The Insiders: बिहार चुनाव छोड़ आईएएस ने की कोलकाता की घुमक्कड़ी, अफसर की बदजुबानी से थर्राए कर्मचारी, मैडम का फायर फाइटर अवतार
द इनइसाडर्स में इस बार पढ़ें पंजाब समेत उत्तर भारत से आए अफसरों के प्रशासनिक कौशल का ब्यौरा
कुलदीप सिंगोरिया@9926510865
भोपाल | “प्रवासी पक्षी और ख़ानाबदोशी...भाग 4″ पिछले अंकों में हमने गुजरात और राजस्थान से आने वाले प्रवासी पक्षियों (अफसरों) के बारे में बताया था। आज चर्चा उत्तर के शेष राज्यों पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली और उत्तराखंड से आनेवाले प्रवासी पक्षियों की। आजादी के समय सबसे बड़ा विभाजन दो राज्यों का हुआ था – पंजाब और बंगाल। आजादी के बाद भी पंजाब के टुकड़े होते गए। कभी हरियाणा, कभी हिमाचल। वहीं, उत्तरप्रदेश से टूटा उत्तराखंड और उत्तर के सभी राज्यों से बना मिक्स वेज सब्जी की तरह दिल्ली एनसीआर। हालांकि आधा मेवात, माझा, दोआबा, मालवा, जलोढ़, शिवालिक और अरावली की पहाड़ियां और ग्रेट हिमालयन रीजन से बने हैं ये राज्य पर मोटे तौर पर पहाड़ और मैदानी इलाके में बंटे हैं। बात मैदान की शुरू करते हैं तो पंजाबी संस्कृति आज भी इन इलाकों का मुख्य किरदार है।
यहां के बाशिंदे एमपी में UPSC के जरिए बहुत कम आते हैं और MPPSC से लगभग शून्य। हाँ पहाड़ों से IFS वाले प्रवासी पक्षी बहुतायत में आते हैं। वैसे, मध्य प्रदेश में एक समय “अस्सी-तुस्सी” लॉबी के जलवे हुआ करते थे। इस लॉबी ने कई बड़े साहब व कई बड़े कप्तान साहब दिए। मौटे तौर पर इनका विश्लेषण करें तो यह गरम, नरम और बेशरम वाली थ्योरी के होते हैं। इस थ्योरी के बारे में हमने योग: कर्मशु कौशलम सीरिज में बताया था। इनके प्रशासनिक कौशल को समझने के लिए तीन पंजाबी कहावते ही काफी है। जैसे –
“खादा पीता लाहे दा, रहंदे अहमत शाहे दा” (जो कमाया, वो ही अपना है), “कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल पतासे पीवे” (जब कोई व्यक्ति बेफिक्र होकर अपनी दुनिया में खुश रहे), और “बगल च छुरी, मुंह च राम राम” (जो पीठ पीछे बुराई करे)”
तो साहब सामान्यतया मैदानी इलाके वालों का ध्येय… सब चीजें वड्डी वड्डी करनी हैं। काम भी वड्डा वड्डा। ऐश भी वड्डी वड्डी और कमाई भी वड्डी वड्डी होर (और) घर भी दो दो बनाने हैं – एक भोपाल विच दूजा मोहाली या दिल्ली NCR विच। हाँ पहाड़ों से आये पक्षी पहाड़ी तासीर की तरह सामान्यतया बहुत ही मेहनती और एथिकल होते हैं। छोटी मोटी जो भी कमाई करते हैं उससे बुढापे का घरौंदा देहरादून में बनाते हैं। और अब आपको ज्यादा इंतजार न कराते हुए शुरू करते हैं आज के द इनसाइडर्स के चुटीले किस्सों की पोटली…
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बदजुबान सीनियर आईएएस – “तुम्हें बिल्डिंग से फेंक दूंगा”
शहर विकास की जिम्मेदारी उठाने वाली संस्था में इन दिनों तूफ़ान आया हुआ है, और उसका कारण है — एक सीनियर आईएएस अफसर। उनकी बदजुबानी और व्यवहार की वजह से कई अफसर सदमे में हैं। कुछ ने तो वीआरएस भी अप्लाई कर दिया है और कुछ छुट्टी पर चले गए हैं। जनाब ने हाल ही एक अफसर से नाराज होकर कहा — “तुम्हें बिल्डिंग से नीचे फेंक दूंगा।” शब्द थे, मगर वार ऐसे जैसे किसी ने आत्मसम्मान पर पत्थर मारा हो। अफसर महोदय आहत हुए, ठेस इतनी लगी कि वीआरएस का आवेदन ठोक दिया। पर बदजुबान आईएएस शायद भूल गए कि पद की ऊँचाई पर अगर ज़ुबान फिसल जाए, तो इमारत की नींव हिल जाती है। हम तो बस इतना कहेंगे हुजूर — आईएएस होना खुदा होना नहीं होता। आपकी नीयत अच्छी हो सकती है, पर जब जुबान खराब हो जाए तो अच्छी नीयत भी बदनियत लगती है।
कबीरदास जी ने कहा था —
“ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए;
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।”
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आईपीएस की डीपीसी — फिर से “चल चित्र” शुरू
