखिर इंसान—और बिरादरी का दबाव तो बनता ही है। यह बात एक नई कहानी की वजह से हम कह रहे हैं। यह कहानी राजधानी की पाश कॉलोनी से शुरू होती है, जहाँ मैडम और उनके पति के मित्र—एक आईपीएस के ससुरजी का बंगला है। पास में ही एक व्यापारी का भी बंगला है। इन दोनों का रिश्ता ऐसा कि “दो तलवारें एक म्यान में नहीं रह सकतीं।” ससुरजी ने व्यापारी को सबक सिखाने के लिए शिकायत ठोंक दी। व्यापारी ने भी कोर्ट से राहत पा ली। पर ससुरजी का जोश कम नहीं हुआ—उन्होंने फिर दामाद के जरिए मैडम तक शिकायत पहुँचा दी। मैडम ने कोर्ट के निर्देश देखे बिना ही व्यापारी को नोटिस दे दिया। व्यापारी जितना सफाई देता गया, मैडम कहती – नियमानुसार ही कार्रवाई होगी। ज्यादा जोर देने पर कहा कि मुझे भूमि विकास नियम की व्याख्या मत बताइए। दाल गलती न देख व्यापारी आखिर एक वरिष्ठ अफसर के पास पहुँचा। अफसर ने मामले की तह पकड़ते ही कमिश्नर मैडम को लिख दिया— “यदि अवमानना हुई, तो जवाबदेही आपकी होगी।” हम बस यही कहेंगे— “न्याय एक आँख से अंधा होता है, पर दूसरी आँख बहुत देखती है।” अगर मैडम ससुरजी और शहर के अन्य मकानों की नाप-जोख भी करवा दें, तो न्यायप्रियता की गूँज दूर तक सुनाई देगी।

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सट्टे की लत में कर्जदार हो गए भाई साहब

अब बात करते हैं एक सांसद महोदय के। सफाई में ख्यात शहर से आते हैं—अपनी व्यापारिक जाति के इकलौते सांसद। महोदय के सुपुत्र तीन चीजों के शौकीन— पार्टीबाजी, नशेबाजी और सट्टेबाजी। जिस पर रामधारी सिंह दिनकर की पंक्ति याद आती है— “पाप जो गुप्त है, वही सबसे अधिक घातक है।” सट्टे की लत उन्हें कर्ज में डुबो दिया। शायद चार्वाक दर्शन ने इन्हें खूब प्रेरित किया— “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत।” लेकिन भूल गए कि आधुनिक बैंक घी नहीं, नोटिस पिलाते हैं। अब बैंकों के नोटिस ने पुत्र के साथ ही सांसद महोदय की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगा दी है।

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जिलाहुकुम ने बंगले पर ही शराब व्यापारी से लिया नजराना

प्रमोटी महिला आईएएस मैडम आदिवासी जिले की कमान संभालते ही सक्रिय हो गईं। जनता खुश—“नई उम्मीद का नया सूरज”—पर जल्दी ही सूरज के धब्बे दिखने लगे। मैडम की सक्रियता के साथ ही विभागों में “कलेक्शन सिस्टम” की पुरानी चक्की घूमने लगी। तभी खबर आई कि मैडम ने एक शराब व्यापारी से पाँच पेटियों का नजराना सीधे बंगले पर मँगवा लिया। जिन विभागों में पकड़ है, वहाँ फाइलें खुद वे पलट-पलटकर खुरचन ढूँढ रही हैं।

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पावर नहीं, संस्कृति से प्यार

एक एसीएस साहब हैं जिन्हें पावर दी गई, पर उन्हें पावर से प्रेम नहीं—संस्कृति से है। वे पावर वाले चैंबर से अधिक संस्कृति में डूबे रहते हैं। मीटिंगों से ऐसे गायब रहते हैं जैसे “स्कूल से बंक मारकर फिल्म देखने गया छात्र।” बड़े साहब ने मीटिंग में टोका—सुधर जाइए।” पर इन्होंने नया तरीका निकाल लिया—अब मीटिंगों में अधीनस्थों को भेजते हैं। साहब के बारे में यह बात तेजी से फैल रही है –
पावर है, पर दिखाते नहीं;
संस्कृति है, पर छोड़ते नहीं।

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गुप्त खातों के राजकुमार की चिंता में डूबे सलाहकार साहब

संस्कृति की बात चल रही है तो यहां को एक और किस्सा पढ़ें। पूर्व में यहाँ पदस्थ एक साहब आज सरकार में ताकतवर हैं। सरकार से उनकी निकटता ऐसी कि “जहाँ सरकार, वहाँ साहब।” लेकिन इन दिनों वे परेशान है। वजह यह है कि उनके अकाउंटेंट को पाँच साल जेल की सजा हो गई है। यह वही अकाउंटेंट था जो साधारण ही नहीं, गुप्त खातों का भी हिसाब रखने का राजकुमार था। अब सवाल यह है कि गुप्त खातों की अगली चाबी किसके हाथ में जाए।  सलाहकार साहब का दर्द इस पंक्ति के जरूर आप समझ सकते हैं –
 “चाबी खो जाए तो ताला बदल जाता है,
पर ताले की याद नहीं जाती।”

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भविष्य सुनहरा बनाने के लिए खरीदी का टारगेट फिक्स

शहरी सेवा के एक अफसर को मंत्रीजी की नाराजगी के बाद दूर भेज दिया गया। उनकी जगह भविष्य को जानने वाले अफसर को चार्ज मिल गया। आते ही पत्नी के नाम हर्बल कंपनी के नाम पर अलग ही खेल शुरू किया। उन्होंने शहरों के जिम्मेदारों को “खरीदी के टारगेट” बाँट दिए। और धार्मिक नगरी में पाँच करोड़ की हवेली का निर्माण भी तेज रफ्तार में चल रहा है। इस घटनाक्रम पर दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे फिल्म में शाहरूख खान का एक डायलाग याद आता है —
“बड़े बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं।” पर यहाँ छोटी बातें—बड़ी कमाई की भूमिका बनाती हैं। खैर साहब को गीता में दिए गए एक संदेश से परिचित कराते हैं – “दुष्टान् सज्जनुषु दण्डं, सज्जनेषु च पालकम्। नित्यमेव महाराजो धर्मे स्थापयते प्रजा:॥” यानी शासन का धर्म है — दुष्टों को दंड देना और सज्जनों की रक्षा करना।
जब शासक ऐसा नहीं करता तो व्यवस्था बिगड़ती है।

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अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिए फिर मैदान में उतरेंगे पूर्व ईएनसी

अब आते हैं उस किरदार पर जो पानी से संबंधित विभाग में बड़के इंजीनियर रहे, संविदाधारी थे, रिटायर हो चुके हैं— पर इच्छाएँ अब भी जवान। नाती-पोतों संग समय बिताने की बजाय जनाब फिर “ऑफिस-ऑफिस” खेलने के मूड में हैं। इसलिए अर्बन डेवलपमेंट कंपनी में बड़का इंजीनियर बनने के लिए आवेदन डाल दिया है। हमारी तरफ से शुभकामनाएँ—इच्छाएँ अतृप्त रहें या पूरी हों, पर प्रयास जारी रहने चाहिए।

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