हमने पहले ही कहा था — इस बार की एसपीएस से आईपीएस के लिए डीपीसी में नंबर एक रैंक वाले साहब की कुर्सी हिल सकती है। और हुआ भी वही। वर्षों से “निद्रा योग” में लीन साहब अचानक जागे, और जागे भी तो सिर्फ “आईपीएस तमगे” के लिए। जैसे ही पता चला कि डीपीसी फिर से होगी तो उनकी जांच की जो फाइलें बरसों से धूल फांक रही थीं, अब रॉकेट की स्पीड में दौड़ रही हैं। गौरतलब है कि यह पहला मौका है जब ढाई दशक में डीपीसी दोबारा होगी। पीएचक्यू में चाय के प्यालों पर सवाल वही — “साहब ने कौन-सी औषधि खा ली कि मंत्रालय तक हिल गया?” माहौल ऐसा जैसे महाभारत के संजय “जय बोलो डीपीसी कथा की” सुना रहे हों। वैसे हमारे एक इनसाइडर का कहना है — पहली डीपीसी के मिनट्स जारी नहीं हुए थे, इसलिए पूरी स्क्रिप्ट का हीरो इन्हें मान लेना जल्दबाज़ी है। असल रहस्य तो UPSC सदस्य, मौजूदा CS और DGP ही बता सकते हैं। बस फर्क इतना है कि परदे के पीछे का ये “डीपीसी ड्रामा” किसी वेब सीरीज़ से कम नहीं।
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स्टेटस लगाने के शौक ने सरकारी गोपनीयता खोली
राज्य प्रशासनिक सेवा में एक अफसर हैं — जिन्हें लोग मज़ाक में “राज्य हम्माल सेवा” का ब्रांड एंबेसडर कहते हैं। साहब अपने अफसरी टशन में विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष द्वारा पूछे गए प्रश्न को ही व्हाट्सऐप स्टेटस बना बैठे। यानी, गोपनीयता गई तेल लेने।
वरिष्ठ अफसरों ने देखा, तो स्टेटस तुरन्त हटवाया गया। साहब का मासूम सा तर्क था — “जब सवाल विधानसभा में सार्वजनिक होना ही है, तो स्टेटस लगाने से कौन सी गोपनीयता भंग हो गई?” कितना भोला तर्क था — जैसे रावण कहे, मैंने सीता का हरण नहीं, ‘सामाजिक पहल’ की थी! वैसे हम बता दें कि जब यह साहब सुशासन संस्थान में थे, तब खूब कुशासन किया था।
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फिलहाल शांति है…
बिहार चुनाव बीत चुके हैं, और डॉक्टर साहब का स्ट्राइक रेट भी शानदार रहा। फिर भी भोपाल की राजनीतिक गलियों में फुसफुसाहट है — “कुछ बड़ा होने वाला है।” मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर निगम-मंडल की कुर्सियाँ सब हवा में तैर रही हैं। दिल्ली से लेकर प्रदेश तक डगमगाहट की बातें हवा में तैर रही है। उच्च पदस्थ एक इनसाइडर का कहना है कि दिल्ली में छवि स्थाई तौर पर डैमेज हुई है लेकिन खतरे के संकेत नहीं है। यानी सब कुछ चंगा है। खैर, राजनीति वही शतरंज है — जहाँ प्यादे को भी लगता है कि राजा उसी के इशारे पर चलता है। हम तो बस कहेंगे — “ये सन्नाटा भी किसी तूफ़ान का इंतज़ार करता दिखता है।”
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मंत्री जी की सिक्युरिटी और उसके निहितार्थ
बिहार चुनाव के बीच एक कद्दावर, लेकिन विवादों से दूर मंत्री जी को अचानक Y+ सिक्युरिटी मिल गई। अब राजनीतिक गलियारे में सवाल — “जब खतरा नहीं, तो सिक्युरिटी क्यों?” जवाब में चर्चा — दिल्ली ने कद बढ़ाने का संदेश दिया है। कहते हैं, यह सिक्युरिटी नहीं, पॉलिटिकल प्रमोशन लेटर है। “दिल्ली दूर है” सुनने वाले अब “दिल्ली पास है” फुसफुसा रहे हैं।
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कलेक्टर साहब से शनि की दशा कब हटेगी
एक प्रमोटी आईएएस, यानी “हम्माल सेवा से प्रमोटेड अफसर”, इन दिनों शनि की साढ़ेसाती में हैं। पंचायतों के कार्यकाल में मलाई खाई, और अब जिले में मलाल झेल रहे हैं।
कलेक्टर साहब के कार्यकाल में —
- काजू-बादाम और नाश्ते के लिए फर्जी बिल,
- दो पन्नों की फोटो कॉपी ₹4000 में,
- 20 लीटर पेंट के लिए 275 मजदूर,
- और अब एनएसए के तहत निर्दोष व्यक्ति को जेल भेजने का मामला।
हाईकोर्ट ने जब क्लास ली तो पता चला कि कलेक्टर साहब ने झूठा हलफनामा दिया था। अब कोर्ट ने वेतन से पेनाल्टी काटने का आदेश दिया है। कवि दिनकर की पंक्ति याद आती है —
“जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।”
हम तो बस यही कहेंगे साहब — थोड़ा संवेदनशील बन जाइए। वरना आपमें और आरआर वाले अफसरों में फर्क रह ही क्या जाएगा?
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फायर फाइटर कमिश्नर
शहर के विकास की कमान संभाले कमिश्नर मैडम के घर में चिमनी ब्लास्ट हुआ। पर उनकी सूझबूझ, सजगता व तत्परता ने बड़ा हादसा टाल दिया। उन्होंने तत्काल ही फायर एक्सटिंग्विशर लिया और खुद ही आग पर काबू पा लिया। घर सुरक्षित, परिवार सकुशल। हालांकि देर रात तक निगमकर्मी उनके घर पर जुटे रहे। नगर निगम कर्मचारी अब उन्हें फायर फाइटर कमिश्नर कह रहे हैं। मैडम ने इसी बहाने आदेश निकला है — सभी ऊँची बिल्डिंगों की फायर NOC का सिस्टम ठीक किया जाए। मैडम ने दिखाया कि नेतृत्व का अर्थ संकट में स्थिर रहना होता है।
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इंजीनियर साहब को चाहिए ओपन जिम
बात कमिश्नर मैडम की निक ही चुकी है तो बता दें कि वे निगम में जबरदस्त कसावट कर रही है। लेकिन नीचे के इंजीनियर साहब की सुबोधता अभी भी नहीं हैं। तभी उन्होंने एक ठेकेदार को बुलाया और कहा — “कॉलोनी के पार्क में ओपन जिम लगाओ।” ठेकेदार मान गया, पर बाद में पता चला कि पार्क निजी कॉलोनी का है —
निगम वहाँ काम नहीं कर सकता। ठेकेदार पीछे हट गया, तो इंजीनियर साहब भड़क गए। सीधे धमकी दी — “देख लूंगा।” हालांकि, इंजीनियर को इस बात का भी डर है कि कहीं ठेकेदार मैडम के समक्ष प्रकट न हो जाए। इसलिए इंजीनियर साहब ठेकेदार को सिर्फ देख ही रहे हैं, कर कुछ नहीं रहे हैं।
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युवा आईएएस और भोपाल की जमीन
वो युवा आईएएस याद हैं? जिन्होंने ₹40 करोड़ का जुर्माना ₹4,000 में बदलकर अंतरराष्ट्रीय फलक पर में अखंड लोकप्रियता हासिल की थी। अब वही साहब राजधानी में सुर्खियों में हैं — क्योंकि उन्होंने तालाब कैचमेंट एरिया में ज़मीन खरीदी है। वो भी उसी “पार्टनर” के साथ, जो घोटाले के मुख्य बाबू का रिश्तेदार है। काली कमाई का असर यही होता है — इंसान ज़मीन तो खरीद लेता है, पर जमीन पर टिक नहीं पाता। तो खबर यह है कि साहब सरकार को इसकी सूचना देना भूल गए।
अब ईडी और इनकम टैक्स की परछाईं उनकी फाइल पर मंडरा रही है।
मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर याद आता है — “कर्ज की पीते थे मय, पर समझते थे कि हाँ,
रंग लाएगी हमारी फकीरी एक दिन।” पर अफसरी की फकीरी और फर्जी कमाई — साथ नहीं चलती साहब।
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चुनावी पर्यटन — कोलकाता की सैर
प्रदेश के राजनेताओं के लिए दूसरे राज्य में चुनाव सिरदर्द और अफसरों के लिए सैर-सपाटा होता है। बिहार में शराबबंदी है, और चुनाव में इस बार सरहद से बाहर घूमा-फिरी पर भी सख्ती ज्यादा थी। मतलब कई अफसरों के लिए यह मज़ा किरकिरा होने जैसा था। लिहाजा, कई अफसरों ने ऑब्जर्वर ड्यूटी से किनारा कर गए। परन्तु खबर यह है कि शराबबंदी के बाद भी कुछ साहबों ने बिहार में पेटियों से शराब की जुगाड़ बैठा ली। वहीं, घूमा-घूमाई भी खूब हुई। एक साहब तो कोलकाता की सैर कर आए। अब वे खुद को ईमानदार, अनुशासनप्रिय और नियमों का भक्त बताते हैं, पर भवन निर्माण संस्था में नियमों का डंडा चलाने वाले साहब के लिए लोग फुसफुसाते हैं — “कानून का डर दूसरों के लिए होता है, अपने लिए नहीं।” चुनावी टूरिज्म के बाद अफसरी का ग्लो बढ़ गया है, बस नैतिकता का टैक्स चुकाना बाकी है।



